Aman
Aman Jun 10, 2018

JAIN Song - Bache Manake Sache

https://youtu.be/23xY6Z4Gc1Q

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"ठाकुर जी की होली लीला" ठाकुरजी की ये लीला बडी ही मनमोहक है। नंदलाल ने सुबह ही टेरकंदब पर अपने सभी मित्रों को बुलाया और बरसाना जाने का विचार बनाया इतने में बलरामजी बोले कि - "लाला! फागुन चलर हौ है तू ऐसई जाएगौ तौ गोपी तोए पकड कै बाँध दींगी और खूब गुलाल गुलचा मारंगी।" ठाकुरजी ने मन मे विचार बनाया और सभी मित्रों को बताया। विचार बडा ही सुंदर है। मित्रों का जयकारा लग गया और हर-हर कहते ही ठाकुर जी वहाँ से बरसाने की ओर चल दिए। बड़ा ही मनमोहक दृश्य है शंकर भगवान उनके रूप को देख कर मन ही मन भावुक हो रहे है। उन्हें ऐसा भावुक देख माता पार्वती पूछ रही हैं - प्रभु! आप की नेत्रों में जल कैसे? शंकर भगवान ने बडा ही सुंदर जबाब दिया कि, आज मेरा रूप मेरे जगत-पति ने लिया है तो मुझे आनन्द हो रहा है। सब देवगण उन्हें देख कर आनन्दमय हो रहे हैं। अलख निरंजन सब दुख भंजन, कहते हुए ठाकुर जी बरसाने आ गये। बाघाम्बर ओढ़े, भस्म लपेटे, त्रिपुड़ लगाये। नगर में कौतुहल हो रहा है, अलख पुरुष को देख सब गोपियाँ अपना भविष्य पूछने लगीं। उनके चेले बाबा की जय हो कहने लगे। यह बात ललिता जी के कानों मे पहुँची कि नगर में कैलाश पर्वत से एक जोगी आया है जो कि सब का भविष्य बता रहा है। राधारानी ने अलख पुरुष को महल में बुलवाया और खूब खिलाया पिलाया फिर सब गोपियाँ उन से भविष्य पूछने लगीं। राधा रानी अपना भविष्य पूछने लगीं तो ठाकुर जी हँस कर बोले तेरा पति तो काला है और गौ पालन करता है और तुम से मिलने के नए-नए भेष बनाता है। इतने में राधा-रानी की निगाह उनकी कमर पे पडी तो वे मन ही मन हँसी कमर मे उनकी वंशी है। राधा रानी ने ललिता जी के कान में कहा कि, अलख पुरुष को चेलों सहित घेर लो। ललिता जी ने सब गोपियों को बुलाया और गुलाल अतर अरगजा केसर मंगवा लिया। राधा रानी ने ठाकुरजी की वंशी को निकाल लिया। ठाकुर जी को अपने असली भेष में आया देख सखा भागने लगे। अागे भागे तो देखा की बलराम जी को गोपियों ने पकड रखा है और उनके गुलाल मार रही हैं। यह देख ठाकुर जी भी भागने लगे तो उनको विशाखा जी ने पीछे से पकड़ लिया और फिर खूब जमकर गुलाल मारा। शिव जी, नारायण भगवान और सब देवगण यह देख कर कह रहे है कि, धन्य धन्य ब्रज की गोपियाँ! "जय हो होरी के रसिया की" "जय जय श्री राधे"

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दुःख ईश्वर का प्रसाद है 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸 जब भगवान सृष्टि की रचना कर रहे तो उन्होंने जीव को कहा कि तुम्हे मृतलोक जाना पड़ेगा,मैं सृष्टि की रचना करने जा रहा हूँ. ये सुन जीव की आँखों मे आंसू आ गए.वो बोला प्रभु कुछ तो ऐसा करो की मे लौटकर आपके पास ही आऊ. भगवान को दया आ गई. उन्होंने दो बाते की जीव के लिए. पहला संसार की हर चीज़ मे अतृप्ति मिला दी, कि तुझे दुनिया मे कुछ भी मिल जाये तू तृप्त नहीं होगा. तृप्ति तुझे तभी मिलेगी जब तू मेरे पास आएगा और दूसरा सभी के हिस्से मे थोडा-थोडा दुःख मिला दिया कि हम लौट कर ईश्वर के पास ही पहुचे. इस तरह हर किसी के जीवन मे थोडा दुःख है. जीवन मे दुःख या विषाद हमें ईश्वर के पास ले जाने के लिए है, लेकिन हम चूक जाते है. हमारी समस्या क्या है कि हर किसी को दुःख आता है, हम भागते है ज्योतिष के पास,अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के पास. कुछ होने वाला नहीं. थोड़ी देर का मानसिक संतोष बस यदि, दुखो से घबराये नहीं और ईश्वर का प्रसाद समझ कर आगे बढे तो बात बन जाती है. यदि हम ईश्वर से विलग होने के दिनों को याद कर ले तो बात बन जाती है और जीव दुखो से भी पार हो जाता है. दुःख तो ईश्वर का प्रसाद है. दुखो का मतलब है, ईश्वर का बुलावा है. वो हमें याद कर रहा है पहले भी ये विषाद और दुःख बहुत से संतो के लिए ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बन चुका है. हमें ये बात अच्छे से समझनी चाहिए कि संसार मे हर चीज़ मे अतृप्ति है और दुःख और विषाद ईश्वर प्राप्ति का साधन है। "जय जय श्री राधे " 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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हमारी_जीवन_यात्रा दो आदमी यात्रा पर निकले - दोनों की मुलाकात हुई चूंकि गंतव्य एक ही था तो दोनों यात्रा में भी साथ हो लिये। सात दिन बाद दोनों के अलग होने का समय आया तो एक ने कहा:- भाई साहब ! एक सप्ताह तक हम दोनों साथ रहे क्या आपने मुझे पहचाना ? दूसरे ने कहा 'नहीं, मैंने तो नहीं पहचाना।' पहला यात्री बोला:- 'महोदय मैं एक नामी ठग हूँ परन्तु आप तो महाठग हैं। आप मेरे भी गुरू निकले। दूसरे यात्री बोला "कैसे ?" पहला यात्री:- "कुछ पाने की आशा में मैंने निरंतर सात दिन तक आपकी तलाशी ली - मुझे कुछ भी नहीं मिला। इतनी बड़ी यात्रा पर निकले हैं तो क्या आपके पास कुछ भी नहीं है ? बिल्कुल खाली हाथ हैं। दूसरा यात्री "मेरे पास एक बहुमूल्य हीरा है और थोड़ी - सी रजत मुद्राएं ।" पहला यात्री "तो फिर इतने प्रयत्न के बावजूद वह मुझे मिली क्यों नहीं ?" दूसरा यात्री "मैं जब भी बाहर जाता - वह हीरा और मुद्राएं तुम्हारी पोटली में रख देता था और तुम सात दिन तक मेरी झोली टटोलते रहे। अपनी पोटली सँभालने की जरूरत ही नहीं समझी - तो फिर तुम्हें कुछ मिलता कहाँ से ?" यही समस्या अपने साथ भी है कि हमारी निगाह सदैव दूसरे की गठरी पर होती है और ईश्वर नित नई खुशियाँ उसमे डालता है परन्तु हमें अपनी गठरी पर निगाह डालने की फुर्सत ही नहीं है - यही हमारी मूलभूत समस्या है। अपनी गठरी टटोलें - अपने आप पर दृष्टिपात करें तो अपनी कमी समझ में आ जाएगी और जीवन में कहीं कोई रूकावट और उलझन नहीं आएगी । इसलिए सबसे बड़ा गूढ मंत्र है : स्वयं को टटोले और जीवन पथ पर आगे बढ़े सुख, समृद्धि और सफलताये आप की प्रतीक्षा में है . . . . . .!!

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. मित्रों आज गुरुवार है, आज हम आपको भगवान विष्णु लक्ष्मी के बारे में बतायेगें!!!!!! देवर्षि नारद ने एक बार धन की देवी लक्ष्मी से पूछा कि आप हमेशा श्री हरि विष्णु के चरण क्यों दबाती रहती हैं? इस पर लक्ष्मी जी ने कहा कि ग्रहों के प्रभाव से कोई अछूता नहीं रहता, वह चाहे मनुष्य हो या फिर देवी-देवता। महिला के " हाथ में देवगुरु बृहस्पति वास करते हैं और पुरुष के पैरों में दैत्यगुरु शुक्राचार्य। जब महिला पुरुष के चरण दबाती है, तो देव और दानव के मिलन से धनलाभ का योग बनता है। इसलिए मैं हमेशा अपने स्वामी के चरण दबाती हूं। भगवान विष्णु ने उन्हें अपने पुरुषार्थ के बल पर ही वश में कर रखा है। लक्ष्मी उन्हीं के वश में रहती है जो हमेशा सभी के कल्याण का भाव रखता हैं। विष्णु के पास जो लक्ष्मी हैं वह धन और सम्पत्ति है। भगवान श्री हरि उसका उचित उपयोग जानते हैं। इसी वजह से महालक्ष्मी श्री विष्णु के पैरों में उनकी दासी बन कर रहती हैं। वहीं एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, अलक्ष्मी अपनी बहन लक्ष्मी से बेहद ईर्ष्या रखती हैं। वह बिल्कुल भी आकर्षक नहीं हैं, उनकी आंखें भड़कीली, बाल फैले हुए और बड़े-बड़े दांत हैं। यहां तक कि जब भी देवी लक्ष्मी अपने पति के साथ होती हैं, अलक्ष्मी वहां भी उन दोनों के साथ पहुंच जाती थीं। अपनी बहन का ये बर्ताव देवी लक्ष्मी को बिल्कुल पसंद नहीं आया और उन्होंने अलक्ष्मी से कहा कि तुम मुझे और मेरे पति को अकेला क्यों नहीं छोड़ देती। इस पर अलक्ष्मी ने कहा कि कोई मेरी आराधना नहीं करता, मेरा पति भी नहीं है, इसलिए तुम जहां जाओगी, मैं तुम्हारे साथ रहूंगी। इस पर देवी लक्ष्मी क्रोधित हो गईं और आवेग में उन्होंने अलक्ष्मी को श्राप दिया कि मृत्यु के देवता तुम्हारे पति हैं और जहां भी गंदगी, ईर्ष्या, लालच, आलस, रोष होगा, तुम वहीं रहोगी। इस प्रकार भगवान विष्णु और अपने पति के चरणों में बैठकर माता लक्ष्मी उनके चरणों की गंदगी को दूर करती हैं, ताकि अलक्ष्मी उनके निकट न आ सकें। इस तरह वे पति को पराई स्त्री से दूर रखने की हर संभव कोशिश कर रही हैं। सौभाग्य और दुर्भाग्य एक साथ चलते हैं। जब आपके ऊपर सौभाग्य की वर्षा होती है, तब दुर्भाग्य वहीं पास में खड़ा अपने लिए मौका तलाशता है। अलक्ष्मी भी कुछ इसी तरह घर के बाहर बैठकर लक्ष्मी के जाने का इंतजार करती हैं। जहां भी गंदगी मौजूद होती है, वहां लालच, ईर्ष्या, पति-पत्नी के झगड़े, अश्लीलता, क्लेश और कलह का वातावरण बन जाता है। यह निशानी है कि घर में अलक्ष्मी का प्रवेश हो चुका है। अलक्ष्मी को दूर रखने और लक्ष्मी को आमंत्रित करने के लिए हिन्दू धर्म से जुड़े प्रत्येक घर में सफाई के साथ-साथ नित्य पूजा-पाठ किया जाता है ताकि घर के लोगों को नकारात्मक ऊर्जा से बचाया जा सके। "श्री विष्णु भगवान एवं लक्ष्मी जी का सच्चे मन से जो भी ध्यान लगावे उसका बेड़ा पार है!! हैं। 🌼 जय लक्ष्मी नारायण जी🌼 *************************************************

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Rajesh Jain Mar 6, 2021

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Rajesh Jain Mar 6, 2021

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