गणपति बप्पा मोरिया

गणपति बप्पा मोरिया

#गणेशजी
*श्री गजानन प्रसंन्न*.....🎋
*जय श्री गणेश*....🌺
*श्रीगणेश की रोचक बातें*.....🌸📖🌸

भगवान श्रीगणेश को विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति, लंबोदर, व्रकतुंड आदि कई विचित्र नामों से पुकारा जाता है। जितने विचित्र इनके नाम हैं उतनी विचित्र इनसे जुड़ी कथाएं भी हैं। अनेक धर्म ग्रंथों में भगवान श्रीगणेश की कथाओं का वर्णन मिलता है। इन कथाओं में भगवान श्रीगणेश से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं।

1- *शिवमहापुराण* के अनुसार माता पार्वती को श्रीगणेश का निर्माण करने का विचार उनकी सखियां जया और विजया ने दिया था। जया-विजया ने पार्वती से कहा था कि नंदी आदि सभी गण सिर्फ महादेव की आज्ञा का ही पालन करते हैं। अत: आपको भी एक गण की रचना करनी चाहिए जो सिर्फ आपकी आज्ञा का पालन करे। इस प्रकार विचार आने पर माता पार्वती ने श्रीगणेश की रचना अपने शरीर के मैल से की।

2- *शिवमहापुराण* के अनुसार श्रीगणेश के शरीर का रंग लाल और हरा है। श्रीगणेश को जो दूर्वा चढ़ाई जाती है वह जडऱहित, बारह अंगुल लंबी और तीन गांठों वाली होना चाहिए। ऐसी 101 या 121 दूर्वा से श्रीगणेश की पूजा करना चाहिए।

3- *ब्रह्मवैवर्त पुराण* के अनुसार माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुण्यक नाम व्रत किया था, इसी व्रत के फलस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण पुत्र रूप में माता पार्वती को प्राप्त हुए।

4- *ब्रह्मवैवर्त पुराण* के अनुसार जब सभी देवता श्रीगणेश को आशीर्वाद दे रहे थे तब शनिदेव सिर नीचे किए हुए खड़े थे। पार्वती द्वारा पुछने पर शनिदेव ने कहा कि मेरे द्वारा देखने पर आपके पुत्र का अहित हो सकता है लेकिन जब माता पार्वती के कहने पर शनिदेव ने बालक को देखा तो उसका सिर धड़ से अलग हो गया।

5- *ब्रह्मवैवर्त पुराण* के अनुसार जब शनि द्वारा देखने पर माता पार्वती के पुत्र का मस्तक कट गया तो भगवान श्रीहरि गरूड़ पर सवार होकर उत्तर दिशा की ओर गए और पुष्पभद्रा नदी के तट पर हथिनी के साथ सो रहे एक गजबालक का सिर काटकर ले आए। उस गजबालक का सिर श्रीहरि ने माता पार्वती के मस्तक विहिन पुत्र के धड़ पर रखकर उसे पुनर्जीवित कर दिया।

6- *ब्रह्मवैवर्त पुराण" के अनुसार एक बार किसी कारणवश भगवान शिव ने क्रोध में आकर सूर्य पर त्रिशूल से प्रहार किया। इस प्रहार से सूर्यदेव चेतनाहीन हो गए। सूर्यदेव के पिता कश्यप ने जब यह देखा तो उन्होंने क्रोध में आकर शिवजी को श्राप दिया कि जिस प्रकार आज तुम्हारे त्रिशूल से मेरे पुत्र का शरीर नष्ट हुआ है, उसी प्रकार तुम्हारे पुत्र का मस्तक भी कट जाएगा। इसी श्राप के फलस्वरूप भगवान श्रीगणेश के मस्तक कटने की घटना हुई।

7- *ब्रह्मवैवर्त पुराण* के अनुसार एक बार तुलसीदेवी गंगा तट से गुजर रही थी, उस समय वहां श्रीगणेश भी तप कर रहे थे। श्रीगणेश को देखकर तुलसी का मन उनकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी ने श्रीगणेश से कहा कि आप मेरे स्वामी हो जाइए लेकिन श्रीगणेश ने विवाह करने से इंकार कर दिया। क्रोधवश तुलसी ने श्रीगणेश को विवाह करने का श्राप दे दिया और श्रीगणेश ने तुलसी को वृक्ष बनने का।

8- *शिवमहापुराण के अनुसार श्रीगणेश* का विवाह प्रजापति विश्वरूप की पुत्रियों सिद्धि और बुद्धि से हुआ है। श्रीगणेश के दो पुत्र हैं इनके नाम क्षेत्र तथा लाभ हैं।

9- *शिवमहापुराण* के अनुसार जब भगवान शिव त्रिपुर का नाश करने जा रहे थे तब आकाशवाणी हुई कि जब तक आप श्रीगणेश का पूजन नहीं करेंगे तब तक तीनों पुरों का संहार नहीं कर सकेंगे। तब भगवान शिव ने भद्रकाली को बुलाकर गजानन का पूजन किया और युद्ध में विजय प्राप्त की।

10- *ब्रह्मवैवर्त पुराण* के अनुसार एक बार परशुराम जब भगवान शिव के दर्शन करने कैलाश पहुंचे तो भगवान ध्यान में थे। तब श्रीगणेश ने परशुरामजी को भगवान शिव से मिलने नहीं दिया। इस बात से क्रोधित होकर परशुरामजी ने फरसे से श्रीगणेश पर वार कर दिया। वह फरसा स्वयं भगवान शिव ने परशुराम को दिया था। श्रीगणेश उस फरसे का वार खाली नहीं होने देना चाहते थे इसलिए उन्होंने उस फरसे का वार अपने दांत पर झेल लिया, जिसके कारण उनका एक दांत टूट गया। तभी से उन्हें एकदंत भी कहा जाता है।

11- *महाभारत का लेखन श्रीगणेश* ने किया है ये बात तो सभी जानते हैं लेकिन महाभारत लिखने से पहले उन्होंने महर्षि वेदव्यास के सामने एक शर्त रखी थी इसके बारे में कम ही लोग जानते हैं। शर्त इस प्रकार थी कि श्रीगणेश ने महर्षि वेदव्यास से कहा था कि यदि लिखते समय मेरी लेखनी क्षणभर के लिए भी न रूके तो मैं इस ग्रंथ का लेखक बन सकता हूं।

तब महर्षि वेदव्यास जी ये शर्त मान ली और श्रीगणेश से कहा कि मैं जो भी बोलूं आप उसे बिना समझे मत लिखना। तब वेदव्यास जी बीच-बीच में कुछ ऐसे श्लोक बोलते कि उन्हें समझने में श्रीगणेश को थोड़ा समय लगता। इस बीच महर्षि वेदव्यास अन्य काम कर लेते थे।

12- *गणेश पुराण* के अनुसार छन्दशास्त्र में 8 गण होते हैं- मगण, नगण, भगण, यगण, जगण, रगण, सगण, तगण। इनके अधिष्ठाता देवता होने के कारण भी इन्हें गणेश की संज्ञा दी गई है। अक्षरों को गण भी कहा जाता है। इनके ईश होने के कारण इन्हें गणेश कहा जाता है, इसलिए वे विद्या-बुद्धि के दाता भी कहे गए हैं।

*गणपति बाप्पा मोरया*......🌺
*मंगल मूतिॅ मोरया*.....

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Dheerendra Gupta Feb 27, 2021

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Geeta Feb 26, 2021

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. सत्पुरूषों का उपहास उचित नहीं एक समयकी बात है। नवयौवन सम्पन्ना तुलसीदेवी नारायणपरायण हो तपस्या के निमित्त से तीर्थो में भ्रमण करती हुई गंगा-तट पर जा पहुँचीं। वहाँ उन्होंने गणेश को देखा, जो किशोरवय और नवयौवन से सम्पन्न थे; वे अत्यन्त सुन्दर, शुद्ध और पीताम्बर धारण किये हुए थे; उनके सारे शरीर में चन्दन का आलेप लगा था; वे रत्नो के आभूषणों से विभूषित थे। सुन्दरता जिनके मन का अपहरण नहीं कर सकती; जो कामना रहित, जितेन्द्रियों में सर्वश्रेष्ठ और योगीन्द्रों के गुरु-के-गुरु हैं तथा मन्द-मन्द मुसकराते हुए जन्म, मृत्यु और बुढ़ापा का नाश करने वाले श्रीकृष्ण के चरणकमलों का जो ध्यान कर रहे थे; ऐसे उन पार्वती नन्दन को देखते ही तुलसी का मन गणेश की ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी उनसे लम्बोदर तथा गजमुख होने का कारण पूछकर उनका उपहास करने लगी। ध्यान-भग होने पर गणेशजी ने पूछा-''वत्से! तुम कौन हो ? किसकी कन्या हो ? यहाँ तुम्हारे आने का क्या कारण है? माता! यह मुझे बतलाओ; क्योंकि शुभे! तपस्वियों का ध्यान भंग करना सदा पाप जनक तथा अमंगलकारी होता है। शुभे! श्रीकृष्ण कल्याण करें, कृपानिधि विघ्न का विनाश करें और मेरे ध्यान- भंग से उत्पन्न हुआ दोष तुम्हारे लिये अमंगलकारक न हो। इस पर तुलसी ने कहा- 'प्रभो! मैं धर्मात्मज की नवयुवती कन्या हूँ और तपस्या में संलग्न हूँ। मेरी यह तपस्या पति-प्राप्ति के लिये है; अतः आप मेरे स्वामी हो जाइये। तुलसी की बात सुनकर अगाध बुद्धिसम्पन्न गणेश श्रीहरि का स्मरण करते हुए विदुषी तुलसी से मधुरवाणी में बोले। गणेश ने कहा- 'हे माता! विवाह करना बड़ा भयंकर होता है; अतः इस विषय में मेरी बिलकुल इच्छा नहीं है; क्योंकि विवाह दुःख का कारण होता है, उससे सुख कभी नहीं मिलता। यह हरि-भक्ति का व्यवधान, तपस्या के नाश का कारण, मोक्ष द्वार का किवाड़, भव-बन्धन की रस्सी, गर्भवास कारक, सदा तत्त्वज्ञान का छेदक और संशयों का उद्गम स्थान है। इसलिये महाभागे ! मेरी ओर से मन लौटा लो और किसी अन्य पति की तलाश करो।' गणेश के ऐसे वचन सुनकर तुलसी को क्रोध आ गया। तब वह साध्वी गणे शको शाप देते हुए बोली-'तुम्हारा विवाह होगा।' यह सुनकर शिव-तनय सुरश्रेष्ठ गणेश ने भी तुलसी को शाप दिया- 'देवि! तुम निस्सन्देह असुर द्वारा ग्रस्त होओगी। तत्पश्चात् महापुरुषों के शाप से तुम वृक्ष हो जाओगी।' गणेश के शाप से वह चिरकाल तक शंखचूड की प्रिय पत्नी बनी रही। तदनन्तर असुरराज शंखचूड शंकरजी के त्रिशूल से मृत्यु को प्राप्त हो गया, तब नारायण प्रिया तुलसी कलांश से वृक्ष भाव को प्राप्त हो गयी। इसलिये सत्पुरुषों के प्रति उपहास पूर्ण व्यवहार नहीं करना चाहिये। [ब्रह्मवैवर्तपुराण] कल्याण (९५/०२) ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" *********************************************

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Geeta Feb 25, 2021

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