🌹krishna ki kridayen aur leelaye kyu mahatvpurna hain? 🌹

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मेरे ख्याल से आपको थोड़ा-बहुत अंदाजा हो गया होगा कि कृष्ण ने अपने जीवन में जो कुछ भी किया, वह कितने जोश और जुनून के साथ किया। चाहे एक बालक के रूप में देखें या एक युवा या एक योद्धा के रूप में देखें, एक राजनीतिज्ञ के रूप में देखें या एक शिक्षक या एक दिव्य अवतार के रूप में देखें, उनके जीवन की किसी भी स्थिति में, सुस्ती का एक पल भी नहीं था। वह हर समय पूरे जोर-शोर से सक्रिय रहते थे। जो लोग चाहे किसी भी वजह से, हर समय खुद को सक्रिय रखने में सफल हो पाते हैं, निश्चित तौर पर एक बड़ी संभावना में विकसित होते हैं। चाहे हम अपना ध्यान जागरूकता पर केंद्रित करें, या भक्ति, क्रिया या अपनी ऊर्जा पर, आखिरकार हम यही देखते हैं कि वह जीवन, जो आप हैं, उसे हर समय सक्रिय और जीवंत कैसे रखें। अगर यह हर समय सक्रिय रहेगा, तो यह आपको परम प्रकृति तक ले जाएगा।

अब सवाल है कि इसे सक्रिय कैसे रखें? हालांकि कृष्ण ने अपनी शिक्षा में सभी चारों मूलभूत तरीकों (कर्म, ज्ञान, भक्ति, क्रिया) की बात की, मगर उन्होंने भक्ति के मार्ग पर ज्यादा जोर दिया। इसलिए नहीं क्योंकि वह जागरूकता या क्रिया से बेहतर है, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने देखा कि ज्यादातर लोग किसी और चीज की बजाय भावनाओं के प्रदर्शन में अधिक सक्षम हैं। अगर आप खुशहाली के अर्थ में अपने जीवन को देखें, जैसे मान लीजिए, आज आपका कारोबार अच्छा चल रहा है, आपकी नौकरी अच्छी चल रही है, सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है, मगर जैसे ही कोई भावनात्मक मुद्दा सामने आता है, आपके अनुभव में आपका जीवन बेकार हो जाता है। दूसरी ओर, मान लीजिए, आज आपकी नौकरी या कारोबार बहुत अच्छा नहीं चल रहा है, मगर जब आप घर आते हैं और भावनात्मक स्तर पर सब कुछ अच्छा मिलता है, तो भावनात्मक पहलू बाकी सारी चीजों को दबा देता है।

ज्यादातर लोगों के लिए, भावनाएं सबसे प्रधान होती हैं। वे जीवन के किसी और पहलू के बजाय भावनाओं के जरिये ज्यादा आसानी से तीव्रता के चरम पर पहुंच सकते हैं। भावना, भक्ति या जोश के मार्ग के लिए एक तरह की बेफिक्री या उन्मुक्तता की जरूरत होती है। जैसा कि फ्रांसिस बेकन ने कहा था, ‘प्रेम करना और बुद्धिमान होना, एक साथ असंभव है।’ अगर आप स्मार्ट और सही होना चाहते हैं, तो प्रेम कभी नहीं होगा। जो लोग प्रेम में पड़ना चाहते हैं, उन्हें बेवकूफ समझे जाने के लिए, आघात सहने के लिए तैयार रहना चाहिए। यही वो चीज है जो लोगों को डराती है, लोगों को दूर भगाती है। ऐसा नहीं है कि इसके बिना आप कमजोर नहीं हैं या आपको चोट नहीं पहुंच सकता। फर्क सिर्फ इतना है कि जब आप प्रेम में पड़ते हैं, तो आप स्वेच्छा से कमजोर होना चाहते हैं। बाकि आप चाहे कितने भी सुरक्षित क्यों न हों, जीवन की घटनाएं आपको वैसे भी अघात पहुँचा सकती हैं। प्रेम में आप अपनी इच्छा से ऐसी स्थिति में जाते हैं।

इसका फायदा यह है कि जोश या जुनून के रास्ते पर चलने के लिए बहुत ज्यादा विद्वता, समझ या साधना की जरूरत नहीं है। इसके लिए बस एक सूत्री प्रेम संबंध की जरूरत होती है, जो किसी भी वजह से न बदले। अब आपको इस तरह के प्रेम संबंधों की आदत हो चुकी है, जहां अगर आपको बदले में कुछ मिलता है, तो आपका प्रेम संबंध चलता है। जैसे ही आपको लगता है कि आपको कुछ नहीं मिल रहा, प्रेम संबंध समाप्त हो जाता है। यह प्रेम संबंध नहीं, लेन-देन है, व्यापार है। अगर आप दलाल स्ट्रीट में कारोबार कर रहे हैं, तब तो फिर ठीक है। लेकिन अगर आप अपने भीतर ही व्यापार कर रहे हैं, तो यह विनाशकारी है। यह जीवन को नष्ट कर देता है। आम तौर पर, खुद को आध्यात्मिक कहने वाले लोग कहते हैं कि पैसे से जीवन नष्ट हो जाता है, मगर ऐसा नहीं है। जब आपके जीवन में कोई जोश नहीं होता और आपकी भावनाओं में कोई उत्साह नहीं रह जाता, तब आपका जीवन नष्ट हो जाता है। यह उसे सुरक्षित करता है, मगर आप अपने जीवन को जितना अधिक सुरक्षित करने की कोशिश करते हैं, आप मौत की ओर उतने ही उन्मुख हो जाते हैं क्योंकि दुनिया में सबसे सुरक्षित चीज मौत है। अगर आप जीवित हैं, तो आपके साथ कुछ भी हो सकता है।

जो व्यक्ति किसी चीज को अच्छा या बुरा नहीं मानता, जिसके लिए, चाहे कुछ भी हो जाए, सब ठीक होता है, वह एक सच्चा भक्त होता है। वह एक सच्चा प्रेमी होता है। चाहे जो कुछ भी हो जाए, उसका एक ही लक्ष्य होता है। यह हिसाब-किताब करने वाले लोगों को मूर्खतापूर्ण लग सकता है। जो लोग हिसाब-किताब करते हैं, वे आरामदेह जीवन जी सकते हैं मगर वे अस्तित्व का आनंद कभी नहीं जान पाएंगे। जो लोग हिसाब-किताब नहीं करते, जो जोश के साथ जीवन जीते हैं, वे अस्तित्व के आनंद को जानते हैं। अगर आप हमेशा इस हिसाब-किताब में उलझे रहते हैं कि आप कितना लगाते हैं और आपको कितना वापस मिलता है, तो आपको सिर्फ सुख-सुविधाएं ही मिल पाएंगी, जीवन का आनंद नहीं।

लीला के ये सात दिन आपमें थोडा सा जोश लाने के लिए थे। लीला की यह श्रृंखला अब खत्म हो रही है, लेकिन लीला नहीं। लीला अब शुरू होनी है। लीला का मतलब कृष्ण की नकल करना नहीं है, वह मूर्खतापूर्ण होगा। कृष्ण ने कभी किसी की नकल नहीं की, न ही आपको करनी चाहिए। लीला का मतलब है कि आप अपने जीवन में एक रस, एक आनंद लाएं।

रसिक या क्रीड़ापूर्ण होने को हमेशा गैरजिम्मेदाराना हरकत माना गया है। ये बात आपके बचपन में आपको जरूर बोली गई होगा और शायद आप भी अपने बच्चों से यही कहते होंगे। अगर वे क्रीड़ापूर्ण हैं, मस्ती करते हैं, तो आपको लगता है कि यह गैरजिम्मेदाराना है। मगर जीने का सबसे जिम्मेदारी भरा तरीका जीवन के साथ क्रीड़ापूर्ण होना है। लटके हुए चेहरे के साथ जीवन जीना पूरी तरह  गैरजिम्मेदाराना है। क्रीड़ापूर्ण होने का मतलब, जिम्मेदार होना है। जब आप क्रीड़ापूर्ण होंगे, तभी आप जीवन के प्रति प्रतिक्रियापूर्ण हो पाएंगे। जब आप गंभीर होते हैं, तो आपके आस-पास के जीवन का आपके लिए कोई अस्तित्व नहीं होता। आपका मतलब सिर्फ खुद से और अपनी फालतू बातों से होता है। आप दुनिया में हर चीज के प्रति प्रतिक्रियाशील तभी हो सकते हैं, जब आप क्रीड़ापूर्ण हों। वरना, जीवन का बोझ ही आपको मार डालेगा।

क्रीड़ापूर्ण होना कोई सिद्धांत नहीं है, जिसे आपको विकसित करना है, जैसे कि ‘मैं क्रीड़ापूर्ण होने जा रहा हूं।’ यह समूचा अस्तित्व ऊर्जा का एक नृत्य है। इस अस्तित्व को उत्पन्न करने वाली शक्तियां हमेशा क्रीड़ापूर्ण होती हैं। हमारी संस्कृति में हमेशा से सृष्टि को ईश्वर का खेल माना गया है। ‘ईश्वर का खेल’ का मतलब यह नहीं है कि ईश्वर आपके जीवन के साथ खेल रहा है और आपके लिए कष्ट पैदा कर रहा है। सृष्टि की शक्तियां लगातार क्रीड़ारत रहती हैं। अगर वे खेलना छोड़ दें, तो आप समाप्त हो जाएंगे। जब शरीर के भीतर सभी मूलभूत शक्तियां पूरे जोशोखरोश के साथ सक्रिय होती हैं, तभी आपको अच्छा महसूस होता है।

क्रीड़ा-प्रिय होना आपका नजरिया नहीं है, यह स्रष्टा और सृष्टि का नजरिया है। अगर आप सृष्टि और स्रष्टा के तालमेल में हैं, तो आप कुदरती तौर पर रसप्रिय या क्रीड़ापूर्ण होंगे। जब आप अपने मन की प्रक्रिया – अपने विचारों, राय, विचारधाराओं, सही और गलत और नैतिकताओं के दास हो जाते हैं, तभी आप अपनी रसप्रियता खो देते हैं। सारी रसप्रियता इसलिए खो गई है क्योंकि आप विशाल सृष्टि को अनदेखा करके अपने मन की तुच्छ कल्पनाओं से बहुत ज्यादा जुड़ जाते हैं। अगर आप जीवन के अनुकूल रहते, अगर आप सृष्टि और स्रृष्टा के तालमेल में रहते, तो आप कुदरती तौर पर क्रीड़ापूर्ण होते।

जो लोग क्रीड़ापूर्ण होते हैं, वही सांसारिक समस्याओं का सामना कर सकते हैं और उससे प्रभावित हुए बिना अपना बेहतरीन काम कर सकते हैं। अगर आप अपने अंदर जरूरी रसप्रियता के बिना समस्याओं से जूझने की कोशिश करेंगे, तो वे समस्याएं आपको नष्ट कर देंगी। यही वजह है कि अच्छे इरादों वाले कई लोगों को उनकी परिस्थितियों ने ही मिटा डाला। अगर आप वाकई क्रीड़ापूर्ण हैं, तभी आप उन्हें बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं, वरना सब कुछ आपके लिए समस्याएं खड़ी कर सकता है। आध्यात्मिक मार्ग पर चलना शुरू करने वाले साधक, जो अभी सिद्ध नहीं हुआ है, उसके लिए क्रिया जरूरी है। और अगर आप उसे क्रीड़ापूर्ण नहीं बनाएंगे, तो यह क्रिया घातक सिद्ध होगी – चाहे वह कैसी भी क्रिया हो।

अगर आप अपने काम में रोजाना कुछ घंटे भी क्रीड़ापूर्ण रहने की कोशिश करें, तो आपका भौतिक शरीर भी काफी बेहतर तरीके से काम करना शुरू कर देगा। आपकी नींद की जरूरत कम हो जाएगी और ध्यान एक कुदरती प्रक्रिया बन जाएगा। जब आप क्रीड़ापूर्ण होते हैं, तो आप जो काम करते हैं, उसमें उलझते नहीं। जब आप उनमें नहीं उलझते तो आप कर्म संचित नहीं करते। इसके बाद जीवन की प्रक्रिया मुक्तिदायक हो जाती है। अब आप जो क्रिया करते हैं, वह कर्म नहीं, योग हो जाता है। जब आप दिन भर योग करने लगते हैं, तो जीवन बहुत सहज और प्रवाहमय हो जाता है।

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Radha Bansal Jan 21, 2021

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Radha Bansal Jan 21, 2021

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Anita Sharma Jan 21, 2021

*पुण्यों का मोल* एक व्यापारी जितना अमीर था उतना ही दान-पुण्य करने वाला, वह सदैव यज्ञ-पूजा आदि कराता रहता था। एक यज्ञ में उसने अपना सबकुछ दान कर दिया। अब उसके पास परिवार चलाने लायक भी पैसे नहीं बचे थे। व्यापारी की पत्नी ने सुझाव दिया कि पड़ोस के नगर में एक बड़े सेठ रहते हैं। वह दूसरों के पुण्य खरीदते हैं। आप उनके पास जाइए और अपने कुछ पुण्य बेचकर थोड़े पैसे ले आइए, जिससे फिर से काम-धंधा शुरू हो सके। पुण्य बेचने की व्यापारी की बिलकुल इच्छा नहीं थी, लेकिन पत्नी के दबाव और बच्चों की चिंता में वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ। पत्नी ने रास्ते में खाने के लिए चार रोटियां बनाकर दे दीं। व्यापारी चलता-चलता उस नगर के पास पहुंचा जहां पुण्य के खरीदार सेठ रहते थे। उसे भूख लगी थी। नगर में प्रवेश करने से पहले उसने सोचा भोजन कर लिया जाए। उसने जैसे ही रोटियां निकालीं एक कुतिया तुरंत के जन्मे अपने तीन बच्चों के साथ आ खड़ी हुई। कुतिया ने बच्चे जंगल में जन्म दिए थे। बारिश के दिन थे और बच्चे छोटे थे, इसलिए वह उन्हें छोड़कर नगर में नहीं जा सकती थी। व्यापारी को दया आ गई। उसने एक रोटी कुतिया को खाने के लिए दे दिया। कुतिया पलक झपकते रोटी चट कर गई लेकिन वह अब भी भूख से हांफ रही थी। व्यापारी ने दूसरी रोटी, फिर तीसरी और फिर चारो रोटियां कुतिया को खिला दीं। खुद केवल पानी पीकर सेठ के पास पहुंचा। व्यापारी ने सेठ से कहा कि वह अपना पुण्य बेचने आया है। सेठ व्यस्त था। उसने कहा कि शाम को आओ। दोपहर में सेठ भोजन के लिए घर गया और उसने अपनी पत्नी को बताया कि एक व्यापारी अपने पुण्य बेचने आया है। उसका कौन सा पुण्य खरीदूं। सेठ की पत्नी बहुत पतिव्रता और सिद्ध थी। उसने ध्यान लगाकर देख लिया कि आज व्यापारी ने कुतिया को रोटी खिलाई है। उसने अपने पति से कहा कि उसका आज का पुण्य खरीदना जो उसने एक जानवर को रोटी खिलाकर कमाया है। वह उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ पुण्य है। व्यापारी शाम को फिर अपना पुण्य बेचने आया। सेठ ने कहा- आज आपने जो यज्ञ किया है मैं उसका पुण्य लेना चाहता हूं। व्यापारी हंसने लगा। उसने कहा कि अगर मेरे पास यज्ञ के लिए पैसे होते तो क्या मैं आपके पास पुण्य बेचने आता! सेठ ने कहा कि आज आपने किसी भूखे जानवर को भोजन कराकर उसके और उसके बच्चों के प्राणों की रक्षा की है। मुझे वही पुण्य चाहिए। व्यापारी वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ। सेठ ने कहा कि उस पुण्य के बदले वह व्यापारी को चार रोटियों के वजन के बराबर हीरे-मोती देगा। चार रोटियां बनाई गईं और उसे तराजू के एक पलड़े में रखा गया। दूसरे पलड़े में सेठ ने एक पोटली में भरकर हीरे-जवाहरात रखे। पलड़ा हिला तक नहीं। दूसरी पोटली मंगाई गई। फिर भी पलड़ा नहीं हिला। कई पोटलियों के रखने पर भी जब पलड़ा नहीं हिला तो व्यापारी ने कहा- सेठजी, मैंने विचार बदल दिया है. मैं अब पुण्य नहीं बेचना चाहता। व्यापारी खाली हाथ अपने घर की ओर चल पड़ा। उसे डर हुआ कि कहीं घर में घुसते ही पत्नी के साथ कलह न शुरू हो जाए। जहां उसने कुतिया को रोटियां डाली थी, वहां से कुछ कंकड़-पत्थर उठाए और साथ में रखकर गांठ बांध दी। घर पहुंचने पर पत्नी ने पूछा कि पुण्य बेचकर कितने पैसे मिले तो उसने थैली दिखाई और कहा इसे भोजन के बाद रात को ही खोलेंगे। इसके बाद गांव में कुछ उधार मांगने चला गया। इधर उसकी पत्नी ने जबसे थैली देखी थी उसे सब्र नहीं हो रहा था। पति के जाते ही उसने थैली खोली। उसकी आंखे फटी रह गईं। थैली हीरे-जवाहरातों से भरी थी। व्यापारी घर लौटा तो उसकी पत्नी ने पूछा कि पुण्यों का इतना अच्छा मोल किसने दिया ? इतने हीरे-जवाहरात कहां से आए ?? व्यापारी को अंदेशा हुआ कि पत्नी सारा भेद जानकर ताने तो नहीं मार रही लेकिन, उसके चेहरे की चमक से ऐसा लग नहीं रहा था। व्यापारी ने कहा- दिखाओ कहां हैं हीरे-जवाहरात। पत्नी ने लाकर पोटली उसके सामने उलट दी। उसमें से बेशकीमती रत्न गिरे। व्यापारी हैरान रह गया। फिर उसने पत्नी को सारी बात बता दी। पत्नी को पछतावा हुआ कि उसने अपने पति को विपत्ति में पुण्य बेचने को विवश किया। दोनों ने तय किया कि वह इसमें से कुछ अंश निकालकर व्यापार शुरू करेंगे। व्यापार से प्राप्त धन को इसमें मिलाकर जनकल्याण में लगा देंगे। ईश्वर आपकी परीक्षा लेता है। परीक्षा में वह सबसे ज्यादा आपके उसी गुण को परखता है जिस पर आपको गर्व हो। अगर आप परीक्षा में खरे उतर जाते हैं तो ईश्वर वह गुण आपमें हमेशा के लिए वरदान स्वरूप दे देते हैं। अगर परीक्षा में उतीर्ण न हुए तो ईश्वर उस गुण के लिए योग्य किसी अन्य व्यक्ति की तलाश में लग जाते हैं। इसलिए विपत्तिकाल में भी भगवान पर भरोसा रखकर सही राह चलनी चाहिए। आपके कंकड़-पत्थर भी अनमोल रत्न हो सकते हैं।

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Radha Bansal Jan 21, 2021

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Radha Bansal Jan 21, 2021

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Radha Bansal Jan 20, 2021

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Gopal Jalan Jan 20, 2021

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Radha Bansal Jan 21, 2021

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