‘त्रिदेवी’ का रहस्य : माँ पार्वती , माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती।

‘त्रिदेवी’ का रहस्य : माँ पार्वती , माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती।

‘त्रिदेवी’ का रहस्य : माँ पार्वती , माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती


*******त्रिदेवी*******का रहस्य :

माँ सरस्वती, माँ लक्ष्मी और माँ पार्वती जी,
ये त्रिदेव की पत्नियां हैं।
इनकी कथा के बारे में लोगों में बहुत भ्रम है, भ्रम को दूर करने का एक छोटा साप्रयास :-

माता अम्बिका :-

ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश को ही सर्वोत्तम और स्वयंभू मान जाता है।
क्या ब्रह्मा जी, विष्ण जी और मेरे आराध्य महादेव जी का कोई पिता नहीं है ?
वेदों में लिखा है कि जो जन्मा या प्रकट है वह ईश्‍वर नहीं हो सकता।
ईश्‍वर अजन्मा, अप्रकट और निराकार है।

शिवपुराण के अनुसार उस अविनाशी परब्रह्म (काल) ने कुछ काल के बाद द्वितीय की इच्छा प्रकट की,
उसके भीतर एक से अनेक होने का संकल्प उदित हुआ,
तब उस निराकार परमात्मा ने अपनी लीला शक्ति से आकार की कल्पना की, जो मूर्तिरहित परम ब्रह्म है।

परम ब्रह्म अर्थात एकाक्षर ब्रह्म,
परम अक्षर ब्रह्म वह परम ब्रह्म भगवान सदाशिव है। एकांकी रहकर स्वेच्छा से सभी ओर विहार करने वाले उस सदाशिव ने अपने विग्रह (शरीर) से शक्ति की सृष्टि की, जो उनके अपने श्रीअंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी।
सदाशिव की उस पराशक्ति को प्रधान प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धि तत्व की जननी तथा विकाररहित बताया गया है।

वह शक्ति अम्बिका (पार्वती या सती नहीं) कही गई है। उसको प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिदेव जननी (ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माता), नित्या और मूल कारण भी कहते हैं।
सदाशिव द्वारा प्रकट की गई उस शक्ति की 8 भुजाएं हैं।

पराशक्ति जगतजननी वह देवी नाना प्रकार की गतियों से संपन्न है और अनेक प्रकार के अस्त्र शक्ति धारण करती है।
एकांकिनी होने पर भी वह माया शक्ति संयोगवशात अनेक हो जाती है।
उस कालरूप सदाशिव की अर्द्धांगिनी हैं जिसे जगदम्बा भी कहते हैं..

माता सरस्वती का परिचय :-

ब्रह्मा जी की पत्नी का नाम माँ सावित्री देवी है,
ब्रह्मा जी ने एक और स्त्री से विवाह किया था जिसका नाम माँ गायत्री है।
जाट इतिहास अनुसार यह गायत्री देवी राजस्थान के पुष्कर की रहने वाली थी जो वेदज्ञान में पारंगत होने के कारण विख्‍यात थी।
पुष्‍कर में ब्रह्माजी को एक यज्ञ करना था और उस वक्त उनकी पत्नीं सावित्री उनके साथ नहीं थी तो उन्होंने गायत्री से विवाह कर यज्ञ संपन्न किया।
लेकिन बाद में जब सावित्री को पता चला तो उन्होंने ब्रह्माजी को शाप दे दिया था।

पुराणों में माँ सरस्वती के बारे में भिन्न भिन्न मत मिलते हैं।
एक मान्यता अनुसार सरस्वती तो ब्रह्मा की पत्नी सावित्री की पुत्री थीं।
दूसरे मत अनुसरा वह ब्रह्मा की मानसपुत्र थी। ब्रह्मा ने उन्हें अपने मुख से प्रकट किया था।
एक अन्य पौराणिक उल्लेख अनुसार देवी महालक्ष्मी (लक्ष्मी नहीं) से जो उनका सत्व प्रधान रूप उत्पन्न हुआ, देवी का वही रूप सरस्वती कहलाया। देवी सरस्वती का वर्ण श्‍वेत है।

ब्रह्मा जी के कई पुत्र और पुत्रियां थे।
सरस्वती देवी को शारदा, शतरूपा, वाणी, वाग्देवी, वागेश्वरी और भारती भी कहा जाता है।

सरस्वती उत्पत्ति कथा सरस्वती पुराण अनुसार :

हिन्दू धर्म के दो ग्रंथों ‘सरस्वती पुराण’ और ‘मत्स्य पुराण’ में सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का अपनी ही बेटी सरस्वती से विवाह करने का प्रसंग है जिसके फलस्वरूप इस धरती के प्रथम मानव ‘मनु’ का जन्म हुआ।

सरस्वती पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना करते समय ब्रह्मा ने सीधे अपने वीर्य से सरस्वती को जन्म दिया था।
इसलिए ऐसा कहा जाता है कि सरस्वती की कोई मां नहीं केवल पिता, ब्रह्मा थे।
स्वयं ब्रह्मा भी सरस्वती के आकर्षण से खुद को बचाकर नहीं रख पाए और उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाने पर विचार करने लगे।

माँ सरस्वती ने अपने पिता की इस मनोभावना को भांपकर उनसे बचने के लिए चारो दिशाओं में छिपने का प्रयत्न किया लेकिन उनका हर प्रयत्न बेकार साबित हुआ।
इसलिए विवश होकर उन्हें अपने पिता के साथ विवाह करना पड़ा।
ब्रह्मा और सरस्वती करीब 100 वर्षों तक एक जंगल में पति-पत्नी की तरह रहे।
इन दोनों का एक पुत्र भी हुआ जिसका नाम रखा गया था स्वयंभु मनु।

माँ सरस्वती उत्पत्ति कथा मत्स्य पुराण अनुसार :

मत्स्य पुराण में यह कथा थोड़ी सी भिन्न है। मत्स्य पुराण अनुसार ब्रह्मा के पांच सिर थे।

कालांतर में उनका पांचवां सिर काल भैरव ने काट दिया था। कहा जाता है जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की तो वह इस समस्त ब्रह्मांड में अकेले थे।

ऐसे में उन्होंने अपने मुख से सरस्वती, सान्ध्य, ब्राह्मी को उत्पन्न किया।
ब्रह्मा अपनी ही बनाई हुई रचना, सरवस्ती के प्रति आकर्षित होने लगे और लगातार उन पर अपनी दृष्टि डाले रखते थे।
ब्रह्मा की दृष्टि से बचने के लिए सरस्वती चारों दिशाओं में छिपती रहीं लेकिन वह उनसे नहीं बच पाईं।
इसलिए सरस्वती आकाश में जाकर छिप गईं, लेकिन अपने पांचवें सिर से ब्रह्मा ने उन्हें आकाश में भी खोज निकाला और उनसे सृष्टि की रचना में सहयोग करने का निवेदन किया।
सरस्वती से विवाह करने के पश्चात सर्वप्रथम स्वयंभु मनु को जन्म दिया।
ब्रह्मा और सरस्वती की यह संतान मनु को पृथ्वी पर जन्म लेने वाला पहला मानव कहा जाता है।

वसंत पंचमी कथा :-

सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्माजी ने मनुष्य योनि की रचना की, परंतु वह अपनी सर्जना से संतुष्ट नहीं थे, तब उन्होंने विष्णु जी से आज्ञा लेकर अपने कमंडल से जल को पृथ्वी पर छिड़क दिया, जिससे पृथ्वी पर कंपन होने लगा और एक अद्भुत शक्ति के रूप में चतुर्भुजी सुंदर स्त्री प्रकट हुई।

जिनके एक हाथ में वीणा एवं दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। वहीं अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी।

जब इस देवी ने वीणा का मधुर नाद किया तो संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई, तब ब्रह्माजी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा।

माँ सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है।

संगीत की उत्पत्ति करने के कारण वह संगीत की देवी भी हैं। वसंत पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं।

माता लक्ष्मी का परिचय :-

ऋषि भृगु की पुत्री माता लक्ष्मी थीं। उनकी माता का नाम ख्याति था।
(समुद्र मंथन के बाद क्षीरसागर से जो लक्ष्मी उत्पन्न हुई थी उसका इनसे कोई संबंध नहीं।
हालांकि उन महालक्ष्मी ने स्वयं ही विष्णु को वर लिया था।)

म‍हर्षि भृगु विष्णु के श्वसुर और शिव के साढू थे।
महर्षि भृगु को भी सप्तर्षियों में स्थान मिला है।

राजा दक्ष के भाई भृगु ऋषि थे। इसका मतलब राजा द‍क्ष की भतीजी थीं।
माता लक्ष्मी के दो भाई दाता और विधाता थे।

भगवान शिव की पहली पत्नी माता सती उनकी (लक्ष्मीजी की) सौतेली बहन थीं।
सती राजा दक्ष की पुत्री थी।

माता लक्ष्मी के 18 पुत्रों में से प्रमुख चार पुत्रों के नाम हैं:-
आनंद, कर्दम, श्रीद, चिक्लीत।
माता लक्ष्मी को दक्षिण भारत में श्रीदेवी कहा जाता है।

लक्ष्मी-विष्णु विवाह कथा :-

जब लक्ष्मीजी बड़ी हुई तो वह भगवान नारायण के गुण-प्रभाव का वर्णन सुनकर उनमें ही अनुरक्त हो गई और उनको पाने के लिए तपस्या करने लगी उसी तरह जिस तरह पार्वतीजी ने शिव जी को पाने के लिए तपस्या की थी।
वे समुद्र तट पर घोण तपस्या करने लगीं। तदनन्तर लक्ष्मी जी की इच्छानुसार भगवान विष्णु ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।

दूसरी विवाह कथा :-

एक बार लक्ष्मीजी के लिए स्वयंवर का आयोजन हुआ। माता लक्ष्मी पहले ही मन ही मन विष्णु जी को पती रूप में स्वीकार कर चुकी थी लेकिन नारद मुनि भी लक्ष्मीजी से विवाह करना चाहते थे।

नारदजी ने सोचा कि यह राजकुमारी हरि रूप पाकर ही उनका वरण करेगी। तब नारदजी विष्णु भगवान के पास हरि के समान सुन्दर रूप मांगने पहुंच गए।

विष्णु भगवान ने नारद की इच्छा के अनुसार उन्हें हरि रूप दे दिया। हरि रूप लेकर जब नारद राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे तो उन्हें विश्वास था कि राजकुमारी उन्हें ही वरमाला पहनाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

राजकुमारी ने नारद को छोड़कर भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी। नारद वहाँ से उदास होकर लौट रहे थे तो रास्ते में एक जलाशय में अपना चेहरा देखा। अपने चेहरे को देखकर नारद हैरान रह गये क्योंकि उनका चेहरा बन्दर जैसा लग रहा था।

हरि का एक अर्थ विष्णु होता है और एक वानर होता है।
भगवान विष्णु ने नारद को वानर रूप दे दिया था। नारद समझ गए कि भगवान विष्णु ने उनके साथ छल किया। उनको भगवान पर बड़ा क्रोध आया।
नारद सीधा बैकुण्ठ पहुँचे और आवेश में आकर भगवान को श्राप दे दिया कि आपको मनुष्य रूप में जन्म लेकर पृथ्वी पर जाना होगा।

जिस तरह मुझे स्त्री का वियोग सहना पड़ा है उसी प्रकार आपको भी वियोग सहना होगा। इसलिए राम और सीता के रूप में जन्म लेकर विष्णु और देवी लक्ष्मी को वियोग सहना पड़ा।

समुद्र मंथन वाली माँ लक्ष्मी :-

समुद्र मंथन से उत्पन्न माँ लक्ष्मी को माँ कमला कहते हैं जो दस महाविद्याओं में से अंतीम महाविद्या है।

देवी कमला, जगत पालन कर्ता भगवान विष्णु की पत्नी हैं।
देवताओं तथा दानवों ने मिलकर, अधिक सम्पन्न होने हेतु समुद्र का मंथन किया, समुद्र मंथन से 18 रत्न प्राप्त हुए, जिन में देवी लक्ष्मी भी थी, जिन्हें भगवान विष्णु को प्रदान किया गया तथा उन्होंने देवी का पानिग्रहण किया।
देवी का घनिष्ठ संबंध देवराज इन्द्र तथा कुबेर से हैं, इन्द्र देवताओं तथा स्वर्ग के राजा हैं तथा कुबेर देवताओं के खजाने के रक्षक के पद पर आसीन हैं।

देवी लक्ष्मी ही इंद्र तथा कुबेर को इस प्रकार का वैभव, राजसी सत्ता प्रदान करती हैं।

माता पार्वती का परिचय :-

माता पार्वती शिवजी की दूसरी पत्नीं थीं। शिवजी की तीसरी पत्नी उमा और चौथी काली थी। पार्वती माता अपने पिछले जन्म में सती थीं। सती माता के ही 51 शक्तिपीठ हैं।

माता सती के ही रूप हैं जिसे 10 महाविद्या कहा जाता है-

माँ काली,
माँ तारा,
माँ छिन्नमस्ता,
माँ षोडशी,
माँ भुवनेश्वरी,
माँ त्रिपुरभैरवी,
माँ धूमावती,
माँ बगलामुखी,
माँ मातंगी और
माँ कमला।

पुराणों में इनके संबंध में भिन्न भिन्न कहानियां मिलती है। दरअसल ये सभी देवियों की कहानि पुराणों में अलग-अलग मिलती है।

“”दिव्योर्वताम सः मनस्विता: संकलनाम ।
त्रयी शक्ति ते त्रिपुरे घोरा छिन्न्मस्तिके च।।””

देवी माँ पार्वती के पिता का नाम हिमवान और माता का नाम रानी मैनावती था।
माता पार्वती की एक बहन का नाम गंगा है, जिसने महाभारत काल में शांतनु से विवाह किया था और जिनके नाम पर ही एक नदी का नाम गंगा है।

माता पार्वती को ही गौरी, महागौरी, पहाड़ोंवाली और शेरावाली कहा जाता है।
अम्बे और दुर्गा का चित्रण पुराणों में भिन्न मिलता है। अम्बे या दुर्गा को सृष्टि की आदिशक्ति माना गया है जो सदाशिव (शिव नहीं) की अर्धांगिनी है।

माता पार्वती को भी दुर्गा स्वरूप माना गया है, लेकिन वे दुर्गा नहीं है।
नवरात्रि का त्योहार माता पार्वत के लिए ही मनाया जाता है।

माँ पार्वती के 9 रूपों के नाम हैं-

माँ शैलपुत्री,
माँ ब्रह्मचारिणी,
माँ चंद्रघंटा,
माँ कूष्मांडा,
माँ स्कंदमाता,
माँ कात्यायनी,
माँ कालरात्रि,
माँ महागौरी और
माँ सिद्धिदात्री।

“”प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति.चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति.महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:।।””

माता पार्वती के 6 पुत्रों में से प्रमुख दो पुत्र हैं:-
गणेश और कार्तिकेय।

भगवान गणेश जी के कई नाम है उसी तरह कार्तिकेय जी को स्कंद भी कहा जाता है।
इनके नाम पर एक पुराण भी है।

इसके अलावा उन्होंने हेति और प्रहेति कुल के एक अनाथ बालक सुकेश को भी पाला था।
सुकेश से ही राक्षस जाति का विकास हुआ।

इसके अलावा उन्होंने भूमा को भी पाल था जो शिव जी के पसीने से उत्पन्न हुआ था।
जलंधर और अयप्पा भी शिव जी के पुत्र थे लेकिन माँ पार्वती ने उनका पालन नहीं किया था।

माता पार्वती की दो सहचरियां जया और विजया भी थीं।

पुराणों अनुसार भगवान शिव की चार पत्नियां थीं। पहली माँ सती जी, जिसने यज्ञ में कूद कर अपनी जान दे दी थी।

यही सती दूसरे जन्म में पार्वती बनकर आई, जिनके पुत्र गणेश और कार्तिकेय हैं।

फिर शिव की एक तीसरी पत्नी थीं जिन्हें उमा कहा जाता था।
देवी उमा को भूमि की देवी भी कहा गया है।
उत्तराखंड में इनका एकमात्र मंदिर है।

भगवान शिव की चौथी पत्नी मां महाकाली है।

उन्होंने इस पृथ्वी पर भयानक दानवों का संहार किया था।

Like Pranam Flower +134 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 86 शेयर

कामेंट्स

Kalpana Bist Sep 4, 2017
बहुत ही बढिया जाजानकारी दी आपने इस के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

Narayan Sharma Sep 4, 2017
कोई तो कहता है की समुद्रमंथन से 14 रत्न निकले थे

Dhanraj Maurya Oct 19, 2018

Om jai jai Om jai jai

Water Pranam Like +12 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 188 शेयर

Dhoop Like Pranam +82 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 707 शेयर
T.K Oct 19, 2018

🚩शुभ रात्रि🚩

Pranam Like Jyot +55 प्रतिक्रिया 21 कॉमेंट्स • 487 शेयर

Like Pranam Flower +34 प्रतिक्रिया 5 कॉमेंट्स • 240 शेयर


🍁🌿🍁🌿🍁🌿🍁🌿🍁
*राजा जनक ने अयोध्या नरेश को सीता स्वयंवर में आमंत्रित क्यों नही किया था ??*

राजा जनक के शासनकाल में एक व्यक्ति का विवाह हुआ। जब वह पहली बार सज-संवरकर ससुराल के लिए चला, तो रास्ते में चलते-चलते एक जगह उसको दलदल मिला, जिसमें एक...

(पूरा पढ़ें)
Tulsi Pranam Jyot +185 प्रतिक्रिया 39 कॉमेंट्स • 591 शेयर
seema Oct 19, 2018

🏹🏹🏹🏹🏹🏹कभी सोचा है की प्रभु 🏹🏹श्री राम के दादा परदादा का नाम क्या था?
नहीं तो जानिये-
1 - ब्रह्मा जी से मरीचि हुए,
2 - मरीचि के पुत्र कश्यप हुए,
3 - कश्यप के पुत्र विवस्वान थे,
4 - विवस्वान के वैवस्वत मनु हुए.वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ...

(पूरा पढ़ें)
Like Pranam Flower +162 प्रतिक्रिया 43 कॉमेंट्स • 373 शेयर
Ramkumar Verma Oct 19, 2018

Good night to all friend

Like Pranam Belpatra +52 प्रतिक्रिया 10 कॉमेंट्स • 844 शेयर

Pranam Like Bell +13 प्रतिक्रिया 10 कॉमेंट्स • 24 शेयर
harshita malhotra Oct 19, 2018

Flower Like Pranam +55 प्रतिक्रिया 36 कॉमेंट्स • 327 शेयर
harshita malhotra Oct 19, 2018

Milk Pranam Like +16 प्रतिक्रिया 7 कॉमेंट्स • 81 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB