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#ज्ञानवर्षा
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Sunil Ag Jun 12, 2017
jai jai jai guru Dev maharaj ki jai ho

Neha Sharma, Haryana Jan 25, 2020

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Suchitra Singh Jan 23, 2020

+82 प्रतिक्रिया 9 कॉमेंट्स • 53 शेयर
My Mandir Jan 25, 2020

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SUNIL VERMA Jan 24, 2020

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white beauty Jan 25, 2020

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Anita Sharma Jan 25, 2020

🔔स्वयं की आंख का महत्व 🔔 एक कहानी का स्मरण करें , एक आदमी अंधा था। उसके आठ लड़के थे, आठ बहुएं थीं। चिकित्सकों ने कहा कि आपकी आंख ठीक हो सकती है, आपरेशन करना होगा। उसने कहा, क्या करेंगे ? फायदा क्या है ? मेरी पत्नी के पास दो आंखें हैं, मेरे आठ लड़कों के पास सोलह आंखें हैं, मेरी आठ बहुओं के पास सोलह आंखें हैं। ऐसी चौतीस आंखें मुझे उपलब्ध हैं। दो न हुईं मेरी, तो क्या फर्क पड़ता है ? लेकिन संयोग की बात! जिस दिन उसने यह इंकार किया उसी रात घर में आग लग गई। वे चौतीस आंखें भागकर बाहर निकल गईं। अंधा चिल्लाता रहा, टटोलता रहा रास्ता। लपटों में जल-भुनकर गिरकर मर गया। मरते वक्त एक ही भाव उसके मन में था, अपनी आंख अगर आज होती तो... ? जो बाहर भागकर निकल गए-- पत्नी, बेटे, बहुएं, उनको याद आयी उसकी, लेकिन बाहर जाकर याद आयी। जब अपने प्राण संकट में पड़े हों तो किसको किसकी याद आती है ? इसलिए कहा गया है कि अपनी आंख का महत्व बहुत बड़ा है। आंखवालों से सीख लेना चाहिए, अपनी आंख के अतिरिक्त किसी और की आंख को अपना सहारा नहीं बनाना चाहिए जी । अपनी आंख जब तक न मिल जाए, सीखना चाहिए, साधना करनी चाहिए, सीखने की कोई उम्र नहीं होती है, विभिन्न विकल्पों-नियमों को भी सीखना चाहिए ।

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Neha Sharma, Haryana Jan 25, 2020

जय श्री राधेकृष्णा शुभ प्रभात् वंदन : मन को जीतना ही सबसे बड़ा तप है 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 एक ऋषि यति-मुनि एक समय घूमते-घूमते नदी के तट पर चल रहे थे। मुनि को मौज आई। हम भी आज नाव पर बैठकर नदी की सैर करें और प्रभु की प्रकृति के दृश्यों को देखें'। चढ़ बैठे नाव को देखने के विचार से नीचे के खाने में जहां नाविक का सामान और निवास होता है, चले गये। जाते ही उनकी दृष्टि एक कुमारी कन्या पर जो नाविक की थी, पड़ी। कुमारी इतनी रुपवती थी कि विवश हो गया, उसे मूर्च्छा सी आ गई।.देवी ने उसके मुख में पानी डाला होश आई। पूछा―'मुनिवर ! क्या हो गया' ? *मुनि बोला―*'देवी ! मैं तुम्हारे सौन्दर्य पर इतना मोहित हो गया कि मैं अपनी सुध-बुध भूल गया अब मेरा मन तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। मेरी जीवन मृत्यु तुम्हारे आधीन है।' *देवी―*'आपका कथन सत्य है, परन्तु मैं तो नीच जाति की मछानी हूं।' *मुनि―*मुझमें यह सामर्थ्य है कि मेरे स्पर्श से तुम शुद्ध हो जाओगी। *देवी―*'पर अब तो दिन है।' *मुनि―*'मैं अभी रात कर दिखा सकता हूं।' *देवी―*'फिर भी यह जल (नदी) है।' *मुनि―*'मैं आन की आन में इसे स्थल (रेत) बना सकता हूं।' *देवी―*'मैं तो अपने माता-पिता के आधीन हूं। उनकी सम्मति तो नहीं होगी।' *मुनि―*'मैं उनको शाप देकर अभी भस्म कर सकता हूं।' *देवी―*'भगवन् ! जब परमात्मा ने आपको आपके भजन, तप के प्रताप से इतनी सामर्थ्य और सिद्धि वरदान दी है तो कितनी मूर्खता है कि अपने जन्म जन्मान्तरों के तप को एक नीच काम और नीच आनन्द और वह भी एक दो मिनट के लिए विनष्ट करते हो। शोक ! आपमें इतनी सामर्थ्य है कि जल को थल, दिन को रात बना सको पर यह सामर्थ्य नहीं कि मन को रोक सको।' मुनि ने इतना सुना ही था कि उसके ज्ञाननेत्र खुल गए। तत्काल देवी के चरणों में गिर पड़ा कि तुम मेरी गुरु हो, सम्भवतः यही न्यूनता थी जो मुझे नाव की सैर का बहाना बनाकर खींच लाई। *दृष्टान्त―* (१) रुप और काम बड़े-बड़े तपस्वियों को गिरा देता है। (२) तपी-जती स्त्री रुप से बचें। (३) कच्चे पक्के की परीक्षा तो संसार में होती है, जंगल में नहीं। (४) जब अपनी भूल का भान हो जावे, तब हठ मत करो। (५) जिन पर प्रभु की दया होती है, उनका साधन वे आप बनाते हैं। इसी सन्देश को मनुस्मृति में बताया गया है- इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहारिषु | संयमे यतनमातिष्ठेद्विद्वान यंतेव वाजिनाम || [ मनु - 2 / 88 ] जिस प्रकार से विद्वान सारथि घोड़ों को नियम में रखता है , उसी प्रकार हमको अपने मन तथा आत्मा को खोटे कामों में खींचने वाले विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों को सब प्रकार से खींचने का प्रयत्न करना चाहिए। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 *ऋणमोचक मंगळ स्तोत्र* यदि आपके ऊपर ऋण/कर्ज का बोझ अधिक बढ़ गया है और आप उस कर्ज को चाह कर भी नहीं उतार पा रहे है तब यदि आप ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का नियमित पाठ करते है तो निश्चित ही धीरे धीरे आपका ऋण उतर जाएगा। जैसा की आप जानते है मंगल का सम्बन्ध हनुमानजी से है और हनुमानजी सर्वबाधा मुक्ति प्रदाता है यह श्लोक भी हनुमान जी की ही आराधना के रूप में प्रतिष्ठित है। कैसे आरम्भ करे ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ....?? इस पाठ को प्रारम्भ करने के लिए सर्वप्रथम आपको किसी शुभ तिथि का चयन भारतीय पञ्चाङ्गानुसार कर लेना चाहिए। यह पाठ मंगलवार को ही शुरू करना चाहिए अन्य दिन को नही। इस पाठ को करने से पूर्व लाल वस्त्र बिछाकर मंगल यन्त्र व महावीर हनुमान जी को स्थापित करना चाहिए , सिंदूर व चमेली के तेल का चोला अर्पित कर अपने बाये हाथ की तरफ देशी घी का दीप व दाहिने हाथ की तरफ तिल के तेल का दीप स्थापित करना चाहिए। इसके बाद हनुमान जी को गुड़, चने व बेसन का भोग लगाना चाहिए। मंगल देव (मंगल यन्त्र को प्राण प्रतिष्ठित कर) व हनुमान जी के सामने ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ, लाल वस्त्र धारण करके ही आरम्भ करना चाहिए। यह पाठ अपनी श्रद्धा अनुसार 1, 3, 5, 9 , अथवा 11 पाठ 43 दिन तक नित्य करना चाहिए | इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से निश्चित ही कर्ज, ऋण व आर्थिक बाधा से मुक्ति मिलती है। *ऋणमोचक मंगल स्तोत्र -* मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः। स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः ॥1॥ लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः। धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः॥2॥ अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः। व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः॥3॥ एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत्। ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्॥4॥ धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्। कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्॥5॥ स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः। न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्॥6॥ अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल। त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय॥7॥ ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः। भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा॥ 8 || अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः। तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात्॥9॥ विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा। तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः॥10॥ पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः। ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः॥11॥ एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम्। महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा॥12॥ || इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ||

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