दीपों से सज गयी आयोध्या, राम भक्ति में लोग हुए मगन।

दीपों से सज गयी आयोध्या, राम भक्ति में लोग हुए मगन।
दीपों से सज गयी आयोध्या, राम भक्ति में लोग हुए मगन।
दीपों से सज गयी आयोध्या, राम भक्ति में लोग हुए मगन।
दीपों से सज गयी आयोध्या, राम भक्ति में लोग हुए मगन।

आयोध्या में पहली बार दीवाली का भव्य आयोजन कर लोगों में धर्म के प्रति अलख जलाने का सराहनीय कार्य।

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कामेंट्स

बब्लू गुप्ता Oct 18, 2017
कान तरस गए थे अयोध्या में यूपी के किसी मुख्यमंत्री द्वारा जय श्रीराम के उद्घोष के लिए आज योगी जी ने इच्छा पूरी कर दी जय श्री राम

Manohar Borana Oct 18, 2017
मुख्यमंत्री जी हो तो हमारे योगी जी जैसा हो जय श्री राम

चित्त के विक्षेप ही विघ्‍न हैं। ये नौ हैं- ये सभी विक्षेप मन्त्र के जाप से समाप्त हो जाते हैं!!!!!!!! सौ रोगों की एक औषधि, मंत्र जाप,प्रभुश्रीराम ने स्वयं अपने मुखार विंदु से माता सबरी को बतायी थी। प्रस्तुत लेख हम आपको मन्त्र जाप के लाभ बतायेगें। * मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥ 1. व्याधि या रोग = शरीर या मन में रोग का उत्पन्न होना। रोग तभी होता है जब जैव विद्युत चक्र अव्यवस्थित हो जाता है। इसके प्रवाह में व्यतिक्रम या व्यतिरेक उठ खड़े होते हैं। इस स्थिति में व्यक्ति रोगी हो जाता है क्योंकि रोग उसे घेर लेते हैं। जैव विद्युत चक्र को लयबद्ध कर देने से रोग ठीक हो जाते हैं। यह जान लें कि मन्त्र जाप से प्राण विद्युत के चक्र में आने वाली बाधाओं का निराकरण किया जाता है और साधक को ब्र्ह्माण्डीय ऊर्जा का एक बड़ा अंश प्राप्त होता है। 2. अकर्मण्यता - काम न करने की प्रवृत्ति,, अकर्मण्यता तभी आती है जब हममें ऊर्जा का स्रोत निर्बल होता है। तब हम स्वयं को शिथिल व निर्बल पाते हैं। मन्त्र जप से ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का प्रवाह मिलता है और अकर्मण्यता उत्साह में बदल जाती है। 3. संशय या सन्देह- साधना के परिणाम एवं स्वयं की क्षमता पर सन्देह है। दृढ़ता के विरूद्ध ही संशय है। इससे मानसिक ऊर्जा कई भागों में विभाजित हो जाती है। मन्त्र प्रयोग से संशय का कोई स्थान नहीं रहता है। 4. प्रमाद- आध्यात्मिक अनुष्ठानों की अवहेलना करना ही है। प्रमाद सदैव मन में होता है। ऐसे में मन मूर्छित अवस्था में होता है। होश खोया मन प्रमादी होता है। मन्त्र जप से मन को होश में लाया जा सकता है। 5. आलस्य- तमोगुण की वृद्धि से साधना को बीच में ही छोड़ देना है क्योंकि चित्त और शरीर दोनों भारी हो जाते हैं। आलस्य एक प्रकार से जीवन के प्रति उत्साह खोना है। बच्चे कभी नहीं थकते क्योंकि उनके पास ऊर्जा का अक्षय भण्डार होता है। मन्त्र जाप से ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन होने लगता है जिसके फलस्वरूप साधक में नए उत्साह की अनुभूति जागती है और वह आलसी नहीं रहता है। 6. अविरति- विषय वासना में आसक्त होना है जिस कारण वैराग्य का अभाव हो जाता है। विषयासक्ति शरीर और मन की एकत्र ऊर्जा का व्यय न हो पाने से होती है। मन्त्र साधना से ऊर्जा का उर्ध्वगमन या व्यय होता है जिससे विषयासक्ति छंट जाती है। 7. भ्रान्ति- साधना को किसी कारण अपने प्रतिकूल मान लेना ही है। भ्रान्ति खुली आंखों से स्वप्न देखना है। मन्त्र जाप से जाग्रत हो जाता है साधक और भ्रान्ति रहती नहीं है। 8. अलब्धता- उपलब्धि न मिलने से उपजी निराशा ही है। दुर्बलता असहाय एवं दुर्बल करती है। सामर्थ्य पूर्ण न होने से विराट से स्वयं को अलग अनुभूत करने से दुर्बलता आती है। मन्त्र जाप से हम विराट चेतना से जोड़ता है जिससे सिद्धि वश साध्य दिखने लगता है और दुर्बलता दिखती नहीं है। 9. अस्थिरता- स्थिरता की स्थिति में न टिक पाना ही अस्थिरता है। अस्थिरता बहाने ही हैं। कुछ करने से पूर्व ही न करने के अनेक बहाने ढूंढ या गढ़ लेते हैं। बहाने बनाना अस्थिरता ही है। मन्त्र जप दृढ़ता से होने पर सजगता आ जाती है और चित्त साधना में रत रहता है।इसमें निरन्तरता आती रहे तो सब विक्षेप हट जाते हैं और साधक साध्य की प्राप्ति में खो जाता है और एक नई अनुभूति में लिप्त होकर दूजों को मार्ग दिखाने लगता है। मंत्र कौन सा जपे। श्रीराम जय राम जय जय राम। *महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥ महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥ भावार्थ:-जो महामंत्र है, जिसे महेश्वर श्री शिवजी जपते हैं और उनके द्वारा जिसका उपदेश काशी में मुक्ति का कारण है तथा जिसकी महिमा को गणेशजी जानते हैं, जो इस 'राम' नाम के प्रभाव से ही सबसे पहले पूजे जाते हैं॥

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Rakesh Jain Jan 21, 2020

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SurajBhardwaj Jan 21, 2020

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D N SINGH RATHORE Jan 21, 2020

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Deepak tirapathi Jan 22, 2020

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