MADAN LAL
MADAN LAL Apr 16, 2021

🌹🙏Jai Shree Radhe Radhe Ji..🙏🌹

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Mamta Chauhan Apr 16, 2021
Radhe Radhe ji🙏shubh ratri vandan bhai ji aapka har pal khushion bhara ho radha rani ki kripa sda aap or aapke priwar pr bni rhe🌷🌷🌷🙏🙏🙏

Asha-Bakshi Apr 16, 2021
JAI SHREE RADHE RADHE KRISHNA JI SHUBH RAATRI VANDAN BHAI JI AAPKA HAR DIN HAR PAL KHUSIYO BHRA HO AAP SDA KHUSH RHO SWASTH RHO BHAI JI 🙏🙏🙏

Ansouya M 🍁 May 11, 2021

🌷🙏🌷श्री गणेशाय नमः 🌹🙏🌹 🙏🌷🙏🌷🌷🌷जय श्री राधे कृष्ण 🙏🙏🕉 🙏🌷🙏🙏🌷🙏🙏जय सिया राम 🌹🙏🌹 🌷🙏🌷🌷🌷🌷जय बजरंगबली हनुमान 🙏 🙏🌷🙏🙏🙏🙏शुभ संध्या आप सभी स्नेही भक्त जनों को जी----जय सिया राम 🌹🙏🌹🌷🙏🌷 🌷🙏🌷उमा कहउ मैं अनुभव अपना। सत् हरि भजन जगत सब सपना"।।🚩 राम कथा सुन्दर करतारी। संसय बिहग उड़ावन हारी।।🚩 राम कथा सशि किरण समाना सन्त चकोर करहि जिमि पाना ।।🚩 भगवान शिव जी ने माँ पार्वती को यहाँ अत्यंत गूढ़ रहस्य को बहुत ही सरलता से प्रतिपादित कर दिया है. भगवान शिव पार्वती जी से कहते हैं कि हे उमा सुनो मैं तुम्हें अपना अनुभव बताता हूँ, ये कोई सुनी सुनाई बात नहीं है ये मेरा स्वयं का अनुभव है. ये सारा संसार एक स्वप्न की भांति झूठ है, अर्थात जैसे हम सोते हुए सपना देखते हैं, उस सपने में अनेकों प्रकार के पदार्थ देखते हैं. और जब तक हम वो सपना देख रहे होते हैं तब तक सपने में दीखने वाली प्रत्येक वस्तु हमें सत्य ही लगती है, और हम अपने वास्तविक जगत को उस समय पूरी तरह भूल जाते हैं. परन्तु जैसे ही हम जागते हैं तो सपने में देखे गये सभी पदार्थ अदृश्य हो जाते हैं क्योंकि वे वास्तव में कहीं नहीं है, वे तो बस हमारे मन में ही कल्पित हैं.। ठीक इसी प्रकार आत्मा भी अपने मन में इस संसार रूपी सपने को देख रहा है. जब तक आत्मा यह स्वप्न देखता है तब तक आत्मा को ये झूठा संसार ही सत्य लगता है क्योंकि उस समय वो अपना वास्तविक स्वरुप भूल जाता है (जैसे सोता हुआ व्यक्ति अपने शरीर को भूल जाता है और सपने में देखे गये शरीर को ही "ये मैं हूँ" ऐसा समझने लग जाता है). किन्तु हरिभजन से जैसे ही उसका स्वप्न भ्रम दूर होता है वैसे ही उसे अपने वास्तविक अविनाशी स्वरुप की प्रतीति होने लगती है. अतः हरि भजन ही सत्य है क्योंकि केवल वही सत्य स्वरुप परमात्मा का बोध कराता है। । जो मनुष्य श्रेष्ठ पुरुषों के साथ परमात्मा का विचार करके तथा बुद्धि से संसार-सागर का तत्त्व समझ कर जगत में विचरण करता है, वही वास्तविक शोभा पाता है।।🙏 🙏🙏उमा पति महादेव की जय 🙏🙏 🌷🙏🌷🙏सिया वर रामचन्द्र की जय 🌷🙏🌷🙏🌷🙏🌷सर्व भवन्तू सुखिनह ।।।।।🙏🙏 ✍️साभार - रामचरित मानस🚩

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sanjay Awasthi May 11, 2021

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Manju Mahor May 11, 2021

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Ajay Kumar May 11, 2021

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sarita @bh. May 11, 2021

यह एक मेरे अहसास और अनुभव को स्पर्श करती एक कहानी है .... अन्यथा ना ले ... वैचारिक मतभेद हो सकते है ... *भूमि मार्ग* मांँ ....."बेटा! थोड़ा खाना खाकर जा ..!! दो दिन से तुने कुछ खाया नहीं है।" लाचार माता के शब्द है अपने बेटे को समझाने के लिये। "देखो मांँ ! मैंने मेरी बारहवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद वेकेशन में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी, और बाबूजी ने प्राॅमिस किया था। आज मेरे आखरी पेपर के बाद दीदी को कह देना कि जैसे ही मैं परीक्षा खंड से बाहर आऊंगा तब पैसा लेकर बाहर खडी रहे। मेरे दोस्त की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है। और हाँ, यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आयी तो मैं घर वापस नहीं आऊंगा।" एक गरीब घर में बेटे महेंद्र की जिद्द और माता की लाचारी आमने सामने टकरा रही थी। "बेटा! तेरे बाबूजी तुझे बाइक लेकर देने ही वाले थे, लेकिन पिछले महीने हुए एक्सिडेंट .... मां कुछ बोले उसके पहले महेंद्र बोला "मैं कुछ नहीं जानता .. मुझे तो बाइक चाहिये ही चाहिये ..!!" ऐसा बोलकर महेंद्र अपनी मां को गरीबी एवं लाचारी की मझधार में छोड़ कर घर से बाहर निकल गया। 12वीं बोर्ड की परीक्षा के बाद मिश्रा 'सर एक अनोखी परीक्षा का आयोजन करते थे। हालांकि मिश्रा सर का विषय गणित था, किन्तु विद्यार्थियों को जीवन का भी गणित भी समझाते थे और उनके सभी विद्यार्थी विविधता से भरी ये परीक्षा अचूक देने जाते थे। इस साल परीक्षा का विषय था *मेरी पारिवारिक भूमिका* महेंद्र परीक्षा खंड में आकर बैठ गया। उसने मन में गांठ बांध ली थी कि यदि मुझे बाइक लेकर देंगे तो ही मैं घर जाऊंगा। मिश्रा सर के क्लास में सभी को पेपर वितरित हो गया। पेपर में 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिये एक घंटे का समय दिया गया था। महेंद्र ने पहला प्रश्न पढा और जवाब लिखने की शुरुआत की। प्रश्न नंबर १ :- आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, बहन, भाई और आप कितने घंटे काम करते हो? विस्तार से बताइये? महेंद्र ने त्वरीत से जवाब लिखना शुरू कर दिया। जवाबः बाबूजी सुबह छह बजे टिफिन के साथ अपनी ओटोरिक्षा लेकर निकल जाते हैं। और रात को नौ बजे वापस आते हैं। कभी कभार वर्धी में जाना पड़ता है। ऐसे में लगभग पंद्रह घंटे काम करते है। मां सुबह चार बजे उठकर बाबूजी का टिफिन तैयार कर, बाद में घर का सारा काम करती हैं। दोपहर को सिलाई का काम करती है। और सभी लोगों के सो जाने के बाद वह सोती हैं। लगभग रोज के सोलह घंटे काम करती है। दीदी सुबह कालेज जाती हैं, शाम को 4 से 8 पार्ट टाइम बच्चो को पढ़ाती हैं। और रात्रि को मम्मी को काम में मदद करती हैं। लगभग बारह से तेरह घंटे काम करती है । मैं, सुबह छह बजे उठता हूँ, और दोपहर स्कूल से आकर खाना खाकर सो जाता हूँ। शाम को अपने दोस्तों के साथ टहलता हूँ। रात्रि को ग्यारह बजे तक पढता हूँ। लगभग दस घंटे व्यस्त रहता हूं । (इससे महेंद्र को मन ही मन लगा, कि उनका कामकाज में औसत सबसे कम है।) पहले सवाल के जवाब के बाद महेंद्र ने दूसरा प्रश्न पढा .. प्रश्न नंबर २ :- आपके घर की मासिक कुल आमदनी कितनी है? जवाबः बाबूजी की आमदनी लगभग दस हजार हैं। मम्मी एवं दीदी मिलकर पांंच हजार जोडते हैं। कुल आमदनी पंद्रह हजार। प्रश्न नंबर ३ :- मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपकी मनपसंद टीवी पर आ रही तीन सीरियल के नाम, शहर के एक सिनेमा हाल का पता और अभी वहां चल रही मूवी का नाम बताइये? सभी प्रश्नों के जवाब आसान होने से फटाफट दो मिनट में लिख दिये गए.. प्रश्न नंबर ४ :- एक किलो आलू और भिन्डी के अभी हाल की कीमत क्या है? एक किलो गेहूं, चावल और तेल की कीमत बताइये? और जहाँ पर घर का गेहूं पिसाने जाते हो उस आटा चक्की का पता दीजिये। महेंद्र को इस सवाल का जवाब नहीं आया। उसे समझ में आया कि हमारी दैनिक आवश्यक जरुरतों की चीजों के बारे में तो उसे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। मम्मी जब भी कोई काम बताती थी तो मना कर देता था। आज उसे ज्ञान हुआ कि अनावश्यक चीजें मोबाइल रिचार्ज, मुवी का ज्ञान इतना उपयोगी नहीं है। अपने घर के काम की जवाबदेही लेने से या तो हाथ बटा कर साथ देने से हम कतराते रहे हैं। प्रश्न नंबर ५ :- आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी तकरार या गुस्सा करते हो? जवाबः हां, मुझे आलू के सिवा कोई भी सब्जी पसंद नहीं है। यदि मम्मी और कोई सब्जी बनायें तो, मेरे घर में झगड़ा होता है। कभी मैं बगैर खाना खायें उठ खडा हो जाता हूँ। (इतना लिखते ही महेंद्र को याद आया कि आलू की सब्जी से मम्मी को गैस की तकलीफ होती हैं। पेट में दर्द होता है, अपनी सब्जी में एक बडी चम्मच वो अजवाइन और हींग डालकर खाती हैं। एक दिन मैंने गलती से मां की सब्जी खा ली, और फिर मैंने थूक दिया था। और फिर पूछा कि मां तुम ऐसा क्यों खाती हो? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति ऐसी अच्छी नहीं है कि हम दो सब्जी बनाकर खायें। तुम्हारी जिद के कारण मम्मी बेचारी क्या करें?) महेंद्र ने अपनी यादों से बाहर आकर अगले प्रश्न को पढा प्रश्न नंबर ६ :- आपने अपने घर में की हुई आखरी जिद के बारे में लिखिये .. महेंद्र ने जवाब लिखना शुरू किया। मेरी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के बाद दूसरे ही दिन बाइक के लिये जीद्द की थी। बाबूजी ने कोई जवाब नहीं दिया था, मां ने समझाया कि घर में पैसे नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना! मैंने दो दिन से घर में खाना खाना भी छोड़ दिया है। जब तक बाइक नहीं लेकर दोगे मैं खाना नहीं खाऊंगा। और आज तो मैं वापस घर नहीं जाऊंगा कहके निकला हूँ। अपनी जिद का प्रामाणिकता से महेंद्र ने जवाब लिखा। प्रश्न नंबर ७ :- आपको अपने घर से मिल रही पोकेट मनी का आप क्या करते हो ? आपके भाई-बहन कैसे खर्च करते हैं? जवाब: हर महीने बाबूजी मुझे सौ रुपये देते हैं। उसमें से मैं, मनपसंद पर्फ्यूम, गोगल्स लेता हूं, या अपने दोस्तों की छोटीमोटी पार्टियों में खर्च करता हूँ। मेरी दीदी को भी बाबूजी सौ रुपये देते हैं। वो खुद कमाती हैं और तनख्वाह के पैसे से मां को आर्थिक मदद करती हैं। हां, उसको दिये गये पोकेटमनी को वो गल्ले में डालकर बचत करती हैं। उसे कोई मौजशौख नहीं है, क्योंकि वो कंजूस भी हैं। प्रश्न नंबर ८ :- आप अपनी खुद की पारिवारिक भूमिका को समझते हो? प्रश्न अटपटा और जटिल होने के बाद भी महेंद्र ने जवाब लिखा। परिवार के साथ जुड़े रहना, एकदूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना एवं मददगार होना चाहिये और अपनी जवाबदेही निभानी चाहिये। यह लिखते लिखते ही अंतरात्मासे आवाज आयी कि अरे महेंद्र ! तुम खुद अपनी पारिवारिक भूमिका को योग्य रूप से निभा रहे हो? और अंतरात्मा से जवाब आया कि ना बिल्कुल नहीं ..!! प्रश्न नंबर ९ :- आपके परिणाम से आपकी माँ.. बाबूजी खुश हैं? क्या वह अच्छे परिणाम के लिये आपसे जिद करते हैं? आपको डांटते रहते हैं? (इस प्रश्न का जवाब लिखने से पहले ही महेंद्र की आंखें भर आयी। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका बराबर समझ चुका था।) लिखने की शुरुआत की .. वैसे तो मैं कभी भी मेरे माँ-बाबूजी को आजतक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूँ। लेकिन इसके लिये उन्होंने कभी भी जिद नहीं की है। मैंने बहुत बार अच्छे रिजल्ट के प्राॅमिस तोडे हैं। फिर भी हल्की सी डांट के बाद वही प्रेम और वात्सल्य बना रहता था। प्रश्न नंबर १० :- पारिवारिक जीवन में असरकारक भूमिका निभाने के लिये इस वेकेशन में आप कैसे परिवार को मददगार होंगें? जवाब में महेंद्र की कलम चले इससे पहले उनकी आंखों से आंसू बहने लगे, और जवाब लिखने से पहले ही कलम रुक गई .. बेंच के नीचे मुंह रखकर रोने लगा। फिर से कलम उठायी तब भी वो कुछ भी न लिख पाया। अनुत्तर दसवां प्रश्न छोड़कर पेपर सबमिट कर दिया। स्कूल के दरवाजे पर दीदी को देखकर उसकी ओर दौड़ पडा। "भैया ! ये ले आठ हजार रुपये, मम्मी ने कहा है कि बाइक लेकर ही घर आना।" दीदी ने महेंद्र के हाथ में पैसे रख दिये। "कहाँ से लायी ये पैसे?" महेंद्र ने पूछा। दीदी ने बताया "मैंने मेरी ऑफिस से एक महीने की सेलेरी एडवांस मांग ली। बाबूजी ने भी जहां काम करते हैं वहीं से उधार ले लिया, और मेरी पॉकेटमनी की बचत और मांँ के बचाए पैसे मिला कर तुम्हारी बाइक के पैसे की व्यवस्था हो गई हैं। महेंद्र की दृष्टि पैसे पर स्थिर हो गई। दीदी फिर बोली " भैय्या , तुम मांँ को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगे तो, मैं घर पर नहीं आऊंगा! अब तुम्हें समझना चाहिये कि तुम्हारी भी घर के प्रति जिम्मेदारी है। मुझे भी बहुत से शौक हैं, लेकिन अपने शौक से अपने परिवार को मैं सबसे ज्यादा महत्व देती हूं। तुम हमारे परिवार के सबसे लाडले हो, बाबूजी को पैर की तकलीफ हैं फिर भी तेरी बाइक के लिये पैसे कमाने और तुम्हें दिये प्रॉमिस को पूरा करने अपने फ्रेक्चर वाले पैर होने के बावजूद काम किये जा रहे हैं। तेरी बाइक के लिये। यदि तुम समझ सको तो अच्छा है, कल रात को अपने प्रॉमिस को पूरा नहीं कर सकने के कारण बहुत दुःखी थे। और इसके पीछे उनकी मजबूरी है। बाकी तुमने तो अनेकों बार अपने प्रॉमिस तोडे ही है न? मेरे हाथ में पैसे थमाकर दीदी घर की ओर चल पड़ी । उसी समय दोस्त अशोक वहां अपनी बाइक लेकर आ गया, अच्छे से चमका कर ले आया था। "ले .. महेंद्र आज से ये बाइक तुम्हारी, सब बारह हजार में मांग रहे हैं, मगर ये तुम्हारे लिये आठ हजार ।" महेंद्र बाइक की ओर टगर टगर देख रहा था। और थोड़ी देर के बाद बोला "दोस्त तुम अपनी बाइक उस बारह हजार वाले को ही दे देना! मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पायी हैं और होने की हाल फिलहाल संभावना भी नहीं है।" और वो सीधा मिश्रा सर की केबिन में जा पहूंचा। "अरे महेंद्र ! कैसा लिखा है पेपर में? मिश्रा सर ने मोहन की ओर देख कर पूछा। "सर ..!!, यह कोई पेपर नहीं था, ये तो मेरे जीवन के लिये दिशानिर्देश था। मैंने एक प्रश्न का जवाब छोड़ दिया है। किन्तु ये जवाब लिखकर नहीं अपने जीवन की जवाबदेही निभाकर दूंगा और मिश्रा सर को चरणस्पर्श कर अपने घर की ओर निकल पडा। घर पहुंचते ही, मांँ ,बाबूजी, दीदी सब उसकी राह देखते खडे थे। "बेटा! बाइक कहाँ हैं?" मांँ ने पूछा। महेंद्र ने दीदी के हाथों में पैसे थमा दिये और कहा कि माफ करना दीदी ! मुझे बाइक नहीं चाहिये। और बाबूजी मुझे ओटो की चाभी दो, आज से मैं पूरे वेकेशन तक ओटो चलाऊंगा और आप थोड़े दिन आराम करेंगे, और मांँ आज से मेरी पहली कमाई शुरू होगी। इसलिये तुम अपनी पसंद की मैथी की भाजी और लौकी ले आना, रात को हम सब साथ मिलकर के एक साथ खाना खायेंगे। महेंद्र के स्वभाव में आये परिवर्तन को देखकर मांँ ने उसको गले लगा लिया और कहा कि "बेटा! सुबह जो कहकर तुम गये थे वो बात मैंने तुम्हारे बाबूजी को बतायी थी, और इसलिये वो दुःखी हो गये, काम छोड़ कर वापस घर आ गये। भले ही मुझे पेट में दर्द होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी पसंद की ही सब्जी बनाऊंगी।" महेंद्र ने कहा "नहीं मांँ ! अब मेरी समझ गया हूँ कि मेरे घर परिवार में मेरी भूमिका क्या है? मैं रात को लौकी ,मैथी की सब्जी ही खाऊंगा, परीक्षा में मैंने आखरी जवाब नहीं लिखा हैं, वह प्रेक्टिकल करके ही दिखाना है। और हाँ मांँ हम गेहूं को पिसाने कहाँ जाते हैं, उस आटा चक्की का नाम और पता भी मुझे दे दो"और उसी समय मिश्रा सर ने घर में प्रवेश किया। और बोले "वाह! महेंद्र जो जवाब तुमनें लिखकर नहीं दिये वे प्रेक्टिकल जीवन जीकर कर दोगे "सर! आप और यहाँ?" महेंद्र... मिश्रा सर को देख कर आश्चर्य चकित हो गया। "मुझे मिलकर तुम चले गये, उसके बाद मैंने तुम्हारा पेपर पढा इसलिये तुम्हारे घर की ओर निकल पडा। मैं बहुत देर से तुम्हारे अंदर आये परिवर्तन को सुन रहा था। मेरी अनोखी परीक्षा सफल रही और इस परीक्षा में तुमने पहला नंबर पाया है।" ऐसा बोलकर मिश्रा सर ने महेंद्र के सर पर हाथ रखा। महेंद्र ने तुरंत ही मिश्रा सर के पैर छुएँ और ऑटो रिक्शा चलाने के लिये निकल पडा.... मेरा सभी सम्माननीय अभिभावकों से अनुरोध है कि आप इस पोस्ट को या इस जैसी पोस्ट को अपने साथी संगी और बच्चो को संज्ञान में अवश्य दे आप भी जरूर पढ़िएगा और अपने बच्चों को भी पढ़ने का अवसर दें जिससे वे पारिवारिक स्थिति और अपनी जवाबदेही को कुछ हद तक समझ सके ये मेरा मत है ...सफलता को प्राप्त करने के कई विकल्प होते है और शिखर हमेशा रिक्त रहता है....परिस्थिति और उपलब्ध साधन ...शिखर मार्ग तय करते है व्यवहारिक जीवन में ... मैंने ऐसी पोस्ट का महत्व महसूस किया है ... संस्कार का पौधा शायद कुछ ऐसे ही पनपता है ... ऐसा मेरा एक अनुभव रहा है मेरा आपसे आग्रह है कि आप स्वयं और अपने बच्चों को इस पोस्ट का संदेश समझने का अवसर प्रदान करें ... अत्यधिक सुविधाएं कई बार व्यक्ति को कमजोर और गुमराह कर देती है. *प्रतिभा धनवान और साधन संपन्न लोगो की बपौती नहीं अपितु चरित्र है , गुण है...संस्कार है...सिद्धि है....* सफल ,संपन्न और सार्थक जीवन के लिए श्रेष्ठ संस्कारो को आधार बनाएं ... यही हमारी भारतीय संस्कृति है... जय हिंद... वंदे मातरम... 🙏

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Geeta sahu. May 11, 2021

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Kamal May 11, 2021

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