ॐ साईं राम

ॐ साईं राम

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🌷 OM ❤ SAI ❤ RAM 🌷 बाबा की लीलाओं का कोई भी अंत न ❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤ पा सका । अब उन लीलाओं में से एक ❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤ लीला का यहाँ भी दर्शन करें । भक्तों के ❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤ संकटों के घटित होने के पूर्व ही बाबा ❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤ उपयुक्त अवसर पर किस प्रकार उनकी ❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤❤ रक्षा किया करते थे । ❤❤❤❤❤❤❤ श्री. बालासाहेब मिरीकर, जो सरदार काकासाहेब के सुपुत्र तथा कोपरगाँव के मामलतदार थे, एक बार दौरे पर चितली जा रहे थे । तभी मार्ग में, वे साईबाबा के दर्शनार्थ शिरडी पधारे । उन्होंने मसजिद में जाकर बाबा की चरण-वन्दना की और सदैव की भाँति स्वास्थ्य तथा अन्य विषयों पर चर्चा की । बाबा ने उन्हें चेतावनी देकर कहा कि क्या तुम अपनी द्घारकामाई को जानते हो । श्री. बालासाहेब इसका कुछ अर्थ न समझ सके, इसीलिए वे चुप ही रहे । बाबा ने उनसे पुनः कहा कि जहाँ तुम बैठे हो, वही द्घारकामाई है । 💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖 जो उसकी गोद में बैठता है, वह अपने 💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖 बच्चों के समस्त दुःखों और 💖💖💖💖💖💖💖💖💖 कठिनाइयों को दूर कर देती है । यह 💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖 मसजिद माई परम दयालु है । सरल 💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖 हृदय भक्तों की तो वह माँ है और 💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖 संकटों में उनकी रक्षा अवश्य करेगी । 💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖 जो उसकी गोद में एक बार बैठता है, 💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖 उसके समस्त कष्ट दूर हो जाते है । जो 💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖 उसकी छत्रछाया में विश्राम करता है, 💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖 उसे आनन्द और सुख की प्राप्ति होती 💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖 है । 💖💖 तदुपरांत बाबा ने उन्हें उदी देकर अपना वरद हस्त उनके मस्तक पर रख आर्शीवाद दिया । जब श्री. बालासाहेब जाने के लिये उठ खड़े हुए तो बाबा बोले कि क्या तुम लंबे बाबा (अर्थात् सर्प) से परिचित हो । और अपनी बाई मुट्ठी बन्द कर उसे दाहिने हाथ की कुहनी के पास ले जाकर दाहिने हाथ को साँप के सदृश हिलाकर बोले कि वह अति भयंकर है, परन्तु द्घारकामाई के लालों का वह कर ही क्या सकता है । जब स्वंय ही द्घारकामाई उनकी रक्षा करने वाली है तो सर्प की सामर्थ्य ही क्या है । वहाँ उपस्थित लोग इसका अर्थ तथा मिरीकर को इस प्रकार चोतावनी देने का कारण जानना चाहते थे, परन्तु पूछने का साहस किसी में भी न होता था । बाबा ने शामा को बुलाया और बालासाहेब के साथ जाकर चितली यात्रा का आनन्द लेने की आज्ञा दी । तब शामा ने जाकर बाबा का आदेश बालासाहेब को सुनाया । वे बोले कि मार्ग में असुविधायें बहुत है, अतः आपको व्यर्थ ही कष्ट उठाना उचित नहीं है । बालासाहेब ने जो कुछ कहा, वह शामा ने बाबा को बताया । बाबा बोले कि अच्छा ठीक है, न जाओ । सदैव उचित अर्थ ग्रहणकर श्रेष्ठ कार्य ही करना चाहिये । जो कुछ होने वाला है, सो तो होकर ही रहेगा । बालासाहेब ने पुनः विचार कर शामा को अपने साथ चलने के लिये कहा । तब शामा पुनः बाबाकी आज्ञा प्राप्त कर बालासाहेब के साथ ताँगे में रवाना हो गये । वे नौ बजे चितली पहुँचे और मारुति मंदिर में जाकर ठहरे । आफिस के कर्मचारीगण अभी नहीं आये थे, इस कारण वे यहाँ-वहाँ की चर्चायें करने लगे । बालासाहेब दैनिक पत्र पढ़ते हुए चटाई पर शांतिपूर्वक बैठे थे । उनकी धोती का ऊपरी सिरा कमर पर पड़ा हुआ था और उसी के एक भाग पर एक सर्प बैठा हुआ था । किसी का भी ध्यान उधर न था । वह सी-सी करता हुआ आगे रेंगने लगा । यह आवाज सुनकर चपरासी दौड़ा और लालटेन ले आया । सर्प को देखकर वह साँप साँप कहकर उच्च स्वर में चिल्लाने लगा । तब बालासाहेब अति भयभीत होकर काँपने लगे । शामा को भी आश्चर्य हुआ । तब वे तथा अन्य व्यक्ति वहाँ से धीरे से हटे और अपने हाथ में लाठियाँ ले ली । सर्प धीरे-धीरे कमर से नीचे उतर आया । तब लोगों ने उसका तत्काल ही प्राणांत कर दिया । जिस संकट की बाबा ने भविष्यवाणी की थी, वह टल गया और साई-चरणों में बालासाहेब का प्रेम दृढ़ हो गया । ( From -- Sri Sai Satcharitra ) 🌷 SRI SATCHIDANANDA SADGURU SAINATH MAHARAJ KI JAI 🌷

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prakash barde Apr 13, 2021

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