मायमंदिर फ़्री कुंडली
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netaji
netaji Jun 11, 2019

Netaji

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🌷🌷 ॐ अज निरंजन निर्विकाराये नमः🌷🌷 🌷🌷ॐ जय श्री आदित्याय नमः🌷🌷 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 🚩 सुविचार 🚩 ********************************************* ईश्वर में मन क्यों नही लगता और सभी मन विषयो में ही क्यों लगा रहता है। ****************************************** जब हरि कृपा होती है तब ही मन भगवान् की ओर लगता है। और जीव सुखी होता हैं।नही तो जितने रोम है जानो उतने ही रोकने वाले एवं अवरोधक तत्व मनुष्य में है अतः सभी प्रसन्ता पूर्वक हरि करना चाहिए। **** प्राणी वासनाओ पर नियंत्रण नही कर पता और मन विषयो में लगाये रहता है। जो मन और इंद्रियों को रोककर तत्वों का विचार नही करता है। मन को खुद ही विषयो में लगाये हुए हैं। मन से मिथ्या विचार करता है।जिससे उसका उद्धार नही हो सकता है। 🌷🕉️ सर्व परवशं दुःखम सर्वं आत्मवशं सुखं। एतद विद्यात समासेन लक्षणम सुख दुखयो।। 🌷🌷 ॐ जय श्री निर्विकाराये नमः 🌷🌷 🌷🌷 ॐ जय श्री गुरुदेवाय नमः 🌷🌷 🚩☑️ आज के आनंद की जय 🙏 🚩☑️ परमानन्द की जय 🙏 🚩☑️ प्राणियों में सद्भावना हो । 🚩☑️ बोलो भाई सब भक्तन की जय। 🚩☑️ बोलो भाई सब संतन की जय ।। 🚩☑️ भारत माता की जय। 🚩🚩🚩🚩 जय श्री राम🚩🚩🚩🚩

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Kalpana bist Jul 20, 2019

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🕉️🕉️जय श्री आदित्याय नमः🕉️🕉️ 🌷ॐ अज निरंजन निर्विकाराये नमः🌷 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 माया जिसका नाम है और नारायण में लीन हैवह या तो अलग है या निष्काम जाने क्यो ? @@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ ***** माया भगवान् की इच्छा है, उसके त्रिगुण रूप है:-सात्विक ,राजस और तामस । 🌷 तमसो लक्षणम कामो राजसस्त्वर्थ उच्यते। सत्त्वस्य लक्षणम धर्म: श्रेष्ठयमेषनां यथोत्तरं।। अर्थात--तमोगुण का लक्षण काम, रजोगुण का अर्थसंग्रह की इच्छा और सत्वगुण का लक्षण धर्मसेवा करना है। परंतु तमोगुण से रजोगुण और रजोगुण से सत्वगुण श्रेष्ठ है। **** जहाँ हरि नही वहाँ काम,क्रोध,मदऔर लोभ के भ्रम जाल है। अतः उत्तम कार्य करना योग्य है। **** भगवान् की रचना महाप्रलय के भी ऊपर है। वह जैसा करना चाहते हैं, तब माया की ही ओर देखते है तब महातत्व तक की सारी उत्पत्ति। करके जगत को सामान रीति से भर देते हैं। वही परब्रम्ह जब नाश करना चाहते हैं तब अपनी माया सहित मूसलाधार वर्षा कर देते हैं। *** इससे सब ईश्वरं की इच्छा और माया का ही व्यवहार है अतः हरि को समझना उचित है। *****प्रभु की माया से कोई बच नहीं सकता। भगवान् की इच्छा और माया सब एक ही है जो प्राणी हरि भक्ति करते हैं वही संसारी जीव पार पाते हैं और सफल होते हैं। *** जिसने परब्रम्ह को जाना उसी ने उन्हें पाया है वही आनंदित है।। 🌷🌷ॐ जय श्री जगतनियन्ताय नमः🌷🌷 🌷🌷ॐ जय श्री सूर्यदेवाय नमः 🌷🌷 🚩✔️ आज के आंनद की जय ।। 🚩✔️ परमानंद की जय ।। 🚩✔️प्राणियों में सद्भावना हो। 🚩✔️बोलो भाई सब संतन की जय। 🚩✔️बोलो भाई सब भक्तन की जय। 🚩✔️ भारत माता की जय।। 🌷🌷🌷ॐ जय श्री गुरुदेवाय नमः 🌷🌷🌷 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🕉️🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 🌷🌷🌷जय श्री राम🌷🌷🌷

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SUNIL KUMAR SHARMA Jul 20, 2019

मथुरा में एक संत रहते थे। उनके बहुत से शिष्य थे। उन्हीं में से एक सेठ जगतराम भी थे। जगतराम का लंबा चौड़ा कारोबार था। वे कारोबार के सिलसिले में दूर दूर की यात्राएं किया करते थे। एक बार वे कारोबार के सिलसिले में कन्नौज गये। कन्नौज अपने खुश्बूदार इत्रों के लिये प्रसिद्ध है। उन्होंने इत्र की एक मंहगी शीशी संत को भेंट करने के लिये खरीदी।सेठ जगतराम कुछ दिनों बाद काम खत्म होने पर वापस मथुरा लौटे। अगले दिन वे संत की कुटिया पर उनसे मिलने गये। संत कुटिया में नहीं थे। पूछा तो जवाब मिला कि यमुना किनारे गये हैं, स्नान-ध्यान के लिये। जगतराम घाट की तरफ चल दिये। देखा कि संत घुटने भर पानी में खड़े यमुना नदी में कुछ देख रहे हैं और मुस्कुरा रहे हैं। तेज चाल से वे संत के नजदीक पहुंचे। प्रणाम करके बोले आपके लिये कन्नौज से इत्र की शीशी लाया हूँ। संत ने कहा लाओ दो। सेठ जगतराम ने इत्र की शीशी संत के हाथ में दे दी। संत ने तुरंत वह शीशी खोली और सारा इत्र यमुना में डाल दिया और मुस्कुराने लगे।जगतराम यह दृश्य देख कर उदास हो गये और सोचा एक बार भी इत्र इस्तेमाल नहीं किया , सूंघा भी नहीं और पूरा इत्र यमुना में डाल दिया। वे कुछ न बोले और उदास मन घर वापस लौट गये। कई दिनों बाद जब उनकी उदासी कुछ कम हुई तो वे संत की कुटिया में उनके दर्शन के लिये गये। संत कुटिया में अकेले आंखे मूंदे बैठे थे और भजन गुनगुना रहे थे। आहट हुई तो सेठ को द्वार पर देखा। प्रसन्न होकर उन्हें पास बुलाया और कहा – ”उस दिन तुम्हारा इत्र बड़ा काम कर गया। सेठ ने आश्चर्य से संत की तरफ देखा और पूछा “मैं कुछ समझा नहीं। संत ने कहा- उस दिन यमुना में राधा जी और श्री कृष्ण की होली हो रही थी। श्रीराधा जी ने श्रीकृष्ण के ऊपर रंग डालने के लिये जैसे ही बर्तन में पिचकारी डाली उसी समय मैंने तुम्हारा लाया इत्र बर्तन में डाल दिया। सारा इत्र पिचकारी से रंग के साथ श्रीकृष्ण के शरीर पर चला गया और भगवान श्रीकृष्ण इत्र की महक से महकने लगे। तुम्हारे लाये इत्र ने श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी की होली में एक नया रंग भर दिया। तुम्हारी वजह से मुझे भी श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी की कृपा प्राप्त हुई।सेठ जगतराम आंखे फाड़े संत को देखते रहे। उनकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। संत ने सेठ की आंखों में अविश्वास की झलक देखी तो कहा शायद तुम्हें मेरी कही बात पर विश्वास नहीं हो रहा। जाओ मथुरा के सभी श्रीकृष्ण राधा के मंदिरों के दर्शन कर आओ, फिर कुछ कहना। सेठ जगतराम मथुरा में स्थित सभी श्रीकृष्ण राधा के मंदिरों में गये। उन्हें सभी मंदिरों में श्रीकृष्णराधा की मूर्ति से अपने इत्र की महक आती प्रतीत हुयी। सेठ जगतराम का इत्र श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी ने स्वीकार कर लिया था। वे संत की कुटिया में वापस लौटे और संत के चरणों में गिर पड़े। सेठ की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। और उसे संत जी का अधिकार मालूम हुआ। संत की आंखें भी प्रभु श्रीकृष्ण की याद में गीली हो गयीं। इसलिए सदैव ध्यान रहे कि संत महात्मा भले ही हमारे जैसे दिखते हों, रहते हों लेकिन वे हर वक्त ईश्वर में मन लगाये रहते हैं। हम जैसों के लिये यह अधिकार तब प्राप्त होगा जब हमारी भक्ति बढ़े, नाम सिमरन बढ़े। जय श्री राधे कृष्णा 🙏🙏🙏

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Archana Mishra Jul 20, 2019

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anita sharma Jul 20, 2019

कृष्ण और सुदामा का प्रेम बहुत गहरा था। प्रेम भी इतना कि कृष्ण, सुदामा को रात दिन अपने साथ ही रखते थे। कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते। एक दिन दोनों वनसंचार के लिए गए और रास्ता भटक गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक ही फल लगा था। कृष्ण ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। कृष्ण ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा सुदामा को दिया। सुदामा ने टुकड़ा खाया और बोला, 'बहुत स्वादिष्ट! ऎसा फल कभी नहीं खाया। एक टुकड़ा और दे दें। दूसरा टुकड़ा भी सुदामा को मिल गया। सुदामा ने एक टुकड़ा और कृष्ण से मांग लिया। इसी तरह सुदामा ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए। जब सुदामा ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो कृष्ण ने कहा, 'यह सीमा से बाहर है। आखिर मैं भी तो भूखा हूं। मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।' और कृष्ण ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया। मुंह में रखते ही कृष्ण ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था। कृष्ण बोले, 'तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए? उस सुदामा का उत्तर था, 'जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, एक कड़वे फल की शिकायत कैसे करूं? सब टुकड़े इसलिए लेता गया ताकि आपको पता न चले।

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anita sharma Jul 20, 2019

#महाभागवती_जनाबाई श्रीनामदेव जी की भक्ति का कौन वर्णन कर सकता है जबकि उनकी दासी जनाबाई की ही भक्ति अकथनीय है। श्रीनामदेव जी के सत्संग में जनाबाई के ऊपर ऐसा प्रेमरंग चढ़ा की वह निरन्तर नामजप करती हुई विभोर ही रहा करती थी और स्वयं भगवान श्रीपंढ़रीनाथजी उस महा-भागवती के साथ बैठकर चक्की चलाते थे, साथ- साथ कपड़े धोते थे। श्रीजनाबाई की भक्ति की प्रशंसा सुनकर परम्- भागवत श्रीकबीरदास जी काशी से पैदल चलकर पंढरपुर गये। श्रीजनाबाई का पता लगाये तो पता चला कि वह कण्डे (उपले) लेने गई है। जब पता लगाते-लगाते वहाँ पहुँचे तो श्रीकबीरदास जी ने देखा कि जनाबाई एक दूसरी औरत से झगड़ रही है। झगड़ा किसी और बात का नही, कण्डो का ही झगड़ा था। जना उस स्त्री से कहती थी कि तुमने मेरे कण्डे चुराये है। वह कहती थी कि नही, ये तो मेरे ही कण्डे है। श्रीकबीरदासजी के समझ मे नही आ रहा था कि यह कैसी भक्त है, जो तुच्छ कण्डो के लिये इतना बखेड़ा किये है। पुनः क्या पहचान है कि उसने इनके कण्डे चुराये है, टोकरी में रखे हुए सभी कण्डे एक से लगते थे। अंत मे श्रीकबीरदासजी ने पूछ ही लिया कि बाईजी! आपके कण्डो की कुछ पहचान भी है? श्रीजनाबाई ने कहा- पहचान क्यो नही है। मेरे कण्डो से 'विट्ठल' नाम की ध्वनि निकल रही होगी। यह सुनकर श्रीकबीरदासजी दंग रह गये और सचमुच एक कंडा कान से लगाकर सुने तो उससे आवाज निकल रही थी- 'जै विट्ठल जै विट्ठल विट्ठल'। और जो स्त्री के कण्डे थे, उनसे कोई ध्वनि नही निकल रही थी, वह तो कण्डे ही थे। श्रीकबीरदासजी नतमस्तक हो गए जनाबाई के सामने। धन्य है जनाबाई जिनके स्पर्श से जड़ भी चैतन्य के भाँति भगवन्नाम की रट लगा रहे है। ।।राधे राधे।।

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काल्ह करे सो आज कर, आज करे सो अब,,, पल में प्रलय होयेगी, बहुरि करेगा कब,,, वरदान का इस्तेमाल एक बार एक व्यक्ति ने घोर तपस्या करके भगवान को प्रसन्न कर लिया। भगवान ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वर दिया कि जीवन में एक बार सच्चे मन से जो चाहोगे वही हो जाएगा। उस व्यक्ति के जीवन में अनेक अवसर आए, जब वह इस वरदान का इस्तेमाल कर अपने जीवन को सुखी बना सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। कई बार भूखों मरने की नौबत आई, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। अनेक ऐसे अवसर भी आए, जब वह इस वरदान का प्रयोग कर देश की काया पलट कर सकता था, अथवा समाज को खुशहाल बना सकता था, लेकिन उसने ऐसा भी नहीं किया। वह उस अवसर की तलाश में था जब मौत आएगी और वह अपने वरदान का इस्तेमाल कर अमर हो जाएगा और दुनिया को दिखा देगा कि अपने वरदान का उसने कितनी बुद्धिमत्ता से इस्तेमाल किया है। लेकिन मौत तो किसी को सोचने का अवसर देती नहीं। उसने चुपके से एक दिन उसे आ दबोचा। उस का वरदान धरा का धरा रह गया। मौत से पहले जी लेने का अर्थ है अपनी सामर्थ्य अथवा इन नेमतों का सदुपयोग कर लेना। और यह बेहद जरूरी है और अभी करना जरूरी है। बाद में तो कोई अवसर मिलने से रहा। ये दौलत, ये बाहुबल, ये सत्ता की ताकत कुछ भी साथ नहीं जाने वाला। जिन के लिए ये सब कर रहे हो उन के भी काम नहीं आने वाला है,,, आपका समय शुभ हो,, हर हर महादेव जय शिव शंकर

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anita sharma Jul 20, 2019

🌹चर्तुभुज-रुप का दर्शन 🌹 . एक समय कुभनदास जी को श्री ठाकुरजी ने कहा की... . कुभना मेरे साथ वृजभक्त के घर माखन-चोरी करने के लिये चल। . श्रीकुभनदास ने कहा की महाराज आप तो जब माखन-चोरी करते समय वृजभक्त आ जाये तब आप तो भाग जायेंगे.... . ओर में इस उमर मे भाग नहीं सकुंगा ओर मैं पकङा जाऊंगा ओर मुझे मार पङेगी इस लिये मैं नही आऊंगा। . तब श्री ठाकुरजी ने कहा मैं तेरे साथ हुँ तुझे कुछ नही होगा। . ओर एक दिन एक वृजभक्त के घर माखन-चोरी करने के लिये चल पड़े। . और जब श्री ठाकुरजी उपर लटकी हुई मटकी से माखन-चोरी करने के लिये श्रीकुभनदास जी की पीठ के उपर चढे ओर दोनो हाथो से माखनचोरी कर रहे थे . तब श्री ठाकुरजी का पीतांबर छुट कर नीचे गिर गया। . तब श्रीठाकुरजी ने अपने दुसरे दो हाथ प्रगट करके अपना पीताँबर सभाला.. . तब कुंभनदास को ठाकुरजी के चर्तुभुज-रुप का दर्शन हुआ.. . ओर श्रीठाकुरजी का सवांग रुप का दर्शन हुआ। . जब कुंभनदास जी वहा से अपने घर पहुंचे तो वहा उसके घर एक बालक का प्रागटय हुआ... . तब कुंभनदास ने उसका नाम श्री चतुर्भुजदास रखा। 🙏जय जय श्री राधे 🙏

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