Meena Dubey
Meena Dubey Feb 9, 2020

Jai shri Radhy Krishna Radhy Krishna Radhy

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Ramswaroop Chaurasia Feb 9, 2020
jai shre radhe Krishna ji beautiful post &words ji thanks 🍁🌷🌷🌷🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🌷🌷ji good night ji sweet drmes ji 🌹❤❤🌱🙏🏼🙏🏼🙏🏻🙏🏼

Neha Sharma, Haryana Feb 9, 2020
जय श्री राधेकृष्णा बहना जी। शुभ रात्रि नमन जी। ईश्वर की असीम कृपा आप और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे जी। आपका हर पल शुभ व मंगलमय हो मेरी प्यारी बहना जी।

Meena Dubey Jan 26, 2020

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sai shyam Jan 25, 2020

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Sanjeev Jain Jan 24, 2020

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Neha Sharma, Haryana Jan 25, 2020

जय श्री राधेकृष्णा शुभ रात्रि वंदन अगर सत्संग, कीर्तन, हरि कथा में मन नहीं लगता, तो समझ लेना की पाप ज्यादा है। श्रीतुलसीदासजी महाराजने कहा है— तुलसी पूरब पाप ते हरि चर्चा न सुहात । जैसे ज्वरके जोरसे भूख बिदा हो जात ॥ जब ज्वर (बुखार) का जोर होता है तो अन्न अच्छा नहीं लगता । उसको अन्नमें भी गन्ध आती है । जैसे भीतरमें बुखारका जोर होता है तो अन्न अच्छा नहीं लगता, वैसे ही जिसके पापोंका जोर ज्यादा होता है, वह भजन कर नहीं सकता, सत्संगमें जा नहीं सकता। बंगाल के गांवों में एक बुढ़ा आदमी सरोवरके किनारे मछलियाँ पकड़ रहा था। दो भगवान के भक्तो ने उसे देखा और कहा—‘यह बूढ़ा हो गया, बेचारा भजनमें लग जाय तो अच्छा है ।’ उससे जाकर कहा कि तुम भगवन्नाम- उच्चारण करो तो, उसे ‘राम’ नाम आया ही नहीं ।वह मेहनत करनेपर भी सही उच्चारण नहीं कर सका । कई नाम बतानेके बादमेंअन्तमें ‘होरे-होरे’ कहने लगा । इस नामका उच्चारण हुआ और कोई नाम आया ही नहीं । उससे पूछा गया कि ‘तुम्हें एक दिनमें कितने पैसे मिलते हैं ?’ तो उन्होंने बताया कि इतनी मछलियाँ मारनेसे इतने पैसे मिलते हैं । तो उन्होंने कहा कि ‘उतने पैसोंके चावल हम तुम्हें दे देंगे । तुम हमारी दूकानमें बैठकर दिनभर होरे-होरे (हरि-हरि) किया करो ।’ उसको किसी तरह ले गये दूकानपर । वह एक दिन तो बैठा । दूसरे दिन देरसे आया और तीसरे दिन आया ही नहीं । फिर दो-तीन दिन बाद जाकर देखा, वह उसी जगह धूपमें मछली पकड़ता हुआ मिला । उन्होंने उसे कहा कि ‘तू वहाँ दूकानमें छायामें बैठा था । क्या तकलीफ थी ? तुमको यहाँ जितना मिलता है, उतना अनाज दे देंगे केवल दिनभर बैठा हरि-हरि कीर्तन किया कर ।’उसने कहा—‘मेरेसे नहीं होगा ।’वह दूकानपर बैठ नहीं सका । पापीका शुभ काममें लगना कठीन होता है । इसलिए श्री रामसुखदासजी महाराज कहते हैं कि जो भाई सत्संगमें रुचि रखते हैं, सत्संगमें जाते हैं, नाम लेते हैं, जप करते हैं, उन पुरुषोंको मामूली नहीं समझना चाहिये । वे साधारण आदमी नहीं हैं । वे भगवान्‌का भजन करते हैं, शुद्ध हैं और भगवान्‌के कृपा-पात्र हैं । परन्तुजो भगवान्‌की तरफ चलते हैं, उनको अपनी बहादुरी नहीं माननी चाहिये कि हम बड़े अच्छे हैं । हमें तो भगवान्‌की कृपा माननी चाहिये, जिससे हमें सत्संग, भजन-ध्यानका मौका मिलता है । हमें ऐसा समझना चाहिये कि ऐसे कलियुगके समयमें हमें भगवान्‌की बात सुननेको मिलती है, हम भगवान्‌का नाम लेते हैं, हमपर भगवान्‌की बड़ी कृपा है । !! जय श्री राम !! शुभ बोले अच्छा सुने करें शुद्ध व्यवहार दुखियों की आवाज सुन बांटे जग में प्यार !! जय श्री राम !! कागभुशुण्डिजी और गरुड़जी का संवाद?? रामचरितमानस के उत्तरकांड में बाबा तुलसी ने कलयुग का बहुत सुंदर वर्णन किया है, आप भी पढ़ें!!!!! * पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल। नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल॥ पूर्व के एक कल्प में पापों का मूल युग कलियुग था, जिसमें पुरुष और स्त्री सभी अधर्मपारायण और वेद के विरोधी थे॥ हे गरुड़जी! वह कलिकाल बड़ा कठिन था। उसमें सभी नर-नारी पापपरायण (पापों में लिप्त) थे। कलियुग के पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया, सद्ग्रंथ लुप्त हो गए, दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना कर-करके बहुत से पंथ प्रकट कर दिए। सभी लोग मोह के वश हो गए, शुभ कर्मों को लोभ ने हड़प लिया। हे ज्ञान के भंडार! हे श्री हरि के वाहन! सुनिए, अब मैं कलि के कुछ धर्म कहता हूँ। कलियुग में न वर्णधर्म रहता है, न चारों आश्रम रहते हैं। सब पुरुष-स्त्री वेद के विरोध में लगे रहते हैं। ब्राह्मण वेदों के बेचने वाले और राजा प्रजा को खा डालने वाले होते हैं। वेद की आज्ञा कोई नहीं मानता। जिसको जो अच्छा लग जाए, वही मार्ग है। जो डींग मारता है, वही पंडित है। जो मिथ्या आरंभ करता (आडंबर रचता) है और जो दंभ में रत है, उसी को सब कोई संत कहते हैं। जो (जिस किसी प्रकार से) दूसरे का धन हरण कर ले, वही बुद्धिमान है। जो दंभ करता है, वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल्लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान कहा जाता है। जो आचारहीन है और वेदमार्ग को छोड़े हुए है, कलियुग में वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान्‌ है। जिसके बड़े-बड़े नख और लंबी-लंबी जटाएँ हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी है। जो अमंगल वेष और अमंगल भूषण धारण करते हैं और भक्ष्य-भक्ष्य (खाने योग्य और न खाने योग्य) सब कुछ खा लेते हैं वे ही योगी हैं, वे ही सिद्ध हैं और वे ही मनुष्य कलियुग में पूज्य हैं। जिनके आचरण दूसरों का अपकार (अहित) करने वाले हैं, उन्हीं का बड़ा गौरव होता है और वे ही सम्मान के योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्म से लबार (झूठ बकने वाले) हैं, वे ही कलियुग में वक्ता माने जाते हैं। हे गोसाईं! सभी मनुष्य स्त्रियों के विशेष वश में हैं और बाजीगर के बंदर की तरह (उनके नचाए) नाचते हैं। ब्राह्मणों को शूद्र ज्ञानोपदेश करते हैं और गले में जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं। सभी पुरुष काम और लोभ में तत्पर और क्रोधी होते हैं। देवता, ब्राह्मण, वेद और संतों के विरोधी होते हैं। अभागिनी स्त्रियाँ गुणों के धाम सुंदर पति को छोड़कर पर पुरुष का सेवन करती हैं। सुहागिनी स्त्रियाँ तो आभूषणों से रहित होती हैं, पर विधवाओं के नित्य नए श्रृंगार होते हैं। शिष्य और गुरु में बहरे और अंधे का सा हिसाब होता है। एक (शिष्य) गुरु के उपदेश को सुनता नहीं, एक (गुरु) देखता नहीं (उसे ज्ञानदृष्टि) प्राप्त नहीं है), जो गुरु शिष्य का धन हरण करता है, पर शोक नहीं हरण करता, वह घोर नरक में पड़ता है। माता-पिता बालकों को बुलाकर वही धर्म सिखलाते हैं, जिससे पेट भरे। स्त्री-पुरुष ब्रह्मज्ञान के सिवा दूसरी बात नहीं करते, पर वे लोभवश कौड़ियों (बहुत थोड़े लाभ) के लिए ब्राह्मण और गुरु की हत्या कर डालते हैं। शूद्र ब्राह्मणों से विवाद करते हैं (और कहते हैं) कि हम क्या तुमसे कुछ कम हैं? जो ब्रह्म को जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है। ऐसा कहकर वे उन्हें डाँटकर आँखें दिखलाते हैं। जो पराई स्त्री में आसक्त, कपट करने में चतुर और मोह, द्रोह और ममता में लिपटे हुए हैं, वे ही मनुष्य अभेदवादी (ब्रह्म और जीव को एक बताने वाले) ज्ञानी हैं। मैंने उस कलियुग का यह चरित्र देखा। वे स्वयं तो नष्ट हुए ही रहते हैं, जो कहीं सन्मार्ग का प्रतिपालन करते हैं, उनको भी वे नष्ट कर देते हैं। जो तर्क करके वेद की निंदा करते हैं, वे लोग कल्प-कल्पभर एक-एक नरक में पड़े रहते हैं। स्त्री के मरने पर अथवा घर की संपत्ति नष्ट हो जाने पर सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं। वे अपने को ब्राह्मणों से पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं। ब्राह्मण अपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख और व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वामी होते हैं। शूद्र नाना प्रकार के जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन (व्यास गद्दी) पर बैठकर पुराण कहते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। अपार अनीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। कलियुग में सब लोग वर्णसंकर और मर्यादा से च्युत हो गए। वे पाप करते हैं और (उनके फलस्वरूप) दुःख, भय, रोग, शोक और (प्रिय वस्तु का) वियोग पाते हैं। वेद सम्मत तथा वैराग्य और ज्ञान से युक्त जो हरिभक्ति का मार्ग है, मोहवश मनुष्य उस पर नहीं चलते और अनेकों नए-नए पंथों की कल्पना करते हैं। संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयों ने हर लिया। तपस्वी धनवान हो गए और गृहस्थ दरिद्र। हे तात! कलियुग की लीला कुछ कही नहीं जाती। कुलवती और सती स्त्री को पुरुष घर से निकाल देते हैं और अच्छी चाल को छोड़कर घर में दासी को ला रखते हैं। पुत्र अपने माता-पिता को तभी तक मानते हैं, जब तक स्त्री का मुँह नहीं दिखाई पड़ता। जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तब से कुटुम्बी शत्रु रूप हो गए। राजा लोग पाप परायण हो गए, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजा को नित्य ही (बिना अपराध) दंड देकर उसकी विडंबना (दुर्दशा) किया करते हैं। धनी लोग मलिन (नीच जाति के) होने पर भी कुलीन माने जाते हैं। द्विज का चिह्न जनेऊ मात्र रह गया और नंगे बदन रहना तपस्वी का। जो वेदों और पुराणों को नहीं मानते, कलियुग में वे ही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं। कवियों के तो झुंड हो गए, पर दुनिया में उदार (कवियों का आश्रयदाता) सुनाई नहीं पड़ता। गुण में दोष लगाने वाले बहुत हैं, पर गुणी कोई भी नहीं। कलियुग में बार-बार अकाल पड़ते हैं। अन्न के बिना सब लोग दुःखी होकर मरते हैं। हे पक्षीराज गरुड़जी! सुनिए कलियुग में कपट, हठ (दुराग्रह), दम्भ, द्वेष, पाखंड, मान, मोह और काम आदि (अर्थात्‌ काम, क्रोध और लोभ) और मद ब्रह्माण्डभर में व्याप्त हो गए (छा गए)। मनुष्य जप, तप, यज्ञ, व्रत और दान आदि धर्म तामसी भाव से करने लगे। देवता (इंद्र) पृथ्वी पर जल नहीं बरसाते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं। स्त्रियों के बाल ही भूषण हैं (उनके शरीर पर कोई आभूषण नहीं रह गया) और उनको भूख बहुत लगती है (अर्थात्‌ वे सदा अतृप्त ही रहती हैं)। वे धनहीन और बहुत प्रकार की ममता होने के कारण दुःखी रहती हैं। वे मूर्ख सुख चाहती हैं, पर धर्म में उनका प्रेम नहीं है। बुद्धि थोड़ी है और कठोर है, उनमें कोमलता नहीं है। मनुष्य रोगों से पीड़ित हैं, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्ष का थोड़ा सा जीवन है, परंतु घमंड ऐसा है मानो कल्पांत (प्रलय) होने पर भी उनका नाश नहीं होगा। कलिकाल ने मनुष्य को बेहाल (अस्त-व्यस्त) कर डाला। कोई बहिन-बेटी का भी विचार नहीं करता। (लोगों में) न संतोष है, न विवेक है और न शीतलता है। जाति, कुजाति सभी लोग भीख माँगने वाले हो गए। ईर्षा (डाह), कडुवे वचन और लालच भरपूर हो रहे हैं, समता चली गई। सब लोग वियोग और विशेष शोक से मरे पड़े हैं। वर्णाश्रम धर्म के आचरण नष्ट हो गए। इंद्रियों का दमन, दान, दया और समझदारी किसी में नहीं रही। मूर्खता और दूसरों को ठगना, यह बहुत अधिक बढ़ गया। स्त्री-पुरुष सभी शरीर के ही पालन-पोषण में लगे रहते हैं। जो पराई निंदा करने वाले हैं, जगत्‌ में वे ही फैले हैं। हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिए, कलिकाल पाप और अवगुणों का घर है, किंतु कलियुग में एक गुण भी बड़ा है कि उसमें बिना ही परिश्रम भवबंधन से छुटकारा मिल जाता है। सत्ययुग, त्रेता और द्वापर में जो गति पूजा, यज्ञ और योग से प्राप्त होती है, वही गति कलियुग में लोग केवल भगवान्‌ के नाम से पा जाते हैं। सत्ययुग में सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरि का ध्यान करके सब प्राणी भवसागर से तर जाते हैं। त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं और सब कर्मों को प्रभु को समर्पण करके भवसागर से पार हो जाते हैं। द्वापर में श्री रघुनाथजी के चरणों की पूजा करके मनुष्य संसार से तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है और कलियुग में तो केवल श्री हरि की गुणगाथाओं का गान करने से ही मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं। कलियुग में न तो योग और यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्री रामजी का गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्री रामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है, वही भवसागर से तर जाता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं। नाम का प्रताप कलियुग में प्रत्यक्ष है। कलियुग का एक पवित्र प्रताप (महिमा) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर (मानसिक) पाप नहीं होते। यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुग के समान दूसरा युग नहीं है, (क्योंकि) इस युग में श्री रामजी के निर्मल गुणसमूहों को गा-गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार (रूपी समुद्र) से तर जाता है। धर्म के चार चरण (सत्य, दया, तप और दान) प्रसिद्ध हैं, जिनमें से कलि में एक (दान रूपी) चरण ही प्रधान है। जिस किसी प्रकार से भी दिए जाने पर दान कल्याण ही करता है। श्री रामजी की माया से प्रेरित होकर सबके हृदयों में सभी युगों के धर्म नित्य होते रहते हैं। शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान और मन का प्रसन्न होना, इसे सत्ययुग का प्रभाव जानें। सत्त्वगुण अधिक हो, कुछ रजोगुण हो, कर्मों में प्रीति हो, सब प्रकार से सुख हो, यह त्रेता का धर्म है। रजोगुण बहुत हो, सत्त्वगुण बहुत ही थोड़ा हो, कुछ तमोगुण हो, मन में हर्ष और भय हो, यह द्वापर का धर्म है। तमोगुण बहुत हो, रजोगुण थोड़ा हो, चारों ओर वैर-विरोध हो, यह कलियुग का प्रभाव है। पंडित लोग युगों के धर्म को मन में ज्ञान (पहचान) कर, अधर्म छोड़कर धर्म में प्रीति करते हैं। जिसका श्री रघुनाथजी के चरणों में अत्यंत प्रेम है, उसको कालधर्म (युगधर्म) नहीं व्यापते। हे पक्षीराज! नट (बाजीगर) का किया हुआ कपट चरित्र (इंद्रजाल) देखने वालों के लिए बड़ा विकट (दुर्गम) होता है, पर नट के सेवक (जंभूरे) को उसकी माया नहीं व्यापती। - डॉ0 विजय शंकर मिश्र

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Neha Sharma, Haryana Jan 27, 2020

*जय श्री राधेकृष्णा*🥀🥀🙏 *शुभ प्रभात् वंदन*🥀🥀🙏 : आज भी हिमांचल क्षेत्र में कोई रहस्यमय अग्नि स्वरुप शक्ति है जो राक्षसों का संहार करती है...... इस रहस्यमयी शक्ति का वर्णन पहली बार महाभारत में हुआ है | महाभारत में आई कथा के अनुसार एक बार गन्धर्वराज चित्ररथ अर्जुन से कहते हैं “अर्जुन ! राजा इक्ष्वाकु के वंश में कल्माषपाद नाम का एक राजा हुआ था । एक दिन की बात है, वह शिकार खेलने के लिये वन में गया । लौटने के समय वह एक ऐसे मार्ग से आने लगा, जिससे केवल एक ही मनुष्य चल सकता था । वह थका-माँदा और भूखा-प्यासा तो था ही, उसी मार्ग पर सामने से शक्तिमुनि आते दीख पड़े । शक्तिमुनि, वसिष्ठ जी के सौ पुत्रों में सबसे बड़े थे । राजा ने कहा, “तुम हट जाओ । मेरे लिये रास्ता छोड़ दो” । शक्ति ने कहा, “महाराज ! सनातन धर्म के अनुसार क्षत्रिय का यह कर्तव्य है कि वह ब्राह्मण के लिये मार्ग छोड़ दे” । इस प्रकार दोनों में कुछ कहा-सुनी हो गयी । न ऋषि हटे और न राजा । राजा के हाथ में चाबुक था, उन्होंने बिना सोचे-विचारे ऋषि पर चला दिया । शक्ति मुनि ने इसे राजा का अन्याय समझ कर उन्हें शाप दिया कि “अरे नृपाधम ! तू राक्षस की तरह तपस्वी पर चाबुक चलाता है; इसलिये जा, राक्षस हो जा” । राजा राक्षसभावाक्रान्त हो गया । उसने कहा, “तुमने मुझे अयोग्य शाप दिया है; इसलिये लो, मैं तुमसे ही अपना राक्षसपना प्रारम्भ करता हूँ” । इसके बाद कल्माषपाद शक्ति मुनि को मारकर तुरंत खा गया । केवल शक्तिमुनि को ही नहीं; वसिष्ठ के जितने पुत्र थे, सभी को उसने खा लिया । शक्ति और वसिष्ठ के दूसरे पुत्रों के भक्षण में कल्माष का राक्षसपना तो कारण था ही, इसके अलावा विश्वामित्र ने भी पहले द्वेष का स्मरण करके किंकर नाम के राक्षस को आज्ञा दी थी कि वह कल्माषपाद में प्रवेश कर जाय, जिसके कारण वह ऐसे नीच कर्म में प्रवृत्त हुआ । वसिष्ठ जी को यह बात मालूम हुई । उन्होंने जाना कि इसमें विश्वामित्र की प्रेरणा है फिर भी उन्होंने अपने शोक के वेग को वैसे ही धारण कर लिया, जैसे पर्वतराज सुमेरु पृथ्वी को । उन्होंने प्रतीकार की सामर्थ्य होने पर भी उनसे किसी प्रकार का बदला नहीं लिया । एक बार महर्षि वसिष्ठ अपने आश्रम पर लौट रहे थे । इसी समय ऐसा जान पड़ा, मानो उनके पीछे-पीछे कोई षडंग वेदों का अध्ययन करता हुआ चलता है । वसिष्ठ ने पूछा कि मेरे पीछे-पीछे कौन चल रहा है? आवाज आयी कि “मैं आपकी पुत्रवधू शक्ति पत्नी अदृश्यन्ती हूँ” । वसिष्ठ बोले, “बेटी ! मेरे पुत्र शक्ति के समान स्वर से सांग वेदों का अध्ययन कौन कर रहा है” ? अदृश्यन्ती ने कहा, “आपका पौत्र मेरे गर्भ में है । वह बारह वर्ष से गर्भ में ही वेदाध्ययन कर रहा है” । यह सुनकर वसिष्ठ मुनि को बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने सोचा, “अच्छी बात है । मेरी वंश-परम्परा का उच्छेद नहीं हुआ” । यही सब सोचते हुए वे लौट ही रहे थे कि एक निर्जन वन में कल्माषपाद से उनकी भेंट हो गयी । कल्माषपाद विश्वामित्र के द्वारा प्रेरित उग्र राक्षस से आविष्ट होकर वसिष्ठ मुनि को खा जाने के लिये दौड़ा । उस क्रूरकर्मा राक्षस को देखकर अदृश्यन्ती डर गयी और कहने लगी, “भगवन् ! देखिये, देखिये; यह हाथ में सूखा काठ लिये भयंकर राक्षस दौड़ा आ रहा है । आप इससे मेरी रक्षा कीजिये” । वसिष्ठ ने कहा, “बेटी, डरो मत । यह राक्षस नहीं, कल्माषपाद है” । यह कहकर महर्षि वसिष्ठ ने हुंकार से ही उसे रोक दिया । इसके बाद उन्होंने जल को हाथ में लेकर मन्त्र से अभिमन्त्रित किया और कल्माषपाद के ऊपर डाला । वह तुरंत शाप से मुक्त हो गया । बारह वर्ष के बाद आज वह शाप से छूटा । उसका तेज बढ़ गया, वह होश में आया और हाथ जोड़कर श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठ से कहने लगा, “महाराज ! मैं सुदास का पुत्र कल्माषपाद आपका यजमान हूँ । आज्ञा कीजिये, मैं आपको क्या सेवा करूँ” ? वसिष्ठ जी ने कहा, “यह सब बात तो भैया ! समय-समय की है । अब जाओ, तुम अपने राज्य की देखभाल करो । हाँ, इतना ध्यान रखना कि कभी किसी ब्राह्मण का अपमान न हो” । राजा ने प्रतिज्ञा की, “महाभाग्यवान् ऋषिश्रेष्ठ ! मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा । कभी ब्राह्मणों का तिरस्कार नहीं करूँगा, उनका प्रेम से सत्कार करूँगा” । क्षमाशील महर्षि वसिष्ठ इसी पुत्रघाती राजा के साथ अयोध्या में आये और अपने कृपा प्रसाद से उसे पुत्रवान् बनाया । इधर वसिष्ठ के आश्रम पर अदृश्यन्ती के गर्भ से पराशर का जन्म हुआ । स्वयं भगवान् वसिष्ठ ने पराशर के जातकर्मादि संस्कार कराये । धर्मात्मा पराशर वसिष्ठमुनि को ही अपना पिता समझते थे और “पिताजी ! पिताजी !” कहकर पुकारते थे । एक दिन अदृश्यन्ती ने बतलाया कि ये तुम्हारे पिता नहीं, दादा हैं; इसी प्रसंग में पराशर जी को यह भी मालूम हुआ कि मेरे पिता को राक्षस ने खा डाला । यह सुनकर उनके चित्त में बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने सब राजाओं पर विजय प्राप्त करने का निश्चय किया । महर्षि वसिष्ठ ने प्राचीन कथाएँ कहकर उन्हें समझाया और आज्ञा की कि “तुम्हारा कल्याण इसी में है। तुम क्षमा करो, किसी को पराजित मत करो । तुम्हें मालूम ही है कि इन राजाओं की जगत में कितनी आवश्यकता है” । वसिष्ठ के समझाने-बुझाने से पराशर ने राजाओं को पराजित करने का निश्चय तो छोड़ दिया, परंतु राक्षसों के विनाश के लिये घोर यज्ञ प्रारम्भ किया । उस यज्ञ से जब राक्षसों का नाश होने लगा, तब महर्षि पुलस्त्य और वसिष्ठ ने उन्हें समझाया “पराशर ! क्षमा ही परम धर्म है । तुम्हारे सभी पूर्वज क्षमा की मूर्ति हैं । मनुष्य तो यों ही किसी की मृत्यु का निमित्त बन जाता है, तुम यह भयंकर क्रोध त्याग दो” । ऋषियों की आज्ञा से पराशर ने भी क्षमा स्वीकार की और अपने यज्ञाग्नि को हिमाचल में छोड़ दिया । वह आग अब भी राक्षस, वृक्ष और पत्थरों को जलाती फिरती है । बहुत से लोग तो जानते भी नहीं कि ऐसी कोई शक्ति आज भी है | यद्यपि वो शक्ति जो कोई भी है और हिमांचल क्षेत्र में जहाँ कहीं भी है, इस बात की प्रबल सम्भावना है कि वो अभी निष्क्रिय है | लेकिन भविष्य जब कभी भी, किसी कारण वश अगर सक्रीय हुई, तो राक्षसी मानसिकता वाली प्राणियों पर कहर बन कर बरसेगी |

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suraj rajpal Jan 25, 2020

🌷।।श्रीमत्कुंजबिहारिणे नमः।। 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻 मीरा जी जब भगवान कृष्ण के लिए गाती थी, तो भगवान बड़े ध्यान से सुनते थे। सूरदास जी जब पद गाते थे, तब भी भगवान सुनते थे। और कहाँ तक कहूँ, कबीर जी ने तो यहाँ तक कह दिया- "चींटी के पग नूपुर बाजे" वह भी भगवान सुनता है। एक चींटी कितनी छोटी होती है, अगर उसके पैरों में भी घुंघरू बाँध दे तो उसकी आवाज को भी भगवान सुनते है। यदि आपको लगता है, की आपकी पुकार भगवान नहीं सुन रहे तो ये आपका वहम है या फिर आपने भगवान के स्वभाव को नहीं जाना। कभी प्रेम से उनको पुकारो तो सही, कभी उनकी याद में आंसू गिराओ तो सही। मैं तो यहाँ तक कह सकता हूं की केवल भगवान ही है जो आपकी बात को सुनता है। 🙏 एक छोटी सी कथा संत बताते है: एक भगवान जी के भक्त हुए थे, उन्होंने 20 साल तक लगातार भगवत गीता जी का पाठ किया। अंत में भगवान ने उनकी परिक्षा लेते हुऐ कहा, अरे भक्त! तू सोचता है की मैं तेरे गीता के पाठ से खुश हूँ, तो ये तेरा वहम है। मैं तेरे पाठ से बिलकुल भी प्रसन्न नही हुआ। जैसे ही भक्त ने सुना तो वो नाचने लगा, और झूमने लगा। भगवान ने बोला, अरे! मैंने कहा की मैं तेरे पाठ करने से खुश नही हूँ और तू नाच रहा है। वो भक्त बोला, भगवान जी आप खुश हो या नहीं हो ये बात मैं नही जानता। लेकिन मैं तो इसलिए खुश हूँ, की आपने मेरा पाठ कम से कम सुना तो सही, इसलिए मैं नाच रहा हूँ। ये होता है भाव। थोड़ा सोचिये, जब द्रौपती जी ने भगवान कृष्ण को पुकारा तो क्या भगवान ने नहीं सुना? भगवान ने सुना भी और लाज भी बचाई। जब गजेन्द्र हाथी ने ग्राह से बचने के लिए भगवान को पुकारा तो क्या भगवान ने नहीं सुना? बिल्कुल सुना और भगवान अपना भोजन छोड़कर आये। कबीरदास जी, तुलसीदास जी, सूरदास जी, हरिदास जी, मीरा बाई , श्री रामसुखदास जी और न जाने कितने संत हुए जो भगवान से बात करते थे और भगवान भी उनकी सुनते थे। 🙏इसलिए जब भी भगवान को याद करो उनका नाम जप करो तो ये मत सोचना की भगवान आपकी पुकार सुनते होंगे या नहीं? कोई संदेह मत करना, बस ह्रदय से उनको पुकारना, तुम्हे खुद लगेगा की हाँ, भगवान आपकी पुकार को सुन रहे है। और आपको इसका अहसास भी होने लगेगा। 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🌷 Radhe radhe🌼 Jay shree Radhekrishna🙏🌹🌹

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