Jayshree Shah
Jayshree Shah Oct 5, 2017

Jay jinendra

Jay jinendra

सत्संग हम किस लिये जाते है.......कभी विचार किया......??

वहां चल रहे गुरुवाणी के शब्दों पर ध्यान दिया या आखें केवल चमत्कार देखने में लगी है....... अपना ध्यान केवल शब्दों पर रखे और आंखों को बन्द करके सतगुरुजी को देखने की कोशिश करे।

फिर देखना खुद को ..... आपका रोम रोम पुलकित हो जायेगा.... सतगुरुजी को अपने भीतर महसूस करोगे। आप बहार के चमत्कार की बजाय अपने भीतर ही चमत्कार महसूस करोगे।

सत्संग मे हम सत्य को ही तो पाना चाहते और वो सत्य तो सतगुरुजी ही है..... और सतगुरु जी ने आपको इसीलिये तो सत्संग़ में बुलाया है.....।।।

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कामेंट्स

आप सभी उदास ना हों , बहुत ही जल्दी सब ठीक होगा.. और फिर से ज़िंदगी की उड़ान शुरू होगी , अभी के दौर के लिए कुछ पंक्तियाँ ... आज सलामत रहे , तो कल की सहर देखेंगे... आज पहरे मे रहे तो कल का पहर देखेंगें । सासों के चलने के लिए , कदमों का रुकना ज़रूरी है... घरों में बंद रहना दोस्तों हालात की मजबूरी है । अब भी न संभले तो बहुत पछताएँगे.. सूखे पत्तों की तरह हालात की आँधी में बिखर जाएँगे । यह जंग मेरी या तेरी नहीं , हम सब की है.. इस की जीत या हार भी हम सब की है । अपने लिए नहीं , अपनों के लिए जीना है... यह जुदाई का ज़हर दोस्तों , घूँट- घूँट पीना है । आज महफूज़ रहे , तो कल मिल के खिलखिलाएँगे.. गले भी मिलेंगे , और हाथ भी मिलाएँगे। शुभ रात्रि 💐💐🌹🌹🙏

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🌹प्रभू की दुकान 🌹 एक दिन में सड़क से जा रहा था । रास्ते में एक जगह बोर्ड लगा था 🙏🏻ईश्वरीय किरायाने की ⚖️दुकान मेरी जिज्ञासा बढ़ गई क्यों ना इस दुकान पर जाकर देखो इसमें बिकता क्या है? जैसे ही यह ख्याल आया🪟 दरवाजा अपने आप खुल गया । मैंने खुद को दुकान के अंदर पाया। जरा सी जिज्ञासा रखते हैं द्वार अपने आप खुल जाते हैं। खोलने नहीं पड़ते। मैंने दुकान के अंदर देखा जगह-जगह देवदूत खड़े थे एक देवदूत ने । मुझे टोकरी देते हुए कहा ,मेरे बच्चे ध्यान से खरीदारी करो वहा वह सब कुछ था जो एक इंसान को चाहिए होता है। देवदूत ने कहा एक बार में टोकरी भर कर ना ले जा सको, तो दोबारा आ जाना फिर दोबारा टोकरी भर लेना। अब मैंने सारी चीजें देखी ।सबसे पहले धीरज खरीदा फिर प्रेम भी ले लिया, फिर समझ भी ले ली। फिर एक दो डिब्बे विवेक भी ले लिया। आगे जाकर विश्वास के दो तीन डिब्बे उठा लिए ।मेरी टोकरी भरती गई । आगे गया पवित्रता मिली सोचा इसको कैसे छोड़ सकता हूं , फिर शक्ति का बोर्ड आया शक्ति भी ले ली। हिम्मतभी ले ली सोचा हिम्मत के बिना तो जीवन में काम ही नहीं चलता। आगे सहनशीलता ली फिर मुक्ति का डिब्बा भी ले लिया । मैंने वह सब चीजें खरीद ली जो मेरे मालिक खुदा को पसंद है। फिर जिज्ञासु की नजर प्रार्थना पर पड़ी मैंने उसका भी एक डिब्बा उठा लिया। कि सब गुण होते हुए भी अगर मुझसे कभी कोई भूल हो जाए तो मैं प्रभु 🙏🏻से प्रार्थना कर लूंगा कि मुझे भगवान माफ 🙏🏻कर देना आनंद शांति गीतों से मैंने basket 🛒को भर लिया। फिर मैं काउंटर🚶🏻‍♂️ पर गया और देवदूत से पूछा सर -मुझे इन सब समान का कितना बिल चुकाना है देवदूत बोला मेरे बच्चे यहां के bill को चुकाने का ढंग भी ईश्ववरीय है। अब तुम जहां भी जाना इन चीजों को भरपूर बांटना और लुटाना। इन चीजों का बिल इसी तरह चुकाया जाता है । कोई- कोई विरला इस दुकान पर प्रवेश करता है। जो प्रवेश कर लेता है वह मालो- माल हो जाता है। वह इन गुणों को खूब भोगता भी है ,और लुटाता भी है। प्रभू की यह दुकान शिव सतगुरु के सत्संग की दुकान है। शिव सतगुरु की शरण🧘🏻‍♂️ में आकर, उसके वचनों से प्रीत करते हैं तो सब गुणों के खजाने हमको मिल जाते हैं फिर कभी खाली हो भी जाए फिर सत्संग में आ कर बास्केट भर लेना 🙏🙏🙏 🌹तू ही तू 🌹

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**( भगवान् क्यो आते हैं )** .ram ram ji ✍️✍️🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏🙏🙏 . एक बार अकबर ने बीरबल से पूछाः तुम्हारे भगवान और हमारे खुदा में बहुत फर्क है। . हमारा खुदा तो अपना पैगम्बर भेजता है जबकि तुम्हारा भगवान बार- बार आता है। यह क्या बात है ? . बीरबलः जहाँपनाह ! इस बात का कभी व्यवहारिक तौर पर अनुभव करवा दूँगा। आप जरा थोड़े दिनों की मोहलत दीजिए। . चार-पाँच दिन बीत गये। बीरबल ने एक आयोजन किया। . अकबर को यमुनाजी में नौका विहार कराने ले गये। कुछ नावों की व्यवस्था पहले से ही करवा दी थी। . उस समय यमुनाजी छिछली न थीं। उनमें अथाह जल था। . बीरबल ने एक युक्ति की कि जिस नाव में अकबर बैठा था, उसी नाव में एक दासी को अकबर के नवजात शिशु के साथ बैठा दिया गया। . सचमुच में वह नवजात शिशु नहीं था। मोम का बालक पुतला बनाकर उसे राजसी वस्त्र पहनाये गये थे ताकि वह अकबर का बेटा लगे। . दासी को सब कुछ सिखा दिया गया था। नाव जब बीच मझधार में पहुँची और हिलने लगी तब 'अरे.... रे... रे.... ओ.... ओ.....' कहकर दासी ने स्त्री चरित्र करके बच्चे को पानी में गिरा दिया और रोने बिलखने लगी। . अपने बालक को बचाने-खोजने के लिए अकबर धड़ाम से यमुना में कूद पड़ा। . खूब इधर-उधर गोते मारकर, बड़ी मुश्किल से उसने बच्चे को पानी में से निकाला। . वह बच्चा तो क्या था मोम का पुतला था। . अकबर कहने लगाः बीरबल ! यह सारी शरारत तुम्हारी है। तुमने मेरी बेइज्जती करवाने के लिए ही ऐसा किया। . बीरबलः जहाँपनाह ! आपकी बेइज्जती के लिए नहीं, बल्कि आपके प्रश्न का उत्तर देने के लिए ऐसा ही किया गया था। . आप इसे अपना शिशु समझकर नदी में कूद पड़े। उस समय आपको पता तो था ही इन सब नावों में कई तैराक बैठे थे, नाविक भी बैठे थे और हम भी तो थे ! . आपने हमको आदेश क्यों नहीं दिया ? हम कूदकर आपके बेटे की रक्षा करते ! . अकबरः बीरबल ! यदि अपना बेटा डूबता हो तो अपने मंत्रियों को या तैराकों को कहने की फुरसत कहाँ रहती है ? . खुद ही कूदा जाता है। . बीरबलः जैसे अपने बेटे की रक्षा के लिए आप खुद कूद पड़े, ऐसे ही हमारे भगवान जब अपने बालकों को संसार एवं संसार की मुसीबतों में डूबता हुआ देखते हैं तो वे पैगम्बर-वैगम्बर को नहीं भेजते, वरन् खुद ही प्रगट होते हैं। . वे अपने बेटों की रक्षा के लिए आप ही अवतार ग्रहण करते है और संसार को आनंद तथा प्रेम के प्रसाद से धन्य करते हैं।

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अध्यात्म बड़ा सरल है। फिर भी लोग मन में कई भ्रांतियां पाल लेते हैं कि कहीं आध्यात्मिक होने पर घर छोड़कर संन्यास लेना पड़ जाए, कहीं बैरागी न हो जाऊं, कहीं गृहस्थ धर्म न छोड़ दूं। अध्यात्म तो हमें जीवन जीना सिखाता है। जैसे कोई भी मशीन खरीदने पर उसके साथ एक मैन्युअल बुक आती है, ऐसे ही तन-मन को चलाने के लिए मैन्युअल बुक गीता आदि आध्यात्मिक शास्त्र और गुरु होते हैं जो हमें शरीर, इंद्रियों, मन, बुद्धि अहंकार का प्रयोग करना सिखाते हैं। घर-गृहस्थी में तालमेल बिठाना सिखाते हैं, समाज में आदर्श के रूप में रहना सिखाते हैं, मन को सुलझाना सिखाते हैं। अत: धर्म कोई भी हो, लेकिन सभी को आध्यात्मिक अवश्य होना चाहिए। अब प्रश्र उठता है कि अध्यात्म का लक्ष्य क्या है? यह समझो जैसे आप कभी पहाडिय़ों पर घूमने जाते हैं। पहाडिय़ों पर मंजिल भी वैसी ही होती है, जैसा रास्ता। फिर आप रास्ते के साइड सीन का आनंद लेते हैं, हर सीन को देखकर प्रसन्न होते हैं, उसका मजा लेते हैं। फिर अंत में जहां पहुंचते हैं, वहां भी वही दृश्य पाते हैं। अत: रास्ते का ही मजा है। लॉन्ग ड्राइव में आप रास्ते का ही आनंद लेते हैं। अध्यात्म की यात्रा भी ऐसी ही होती है जिसमें रास्ते का ही मजा है। अध्यात्म कहता है कि बीतते हुए हर पल का आनंद लो, उस पल में रहो, हर पल को खुशी के साथ जियो। हर परिस्थिति, सुख-दुख, मान-सम्मान, लाभ-हानि से गुजरते हुए अपने में मस्त रहो। द्वंद्वों में सम्भाव में रहो क्योंकि मुक्ति मरने के बाद नहीं, जीते जी की अवस्था है। जब हम अपने स्वरूप के साथ जुड़कर हर पल को जीते हैं, तब वह जीते जी मुक्त भाव में ही बना रहता है। अध्यात्म कोई मंजिल नहीं, बल्कि यात्रा है। इसमें जीवन भर चलते रहना है। यह यात्रा हमें वर्तमान में रहना और अभी में आनंद लेना सिखाती है। यदि ‘अभी में’ रहकर उस आनंद भाव में नहीं आए तो कभी हम आनंद में नहीं आ पाएंगे और जब भी आएंगे, उस समय भी अभी ही होगा। वैसे हम पूरा जीवन अभी-अभी की शृंखला में जीते हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक अभी-अभी-अभी में ही जीते हैं। फिर भी मन भूतकाल या भविष्य में ही बना रहता है और भूतकाल का दुख या भविष्य का डर या लालच में ही मन घूमता रहता है लेकिन जब हम अभी में आते हैं, उसी समय से हमारे जीवन में अध्यात्म का प्रारम्भ होता है और फिर हम इस अभी-अभी की कड़ी को पकड़ कर रखते हैं। इसलिए मुक्ति अभी में है, भविष्य में नहीं। अत: यदि हम जीवन भर अभी को पकड़ कर रखें फिर हम जहां हैं जैसे हैं, वहीं आध्यात्मिक हो सकते हैं।

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‼️ *आवश्यक जानjकारी*‼️ आज मैं आपके साथ साझा करना चाहूंगा कि जैन समुदाय के नेता प्रमोदभाई मलकान के साथ क्या हुआ था। उनके बेटे को कोरोना पॉजिटिव था। ऑक्सीजन का स्तर (लेवल) 80-85 हो गया था। चिकित्सकीय सलाह के अनुसार अस्पताल में भर्ती करना जरुरी था। लेकिन घरेलू उपाय के जानकार प्रमोदभाई ने कपूर का एक क्यूब और एक चम्मच अजवायन को रूमाल में बांधकर 10 से 12 बार लंबी गहरी सूंघवाने की कोशिश करवाई। हर दो घँटे इसे शुरू करने से 24 घंटे के भीतर, ऑक्सीजन का स्तर 98-99 तक चला गया और हॉस्पिटल जाने की जंझट से बच गए। उनके एक दोस्त को अस्पताल में भर्ती कराया गया था और उन्होंने यह प्रयोग उन पर भी किया इससे भी अच्छा परिणाम मिला और उन्हें अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई। यह जानकारी समाज के लिये बनाई गई है ताकि यह दूसरों के लिए उपयोगी हो। *कोरोना वायरस, आयुर्वेद को अपनाने वालों को डरने की जरूरत नहीं है। "* डॉ प्रयाग डाभी संजीवनी हेल्थकेयर, गुजरात सभी लोगों से अनुरोध है कि पिछले एक वर्ष से पूरी दुनिया में कोरोना वायरस का प्रकोप है, और कब तक रहेगा , यह पता नहीं। इसलिए आयुर्वेद इस बीमारी से बचने का एकमात्र तरीका है। ‼️कपूर 2 टिक्की अजवाइन 1 चम्मच लवंग 5 नग‼️ *👉इन सभी चीजों को मिलाएं, उन्हें एक सूती कपड़े की पोटली में बाँधें और अपनी जेब में रखें और दिन भर उसे सूँघते रहें।* 👏🏻 कृपया इस जानकारी को पूरे भारत में फैलाएं ताकि हर भारतीय कोरोनवायरस से संक्रमित न हो। 👏🏻 डॉ प्रयाग डाभी Mo.9909991653 संकलन विनय कुमार छिपानी 79996 25125 🙏🙏

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mansukh lal oswal Apr 11, 2021

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white beauty Apr 11, 2021

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