🌹krishna ki kridayen aur leelaye kyu mahatvpurna hain? 🌹

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मेरे ख्याल से आपको थोड़ा-बहुत अंदाजा हो गया होगा कि कृष्ण ने अपने जीवन में जो कुछ भी किया, वह कितने जोश और जुनून के साथ किया। चाहे एक बालक के रूप में देखें या एक युवा या एक योद्धा के रूप में देखें, एक राजनीतिज्ञ के रूप में देखें या एक शिक्षक या एक दिव्य अवतार के रूप में देखें, उनके जीवन की किसी भी स्थिति में, सुस्ती का एक पल भी नहीं था। वह हर समय पूरे जोर-शोर से सक्रिय रहते थे। जो लोग चाहे किसी भी वजह से, हर समय खुद को सक्रिय रखने में सफल हो पाते हैं, निश्चित तौर पर एक बड़ी संभावना में विकसित होते हैं। चाहे हम अपना ध्यान जागरूकता पर केंद्रित करें, या भक्ति, क्रिया या अपनी ऊर्जा पर, आखिरकार हम यही देखते हैं कि वह जीवन, जो आप हैं, उसे हर समय सक्रिय और जीवंत कैसे रखें। अगर यह हर समय सक्रिय रहेगा, तो यह आपको परम प्रकृति तक ले जाएगा।

अब सवाल है कि इसे सक्रिय कैसे रखें? हालांकि कृष्ण ने अपनी शिक्षा में सभी चारों मूलभूत तरीकों (कर्म, ज्ञान, भक्ति, क्रिया) की बात की, मगर उन्होंने भक्ति के मार्ग पर ज्यादा जोर दिया। इसलिए नहीं क्योंकि वह जागरूकता या क्रिया से बेहतर है, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने देखा कि ज्यादातर लोग किसी और चीज की बजाय भावनाओं के प्रदर्शन में अधिक सक्षम हैं। अगर आप खुशहाली के अर्थ में अपने जीवन को देखें, जैसे मान लीजिए, आज आपका कारोबार अच्छा चल रहा है, आपकी नौकरी अच्छी चल रही है, सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है, मगर जैसे ही कोई भावनात्मक मुद्दा सामने आता है, आपके अनुभव में आपका जीवन बेकार हो जाता है। दूसरी ओर, मान लीजिए, आज आपकी नौकरी या कारोबार बहुत अच्छा नहीं चल रहा है, मगर जब आप घर आते हैं और भावनात्मक स्तर पर सब कुछ अच्छा मिलता है, तो भावनात्मक पहलू बाकी सारी चीजों को दबा देता है।

ज्यादातर लोगों के लिए, भावनाएं सबसे प्रधान होती हैं। वे जीवन के किसी और पहलू के बजाय भावनाओं के जरिये ज्यादा आसानी से तीव्रता के चरम पर पहुंच सकते हैं। भावना, भक्ति या जोश के मार्ग के लिए एक तरह की बेफिक्री या उन्मुक्तता की जरूरत होती है। जैसा कि फ्रांसिस बेकन ने कहा था, ‘प्रेम करना और बुद्धिमान होना, एक साथ असंभव है।’ अगर आप स्मार्ट और सही होना चाहते हैं, तो प्रेम कभी नहीं होगा। जो लोग प्रेम में पड़ना चाहते हैं, उन्हें बेवकूफ समझे जाने के लिए, आघात सहने के लिए तैयार रहना चाहिए। यही वो चीज है जो लोगों को डराती है, लोगों को दूर भगाती है। ऐसा नहीं है कि इसके बिना आप कमजोर नहीं हैं या आपको चोट नहीं पहुंच सकता। फर्क सिर्फ इतना है कि जब आप प्रेम में पड़ते हैं, तो आप स्वेच्छा से कमजोर होना चाहते हैं। बाकि आप चाहे कितने भी सुरक्षित क्यों न हों, जीवन की घटनाएं आपको वैसे भी अघात पहुँचा सकती हैं। प्रेम में आप अपनी इच्छा से ऐसी स्थिति में जाते हैं।

इसका फायदा यह है कि जोश या जुनून के रास्ते पर चलने के लिए बहुत ज्यादा विद्वता, समझ या साधना की जरूरत नहीं है। इसके लिए बस एक सूत्री प्रेम संबंध की जरूरत होती है, जो किसी भी वजह से न बदले। अब आपको इस तरह के प्रेम संबंधों की आदत हो चुकी है, जहां अगर आपको बदले में कुछ मिलता है, तो आपका प्रेम संबंध चलता है। जैसे ही आपको लगता है कि आपको कुछ नहीं मिल रहा, प्रेम संबंध समाप्त हो जाता है। यह प्रेम संबंध नहीं, लेन-देन है, व्यापार है। अगर आप दलाल स्ट्रीट में कारोबार कर रहे हैं, तब तो फिर ठीक है। लेकिन अगर आप अपने भीतर ही व्यापार कर रहे हैं, तो यह विनाशकारी है। यह जीवन को नष्ट कर देता है। आम तौर पर, खुद को आध्यात्मिक कहने वाले लोग कहते हैं कि पैसे से जीवन नष्ट हो जाता है, मगर ऐसा नहीं है। जब आपके जीवन में कोई जोश नहीं होता और आपकी भावनाओं में कोई उत्साह नहीं रह जाता, तब आपका जीवन नष्ट हो जाता है। यह उसे सुरक्षित करता है, मगर आप अपने जीवन को जितना अधिक सुरक्षित करने की कोशिश करते हैं, आप मौत की ओर उतने ही उन्मुख हो जाते हैं क्योंकि दुनिया में सबसे सुरक्षित चीज मौत है। अगर आप जीवित हैं, तो आपके साथ कुछ भी हो सकता है।

जो व्यक्ति किसी चीज को अच्छा या बुरा नहीं मानता, जिसके लिए, चाहे कुछ भी हो जाए, सब ठीक होता है, वह एक सच्चा भक्त होता है। वह एक सच्चा प्रेमी होता है। चाहे जो कुछ भी हो जाए, उसका एक ही लक्ष्य होता है। यह हिसाब-किताब करने वाले लोगों को मूर्खतापूर्ण लग सकता है। जो लोग हिसाब-किताब करते हैं, वे आरामदेह जीवन जी सकते हैं मगर वे अस्तित्व का आनंद कभी नहीं जान पाएंगे। जो लोग हिसाब-किताब नहीं करते, जो जोश के साथ जीवन जीते हैं, वे अस्तित्व के आनंद को जानते हैं। अगर आप हमेशा इस हिसाब-किताब में उलझे रहते हैं कि आप कितना लगाते हैं और आपको कितना वापस मिलता है, तो आपको सिर्फ सुख-सुविधाएं ही मिल पाएंगी, जीवन का आनंद नहीं।

लीला के ये सात दिन आपमें थोडा सा जोश लाने के लिए थे। लीला की यह श्रृंखला अब खत्म हो रही है, लेकिन लीला नहीं। लीला अब शुरू होनी है। लीला का मतलब कृष्ण की नकल करना नहीं है, वह मूर्खतापूर्ण होगा। कृष्ण ने कभी किसी की नकल नहीं की, न ही आपको करनी चाहिए। लीला का मतलब है कि आप अपने जीवन में एक रस, एक आनंद लाएं।

रसिक या क्रीड़ापूर्ण होने को हमेशा गैरजिम्मेदाराना हरकत माना गया है। ये बात आपके बचपन में आपको जरूर बोली गई होगा और शायद आप भी अपने बच्चों से यही कहते होंगे। अगर वे क्रीड़ापूर्ण हैं, मस्ती करते हैं, तो आपको लगता है कि यह गैरजिम्मेदाराना है। मगर जीने का सबसे जिम्मेदारी भरा तरीका जीवन के साथ क्रीड़ापूर्ण होना है। लटके हुए चेहरे के साथ जीवन जीना पूरी तरह  गैरजिम्मेदाराना है। क्रीड़ापूर्ण होने का मतलब, जिम्मेदार होना है। जब आप क्रीड़ापूर्ण होंगे, तभी आप जीवन के प्रति प्रतिक्रियापूर्ण हो पाएंगे। जब आप गंभीर होते हैं, तो आपके आस-पास के जीवन का आपके लिए कोई अस्तित्व नहीं होता। आपका मतलब सिर्फ खुद से और अपनी फालतू बातों से होता है। आप दुनिया में हर चीज के प्रति प्रतिक्रियाशील तभी हो सकते हैं, जब आप क्रीड़ापूर्ण हों। वरना, जीवन का बोझ ही आपको मार डालेगा।

क्रीड़ापूर्ण होना कोई सिद्धांत नहीं है, जिसे आपको विकसित करना है, जैसे कि ‘मैं क्रीड़ापूर्ण होने जा रहा हूं।’ यह समूचा अस्तित्व ऊर्जा का एक नृत्य है। इस अस्तित्व को उत्पन्न करने वाली शक्तियां हमेशा क्रीड़ापूर्ण होती हैं। हमारी संस्कृति में हमेशा से सृष्टि को ईश्वर का खेल माना गया है। ‘ईश्वर का खेल’ का मतलब यह नहीं है कि ईश्वर आपके जीवन के साथ खेल रहा है और आपके लिए कष्ट पैदा कर रहा है। सृष्टि की शक्तियां लगातार क्रीड़ारत रहती हैं। अगर वे खेलना छोड़ दें, तो आप समाप्त हो जाएंगे। जब शरीर के भीतर सभी मूलभूत शक्तियां पूरे जोशोखरोश के साथ सक्रिय होती हैं, तभी आपको अच्छा महसूस होता है।

क्रीड़ा-प्रिय होना आपका नजरिया नहीं है, यह स्रष्टा और सृष्टि का नजरिया है। अगर आप सृष्टि और स्रष्टा के तालमेल में हैं, तो आप कुदरती तौर पर रसप्रिय या क्रीड़ापूर्ण होंगे। जब आप अपने मन की प्रक्रिया – अपने विचारों, राय, विचारधाराओं, सही और गलत और नैतिकताओं के दास हो जाते हैं, तभी आप अपनी रसप्रियता खो देते हैं। सारी रसप्रियता इसलिए खो गई है क्योंकि आप विशाल सृष्टि को अनदेखा करके अपने मन की तुच्छ कल्पनाओं से बहुत ज्यादा जुड़ जाते हैं। अगर आप जीवन के अनुकूल रहते, अगर आप सृष्टि और स्रृष्टा के तालमेल में रहते, तो आप कुदरती तौर पर क्रीड़ापूर्ण होते।

जो लोग क्रीड़ापूर्ण होते हैं, वही सांसारिक समस्याओं का सामना कर सकते हैं और उससे प्रभावित हुए बिना अपना बेहतरीन काम कर सकते हैं। अगर आप अपने अंदर जरूरी रसप्रियता के बिना समस्याओं से जूझने की कोशिश करेंगे, तो वे समस्याएं आपको नष्ट कर देंगी। यही वजह है कि अच्छे इरादों वाले कई लोगों को उनकी परिस्थितियों ने ही मिटा डाला। अगर आप वाकई क्रीड़ापूर्ण हैं, तभी आप उन्हें बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं, वरना सब कुछ आपके लिए समस्याएं खड़ी कर सकता है। आध्यात्मिक मार्ग पर चलना शुरू करने वाले साधक, जो अभी सिद्ध नहीं हुआ है, उसके लिए क्रिया जरूरी है। और अगर आप उसे क्रीड़ापूर्ण नहीं बनाएंगे, तो यह क्रिया घातक सिद्ध होगी – चाहे वह कैसी भी क्रिया हो।

अगर आप अपने काम में रोजाना कुछ घंटे भी क्रीड़ापूर्ण रहने की कोशिश करें, तो आपका भौतिक शरीर भी काफी बेहतर तरीके से काम करना शुरू कर देगा। आपकी नींद की जरूरत कम हो जाएगी और ध्यान एक कुदरती प्रक्रिया बन जाएगा। जब आप क्रीड़ापूर्ण होते हैं, तो आप जो काम करते हैं, उसमें उलझते नहीं। जब आप उनमें नहीं उलझते तो आप कर्म संचित नहीं करते। इसके बाद जीवन की प्रक्रिया मुक्तिदायक हो जाती है। अब आप जो क्रिया करते हैं, वह कर्म नहीं, योग हो जाता है। जब आप दिन भर योग करने लगते हैं, तो जीवन बहुत सहज और प्रवाहमय हो जाता है।

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Swami Lokeshanand Aug 3, 2020

हनुमानजी कंचन, कीर्ति और कामिनी रूपी बाधाओं से बचकर, सागर पार कर गए। लोग कहने लगे कि हनुमानजी ने गजब कर दिया, तो तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि हनुमानजी ने एक ही छलांग में सागर पार कर लिया, तो इसमें क्या हैरानी है? "प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहिं। जलधि लांघि गए अचरज नाहिं॥" यह तो विचार करें कि हनुमानजी के मुख में क्या है? वह मुद्रिका आप अपने मुख में रख लें, आप भी सागर पार कर जाएँगे। हनुमानजी की विशेषता यही है कि उन्होंने अनेक बाधाएँ आने पर भी, मुख से मुद्रिका गिराई नहीं। लोग पूछते हैं- बाबा! वह मुद्रिका कौन से सुनार की दुकान से मिलेगी? हम भी ले लें। तुलसीदासजी कहते हैं- वह मुद्रिका किसी दुकान से नहीं मिलती। वह तो किसी संत से मिलती है। राम नाम ही मुद्रिका है। संकोच और कपट त्यागकर, विनय भाव से, किसी संत के चरणों में अपनी श्रद्धा निवेदन कर के, उन्हें अपनी सेवा से संतुष्ट कर के, यह नाम का दान पाया जाता है। लंका आई तो हनुमानजी को लंका की चमक दमक दिखाई दी। पर वह चमक हनुमानजी को बांध नहीं सकती। क्योंकि जगत के विषय नहीं बाँधते, उन विषयों के प्रति आपकी आसक्ति आपको बाँध देती है। जो जरा सा वैराग्य चढ़ते ही घर छोड़ भागते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि घर तो जड़ है, वह चेतन को कैसे बाँध सकता है? गृहासक्ति बंधनकारी है। ध्यान दें, सबके अंत:करण में भक्ति है, भक्ति विहीन कोई है ही नहीं। प्रेमस्वरूप परमात्मा का अंश, जीव, प्रेम विहीन होगा भी कैसे? अंतर केवल इतना है कि आपने वह प्रेम लगाया कहाँ है? जो प्रेम परमात्मा में लगाना था, उसे आपने स्त्री पुत्रादि में, धन सम्पत्ति में, पद प्रतिष्ठा की दौड़ में लगा रखा है। भक्तिदेवी को, श्रीसीताजी को, आपने कुछ कागज के कतरों, सोने चाँदी के ठीकरों, माँस के लोथड़ों के लिए दूसरों के पास गिरवी रख छोड़ा है। आपने उन्हें चौक चौराहों पर, बाजारों में, दो दो कौड़ियों के लिए, नुमाइश पर लगा रखा है। यही प्रेम यदि परमात्मा में लगा दिया जाता तो भक्ति बन जाता, संसार में लगकर आसक्ति बन गया है। यही प्रेम आसक्ति बनकर आपको दुख, चिंता, उद्वेग, जन्म मरण के बंधन में डाल रहा है। यही प्रेम यदि पुन: भगवान से लगा दें, तो यह आपकी मुक्ति का हेतु बन सकता है। यह नियम है कि जिससे प्रेम होता है, उसे याद करना नहीं पड़ता, उसकी याद अपने आप आती है। यदि आपका प्रेम का पात्र बदल जाए, तो लक्ष्य विस्मृति कैसे हो? मुद्रिका कैसे गिरे? नाम कैसे छूटे? जगत की चमक दमक लक्ष्य से कैसे भटका दे? विडियो-प्रभु मुद्रिका- https://youtu.be/70mHorKLWgs

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white beauty Aug 3, 2020

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Reena Dwivedi Aug 2, 2020

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Shraddha Bhardwaj Aug 2, 2020

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white beauty Aug 3, 2020

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white beauty Aug 3, 2020

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R.G.P.Bhardwaj Aug 3, 2020

. """"श्रावणी उपाकर्म विशेष"""" 🌸🌸〰️〰️🌸〰️🌸〰️〰️🌸🌸 उपाकर्म इन्द्रियों की पवित्रता का पुण्य पर्व...!! 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ उपाकर्म का अर्थ है प्रारंभ करना। उपाकरण का अर्थ है आरंभ करने के लिए निमंत्रण या निकट लाना। वैदिक काल में यह वेदों के अध्ययन के लिए विद्यार्थियों का गुरु के पास एकत्रित होने का काल था। इसके आयोजन काल के बारे में धर्मगंथों में लिखा गया है कि - जब वनस्पतियां उत्पन्न होती हैं, श्रावण मास के श्रवण व चंद्र के मिलन (पूर्णिमा) या हस्त नक्षत्र में श्रावण पंचमी को उपाकर्म होता है। इस अध्ययन सत्र का समापन, उत्सर्जन या उत्सर्ग कहलाता था। यह सत्र माघ शुक्ल प्रतिपदा या पौष पूर्णिमा तक चलता था। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के शुभ दिन रक्षाबंधन के साथ ही श्रावणी उपाकर्म का पवित्र संयोग बनता है। विशेषकर यह पुण्य दिन ब्राह्मण समुदाय के लिए बहुत महत्व रखता है। जीवन की वैज्ञानिक प्रक्रिया:- जीवन के विज्ञान की यह एक सहज, किन्तु अति महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। जन्मदात्री माँ चाहती है कि हर अण्डा विकसित हो । इसके लिए वह उसे अपने उदर की ऊर्जा से ऊर्जित करती है, अण्डे को सेती है। माँ की छाती की गर्मी पाकर उस संकीर्ण खोल में बंद जीव पुष्ट होने लगता है। उसके अंदर उस संकीर्णता को तोड़कर विराट् प्रकृति, विराट् विश्व के साक्षात्कार का संकल्प उभरता है। उसे फिर उस सुरक्षित संकीर्ण खोल को तोड़कर बाहर निकलने में भय नहीं लगता । वह दूसरा-नया जन्म ले लेता है । यह प्रक्रिया प्रकृति की सहज प्रक्रिया है, किन्तु पुरुषार्थसाध्य है । पोषक और पोषित; दोनों को इसके अंतर्गत प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है । इसीलिए युगऋषि ने लिखा है- 'मनुष्य जन्म तो सहजता से हो जाता है, किन्तु मनुष्यता विकसित करने के लिए कठोर पुरुषार्थ करना पड़ता है ।' जैसे अण्डा माता की छाती की ऊष्मा से पकता है, वैसे ही मनुष्यता गुरु-अनुशासन में वेदमाता की गर्मी (शुद्ध ज्ञान की ऊर्जा) से धीरे-धीरे परिपक्व होती है । परिपक्व होने पर साधक अपने संकल्प से उस संकीर्णता के घेरे को तोड़ डालता है। तब उसे अपने तथा जन्मदात्री माता के स्वरूप का बोध होता है । तब वह भी माँ की तरह विराट् आकाश में उड़ने की चेष्टा करता है । तब माँ ऊँची उड़ानें भरने के उसके प्रयासों को शुद्ध-सही बनाती है। यही मर्म है- 'पावमानी द्विजानाम्' का । जो संकीर्णता के खोल में बंद है, उसे माँ विकसित करने के लिए अपनी ऊर्जा तो देती रहती है, किन्तु नया जन्म लेने के पहले उसके लिए अपने अन्य कौशलों का प्रयोग नहीं कर सकती । जिसने दूसरा जन्म ले लिया, वह 'द्विज' । नये दुर्लभ जन्म की प्रक्रिया को पूरा करने की प्रवृत्ति-साधना है 'द्विजत्व' । जब द्विज के चिंतन, चरित्र, व्यवहार पवित्र हो जाते हैं, तो वह ब्रह्म के अनुशासन में सिद्ध ब्राह्मण हो जाता है । जब उसकी कामनाएँ ब्रह्म के अनुरूप ही हो जाती हैं, तो ब्राह्मी चेतना-आदिशक्ति उसके लिए कामधेनु बन जाती है । जिसकी कामनाएँ-प्रवृत्तियों अनगढ़हैं, उन्हें पूरा करने से तो संसार में अनगढ़ता ही बढ़ेगी। इसलिए माता सुगढ़-शुद्ध कामना वालों के लिए ही कामधेनु का रूप धारण करती है । भारतीय संस्कृति में द्विजत्व और ब्राह्मणत्व का संबंध किसी जाति या वर्ग विशेष में जन्म लेने से नहीं है, बल्कि वह साधना की उच्च कक्षा से जुड़े सम्बोधन हैं । इसीलिए संस्कारों से द्विजत्व की प्राप्ति की बात कही जाती रही है । संगीत के द्वार सभी के लिए खुले हैं, किन्तु संगीताचार्य अपनी बारीकियाँ उन्हीं के सामने खोलते हैं, जिनकी संगीत साधना उच्च स्तरीय हो गई है । खेल सभी खेल सकते हैं, किन्तु खेल प्रशिक्षक खेल तकनीक की बारीकियाँ उसी को समझाता है, जिनके कौशल और दमखम की साधना उच्च स्तरीय है । जिसकी साधना विकसित नहीं हुई है, उसे आगे की बात बताने से बतलाने वाले का प्रयास निरर्थक तो जाता ही है, कई बार उसका विपरीत प्रभाव भी भोगना पड़ जाता है । तिथि:- श्रावण पूण्रिमा में यदि ग्रहण या संक्रांति हो तो श्रावणी उपाकर्म श्रावण शुक्ल पंचमी को करना चाहिये। 'भद्रायां ग्रहणं वापि पोर्णिमास्या यदा भवेत। उपाकृतिस्तु पंचम्याम कार्या वाजसेनयिभः' संक्रांति व पूर्णिमा युति या ग्रहण पूर्णिमा युति में वाजसेनी आदि सभी शाखा के ब्राह्मणों को उपाकर्म (श्रावणी) पंचमी को कर लेनी चाहिये। शास्त्र सम्मत श्रावण उपाकर्म भद्रा दोष, ग्रहण युक्त पूर्णिमा, संक्राति युक्त पूर्णिमा में नहीं किया जाता तब उससे पूर्व श्रावण शुक्ल पंचमी नागपंचमी में श्रावणी स्नान उपाकर्म करने के शास्त्रोत्त निर्देश हैं। हेमाद्रिकल्प, स्कंद पुराण, स्मृति महार्णव, निर्णय सिंधु, धर्म सिंधु आदि योतिष व धर्म के निर्णय ग्रंथों में इसके प्रमाण हैं। कुछ ग्रंथों के प्रमाण इस प्रकार हैं- 'श्रावण शुक्लया: पूर्णिमायां ग्रहणं संक्रांति वा भवेतदा। यजुर्वेदिभिः श्रावण शुक्ल पंचम्यामुपाकर्म कर्तव्यं॥' अर्थात श्रावण पूण्रिमा में यदि ग्रहण या संक्रांति हो तो श्रावणी उपाकर्म श्रावण शुक्ल पंचमी को करना चाहिये। एक अन्य श्लोक के उल्लेख के अनुसार भद्रा में दो कार्य नहीं करना चाहिये एक श्रावणी अर्थात उपाकर्म, रक्षाबंधन, श्रवण पूजन आदि और दूसरा फाल्गुनि होलिका दहन। भद्रा में श्रावणी करने से राजा की मृत्यु होती है तथा फाल्गुनी करने से नगर ग्राम में आग लगती है तथा उपद्रव होते हैं। श्रावणी अर्थात उपाकर्म रक्षाबंधन, श्रवण पूजन भद्रा के उपरांत ही की जा सकती है। लेकिन ग्रहण युक्त पूर्णिमा भी श्रावणी उपाकर्म में निषिध्द है|ब्राह्मणों का यह अतिमहत्वपूर्ण कर्म हैं। श्रावणी पर्व👉 श्रावणी पर्व द्विजत्व की साधना को जीवन्त, प्रखर बनाने का पर्व है । जो इस पर्व के प्राण-प्रवाह के साथ जुड़ते हैं, उनका द्विजत्व-ब्राह्मणत्व जाग्रत् होता जाता है तथा वे आदिशक्ति, गुरुसत्ता के विशिष्ठ अनुदानों के प्रामाणिक पात्र बन जाते हैं। द्विजत्व की साधना को इस पर्व के साथ विशेष कारण से जोड़ा गया है । युगऋषि ने श्रावणी पर्व के सम्बन्ध में लिखा है कि यह वह पर्व है जब ब्रह्म का 'एकोहं बहुस्यामि' का संकल्प फलित हुआ। पौराणिक उपाख्यान सबको पता है। भगवान की नाभि से कमलनाल निकली, उसमें से कमल पुष्प विकसित हुआ। उस पर स्रष्टा ब्रह्मा प्रकट हुए, उन्होंने सृष्टि की रचना की । युगऋषि इस अंलकारिक आख्यान का मर्म स्पष्ट करते हुए लिखते हैं- "संकल्पशक्ति क्रिया में परिणित होती है और उसी का स्थूल रूप वैभव एवं घटनाक्रम बनकर सामने आता है । नाभि (संकल्प) में से अन्तरंग बहिरंग बनकर विकसित होने वाली कर्म-वर्लरी को ही पौराणिक अलंकरण में कमलबेल कहा गया है । पुष्प इसी बेल का परिपक्व परिणाम है । सृष्टि का सृजन हुआ, इसमें दो तत्व प्रयुक्त हुए-१ ज्ञान, २ कर्म । इन दोनों के संयोग से सूक्ष्म चेतना, संकल्प शक्ति स्थूल वैभव में परिणत हो गई और संसार का विशाल कलेवर बनकर खड़ा हो गया। उसमें ऋद्धि-सिद्धियों का आनन्द-उल्लास भर गया । यही कमल-पुष्प की पखुड़ियाँ हैं । इसका मूल है ज्ञान और कर्म, जो ब्रह्म की इच्छा और प्रत्यावर्तन प्रक्रिया द्वारा सम्भव हुआ । ज्ञान और कर्म के आधार पर ही मनुष्य की गरिमा का विकास हुआ है ।" मनुष्य की महान गरिमा के अनुरूप जीवन जीने के अभ्यास को द्विजत्व की साधना कहा गया है । द्विजत्व की साधना सहज नहीं है । मन की कमजोरियों और परिस्थितियों की विषमताओं के कारण प्रयास करने पर भी साधकों से चूकें हो जाती हैं । समय-समय पर आत्म समीक्षा द्वारा उन भूल-चूकों को चिन्हित करके उन्हें ठीक करना, अपने अन्दर सन्निहित महान सम्भावनाओं को जाग्रत्-साकार करने के प्रयास करना जरूरी होता है। इस सदाशयतापूर्ण संकल्प को पूरा करने के लिए श्रावणी पर्व-ब्राह्मी संकल्प के फलित होने वाले पर्व से श्रेष्ठ और कौन-सा समय हो सकता है? इसलिए ऋषियों ने द्विजत्व के परिमार्जन-विकास के लिए श्रावणी पर्व को ही चुना है । विधि👉 श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष है- प्रायश्चित्त संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय। सर्वप्रथम होता है। प्रायश्चित्त रूप में हेमाद्रि स्नान संकल्प। गुरु के सान्निध्य में ब्रह्मचारी गोदुग्ध, दही, घृत, गोबर और गोमूत्र तथा पवित्र कुशा से स्नानकर वर्ष भर में जाने- अनजाने में हुए पापकर्मों का प्रायश्चित्त कर जीवन को सकारात्मकता से भरते हैं। स्नान के बाद ऋषिपूजन, सूर्योपस्थान एवं यज्ञोपवीत पूजन तथा नवीन यज्ञोपवीत धारण करते हैं। यज्ञोपवीत या जनेऊ आत्म संयम का संस्कार है। आज के दिन जिनका यज्ञोपवित संस्कार हो चुका होता है, वह पुराना यज्ञोपवित उतारकर नया धारण करते हैं। और पुराने यज्ञोपवित का पूजन भी करते हैं । इस संस्कार से व्यक्ति का दूसरा जन्म हुआ माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति आत्म संयमी है, वही संस्कार से दूसरा जन्म पाता है और द्विज कहलाता है। उपाकर्म का तीसरा पक्ष स्वाध्याय का है। इसकी शुरुआत सावित्री, ब्रह्मा, श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, स्मृति, सदसस्पति, अनुमति, छंद और ऋषि को घृत की आहुति से होती है। जौ के आटे में दही मिलाकर ऋग्वेद के मंत्रों से आहुतियां दी जाती हैं। इस यज्ञ के बाद वेद-वेदांग का अध्ययन आरंभ होता है। इस सत्र का अवकाश समापन से होता है। इस प्रकार वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा साढ़े पांच या साढ़े छह मास तक चलती है। वर्तमान में श्रावणी पूर्णिमा के दिन ही उपाकर्म और उत्सर्ग दोनों विधान कर दिए जाते हैं। प्रतीक रूप में किया जाने वाला यह विधान हमें स्वाध्याय और सुसंस्कारों के विकास के लिए प्रेरित करता है। यह जीवन शोधन की एक अति महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक-आध्यात्मिक प्रक्रिया है । उसे पूरी गम्भीरता के साथ किया जाना चाहिए । श्रावणी पर्व वैदिक काल से शरीर, मन और इन्द्रियों की पवित्रता का पुण्य पर्व माना जाता है । इस पर्व पर की जाने वाली सभी क्रियाओं का यह मूल भाव है कि बीते समय में मनुष्य से हुए ज्ञात-अज्ञात बुरे कर्म का प्रायश्चित करना और भविष्य में अच्छे कार्य करने की प्रेरणा देना। द्विज और द्विजत्व👉 द्विज सम्बोधन यहाँ किसी जाति-वर्ग विशेष के लिए नहीं है, यह एक गुणवाचक सम्बोधन है । जीवन साधना की उच्चतम कक्षा के सफल साधक का पर्याय है। द्विज का अर्थ होता है-दुबारा जन्म लेने वाला । संस्कृत साहित्य में पक्षियों को भी द्विज कहा जाता है । माँ जन्म देती है अण्डे को । माँ के गर्भ से जन्म ले लेने की प्रक्रिया पूरी हो जाने पर भी बच्चे का स्वरूप जन्मदात्री के स्वरूप के अनुरूप नहीं होता । परन्तु अण्डे के अंदर जो जीव है, उसमें जन्मदात्री के अनुरूप विकसित होने की सभी संभावनाएँ होती हैं । प्रकृति के अनुशासन का पालन किये जाने पर उसका समुचित विकास हो जाता है और वह अण्डे में बँधी अपनी संकीर्ण सीमा को तोड़कर अपने नये स्वरूप में प्रकट हो जाता है । इस प्रक्रिया को उसका दूसरा जन्म कहना हर तरह से उचित है । यह प्रक्रिया पूरी होने पर ही उसे प्रकृति की विराटता का बोध होता है। तभी माँ उसे उड़ने का प्रशिक्षण देती है । ऋषियों ने अनुभव किया कि मनुष्य स्रष्टा की अद्भुत कृति है । उसमें दिव्य शक्तियों, क्षमताओं के विकास की अनंत सँभावनाएँ हैं । सामान्य रूप से तो माँ के गर्भ से जन्म लेने के बाद भी वह पशुओं जैसी आहार, निद्रा, भय, मैथुन की संकीर्ण प्रवृत्तियों के घेरे में ही कैद रहता है। मनुष्य की अंतःचेतना जब पुष्ट होकर संकीर्णता के उस अण्डे जैसे घेरे को तोड़कर बाहर आने का पुरुषार्थ करती है, तब उसका दूसरा जन्म होता है। तभी माता (आदिरशक्ति) उसे सदाशयता और सत्पुरुषार्थ (सद्ज्ञान एवं सत्कर्म) के पंख फैलाकर जीवन की ऊँचाइयों में उड़ने का प्रशिक्षण देती है । तैयारी करें:- जो साधक वास्तव में इसका यथेष्ट लाभ उठाना चाहते हैं, उन्हें इसके लिए कम से कम एक दिन पूर्व से विचार मंथन करना चाहिए । गुरुदीक्षा के समय अथवा अगले चरण के साधना प्रयोगों में जो नियम-अनुशासन स्वीकार किये गये थे, उन पर ध्यान दिया जाना चाहिए । भूलों को समझे और स्वीकार किए बिना उनका शोधन संभव नहीं । आत्मसाधना में समीक्षा के बाद ही शोधन, निर्माण एवं विकास के कदम बढ़ाये जा सकते हैं । जो भुल-चूकें हुई हों, उन्हें गुरुसत्ता के सामने सच्चे मन से स्वीकार किया जाना चाहिए । क्षति पूर्ति के लिए अपने कत्तव्य निश्चित करके गुरुसत्ता से उसमें समुचित सहायता की प्रार्थना करनी चाहिए । श्रावणी उपाकर्म के सामूहिक क्रम में जो शामिल हों, उन्हें सामूहिक कर्मकाण्ड का लाभ तभी मिलेगा, जब वे उसके लिए व्यक्तिगत मंथन कर चुके होंगे । उसके बाद शिखा सिंचन उच्च विचार-ज्ञान साधना को तेजस्वी बनने के लिए किया जाता है । यज्ञोपवीत परिवर्तन यज्ञीय कर्म अनुशासन को अधिक प्रखर-प्रामाणिक बनाने के लिए किया जाता है । ब्रह्मा का, वेद का और ऋषियों का आवाहन, पूजन उनकी साक्षी में संकल्प करने तथा उनके सहयोग से आगे बढ़ते रहने के भाव से किया जाता है। रक्षाबंधन प्रगति के श्रेष्ठ संकल्पों को पूरा करने के भाव से किया-कराया जाता है । प्रकृति के अनुदानों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के साथ उसके ऋण से यथाशक्ति उऋण होने के भाव से वृक्षारोपण करने का नियम है । श्रावणी पर हर दीक्षित साधक को साधना का परिमार्जन करने के साथ उसको श्रेष्ठतर स्तरों पर ले जाने के संकल्प करने चाहिए । ऐसा करने वाले साधक ही इष्ट, गुरु या मातृसत्ता के उच्च स्तरीय अनुदानों को प्राप्त करने की पात्रता अर्जित कर सकते हैं। यदि सामूहिक पर्व क्रम में शामिल होने का सुयोग न बने तथा विशेष कर्मकाण्डों का करना-कराना संभव न हो, तो भी अपने साधना स्थल पर भावनापूर्वक पर्व के आवश्यक उपचारों द्वारा श्रावणी के प्राण- प्रवाह से जुड़कर उसका पर्याप्त लाभ प्राप्त किया जा सकता है । इसके लिए सभी को एक दिन पहले से ही जागरूकतापूर्वक प्रयास करने-कराने चाहिए। भूलों के सुधार तथा विकास के लिए निर्धारित नियमों को लिखकर पूजा स्थल पर रख लेना चाहिए । उपासना के समय उन पर दृष्टि पड़ने से होने वाली भूलों, विसंगतियों से बचना संभव होता है । हमारे सार्थक प्रयास हमें उच्च स्तरीय प्रगति का अधिकारी बना सकते हैं। उपाकर्म के लिये सामग्री 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 1 हल्दी 2 कलावा (मौली) 3 अगरबत्ती 4 कपूर 5 तिल 6 जो 7 यज्ञोपवीत 8 चावल 9 अबीर 10 गुलाल 11 माचिस 12 सिंदूर 13 रोली 14 सुपारी, (बड़ी) 15 नारियल 16 सरसो 17 हवन सामग्री 18 शहद (मधु) 19 शक्कर 20 घृत (शुद्ध घी) 21 अगरबत्ती 22धुप बत्ती 23 सप्तमृत्तिका 〰️〰️〰️〰️〰️ हाथी के स्थान की मिट्टि, घोड़ा बांधने के स्थान की मिट्टी, बॉबी की मिट्टी, दीमक की मिट्टी, नदी संगम की मिट्टी, तालाब की मिट्टी, गौ शाला की मिट्टी, राज द्वार की मिटटी 24 पंचगव्य 〰️〰️〰️〰️ गाय का गोबर , गौ मूत्र, गौ घृत, गाय का दूध, गाय का दही 25 सप्त धान्य 〰️〰️〰️〰️ कुलबजन-100ग्राम, जौ, गेहूँ, चावल, तिल, काँगनी, उड़द, मूँग 26कुशा 27दूर्वा 28 पुष्प कई प्रकार के 29 गंगाजल 30 ऋतुफल 39ल1 स्वेतवस्त्र ब्राह्मण को अपने लिए उपयोगी सामग्री 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ धोती, दुपट्टा, आंगोछा, आसन, माला, गौमुखी, लोटा, पंचपात्र, चमची, तष्टा, अर्घा, डाभ अंगूठी, जनेऊ गांठ लगा हुआ। श्रावणी रक्षाबंधन के दिन उपाकर्म के अंतर्गत पाप कर्म की मुक्ति के लिए इन 10 चीजों से एक एक करके स्नान किया जाता हैं- मिट्टी, गाय का गोबर, गाय का दूध, गाय का घी, गाय का पंचगव्य, भस्म, अपामार्ग, कुशा+दूर्वा, शहद एवं गंगाजल, आदि 10 पदार्थो के द्वारा स्नान किया जाता है । इस स्नान से शारीरिक शुद्धि होती है और ऋषिपूजन, देवपूजन, द्वारा आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है। इस क्रम को करने के बाद नये यज्ञोपवित का पूजन कर पहनने के बाद पुराने को बदला जाता हैं, बाद में हवन करके सूर्य भगवान को अर्घ्य चढ़ाया जाता है । साथ इस दिन आत्मशुद्धि के बाद वेद शास्त्रों के अध्यन का भी नियम होता है । 🔥 """"गजेन्द्र प्रताप राजभर"""" 🔥 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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