TR. Madhavan
TR. Madhavan Dec 3, 2017 Sun Temple

।। अति महत्वपूर्ण बातें पूजा से जुड़ी हुई।।

।। अति महत्वपूर्ण बातें पूजा से जुड़ी हुई।।

★ एक हाथ से प्रणाम नही करना चाहिए।

★ सोए हुए व्यक्ति का चरण स्पर्श नहीं करना चाहिए।

★ बड़ों को प्रणाम करते समय उनके दाहिने पैर पर दाहिने हाथ से और उनके बांये पैर को बांये हाथ से छूकर प्रणाम करें।

★ जप करते समय जीभ या होंठ को नहीं हिलाना चाहिए। इसे उपांशु जप कहते हैं। इसका फल सौगुणा फलदायक होता हैं।

★ जप करते समय दाहिने हाथ को कपड़े या गौमुखी से ढककर रखना चाहिए।

★ जप के बाद आसन के नीचे की भूमि को स्पर्श कर नेत्रों से लगाना चाहिए।

★ संक्रान्ति, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, रविवार और सन्ध्या के समय तुलसी तोड़ना निषिद्ध हैं।

★ दीपक से दीपक को नही जलाना चाहिए।

★ यज्ञ, श्राद्ध आदि में काले तिल का प्रयोग करना चाहिए, सफेद तिल का नहीं।

★ शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाना चाहिए। पीपल की सात परिक्रमा करनी चाहिए। परिक्रमा करना श्रेष्ठ है,

★ कूमड़ा-मतीरा-नारियल आदि को स्त्रियां नहीं तोड़े या चाकू आदि से नहीं काटें। यह उत्तम नही माना गया हैं।

★ भोजन प्रसाद को लाघंना नहीं चाहिए।

★ देव प्रतिमा देखकर अवश्य प्रणाम करें।

★ किसी को भी कोई वस्तु या दान-दक्षिणा दाहिने हाथ से देना चाहिए।

★ एकादशी, अमावस्या, कृृष्ण चतुर्दशी, पूर्णिमा व्रत तथा श्राद्ध के दिन क्षौर-कर्म (दाढ़ी) नहीं बनाना चाहिए ।

★ बिना यज्ञोपवित या शिखा बंधन के जो भी कार्य, कर्म किया जाता है, वह निष्फल हो जाता हैं।

★ शंकर जी को बिल्वपत्र, विष्णु जी को तुलसी, गणेश जी को दूर्वा, लक्ष्मी जी को कमल प्रिय हैं।

★ शंकर जी को शिवरात्रि के सिवाय कुंुकुम नहीं चढ़ती।

★ शिवजी को कुंद, विष्णु जी को धतूरा, देवी जी को आक तथा मदार और सूर्य भगवानको तगर के फूल नहीं चढ़ावे।

★ अक्षत देवताओं को तीन बार तथा पितरों को एक बार धोकर चढ़ावंे।

★ नये बिल्व पत्र नहीं मिले तो चढ़ाये हुए बिल्व पत्र धोकर फिर चढ़ाए जा सकते हैं।

★ विष्णु भगवान को चावल गणेश जी को तुलसी, दुर्गा जी और सूर्य नारायण को बिल्व पत्र नहीं चढ़ावें।

★ पत्र-पुष्प-फल का मुख नीचे करके नहीं चढ़ावें, जैसे उत्पन्न होते हों वैसे ही चढ़ावें।

★ किंतु बिल्वपत्र उलटा करके डंडी तोड़कर शंकर पर चढ़ावें।

★पान की डंडी का अग्रभाग तोड़कर चढ़ावें।

★ सड़ा हुआ पान या पुष्प नहीं चढ़ावे।

★ गणेश को तुलसी भाद्र शुक्ल चतुर्थी को चढ़ती हैं।

★ पांच रात्रि तक कमल का फूल बासी नहीं होता है।

★ दस रात्रि तक तुलसी पत्र बासी नहीं होते हैं।

★ सभी धार्मिक कार्यो में पत्नी को दाहिने भाग में बिठाकर धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करनी चाइए।

★ पूजन करनेवाला ललाट पर तिलक लगाकर ही पूजा करें।

★ पूर्वाभिमुख बैठकर अपने बांयी ओर घंटा, धूप तथा दाहिनी ओर शंख, जलपात्र एवं पूजन सामग्री रखें।

★ घी का दीपक अपने बांयी ओर तथा देवता को दाहिने ओर रखें एवं चांवल पर दीपक रखकर प्रज्वलित करें।

आप सभी को निवेदन है अगर हो सके तो और लोगों को भी आप इन महत्वपूर्ण बातों से अवगत करा सकते हैं

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कामेंट्स

Pk Nanda Dec 3, 2017
Very nice and useful post Dhanyabad ji Apka din mangalmaya ho

Ajnabi Dec 3, 2017
very nice jay shree Radhe krishna veeruda

suman batham Dec 3, 2017
बहुत उपयोगी जानकारी दी है आपने, धन्यवाद

rakesh gaur Dec 3, 2017
बहुत अच्छी जानकारियां

TR. Madhavan Dec 3, 2017
सभीको धन्यवाद शुभरात्रि।

Yogesh Kumar Sharma Dec 4, 2017
भगवान भोलेनाथ आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें. ओम नमः शिवायः

kalavati Rajput May 23, 2019

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Swami Lokeshanand May 23, 2019

देखो, मनुष्य के तीन बड़े दुर्धर्ष शत्रु हैं, काम, क्रोध और लोभ। "तात तीन अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ" सूर्पनखा काम है, ताड़का क्रोध और मंथरा लोभ है। ताड़का पर प्रहार रामजी ने किया, मंथरा पर शत्रुघ्नजी ने, सूर्पनखा पर लक्षमणजी ने। उनका असली चेहरा पहचानते ही, किसी को मारा गया, किसी को सुधारा गया, एक को भी छोड़ा नहीं गया। संकेत है कि, सावधान साधक, कैसी भी वृत्ति उठते ही, तुरंत पहचान ले, कि कौन वृत्ति साधन मार्ग में मित्र है और कौन शत्रु। शत्रु पक्ष की वृत्ति का, विजातीय वृत्ति का, आसुरी वृत्ति का, उसे जानते ही, बिना अवसर दिए, बिना एक पल भी गंवाए, तुरंत यथा योग्य उपाय करना ही चाहिए। एक और विशेष बात है, ये कामादि प्रथम दृष्ट्या किसी आवरण में छिप कर ही वार करते हैं, कभी कर्तव्य बन कर, कभी सुंदर बन कर, सुखरूप बनकर, आवश्यकता बनकर, मजबूरी बनकर आते हैं। सबके सामने आते हैं, कच्चा साधक उलझ जाता है, सच्चा साधक सुलझ जाता है। अभी अभी लक्षमणजी के कारण सूर्पनखा का वास्तविक रूप प्रकट हुआ। अब रामजी मारीच का वास्तविक रूप प्रकट करेंगे। फिर सीताजी रावण का वास्तविक रूप प्रकट कर देंगी। भगवान खेल खेल में खेल खेलते हैं। एक तो उनकी यह लीला एक खेल है। इस खेल में तीन और खेल खेले गए। अयोध्या में खेल हुआ गेंद का, रामजी हार गए, भरतजी को जिता दिया। चित्रकूट में खेल हुआ, अयोध्या को गेंद बनाया गया, संदेह हार गया, स्नेह जीत गया। आज पंचवटी में भी एक खेल खेला जा रहा है, यहाँ सूर्पनखा को गेंद बनाया गया है, वासना हार रही है, उपासना जीत रही है। "देखो ठुकराई जाती है पंचवटी में इक बाला। भैया दो राजकुमारों ने उसको गेंद बना डाला॥ दुनिया में दुनियावालों को जो ठोकर रोज लगाती है। वो राम और रामानुज के पैरों की ठोकर खाती है॥" आप के पास भी सूर्पनखा आए तो ठोकर से ही स्वागत करना। अब विडियो देखें- सूर्पनखा निरूपण https://youtu.be/AMqSUheFr2c

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Uma Sood May 23, 2019

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