#महाभागवती_जनाबाई श्रीनामदेव जी की भक्ति का कौन वर्णन कर सकता है जबकि उनकी दासी जनाबाई की ही भक्ति अकथनीय है। श्रीनामदेव जी के सत्संग में जनाबाई के ऊपर ऐसा प्रेमरंग चढ़ा की वह निरन्तर नामजप करती हुई विभोर ही रहा करती थी और स्वयं भगवान श्रीपंढ़रीनाथजी उस महा-भागवती के साथ बैठकर चक्की चलाते थे, साथ- साथ कपड़े धोते थे। श्रीजनाबाई की भक्ति की प्रशंसा सुनकर परम्- भागवत श्रीकबीरदास जी काशी से पैदल चलकर पंढरपुर गये। श्रीजनाबाई का पता लगाये तो पता चला कि वह कण्डे (उपले) लेने गई है। जब पता लगाते-लगाते वहाँ पहुँचे तो श्रीकबीरदास जी ने देखा कि जनाबाई एक दूसरी औरत से झगड़ रही है। झगड़ा किसी और बात का नही, कण्डो का ही झगड़ा था। जना उस स्त्री से कहती थी कि तुमने मेरे कण्डे चुराये है। वह कहती थी कि नही, ये तो मेरे ही कण्डे है। श्रीकबीरदासजी के समझ मे नही आ रहा था कि यह कैसी भक्त है, जो तुच्छ कण्डो के लिये इतना बखेड़ा किये है। पुनः क्या पहचान है कि उसने इनके कण्डे चुराये है, टोकरी में रखे हुए सभी कण्डे एक से लगते थे। अंत मे श्रीकबीरदासजी ने पूछ ही लिया कि बाईजी! आपके कण्डो की कुछ पहचान भी है? श्रीजनाबाई ने कहा- पहचान क्यो नही है। मेरे कण्डो से 'विट्ठल' नाम की ध्वनि निकल रही होगी। यह सुनकर श्रीकबीरदासजी दंग रह गये और सचमुच एक कंडा कान से लगाकर सुने तो उससे आवाज निकल रही थी- 'जै विट्ठल जै विट्ठल विट्ठल'। और जो स्त्री के कण्डे थे, उनसे कोई ध्वनि नही निकल रही थी, वह तो कण्डे ही थे। श्रीकबीरदासजी नतमस्तक हो गए जनाबाई के सामने। धन्य है जनाबाई जिनके स्पर्श से जड़ भी चैतन्य के भाँति भगवन्नाम की रट लगा रहे है। ।।राधे राधे।।

#महाभागवती_जनाबाई

श्रीनामदेव जी की भक्ति का कौन वर्णन कर सकता है जबकि उनकी दासी जनाबाई की ही भक्ति अकथनीय है। श्रीनामदेव जी के सत्संग में जनाबाई के ऊपर ऐसा प्रेमरंग चढ़ा की वह निरन्तर नामजप करती हुई विभोर ही रहा करती थी और स्वयं भगवान श्रीपंढ़रीनाथजी उस महा-भागवती के साथ बैठकर चक्की चलाते थे, साथ- साथ कपड़े धोते थे। श्रीजनाबाई की भक्ति की प्रशंसा सुनकर परम्- भागवत श्रीकबीरदास जी काशी से पैदल चलकर पंढरपुर गये।
श्रीजनाबाई का पता लगाये तो पता चला कि वह कण्डे (उपले) लेने गई है। जब पता लगाते-लगाते वहाँ पहुँचे तो श्रीकबीरदास जी ने देखा कि जनाबाई एक दूसरी औरत से झगड़ रही है। झगड़ा किसी और बात का नही, कण्डो का ही झगड़ा था। जना उस स्त्री से कहती थी कि तुमने मेरे कण्डे चुराये है। वह कहती थी कि नही, ये तो मेरे ही कण्डे है।
श्रीकबीरदासजी के समझ मे नही आ रहा था कि यह कैसी भक्त है, जो तुच्छ कण्डो के लिये इतना बखेड़ा किये है। पुनः क्या पहचान है कि उसने इनके कण्डे चुराये है, टोकरी में रखे हुए सभी कण्डे एक से लगते थे।
अंत मे श्रीकबीरदासजी ने पूछ ही लिया कि बाईजी! आपके कण्डो की कुछ पहचान भी है?
श्रीजनाबाई ने कहा- पहचान क्यो नही है। 
मेरे कण्डो से 'विट्ठल' नाम की ध्वनि निकल रही होगी। यह सुनकर श्रीकबीरदासजी दंग रह गये और सचमुच एक कंडा कान से लगाकर सुने तो उससे आवाज निकल रही थी-
'जै विट्ठल जै विट्ठल विट्ठल'।
और जो स्त्री के कण्डे थे, उनसे कोई ध्वनि नही निकल रही थी, वह तो कण्डे ही थे।
श्रीकबीरदासजी नतमस्तक हो गए जनाबाई के सामने। धन्य है जनाबाई जिनके स्पर्श से जड़ भी चैतन्य के भाँति भगवन्नाम की रट लगा रहे है।

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🙏 मूर्ति में जान 🙏 एक लड़की थी... उसे अपने घर के संस्कारो की वजह से लड्डू गोपाल की भक्ति मिली... उस लड़की की बड़ी आस्था थी लड्डू गोपाल में.... वह लड़की हमेशा वृन्दावन जाती थी और लड्डू गोपाल के दर्शन कर के आती थी.... धीरे धीरे वह बड़ी होती रही पर उसने वृन्दावन जाना नहीं छोड़ा... उसकी शादी हो गयी, बच्चे हो गए, वो भी बड़े हो गए, उनकी भी शादी हो गयी.. पर उस लड़की का नियम कायम था.... एक दिन जब वो लड़की बहुत बुड़िया हो गयी और उसके बस की चलना नहीं रहा... वो वृन्दावन जाकर लड्डू गोपाल की एक मूर्ति ले आई... और घर में रह कर ही उनकी पूजा करने लगी... एक दिन पूजा करने के बाद उस बुड़िया ने अपनी बहु से कहा की, बहु इस मूर्ति तो अंदर वाले कमरे में रख दे... बहु उस मूर्ति को लेकर अंदर गयी पर गलती से उस से वोह मूर्ति छूट गयी... बड़ी जोर के आवाज हुई... बुड़िया घबराई सी चिल्लाई, क्या हुआ बहु... बहु बोली, कुछ नहीं माँ जी केवल मूर्ति गिर गयी है.... यह सुन कर बुड़िया जोर जोर से रोने लगी.... वो रो रो कर यही चिल्लाये जा रही थी की कोई जाओ और जाकर डॉक्टर को बुलवाओ... मेरे लड्डू गोपाल को चोट लग गयी... मेरे लड्डू गोपाल को चोट लग गयी.... पहले तो बहु ने सोचा के बुड़िया नाटक कर रही है... पर जब काफी देर हो जाने के बाद भी वोह चुप नहीं हुई तो बहु को लगा की बुड़िया पागल हो गयी है.. अक्सर बुड़ापे में लोग सठिया जाते है.. शाम को जब बुड़िया का बेटा घर आया और उसे बहु ने सब समझाया तो उसे भी लगा की माँ सचमुच पागल हो गयी है... भला मूर्ति के लिए भी कोई डॉक्टर आता है.. फिर उसे अपने बच्चो का ख्याल आया.. और उस ने निश्चय किया की माँ को पागल खाने भेजना पड़ेगा.. नहीं तो माँ के पागलपन का असर मेरे बच्चो पर भी पड़ सकता है.... वहां पास में ही एक समझदार आदमी रहता था... जब उसके कानो तक यह बात पहुची तो उसने, उस माँ के बेटे को बुलाया और उसे समझाया की, देखो बेटा बुड़ापा और बचपन दोनों एक जैसे होते है... जो आदते बचपन में होती है वो ही बुड़ापे में... तू एक काम कर जा और एक डॉक्टर को बुला ला... उसे पहले से ही समझा दियो की तुझे एक मूर्ति का चेकअप करना है..... और बाद में यह बोलना है की मूर्ति तो ख़तम हो गई और उस में अब जान बाकि नहीं है... जब उसे पैसे मिलेंगे तो भला उसे क्या दिक्कत होगी यह कहने में.. इस तरह तुम्हारी माँ को पागल खाने भी नहीं जाना पड़ेगा और और उसकी जिद्द भी पूरी हो जायेगी... बेटे को बात समझ में आ गयी... वो गया और जैसा उस आदमी ने बताया था एक डॉक्टर को समझा दिया... डॉक्टर भी राजी हो गया... अगले दिन डॉक्टर उस बुड़िया के घर गया.. और घर में घुसते ही बोला अरी बुड़िया कहा है तेरे लड्डू गोपाल... बुड़िया ने मूर्ति को दिखाते हुए कहा, आओ डॉक्टर साहब आओ... देखना जरा क्या हो गया मेरे लड्डू गोपाल को.. डॉक्टर दूर से ही बोला... अरी बुड़िया इस में तो जान बाकि नहीं है... यह तो ख़तम हो गई... बुड़िया को गुस्सा आ गया.. बुड़िया ने डॉक्टर से पूछा क्यों रे डॉक्टर कितने साल हो गए तुझे डाक्टरी करते हुए.. डॉक्टर सकपकाया... और बोला 40 साल पर क्यों... बुड़िया ने कहा की इतने साल हो गए तुझे डाक्टरी करते हुए पर इतना समझ नहीं आया की मरीज को हाथ लगाये बिना उसकी बीमारी का पता नहीं चलता.. डॉक्टर को लगा की वो कुछ ज्यादा ही जल्दी अपना काम ख़तम कर रहा है.. उस ने जा कर मूर्ति की हाथ के नब्ज देखि.. और कहा की ले माँ कुछ नहीं है तेरे लड्डू गोपाल में.. बुड़िया बोली बेटा सही से देख.. ऐसा नहीं हो सकता... डॉक्टर ने इस बार छाती को चेक कर के देखा.. और फिर बोला माँ कुछ नहीं है अब तेरी मूर्ति में.. यह ख़त्म हो गयी... बुडिया ने कहा की बेटा वोह जो मशीन होती है न तुम्हारे पास उस से चेक कर के देख... डॉक्टर समझ गया की बुड़िया स्तेथोस्कोपे की बात कर रही है.. अब उस को पैसे मिले थे तो उसे क्या दिक्कत थी वोह भी लगा कर चेक करने में.. जवाब तो उसे पता ही था... उस डॉक्टर ने अपना स्तेथोस्कोपे निकाला.. और उस को उस मूर्ति के छाती पर रखा.. मूर्ति में से जोर जोर के धक् धक् के आवाज आई.. डॉक्टर घबरा गया.. उसने बार बार चेक करा.. और हर बार धक् धक् की आवाज आई.. उस डॉक्टर ने उस बुड़िया के पैर पकड़ लिए और बोला.. की माँ यह जो दुनिया तुझे पागल कहती है असल में यह दुनिया पागल है जो इस मूर्ति के पीछे छुपी तेरी भावनाओ को नहीं देख सकी. इस मूर्ति में जान नहीं थी यह तो तेरी श्रद्धा थी की इस मूर्ति में भी जान आ गयी.. जय जय श्री राधे

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🌴गुरू की बात को गिरिधारी भी नही टाल सकते🌰🌰🌰🌰🌰 वृंदावन मे एक संत के पास कुछ शिष्य रहते थे उनमे से एक शिष्य मंद बुद्धि का था। एक बार गुरु देव ने सभी शिष्यों को अपने करीब बुलाया और सब को एक मास के लिए ब्रज मे अलग-अलग स्थान पर रहने की आज्ञा दी और उस मंद बुद्धि को बरसाने जाकर रहने को कहा। मंद बुद्धि ने बाबा से पुछा बाबा मेरे रहने खाने की व्यवस्था वहा कौन करेगा। बाबा ने हंस कर कह दिया राधा रानी, कुछ दिनों बाद एक एक करके सब बालक लौट आए पर वो मंद बुद्धि बालक नही आया। बाबा को चिंता हुई के दो मास हो गए मंद बुद्धि बालक नही आया जाकर देखना चाहिए, बाबा अपने शिष्य की सुध लेने बरसाने आ गए। बाबा ने देखा एक सुन्दर कुटिया के बाहर एक सुन्दर बालक बहुत सुन्दर भजन कर रहा है, बाबा ने सोचा क्यों ना इन्ही से पुछा जाए। बाबा जैसे ही उनके करिब गए वो उठ कर बाबा के चरणों में गिर गया और बोला आप आ गए गुरु देव! बाबा ने पुछा ये सब कैसे तु ठीक कैसे हो गया शिष्य बोला बाबा आपके ही कहने से किशोरी जी ने मेरे रहने खाने पीने की व्यवस्था की और मुझे ठीक कर भजन करना भी सिखाया। बाबा अपने शिष्य पर बरसती किशोरी जी की कृपा को देख खुब प्रसन्न हुए और मन ही मन सोचने लगे मेरे कारण मेरी किशोरी जी को कितना कष्ट हुआ। उन्होंने मेरे शब्दो का मान रखते हुए मेरे शिष्य पर अपनी सारी कृपा उडेल दी। इसलिए कहते है गुरू की बात को गिरिधारी भी नही टाल सकते। ।।।। जय सिया राम जी ।।।।

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🌹हरे कृष्णा 👏 भक्तों का संसार 🙏🌹हमारा सांवर दिलदार 🌹🙏 एक उच्च कोटि के संत के श्री मुख से हमने सुना वो कह रहे थे.... . हमने 10 साल की आयु मे घर छोड़ा करीब 20 साल हम पैदल ही घूमते रहे !! . पूरे भारतवर्ष के कोने कोने मे जा कर संतो से मिले व् ज्ञान प्राप्त किया !! . . हमको हमारे गुरुजनों ने पैसा अपने पास रखने से मना किया था और ये भी कहा था की इस ज्ञान को बेचना नहीं !! . अगर कोई देता भी तो गंगा जी मे या किसी नदी तालाब मे फैंक देते !! . हमको एक दिन अचानक मन मे आया की हम कभी रेलगाड़ी मे नहीं बैठे... . चलो आज रेल द्वारा ही सफ़र करते हैं... . पर जब टिकेट चेकर आया उसने 2-4 गालियाँ दी हमको और गाडी से उतार दिया साथ मे कहा की... . महाराज हट्टे कट्टे दीखते हो कुछ काम किया करो... . कुछ पैसे जोड़ कर टिकेट खरीद कर ही रेल मे सफ़र किया करो !! . हमको तो हर बात मे प्रभु की इच्छा ही दिखती थी... . अगले स्टेशन पर हमको उतार दिया गया . हमने पैदल चलना शुरू किया की इतने मे एक बहुत ही प्यारा गोल मटोल सा छोटा सा बच्चा आया बोला.... . ये लो टिकेट और अगली ट्रेन आएगी उसमे बैठ जाना !! . हम उससे कुछ और पूछते वो इतनी देर मे जल्दी से भागता हुआ आँखों से ओझल हो गया !! . पहली बार हमने सोचा ट्रेन मे बैठे किसी सज्जन ने टिकट भिजवा दी होगी... . उसके बाद भी 2-3 बार ऐसा ही हुआ !! . हमको शक सा हुआ की ये बच्चा हर जगह कैसे पहुँच जाता है.... . और टिकेट भी उसी जगह की कैसे दे जाता है जहां हमने जाना होता है !! . हम तो ठहरे फक्कड़ संत हमको अपने प्रोग्रामे का खुद पता नहीं होता एक रात पहले की हम सुबह किधर को जायेंगे !! . हमने एक बार ठाना की हम जगन्नाथ पुरी जायेंगे सुबह ही हम उत्तरप्रदेश से पैदल ही निकलने वाले थे!! . सुबह जैसे ही हम निकले थोड़ी दूर वो ही प्यारा सा बच्चा सिर्फ पीली पीताम्बरी पहने हमारे पास आया व् हाथ पकड़ कर बोला ये लो टिकेट.... . हमने भी आज जैसे सोच रक्खा था उसका हाथ कस के पकड़ लिया व् पुछा की तुम कौन हो और तुमको कैसे पता की हमको जाना है??? . तुम्हारे पास पैसे कहाँ से आये कौन तुमको भेजता है ??? . वो बच्चा मुस्कराया और बोला बाबा मे वो ही हूँ जिसको तुम दिन रात रिझाते हो अपने भावो मे .... . बाबा तुम्हारे अंतर मे जो छिपा है जो पूरे विश्व को चलाता है मे वो ही हूँ !! . बाबा तुमने अपना सब भार मुझ पर छोड़ रक्खा है तो क्या मे तुम्हारा योगक्षेम वहन नहीं करूंगा !! . बाबा कहते हैं काफी मीठे शब्द व् आत्मा परमात्मा की एकता का ज्ञान करवा के वो बच्चा चला गया !! . हम भी बहुत दिन वहीँ उसी जगह बेसुध पड़े रहे !! . आज हम 92 साल के हो गए और शरीर छूटने को है.... . कहीं जाना हो या कुछ किसी साथी संत को जरूरत हो वो बच्चा आज भी उसी रूप मे टिकेट या भोजन या दवाई लेकर आ जाता है !! . ये भी देखो हम वृद्ध हो गए पर वो बच्चा अभी भी बच्चा ही है उसकी न उम्र बड़ी हुई है न शक्ल बदली है !! . कुछ समझे वो हमारा सांवर दिलदार ही है !! . जरूरत है तो उस प्रभु पर विश्वास करने की... . इंसान सोचता है की मे ही अपनी ताकत दिमाग व् मेहनत से सब कुछ खरीद या पा सकता हूँ.... . आप अपनी सोच बदलिए कर्म करते जाईये फल उस पर छोड़ दीजिये !! . परम पूज्य श्री प्रभु दत्त ब्रह्मचारी जी महाराज संकीर्तन लगातार करते करवाते थे !! . उनका रोम रोम संकीर्तन मय हो चुका था !! . scientist n doctors ने एक्सपेरिमेंट किया उनके पूरे शरीर ,पर उनकी heart beat व् नब्ज पर instuments लगा दिए.... . जब उस ग्राफ को उन्होंने study किया तो सिर्फ और सिर्फ हर बार उनका मंत्र ही पाया . श्री कृष्ण गोविन्द हरे.मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेव !! जय जय श्री राधे 🙏🙏 . .

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🌿#अथ_🌿श्रीशिवमहिम्नस्तोत्रम्‌ 🌹🙏 महिम्नः पारं ते परमविदुषो यज्ञसदृशी स्तुतिर्ब्रह्मादीना मपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः । अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामधि गृणन् ममाप्येषः स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥१॥ १. हे प्रभु ! बड़े बड़े पंडित और योगीजन आपके महिमा को नहीं जान पाये तो मैं तो एक साधारण बालक हूँ, मेरी क्या गिनती ? लेकिन क्या आपके महिमा को पूर्णतया जाने बिना आपकी स्तुति नहीं हो सकती ? मैं ये नहीं मानता क्योंकि अगर ये सच है तो फिर ब्रह्मा की स्तुति भी व्यर्थ कहेलायेगी । मैं तो ये मानता हूँ कि सबको अपनी मति अनुसार स्तुति करने का हक है । इसलिए हे भोलेनाथ ! आप कृपया मेरे हृदय के भाव को देखें और मेरी स्तुति का स्वीकार करें । अतीतः पंथानं तव च महिमा वाड् मनसयो रतद्व्यावृत्यायं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि । स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥२॥ २. हे प्रभु ! आप मन और वाणी से पर है ईसलिए वाणी से आपकी महिमा का वर्णन कर पाना असंभव है । यही वजह है की वेद आपकी महिमा का वर्णन करते हुए 'नेति नेति' (मतलब ये नहि, ये भी नहि) कहकर रुक जाते है । आपकी महिमा और आपके स्वरूप को पूर्णतया जान पाना असंभव है, लेकिन जब आप साकार रूप में प्रकट होते हो तो आपके भक्त आपके स्वरूप का वर्णन करते नहीं थकते । ये आपके प्रति उनके प्यार और पूज्यभाव का परिणाम है । मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत स्तव ब्रह्मन्किं वा गपि सुरगुरोर्विस्मयपदम् । मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः पुनामीत्यर्थेस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥३॥ ३. हे त्रिपुरानाशक प्रभु, आपने अमृतमय वेदों की रचना की है । इसलिए जब देवों के गुरु, बृहस्पति आपकी स्तुति करते है तो आपको कोई आश्चर्य नहीं होता । मै भी अपनी मति अनुसार आपके गुणानुवाद करने का प्रयास कर रहा हूँ । मैं मानता हूँ कि इससे आपको कोई आश्चर्य नहीं होगा, मगर मेरी वाणी इससे अधिक पवित्र और लाभान्वित अवश्य होगी । तवैश्चर्यें यत्तद् जगदुदयरक्षाप्रलयकृत त्रयी वस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु । अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं विहंतुं व्योक्रोशीं विदधत इहै के जडधियः ॥४॥ ४. हे प्रभु, आप इस सृष्टि के सृजनहार है, पालनहार है और विसर्जनकार है । इस प्रकार आपके तीन स्वरूप है – ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा आप में तीन गुण है – सत्व, रज और तम । वेदों में इनके बारे में जीक्र किया गया है फिर भी अज्ञानी लोग आपके बारे में उटपटांग बातें करते रहते है । एसा करने से भले उन्हें संतुष्टि मिलती हो, मगर हकिकत से वो मुँह नहीं मोड़ सकते । किमिहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं । किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च ॥ अतकर्यैश्वर्येत्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः । कुतर्कोडयंकांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः ॥५॥ ५. हे प्रभु, मूर्ख लोग अक्सर तर्क करते रहते है कि ये सृष्टि की रचना कैसे हुई, किसकी ईच्छा से हुई, किन चिजों से उसे बनाया गया वगैरह वगैरह । उनका उद्देश्य लोगों में भ्रांति पैदा करने के अलावा कुछ नहि । सच पूछो तो ये सभी प्रश्नों के उत्तर आपकी दिव्य शक्ति से जुड़े है और मेरी सीमित शक्ति से उसे बयाँ करना असंभव है अजन्मानो लोकाः किमवयवंवतोडपि जगता । मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादत्य भवति ॥ अनीशो वा कुर्याद भुवनजनने कः परिकरो । यतो मंदास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥६॥ ६. हे प्रभु, आपके बिना ये सब लोक (सप्त लोक – भू: भुव: स्व: मह: जन: तप: सत्यं) का निर्माण क्या संभव है ? ये जगत का कोई रचयिता न हो, एसा क्या मुमकिन है ? आपके अलावा ईस सृष्टि का निर्माण कौन कर सकता है भला ? आपके अस्तित्व के बारे केवल मूर्ख लोगों को ही शंका हो सकती है त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च । रुचीनां वैचित्र्या दजुकुटिलनानापथजुषां नृणामेको गम्य स्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥७॥ ७. हे प्रभु ! आपको पाने के लिए अनगिनत मार्ग है - सांख्य मार्ग, वैष्णव मार्ग, शैव मार्ग, वेद मार्ग आदि । लोग अपनी रुचि के मुताबिक कोई एक मार्ग को पसंद करते है । मगर आखिरकार ये सभी मार्ग, जैसे अलग🕉️💕🕉️💕🕉️💕🕉️💕🕉️💕

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'कुब्जा उद्धार' की कथा !!!!!! 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ कंस की नगरी मथुरा में कुब्जा नाम की स्त्री थी, जो कंस के लिए चन्दन, तिलक तथा फूल इत्यादि का संग्रह किया करती थी। कंस भी उसकी सेवा से अति प्रसन्न था। जब भगवान श्रीकृष्ण कंस वध के उद्देश्य से मथुरा में आये, तब कंस से मुलाकात से पहले उनका साक्षात्कार कुब्जा से होता है। बहुत ही थोड़े लोग थे, जो कुब्जा को जानते थे। उसका नाम कुब्जा इसलिए पड़ा था, क्योंकि वह कुबड़ी थी। जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि उसके हाथ में चन्दन, फूल और हार इत्यादि है और बड़े प्रसन्न मन से वह लेकर जा रही है। तब श्रीकृष्ण ने कुब्जा से प्रश्न किया- "ये चन्दन व हार फूल लेकर इतना इठलाते हुए तुम कहाँ जा रही हो और तुम कौन हो?" कुब्जा ने उत्तर दिया कि- "मैं कंस की दासी हूँ। कुबड़ी होने के कारण ही सब मुझको कुब्जा कहकर ही पुकारते हैं और अब तो मेरा नाम ही कुब्जा पड़ गया है। मैं ये चंदन, फूल हार इत्यादि लेकर प्रतिदिन महाराज कंस के पास जाती हूँ और उन्हें ये सामग्री प्रदान करती हूँ। वे इससे अपना श्रृंगार आदि करते हैं।" श्रीकृष्ण ने कुब्जा से आग्रह किया कि- "तुम ये चंदन हमें लगा दो, ये फूल, हार हमें चढ़ा दो"। कुब्जा ने साफ इंकार करते हुए कहा- "नहीं-नहीं, ये तो केवल महाराज कंस के लिए हैं। मैं किसी दूसरे को नहीं चढ़ा सकती।" जो लोग आस-पास एकत्र होकर ये संवाद सुन रहे थे व इस दृश्य को देख रहे थे, वे मन ही मन सोच रहे थे कि ये कुब्जा भी कितनी जाहिल गंवार है। साक्षात भगवान उसके सामने खड़े होकर आग्रह कर रहे हैं और वह है कि नहीं-नहीं कि रट लगाई जा रही है। वे सोच रहे थे कि इतना भाग्यशाली अवसर भी वह हाथ से गंवा रही है। बहुत कम लोगों के जीवन में ऐसा सुखद अवसर आता है। जो फूल माला व चंदन ईश्वर को चढ़ाना चाहिए वह उसे न चढ़ाकर वह पापी कंस को चढ़ा रही है। उसमें कुब्जा का भी क्या दोष था। वह तो वही कर रही थी, जो उसके मन में छुपी वृत्ति उससे करा रही थी। भगवान श्रीकृष्ण के बार-बार आग्रह करने और उनकी लीला के प्रभाव से कुब्जा उनका श्रृंगार करने के लिए तैयार हो गई। परंतु कुबड़ी होने के कारण वह प्रभु के माथे पर तिलक नहीं लगा पा रही थी। दास्यस्यहं सुन्दर कंससम्मतात्रिवक्रनामा ह्रायनुलेपकरमणि। मद्भावितं भोजपतेरतिप्रियं विना युवां कोऽन्यतमस्तदर्हति।। उसने कहा- मैं कंस की दासी हूंँ, मेरा नाम तो सैरन्ध्री है, लेकिन कमर तीन जगह से टेढ़ी है तो कोई मेरा नाम नहीं लेता, लोग मुझे कुब्जा कहते हैं, त्रिवक्रा भी कहते हैं, हे गोपाल! मेरे जीवन का आज ये पहला दिन है कि किसी ने मेरा परिचय पूछा, दुनियाँ के लोगों ने कभी मेरा परिचय नहीं पूछा कि मैं कौन हूँ? मेरे द्वारा घिसा हुआ चन्दन महाराज कंस को बड़ा प्रिय लगता है, लेकिन आज मेरा मन कर रहा है कि ये चन्दन आपको लगा दूँ। क्या आप मेरे हाथ का घिसा हुआ चन्दन स्वीकार करेंगे, कृष्ण ने कहा- लगाओ न, उस त्रिवक्रा ने कृष्ण के सखाओं को चन्दन लगाया, बलरामजी के लगाया और जैसे ही मेरे गोविन्द के चन्दन लगाया, गोपाल के नेत्रों से आंसू झर पड़े, सोचा, ये रंग की काली है, त्रिवक्रा है इसलिये लोग इससे बात करना पसंद नहीं करते, इसे भी तो मानवीय गणों से जीने का अधिकार प्राप्त होना चाहिये। कन्हैया ने कुब्जा को अपने नजदीक आने को कहा, वो जैसे ही कन्हैया के पास आयी, बालकृष्ण ने उसकी होड़ी से तीन अंगुली लगायी और जरा सा झटका दिया, वो तो परम सुन्दरी बन गई, कुब्जा क्या है? वो तीन जगह से टेढ़ी क्यों है? कुब्जा हमारी बुद्धि और बुद्धि तीन जगह से टेढ़ी है, काम, क्रोध, और लोभ, जब तक बुद्धि कंस के आधीन रहेगी तब तक तीन विकारों से टेढ़ी रहेगी। ज्योंही कृष्ण के चरणों में गिरेगी, यह विकार निकल जायेंगे और बुद्धि बिलकुल ठीक हो जायेगी, जिस पर गोविन्द कृपा कर दे उसके लिये बड़ी बात क्या है? अब भगवान् श्रीकृष्ण कंस के धनुष यज्ञ में पधारे, सामने कुबलिया पीड़ नामक हाथी था, महावत ने हाथी को आगे बढ़ाया, श्री कृष्ण ने पहले तो थोड़ा युद्ध किया और फिर उठाया हाथी को और मार दिया, आगे धनुष की ओर बढ़े। करेण वामेन सलीलमुद्धृतं सज्यं च कृत्वा निमिषेण पश्यताम्। नृणां विकृष्य प्रबभज मध्यतो यथेक्षुदण्डं मदकर्युरूक्रमः।। बाँये हाथ से प्रभु ने धनुष को उठाया और जितनी देर में पलक गिरते हैं उतनी देर में धनुष के तीन टुकड़े कर दिये, कुबलियापीड़ नाम के हाथी को मार दिया, कंस के पास समाचार गया, ये क्या किया महाराज? कृष्ण को क्यों बुला लिया आपने? उसने आपके धोबी को मार दिया, आपके दर्जी से कपड़े सिलवा लिये, आपके माली से माला पहनी, कुब्जा से चंदन लगवाकर उसे परम सुन्दरी बना दिया। कंस ने कहा वो जादू-वादू भी जानता है क्या? पता नहीं महाराज दूसरे दूत ने कहा, उसने आपके धनुष को ••• क्या हुआ धनुष को? दूत ने कहा- महाराज दुःखद समाचार है कि धनुष तोड़ दिया, वहीं धनुष जो शिवजी ने दिया था कंस को और कहा था ये धनुष जो तोड़ेगा वो तुम्हें नहीं छोड़ेगा, अब तो कंस भय से कांपने लगा, सैनिकों ने कहा- आप क्यों चिन्ता करते हैं? हम लोगों ने बहुत बड़ी रंगभूमि बनायी है, उसमें बड़े-बड़े पहलवान मुष्टिक, चाणूर, कृष्ण-बलराम को ललकारेंगे, बस आपकी आँखों के सामने दोनों को मार देंगे, विशाल रंगभूमि में एक तरफ मातायें और युवतियां विराजमान है, एक तरफ मथुरा वासिं विराजमान है, एक तरफ सभी राज घरानों से पधारे हुए मेहमान राजकुमार विराजमान है, एक तरफ वृद्ध पुरूष है और संत-महात्मा भी है। मल्लानामशनिर्नृमां नरवरः स्त्रिणां स्मरो मूर्तिमान्। गोपानां स्वजनोऽसतां क्षितिभुजां शास्ता स्वपित्रोः शिशुः।। एक तरफ बड़े-बड़े मल्ल पहलवान है, उन लोगों ने कहा महाराज कृष्ण-बलराम आने वाले ही है, आपकी आँखों के सामने दोनों को मार देंगे, कंस महाराज का सिंहासन ऊँचाई पर लगा हुआ है, कृष्ण-बलराम दोनों भैया रंगभूमि में प्रवेश कर रहे हैं, आचार्य शुकदेवजी ने बहुत सुन्दर चित्रण किया है इस झाँकी का- कृष्ण तो एक ही है, लाखों नर-नारी बैठे हैं, आश्चर्य है कि एक ही कृष्ण सबको अलग-अलग रूप में दिखायी देता है। मुत्युर्भोजपतेर्विराडविदुषां तत्त्व॔ परं योगिनां। वृष्णीनां परदेवतेतिविदितो रंकं गतः साग्रजः।। बड़े-बड़े मल्ल पहलवानों को मेरा गोविन्द पहाड़ जैसा विशाल दीखता है, नवयुवतियों को कृष्ण कामदेव के समान सुन्दर दिखायी देता है, जितने वहाँ गोप ग्वारियां बैठे थे उन सबको कन्हैया अपने मित्र के रूप में दीखता है, राजकुमारों को कृष्ण राजकुमार दीखता है, जो नासमझ लोग है उन्हें श्रीकृष्ण साधारण मानव के रूप में दीखते है, योगियों को श्रीकृष्ण परमतत्त्व के रूप में दिखते है, ज्ञानियों को ब्रह्म के रूप में दिखते है, भक्तों को भगवान् के रूप में दिखते है। जाकी रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन तैसी।। जैसा जिसका भाव है, एक ही प्रभु के दर्शन अनन्त रूपों में हो रहा है, जैसे मैंने आपके सामने एक श्वेत मणि को रख दिया और कहा- श्रीमान् इस मणि का रंग क्या है? आपकी आँखों पर काला चश्मा लगा है तो आपने कहा, ये तो काली है, दूसरे ने हरा लगाया तो उसे हरी दिखायी दी, ऐसे ही उसको आप जिस रंग के चश्मे से देखेंगे वो वैसी ही दीखेगी, मणि वहीं है, अपरिवर्तनीय है लेकिन आँखों पर चश्मा जैसा होगा उसका रंग वैसा ही दिखायी देगा। वैसे ही परमात्मा के स्वरूप में परिवर्तन नहीं होता, लेकिन भावनात्मक दृष्टि जैसी होगी, प्रभु उसी भाव से दिखेंगे, कंस को मेरा गोविन्द साक्षात् काल के रूप में दिखाई दिये, चाणूर, मुष्टिक ने कहा- आओ कृष्ण, हमने तुम्हारी लीला बहुत सुनी है, गोकुल में तुमने बड़ा नाटक किया है, आज हमारे साथ तुम्हें युद्ध करना पड़ेगा, कन्हैया बोले- लड़ना तो हमें आता नहीं। कंस ने कहा- कैसे नहीं आता? हमने पूतना भेजी, शकटासुर भेजा, तृणावर्त भेजा, सारे राक्षसों को तुमने मार दिया और कहते हो हमें युद्ध करना नहीं आता, कृष्ण बोले- तुम्हारी सौगन्ध खाकर कह रहे हैं मामाजी, जितने भी हमारे पास राक्षस आयें सब मरे मराये, हमने तो उन्हें यमुनाजी में फेंके बस, चाणूर ने कहा- तुम बालक नहीं हो, हकीकत में काल हो, माँ का दूध पिया है तो आजावो युद्ध करने। 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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. "श्रीबिन्दु जी पर कृपा" बात बहुत पुरानी नहीं है- वृन्दावन में गोस्वामी बिंदुजी महाराज नाम के एक भक्त रहते थे। वे काव्य रचना में प्रवीण थे। श्रीबिहारीजी महाराज उनके प्राणाराध्य थे। अतः प्रतिदिन एक नवीन रचना श्रीबिहारीजी महाराज को सुनाने के लिए रचते और सांयकाल में जब बिहारीजी के दर्शन के लिए जाते तो उन्हे भेंटकर आते। उनके मधुर कण्ठ की ध्वनि दर्शनार्थियों के हृदय को विमुग्ध कर देते। बिहारीजी से उनका सतत् साक्षात्कार था। एक बार बिंदुजी महाराज ज्वर ग्रस्त हो गए। कई दिनों तक कंपकंपी देकर ज्वर आता रहा। उनके शिष्यगण उनकी सेवा में लगे थे। वृन्दावन में उस समय श्रवणलाल वैद्य, आयुर्वेद के प्रतिष्टित ज्ञाता थे। उनकी औषधि से बिंदुजी महाराज का ज्वर तीन-चार दिनों बाद कुछ हल्का पड़ा। बिंदुजी के शिष्यों ने श्रीबिहाराजी की श्रृंगार आरती से लौटकर चरणामृत और तुलसी पत्र अपने गुरुदेव बिंदुजीजी को दिया। बिंदुजी कहने लगे- "किशोरी लाल ! आज सांझ कूँ श्रीबिहारी जी के दरसन करबे चलिंगे।" पर महाराज ! आप कूँ तो कमजोरी बहुत ज्यादा है गयी है, कैसे चलपाओगे"- किशोरीलाल ने अपनी शंका प्रकट की।' अरे कुछ नायें भयौ- ठाकुर कूँ देखे कई दिन है गये- या लिए आज तो जरूर ही जायेंगे। बिंदुजी ने अपना निर्णय सुनाया। 'ठीक है, जो आज्ञा' कहकर किशोरीलाल अन्य कार्यो में व्यस्त हो गए। परंतु बिंदुजी अचानक बेचैन हो उठे। आज तक कभी ऐसा नही हुआ, जब बिंदुजी बिहारीजी के दर्शन करने गये हों और उन्हे कोई नई स्वरचित काव्य रचना न अर्पित की हो। आज उनके पास कोई रचना नही थी। उन्होंने कागज कलम लेकर लिखने का प्रयास भी किया। शारीरिक क्षीणता के कारण सफल नही हो सके। धीरे-धीरे दोपहरी बीत गयी। सूर्यनारायण अस्ताचल की ओर चल दिए। लाल किरणें वृन्दावन के वृक्षों के शिरोभाग पर मुस्कुराने लगीं। तभी बिंदुजी ने पुनः किशोरी लाल को आवाज दी-'किशोरीलाल !' 'हाँ गुरुदेव' 'नैक पुरानों चदरा तो निकार दे अलमारी में ते' किशोरीलाल समझ न सके कि गुरुदेव की अचानक पुरानी चादर की क्या आवश्यकता आ पड़ी। वह आज्ञा की अनुपालना करते हुए अलमारी से चादर निकाल कर गुरूजी के सिरहाने रख दी। चादर क्या थी उसमें दसियों तो पैबंद लगे थे। रज में लिथ रही थी। बिंदुजी ने चादर को सहेज कर अपने पास रख लिया। जब सूर्यास्त हो जाने पर बिंदुजी श्रीबिहारीजी महाराज के दर्शन करने के लिए निकले तो उन्होंने वही चादर ओढ़ रखी थी। तब वृन्दावन में आज-कल की भांति बिजली की जगमग नहीं थी। दुकानदार अपनी दुकानों पर प्रकाश की जो व्यवस्था करते थे बस उसी से बाजार भी प्रकाशित रहते थे। शिष्य लोग भी चुपचाप गुरूजी के पीछे चल दिए। श्रीबिहारीजी महाराज के मंदिर में पहुँच कर बिंदुजी ने किशोरीलाल का सहारा लेकर जगमोहन की सीढ़ियां चढ़ी और श्रीबिहारीजी महाराज के दाहिनें ओर वाले कटहरे के सहारे द्वार से लगकर दर्शन करने लगे। वे जितनी देर वहाँ खड़े रहे उनकी दोनों आँखों से अश्रु की धारा अविरल रूप से प्रवाहित होती रही। आज कोई रचना तो थी नही जिसे बिहारीजी को सुनाते। अतः चुपचाप दर्शन करते रहे। काफी समय बीतने के बाद उन्होंने वहाँ से चलने की इच्छा से कटहरे पर सिर टिकाकर दंडवत प्रणाम किया। एक बार फिर अपने प्राणप्यारे को जी भर के देखा और जैसे ही कटहरे से उतरने लगे कि नूपुरों की ध्वनि ने उनके पैर रोक दिए। जो कुछ उन्होंने देखा वह अद्भुत था। निज महल के सिंघासन से उतर कर बिहारीजी महाराज उनके सामने आ खड़े हुए - 'क्यों ! आज नाँय सुनाओगे अपनी कविता ?' अक्षर-अक्षर जैसे रग में पगा हुआ- खनकती सी मधुर-मधुर आवाज उनके कर्ण-कुहरो से टकराई। उन्होंने देखा-ठाकुरजी ने उनकी चादर का छोर अपने हाथ में ले रखा है। 'सुनाओ न !' एक बार फिर आग्रह के साथ बिहारीजी ने कहा। यह स्वप्न था या साक्षात इसका निर्णय कौन करता। बिंदुजी तो जैसे आत्म-सुध ही खो बैठे थे । शरीर की कमजोरी न जाने कहां विलुप्त हो गयी । वे पुनः कटहरे का सहारा लेकर खड़े हो गए। आँखों से आँसुओं की धार, गदगद हृदय, पुलकित देह जैसे आनन्द का महाश्रोत प्रगट हुआ हो। बिंदुजी की कण्ठ ध्वनी ने अचानक सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। लोग कभी उनकी तरफ देखते कभी उनकी चादर की ओर, किन्तु श्रीबिन्दु थे की श्रीबिहारीजी महाराज की ओर अपलक दृष्टि से देख रहे थे। मंदिर में उनके भजन की गूँज के सिवाए और कोई शब्द सुनाई नहीं दे रहा था- बिंदुजी देर तक गाते रहे- कृपा की न होती जो आदत तुम्हारी। तो सूनी ही रहती अदालत तुम्हारी॥ गरीबों के दिल में जगह तुम न पाते। तो किस दिल में होती हिफाजत तुम्हारी॥ "जय जय श्री राधे" *******************************************

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🍎☀️🍎☀️🍎☀️🍎 🌸१. श्री वैष्णवदास जी द्वारा भक्तमाल माहात्म्य का पहला इतिहास वर्णन : श्री भक्तमाल के प्रथम श्रोता भगवान् ही हैं ➖➖➖➖🌺🙏 वृन्दावन में श्री प्रियादास जी के एक मित्र थे जिनका नाम था श्री गोवर्धननाथ दास । इन्होंने प्रियादास जी के सानिध्य में भक्तमाल का अध्ययन किया था ,वे भक्तमाल की बहुत मधुर कथा कहते थे । एक समय संतो की जमात लेकर साथ ये जयपुर पहुंचे । यह उस समय की बात है जब मुघलो के अत्याचार के कारण राज मानसिंह श्री गोविन्द देव जी को वृंदावन से जयपुर ले गए थे । संतो ने प्रेम से गोविन्द देव जी मंदिर में दर्शन किया । वहाँ के वासियो ने श्री गोवर्धननाथ दास जी से ठाकुर जी को भक्तमाल कथा सुनाने का आग्रह किया । 🍎🍎 उन्होंने कहा – हमें पास ही साम्भर गांव में एक उत्सव में जाना है ।श्रोताओ ने आग्रह किया किंउत्सव जब आएगा तब आप चले जाना तब तक यहाँ कृपा करके भक्तमाल कथा सुनावे । कुछ दिन कथा कहने पर उन्होंने कहा – अब हमें उत्सव क निमित्त सम्भर गाँव जाना है ,लौटकर आनेपर पुनः कथा सुनाएंगे । 🍎🍎 जब महाराज जी पुनः जयपुर आये तब श्रोता आनंदित हुए और भीड़ जमा होने लगी । संत भगवान् श्री गोविन्द देव जी के मंदिर में कथा सुनाने बैठे । कथा के प्रारम्भ में संत जी ने पूछा – हमें नित्य कथा कहने का अभ्यास है ,हमें क्रम मालुम नहीं है । हमने कथा कहाँ पर रोकी थी ? पिछली कथा में किस भक्त का चरित्र सुनाया था ? 🍎🍎 सब श्रोता मौन हो गए ,एक दूसरे का मुख देखने लगे । संत भगवान कहने लगे – आप लोग ध्यान देकर कथा नहीं सुनते है तब कथा आगे क्यों सुनावे ? वह पोथी बाँधने लगे और कहने लगे हम वृन्दावन जा रहे है । उस समय मंदिर में गौड़ीय परंपरा के सिद्ध संत गोस्वामी श्री राधारमण लाल जी विराजमान थे जो वहाँ के प्रमुख पूजारी भी थे। श्री गोविन्द देव जी उनसे प्रत्यक्ष बातें करते थे । 🍎🍎 प्रभु ने श्री राधारमण गोस्वामी जी को आवाज लगाकर अंदर बुलाया और कहा – बाबा आप कृपया जाकर श्री गोवर्धन नाथ दास जी से कह दीजिये की भक्त श्री रैदास जी का प्रसंग चल रहा था ,अब आप आगे की कथा सुनावे । प्रभु के श्रीमुख से यह बात सुनकर श्री राधारमण गोस्वामी जी के आँखों में अश्रु आ गए । उन्होंने जाकर गोवर्धन नाथ दास जी से कहा की – प्रभु कह रहे है की श्री रैदास भक्त तक की कथा हो चुकी है, अब आगे की कथा सुनावे । 🍎🍎 गोवर्धन नाथ दास जी कहने लगे – हम इस बात को कैसे मान ले की प्रभु ने कहा है ? वे जानते तो थे की प्रभु ने यह बात कही है परंतु संत जी इस बात की प्रतिष्ठा करने चाहते थे की भक्तमाल के प्रथम श्रोता श्री भगवान् है । संत ने कहा – यदि सभी सामने भगवान् ने आपसे कही बात पुनःकहे तब हम मानेंगे । ऐसा लहत ही मंदिर से मधुर आवाज आयी – श्री रैदास भक्त तक की कथा हो चुकी है ,अब आगे की कथा सुनावे । भगवान् की बात सबने सुनी , श्री गोवर्धननाथ दास जी के आँखों से अश्रु बहने लगे । उन्होंने कहा – अब कितना भी विलंभ हो हम भगवान् को कथा सुनाकर ही जायेंगे । 🍎🍎 इस तरह भगवान् ने स्वयं प्रमाणित किया की भक्तमाल के प्रथम श्रोता श्री भगवान् है – 🍎🍎 श्री गोविंद देव विख्याता ,कही पुजारी सौं यह बाता । श्री रैदास भक्त की गाथा, भई कहो आगे अब नाथा ।। सुनि सु पुजारी के दृगन पानी बह्यो अपार । याके श्रोता आप हैं यहै कियो निरधार । 🍎🍎 श्री भगवान् को भक्तमाल कथा बहुत अधिक प्रिय है । अनेक सिद्ध संतो का मत है की भगवान् नित्य अपने धाम में श्री भक्तमाल का पाठ करते है । 🦋❣️जय श्री राधा कृष्णा❣️🦋 🍎☀️🍎☀️🍎☀️🍎

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🌺🌸🦋🦋🌸🌺 🌹३.श्री वैष्णवदास जी द्वारा भक्तमाल माहात्म्य का तीसरा इतिहास वर्णन🌹 ☀️☀️श्री भक्तमाल ग्रंथ के स्पर्श मात्र से व्यापारी का उद्धार होना ➖➖➖➖☀️☀️ श्री वृन्दावन में एक दिन श्री प्रियादास जी भक्तमाल की कथा कह रहे थे । अलवर राजस्थान का एक वैश्य व्यापारी व्यक्ति श्री प्रियादास जी की भक्तमाल कथा श्रवण करने के लिए बैठ गया । उसको श्री भक्तमाल में वर्णित संत सेवा ,वैष्णव स्वरूप निष्ठा , धाम निष्ठा , नाम निष्ठा सुनकर अद्भुत आनंद हुआ ,उसकी संतो में और भक्तमाल ग्रन्थ में बहुत श्रद्धा हो गयी ।कथा समाप्ति पर श्री प्रियादास जी महाराज के पास वह व्यापारी आया और प्रणाम् करके कहने लगा महाराज जी आप कृपा करके यह भक्तमाल ग्रन्थ हमें लिखवा कर दीजिए। 💙💙 उस ज़माने में हाथ से पाण्डु लिपि लिख कर दी जाती थी ,उस समय छापखाने नहीं हुआ करते थे अतः संत महात्मा ही ग्रन्थ लिख कर देते थे । श्री प्रियादास जी ने उस व्यक्ति से पूछा – भाई क्या तुम्हे भक्तमाल की कथा सुनने का या पढ़ने का कुछ अभ्यास है ? अथवा क्या तुम्हे भक्तमाल का वक्ता होना है ? या कोई अन्य प्रयोजन है । वह व्यापारी व्यक्ति कहने लगा -महाराज हमने तो पहली बार कथा सुनी है । 💙💙 हमें न पाठ करना है न किसी को यह कथा सुनना चाहते है क्योंकि हम तो व्यापारी है ,हमारे पास इतना समय भी नहीं है । प्रियादास जी ने कहा – जब तुम्हारे पास ग्रन्थ का उपयोग ही नहीं है तो क्यों हमसे इतना श्रम कराना चाहते हो ? तुम हमें सही उपयोग बताओ तो हम अवश्य तुम्हे ग्रन्थ लिख देंगे । उस व्यापारी ने कहा -महाराज मै घर के काम धंदे, स्त्री पुत्रो में उलझा हुआ हूँ ,साधू संग का अवसर नहीं है मेरे जीवन में । 💙💙 महाराज परंतु एक बात मै पक्की जानता हूँ की श्री भक्तमाल में समस्त संत विराजते है ,इस बात पर मेरी दृढ निष्ठा है की जैसे भागवत् जी में श्री कृष्ण विराजमान है, श्री रामायण में श्री राघव जी विराजमान है वैसे ही भक्तमाल मे सब संत विराजमान है । मै अपने लड़को से कह दूंगा की जब हमारा अंत समय आएगा ,उस समय यह ग्रन्थ हमारे छाती पर पधर देना, इतने संतो की कृपा से मेरी मृत्यु सुधर जायेगी और यमदूतों की हिम्मत नहीं होगी की हमें नर्क ले जाएं । संतो के बल से हमको भगवान् के चरण कमल अवश्य प्राप्त होंगे । 💙💙 उसका भाब सुन कर प्रियादास जी के नेत्र भर आये ।श्री प्रियादास जी ने कहा – तुमने भले ही भजन साधन न किया हो परंतु आपकी इस भक्तमाल ग्रन्थ पर अद्भुत निष्ठा है,मै आपको यह ग्रन्थ लिख कर देता हूँ तुम मरते समय इसे अपने हृदय (छाती )पर रख लेना, तुम साधुओं के बल से इस भवसागर से उबर जाओगे । 💙💙 मरती बार हृदय पर धरिहौं, इतने साधुन संग उबरिहौं 💙💙 वह बनिया व्यक्ति ग्रन्थ लेकर घर गया, पूजन करके एक वस्त्र में लपेट कर आले में रख दिया । अब न नित्य पूजन करता, न तुलसी फूल पधराता ,कुछ नहीं बस रखा रह गया और भूल गया । उसने अपने पुत्रो से कह रखा था – देखो जब हमारा अंत समय आएगा उस समय हमारे ह्रदय पर यह आले में राखी पुस्तक पधरा देना ,वृन्दावन के एक महात्मा से एक ग्रन्थ लिखवा कर हमने लाया है । देखते देखते मृत्यु का समय निकट आया । गले में कफ अटक गया । वह थोडा इशारा करके पुत्रो से कुछ कहने लगा । 💙💙 पुत्र समझ गए की पिताजी ने अंत समय में आले में रखे ग्रन्थ को ह्रदय पर रखने को कहा था । पुत्रो ने ऐसा ही किया और जैसे ही ग्रन्थ ह्रदय पर स्पर्श हुआ उसका कंठ खुल गया और वह मुख से हरे कृष्ण गोविन्द नाम का उच्चारण करने लगा । पहले उसे भयंकर यमदूत दिख रहे आने लगे पर जैसे ही पोथी उसकी छाती पर रखी गयी वैसे ही सारे यमदूत वहाँ से चले गए । पुत्रो ने पिता से पूछा – पिताजी !पहले तो आप को देख के लगता था आप बहुत कष्ट में है परंतु अब आप बहुत प्रसन्न होकर भगवान् का नाम जप कर रहे है । लगता है कोई आश्चर्य घटना घटित हुई है । 💙💙 उसने कहा मुझे भयंकर यमदूत पीड़ा पंहुचा रहे थे परंतु तुम लोगो ने जैसे ही पोथी छाती पर रखी तब वे भाग गए । अब हमें संतो का दर्शन हो रहा है ,हमको श्री नामदेव ,श्री रैदास ,श्री सेना, श्री धन्ना ,श्री पीपा, श्री कबीर जी, श्री तुलसीदास जी आकाश में खड़े हैं । वे हमें अपने साथ भगवान् के धाम चलने को कह रहे है सो अब मै भगवान् के धाम जा रहा हूं । तुम मेरे जाने पर दुःख मत करना और यह नियम बना लेना की इस परिवार में किसीकी भी मृत्यु निकट आए , यह भक्तमाल ग्रन्थ उसके हृदय पर पधर दिया जाए । वह भगवान् का नाम उच्चारण करते करते संतो के साथ भगवान् के नित्य धाम को चला गया । 💙💙 श्री वैष्णवदास जी कहते हैं – जिस परिवार के यह व्यक्ति थे उनके सब संबंधी हमारे पास आये और उन्होंने हमें यह घटना सुनायी है अब और कितनी महिमा गाऊं इसकी महिमा तो अनंत है । उस परिवार के सदस्यों ने भक्तमाल कि कथा भी करवाई । श्री भक्तमाल की केवल पोथी को घर में रखना भी संत शुभ मानते है । 💙💙 इस चरित्र से यह बात सोलह आना सिद्ध होती है की भक्तमाल में सम्पूर्ण संतो का निवास है और यह कोई सामान्य ग्रंथ नहीं है ।बहुत से संत कंठ में श्री भक्तमाल जी का मूल पाठ तावीज़ में बंद कर के निष्ठा से धारण करते है । 🌹।। समस्त संतो की जय ।। जय जय श्री सीताराम ।।🌹🙏राधा सखी👸 🌺🌸🦋🦋🌸🌺

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💦♨️💦♨️💦♨️💦 🌹२.श्री वैष्णवदास जी द्वारा भक्तमाल माहात्म्य का दूसरा इतिहास वर्णन➖➖➖➖राधा सखी👸 ❤️श्री भक्तमाल के प्रति भगवान् का प्रेम❤️ एक बार संतो ने प्रार्थना की के भक्तमाल की भक्तिरसबोधिनी टीका पूर्ण हो गयी है अतः ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा करनी चाहिए । इसमें ऐसा कोई नियम नही रखा की कुछ निश्चित समय में परिक्रमा पूरी करनी है, जितने दिन में परिक्रमा पूरी हो जाये उतने दिन सही । रास्ते में श्री भक्तमाल की कथा भी चलती रहेगी । संतो के संग परिक्रमा करने प्रियदास जी चल पड़े । ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा मार्ग पर होडल नाम का एक निम्बार्क संप्रदाय का पुराण स्थान पड़ता है । उस समय वहाँ के महंत पूज्य श्री लालदास जी महाराज थे । श्री लालदास जी महान रसिक संत थे और संतो के चरणों में बहुत श्रद्धा रखते थे । ♨️♨️ श्री लालदास जी ने प्रियादास जी से श्री भक्तमाल कथा कहने का निवेदन किया । कथा में बहुत श्रोताओ की भीड़ होने लगी, बहुत से संत भी विराजे और श्री लालदास जी के सब शिष्य भी भक्तमाल कथा का रसपान करने बैठे ।जहाँ भक्तमाल की कथा होती है वहाँ भोज भंडारे भी बहुत होते है । भीड़ के साथ साथ कुछ चोर भी साधुओं का वेष बनाकर वहाँ आ गए, वही खाने पिने लगे और मस्त रहने लगे । एक रात मौका पाकर चोरों ने कुछ सामान और उसके साथ में भगवान् की मूर्ति चुरा ली । ♨️♨️ प्रातः काल साधू जल्दी जाग जाते है, उन्होंने प्रातः काल देखा की मंदिर के गर्भगृह के द्वार खुले पड़े है, सिंहासन पर भगवान् नहीं है । भगवान् चोरी हो गए । समस्त साधू रोने लगे, श्री लालदास जी भी रोने लगे । प्रियादास को यह सुनते ही ऐसा लगा की प्राण ही चले गए. प्रियादास जी का प्राण धन जीवन भक्तमाल को ही था । प्रियादास जी कहने वे कहने लगे की नाभा जी ने तो कहा था -भक्तों का चरित्र भगवान को बहुत प्रिय है । त्यों जन के गुन प्यारे हरि को । ♨️♨️ श्री प्रियादास जी कहने लगे – ठाकुर जी को हम कथा सुना रहे थे और ठाकुर जी बिच में ही भाग गए । ऐसा लगता है भगवान् को यह भक्तमाल कथा अच्छी नहीं लगती । साधुओं की दृष्टी संसार से अलग है, वे कहने लगे ठाकुर जी को यह भक्तमाल कथा अच्छी नहीं लगी इसलिए यहाँ से उठ कर चोरो के साथ चले गए । ♨️♨️ ठाकुर को यह चरित न प्यारे, यही ते चोरन संग पधारे। ♨️♨️ अब हमारी परिक्रमा पूरी हुई, हम वृन्दावन वापस जा रहे है, हम अनशन करके प्राण त्याग देंगे और इसके बाद कभी कथा नहीं कहेंगे । श्री भक्तमाल के प्रधान श्रोता भगवान् ही यहाँ से चले गए अब कथा कैसे सुनाये । श्री लालदास जी रोने लगे और कहने लगे – श्री ठाकुर जी तो पहले ही चले गए अब संत भी चले जायेंगे तो हम क्या करेंगे । सब संत रोते हुए भगवान् को याद करने लगे । ♨️♨️ चोर भगवान् के मूर्ति लेकर एक खेत में आकर रुक गए और सोक्सहने लगे की यही विश्राम कर लेते है, बाद में आगे बढ़ेंगे । चोर मूर्ति खेत में रख कर सो गए । संतो का दुःख ठाकुर से देखा नहीं गया, उन्होंने चोरो को स्वप्न में आदेश दिया की हमको वापस संतो के पास ले चलो। तुमने मुझे दो तरह का दुःख दिया – एक तो संत भूखे और हम भूखे और दूसरा हमको भक्तमाल कथा सुनने नहीं मिल रही अतः मैं तुम्हें चार प्रकार के दुःख दूँगा । ♨️♨️ चोर बहुत डर गए और कहने लगे – भाई ! हम अभी बहुत दूर नहीं आये है, ठाकुर जी को वापस ले चलो । ठाकुर जी का डोला सजाकर चोर लालदास जी के स्थान की ओर नाचते गाते कीर्तन करते चलने लगे । होडल के ही एक ब्राह्मण देवता ने यह बात प्रियादास जी और संतो को बताई। समस्त संत ठाकुर आनंद में हरिनाम का कीर्तन करने लगे और ठाकुर जी का स्वागत करने चले गए । ♨️♨️ श्री प्रियादास जी के चरणों में दण्डवत् करके चोरो ने कहा कि अब तक हम चोरी करने के लिए साधु बने थे परंतु अब संतो के चरणों के दास बने रहेंगे, अब सच्चे साधु बनेंगे । ♨️♨️ संतो की कृपा से हम चोरो ने भगवान् के स्वप्न में दर्शन किये, भगवान् को संत और भक्तमाल अति प्रिय है । हम अब संत सेवा में लगे रहना चाहते है । चोरो ने श्री पूज्य श्री लालदास जी महाराज की शरण ग्रहण कर ली और सब उनके शिष्य हो गए । 💦♨️💦♨️💦♨️💦

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भगवान चन्द्र सोमदेव: ब्रह्मा मानस पुत्र महर्षि अत्रि पुत्र..🍀🍀 भगवान चन्द्र देवता रात्रि में दृर्श्यमान देवता है। इन्हे जल तत्व का देवता भी माना जाता है। यह भगवान शिव की जटाओ में अर्ध चन्द्र के रूप में विराजमान है। यह ज्योतिष के नवग्रह में द्वितीय स्थान पर आते है। इन्हे वहाँ चन्द्र ग्रह कहा जाता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार चन्द्रदेव महर्षि अत्रि और अनुसूया के पुत्र हैं। इनकी माता के दो पुत्र और भी हुए थे। चन्द्र देव के भाई भगवान त्रिदेव मुख दत्तात्रेय और ऋषि दुर्वासा थे। इनका वर्ण चमकीला गौर है। इनके वस्त्र, अश्व और रथ श्वेत रंग के हैं। शंख के समान उज्जवल दस घोड़ों वाले अपने रथ पर यह कमल के आसन पर विराजमान हैं। इनके एक हाथ में गदा और दूसरा हाथ वरमुद्रा में है। इन्हें सर्वमय कहा गया है। ये १६ कलाओं से युक्त हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने इनके वंश में अवतार लिया था, इसीलिए वे भी सोलह कलाओं से युक्त थे। समुद्र मंथन से उत्पन्न होने के कारण मां लक्ष्मी और कुबेर के भाई भी माने गए हैं। स्कंदपुराण में प्रसंग के अनुसार देवता और दानवो के बीच जब समुन्द्र मंथन हुआ तो उसमे एक रत्न चन्द्र देवता भी थे। इन्हें शिव शंकर ने अपने मस्तिष्क पर धारण कर लिया। ब्रह्माजी ने इन्हें बीज, औषधि, जल तथा ब्राह्मणों का राजा मनोनीत किया है। इनका विवाह दक्ष की २७ कन्याओं से हुआ है, जो सत्ताईस नक्षत्रों के रूप में जानी जाती हैं। एक बार इन्हे गणेश पर हंसी आ गयी और उस कारण गणेश ने चंद्रमा को श्राप दे दिया की उनका आकर कभी भी एक सा नही रहेगा। यही कारण है अमावस्या पर चंद्रमा दिखाई नही देते जबकि पूर्णिमा के दिन पुरे दिखाई देते है। इस तरह नक्षत्रों के साथ चन्द्रदेव परिक्रमा करते हुए सभी प्राणियों के पोषण के साथ-साथ पर्व, संधियों व मासों का विभाजन करते हैं। इनके पुत्र का नाम बुध है जो बृहस्पति की पत्नि तारा से उत्पन्न हुआ था, किन्तु ब्रह्मा के हस्तक्षेप से तारा को बृहस्पति के पास लौट जाना पड़ा। इस कारण बुध का लालन पालन चन्द्रदेव की पत्नि रोहिणी द्वारा हुआ था, इसलिये इन्हें "रोहिणेय" भी कहा जाता है। तारा द्वारा बुध को चन्द्रदेव का पुत्र इंगित करने पे ये क्षत्रिय कहलाऐ अन्यथा बृहस्पति कुल से ब्राह्मण होते। इनकी महादशा दस वर्ष की होती है तथा ये कर्क राशि के स्वामी हैं। इन्हें नवग्रहों में दूसरा स्थान प्राप्त है। इनकी प्रतिकूलता से मनुष्य को मानसिक कष्टों का सामना करना पड़ता है। कहते हैं कि पूर्णिमा को तांबे के पात्र में मधुमिश्रित पकवान अर्पित करने पर ये तृप्त होते हैं। जिसके फलस्वरूप मानव सभी कष्टों से मुक्ति पा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में इन्हे मन का कारक बताया गया है। मन में आने वाले विचार चंद्रमा की कला पर निर्भर करते है। इनका सामान्य मंत्र :- "ॐ सों सोमाय नम:" है। इसका एक निश्चित संख्या में संध्या समय जाप करना चाहिए। चन्द्र देवता ने महा तपस्या करके भगवान शिव के सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी।यह १२ ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले स्थान पर आता है। चंद्र देव को भी प्रत्यक्ष भगवान माना जाता है। अमावस्या को छोड़कर चंद्रदेव अपनी सोलह कलाओं परिपूर्ण होकर साक्षात दर्शन देते हैं। सोमवार चंद्रदेव का दिन है। चंद्रमा से शुभ फल प्राप्त करने के लिए इस दिन खीर जरूर खाना चाहिए। यदि कुंडली में चंद्र नीच का हो तो सफेद कपड़े पहनना चाहिए और श्वेत चंदन का तिलक लगाना चाहिए। चंद्रमा का रत्न मोती है। चंद्र रत्न मोती को चांदी की अंगूठी में जड़वा कर कनिष्ठिका अंगुली में पहनना चाहिए। शीत से पीड़ित होने पर गले में मोतीयुक्त चांदी का अर्धचंद्र लॉकेट पहनने से फायदा होता है। चंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए इन मंत्रों का उच्चारण करें, ध्यान रहे कि चंद्र मंत्र का जाप 11 बार किया जाता है। चंद्र मंत्र - दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णव सम्भवम । नमामि शशिनं सोमं शंभोर्मुकुट भूषणं ।। ॐ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्रमसे नम:।। ॐ ऐं क्लीं सोमाय नम:। ॐ भूर्भुव: स्व: अमृतांगाय विदमहे कलारूपाय धीमहि तन्नो सोमो प्रचोदयात्। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,

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