"समय"

#ज्ञानवर्षा
"समय मन की ही उत्पत्ति है। जैसे ही हम मन के बाहर गए, वहां कोई समय नहीं है। इसे दोत्तीन बातों में समझने की कोशिश करें--
समय मन की उत्पत्ति है जब हम कहते हैं, तो बहुत कारणों से कहते हैं। पहला कारण तो यह है कि अगर आप सुख में हैं तो समय सिकुड़ जाता है। अगर आप दुख में हैं तो समय फैल जाता है। अगर आप किसी प्रियजन से मिल रहे हैं तो घड़ियां जल्दी भागती मालूम पड़ती हैं, और किसी शत्रु से मिलते हैं तो बड़ी मुश्किल से गुजरती मालूम पड़ती हैं। घड़ी अपने ढंग से कांटे घुमाए चली जाती है, लेकिन मन! अगर रात घर में कोई मर रहा है, मरणशैया पर पड़ा है, तो रात कटती हुई मालूम नहीं होती। रात बहुत लंबी हो जाती है। ऐसा लगता है कि अब यह रात शुरू हुई तो समाप्त होगी कि नहीं होगी। घड़ी अपने ढंग से घूमती है। लेकिन ऐसा लगता है, आज घड़ी घूम रही है या नहीं घूम रही है? कांटे धीमे चल रहे हैं? लेकिन कोई प्रियजन आ गया है, रात ऐसे बीत जाती है जैसे क्षण में बीत गई। और डर लगता है कि अब बीती, अब बीती, जल्दी बीत रही है, घड़ी जल्दी क्यों चल रही है? घड़ी जल्दी नहीं चलती है, घड़ी अपने ढंग से चलती रहती है, लेकिन मन की स्थितियों पर समय का माप निर्भर करता है।
आइंस्टीन से लोग पूछा करते थे कि तुम्हारी यह "रिलेटिविटी' की, तुम्हारी यह जो सापेक्षता की धारणा है, यह हमें समझाओ। तो आइंस्टीन कहता था, यह बड़ा कठिन है। और शायद जमीन पर दस-बारह आदमी हैं जिनसे मैं बात कर सकता हूं इस संबंध में, सभी से बात नहीं कर सकता। लेकिन फिर भी तुम्हारे समझ में आ सके, ऐसा मैं तुम्हें उदाहरण देता हूं...आइंस्टीन इसे समझाने को एक छोटा-सा उदाहरण दिया करता करता था। वह कहता था, अगर किसी आदमी को गर्म स्टोव के पास बिठा दिया जाए, तो समय और तरह से बीतता है। उसे अपनी प्रेयसी के पास बिठा दिया जाए तो समय और तरह से बीतता है। हमारा सुख, हमारा दुख हमारे समय की लंबाई को तय करता है।

रात आप स्वप्न देखते हैं, शायद कभी खयाल न किया हो कि स्वप्न में समय की स्थिति बिलकुल बदल जाती है जागने से। एक आदमी ने झपकी ली है क्षण-भर की और वह सपना देखता है इतना बड़ा जिसे देखने में वर्ष-भर लग जाए। वह देखता है उसका विवाह हो गया, उसके बच्चे हो गए, वह बच्चों की शादियां कर रहा है--वर्षों लग जाएं। क्षण-भर झपकी लगी है और आंख खुली है, वह हमें कहता है, इतना लंबा सपना देखा। हम उससे कहेंगे, पागल हो गए हो? इतना लंबा सपना क्षण-भर में कैसे देखोगे? अभी तो तुम जागते थे, अभी तुम जरा-सी झपकी लिए, आंख लगी ही थी और खुल गई, इस पलक झपने में तुम इतना लंबा सपना देख कैसे सकोगे? वह कहेगा, देख कैसे सकूंगा नहीं, मैंने देखा।
स्वप्न में मन बदल जाता है इसलिए समय की धारणा बदल जाती है। गहरी नींद में, सुषुप्ति में समय नहीं रह जाता। इसलिए आप जब बताते हैं कि रात बहुत गहरी नींद आई, तब भी आप जो समय का पता लगाते हैं वह समय का पता गहरी नींद से नहीं लगता, वह कब आप सोए, और कब आप जागे, इन दो छोरों के बीच में जो गुजर गया उसका हिसाब आप रख लेते हैं। लेकिन अगर आपसे कोई पूछे कि आपको बताया न जाए कि कब आप सोए कब आप जागे, तो आप कितनी देर सोए? आप बता न सकेंगे। "

🚩।।जय श्री राम।।🚩

+50 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 20 शेयर
Sunita Pawar Aug 13, 2020

🌲🌹बीमार पड़ने के पहले , ये काम केवल आयुर्वेद ही कर सकता है।🌹🌲 1--केंसर होने का भय लगता हो तो रोज़ाना कढ़ीपत्ते का रस पीते रहें,,, 2-- हार्टअटेक का भय लगता हो तो रोज़ना अर्जुनासव या अर्जुनारिष्ट पीते रहिए,, 3-- बबासीर होने की सम्भावना लगती हो तो पथरचटे के हरे पत्ते रोजाना सबेरे चबा कर खाएँ,,,, 4-- किडनी फेल होने का डर हो तो हरे धनिये का रस प्रात: खाली पेट पिएँ,,, 5-- पित्त की शिकायत का भय हो तो रोज़ाना सुबह शाम आंवले का रस पिएँ,,, 6-- सर्दी - जुकाम की सम्भावना हो तो नियमित कुछ दिन गुनगुने पानी में थोड़ा सा हल्दी चूर्ण डालकर पिएँ,,,, 7-- गंजा होने का भय हो तो बड़ की जटाएँ कुचल कर नारियल के तेल में उबाल कर छान कर,रोज़ाना स्नान के पहले उस तेल की मालिश करें,,, 8-- दाँत गिरने से बचाने हों तो फ्रिज और कूलर का पानी पीना बंद कर दें,,,, 9-- डायबिटीज से बचाव के लिए तनावमुक्त रहें, व्यायाम करें, रात को जल्दी सो जाएँ, चीनी नहीं खाएँ , गुड़ खाएँ,,, 10--किसी चिन्ता या डर के कारण नींद नहीं आती हो तो रोज़ाना भोजन के दो घन्टे पूर्व 20 या 25 मि. ली. अश्वगन्धारिष्ट ,200 मि. ली. पानी में मिला कर पिएँ,,,, किसी बीमारी का भय नहीं हो तो भी -- 15 मिनिट अनुलोम - विलोम, 15 मिनिट कपालभाती, 12 बार सूर्य नमस्कार करें,,,, स्वयं के स्वास्थ्य के लिए इतना तो करें,,🌲 🌲स्वस्थ रहने के लिए धन नहीं लगता, थोड़ी स्फूर्ति, थोड़ी जागरूकता व थोड़ा परिश्रम लगता है🌲

+38 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 76 शेयर
Vijay Shukla Aug 13, 2020

एक कहानी *एक सन्त जो एक वृक्ष के नीचे ध्यान कर रहा था, रोज एक लकड़हारे को लकड़ी काटते ले जाते देखता था ???* *एक दिन उससे कहा कि "सुन भाई, दिन- भर लकड़ी काटता है, दो जून रोटी भी नहीं जुट पाती। तू जरा आगे क्यों नहीं जाता। वहां आगे चंदन का जंगल है। एक दिन काट लेगा, सात दिन के खाने के लिए काफी हो जाएगा !!!!!!!!* गरीब लकड़हारे को भरोसा तो नहीं आया, क्योंकि वह तो सोचता था कि जंगल को जितना वह जानता है और कौन जानता है ??? जंगल में ही तो जिंदगी बीती। लकड़ियां काटते ही तो जिंदगी बीती। यह बाबा यहां बैठा रहता है वृक्ष के नीचे, इसको क्या खाक पता होगा??? मानने का मन तो न हुआ, लेकिन फिर सोचा कि हर्ज क्या है, कौन जाने ठीक ही कहता हो! फिर झूठ कहेगा भी क्यों??? शांत आदमी मालूम पड़ता है, मस्त आदमी मालूम पड़ता है?कभी बोला भी नहीं इसके पहले एक बार प्रयोग करके देख लेना जरूरी है ??? *तो गया। लौटा संत के चरणों में सिर रखा और कहा कि "मुझे क्षमा करना, मेरे मन में बड़ा संदेह आया था, क्योंकि मैं तो सोचता था कि मुझसे ज्यादा लकड़ियां कौन जानता है। मगर मुझे चंदन की पहचान ही न थी। मेरा बाप भी लकड़हारा था, उसका बाप भी लकड़हारा था। हम यही काटने की, जलाऊ-लकड़ियां काटते-काटते जिंदगी बिताते रहे, हमें चंदन का पता भी क्या, चंदन की पहचान क्या! हमें तो चंदन मिल भी जाता तो भी हम काटकर बेच आते उसे बाजार में ऐसे ही। तुमने पहचान बताई, तुमने गंध जतलाई, तुमने परख दी। जरुर जंगल है। मैं भी कैसा अभागा! काश, पहले पता चल जाता ????* सन्त ने कहा कोई फिक्र न करो, जब पता चला तभी जल्दी है। जब घर आ गए तभी सबेरा है?? दिन बड़े मजे में कटने लगे। एक दिन काट लेता, सात-आठ दिन, दस दिन जंगल आने की जरूरत ही न रहती ??? एक दिन सन्त ने कहा; *"मेरे भाई, मैं सोचता था कि तुम्हें कुछ अक्ल आएगी। जिंदगी भर तुम लकड़ियां काटते रहे, आगे न गए; तुम्हें कभी यह सवाल नहीं उठा कि इस चंदन के आगे भी कुछ हो सकता है?"* उसने कहा; *"यह तो मुझे सवाल ही न आया। क्या चंदन के आगे भी कुछ है?"* उस सन्त ने कहा : *"चंदन के जरा आगे जाओ तो वहां चांदी की खदान है। लकड़िया-वकडिया काटना छोड़ो। एक दिन ले आओगे, दो-चार छ: महीने के लिए हो गया।"* अब तो भरोसा आया था। भागा। संदेह भी न उठाया। चांदी पर हाथ लग गए, तो कहना ही क्या! चांदी ही चांदी थी! चार-छ: महीने नदारद हो जाता। एक दिन आ जाता, फिर नदारद हो जाता। लेकिन आदमी का मन ऐसा मूढ़ है कि फिर भी उसे खयाल न आया कि और आगे कुछ हो सकता है। सन्त ने फिर एक दिन कहा कि *"तुम कभी जागोगे कि नहीं! कि मुझी को तुम्हें जगाना पड़ेगा। आगे सोने की खदान है मूर्ख! तुझे खुद अपनी तरफ से सवाल, जिज्ञासा, मुमुक्षा कुछ नहीं उठती कि जरा और आगे देख लूं? अब छह महीने मस्त पड़ा रहता है, घर में कुछ काम भी नहीं है, फुरसत है। जरा जंगल में आगे देखकर देखूं यह खयाल में नहीं आता?"* उसने कहा कि *"मैं भी मंदभागी, मुझे यह खयाल ही न आया, मैं तो समझा चांदी, बस आखिरी बात हो गई, अब और क्या होगा?"* गरीब ने सोना तो कभी देखा न था, सुना था। सन्त ने कहा : *"थोड़ा और आगे सोने की खदान है।"* और ऐसे कहानी चलती है। फिर और आगे हीरों की खदान है। और ऐसे कहानी चलती है। और एक दिन सन्त ने कहा कि नासमझ, *"अब तू हीरों पर ही रुक गया?"* अब तो उस लकड़हारे को भी बडी अकड़ आ गई, बड़ा धनी भी हो गया था, महल खड़े कर लिए थे। उसने कहा *"अब छोड़ो, अब तुम मुझे परेशान न करो। अब हीरों के आगे क्या हो सकता है?"* उस बाबा ने कहा. *हीरों के आगे मैं हूं। तुझे यह कभी खयाल नहीं आया कि यह आदमी मस्त यहां बैठा है, जिसे पता है हीरों की खदान का, वह हीरे नहीं भर रहा है, इसको जरूर कुछ और आगे मिल गया होगा! हीरों से भी आगे इसके पास कुछ होगा, तुझे कभी यह सवाल नहीं उठा?* रोने लगा वह आदमी। सिर पटक दिया चरणों पर। कहा कि *"मैं कैसा मूढ़ हूं मुझे यह सवाल ही नहीं आता। तुम जब बताते हो, तब मुझे याद आता है। यह तो मेरे जन्मों-जन्मों में नहीं आ सकता था खयाल कि तुम्हारे पास हीरों से भी बड़ा कोई धन है।* सन्त ने कहा : *उसी धन का नाम परमात्मा का ध्यान है।* अब खूब तेरे पास धन है, अब धन की कोई जरूरत नहीं। अब जरा अपने भीतर की खदान खोद, जो सबसे कीमती है।..... 🦚🌷विजय शुक्ल🌷🦚 सम्पर्क सूत्र - 📱-8574763197

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर
Rajiv Mishra Aug 11, 2020

*हरी ॐ भाव " क्या भगवान हमारे द्वारा चढ़ाया गया भोग खाते हैं ? यदि खाते हैं , तो वह वस्तु समाप्त क्यों नहीं हो जाती और यदि नहीं खाते हैं , तो भोग लगाने का क्या लाभ ?" - एक लड़के ने पाठ के बीच में अपने गुरु से प्रश्न किया । गुरु ने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया । वे पूर्ववत् पाठ पढ़ाते रहे । उस दिन उन्होंने पाठ के अन्त में एक श्लोक पढ़ाया -* *पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।* *पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥* *पाठ पूरा होने के बाद गुरु ने सभी शिष्यों से कहा कि वे पुस्तक देखकर श्लोक कंठस्थ कर लें ।* *एक घंटे बाद गुरु ने प्रश्न करने वाले शिष्य से पूछा कि उसे श्लोक कंठस्थ हुआ कि नहीं । उस शिष्य ने पूरा श्लोक शुद्ध-शुद्ध गुरु को सुना दिया । फिर भी गुरु ने सिर 'नहीं' में हिलाया , तो शिष्य ने कहा कि - " वे चाहें , तो पुस्तक देख लें ; श्लोक बिल्कुल शुद्ध है ।” गुरु ने पुस्तक दिखाते हुए कहा - “ श्लोक तो पुस्तक में ही है , तो तुम्हें कैसे याद हो गया ?” शिष्य कुछ नहीं कह पाया ।* *गुरु ने कहा - “ पुस्तक में जो श्लोक है , वह स्थूल रूप में है । तुमने जब श्लोक पढ़ा , तो वह सूक्ष्म रूप में तुम्हारे अंदर प्रवेश कर गया । उसी सूक्ष्म रूप में वह तुम्हारे मन में रहता है । इतना ही नहीं , जब तुमने इसको पढ़कर कंठस्थ कर लिया , तब भी पुस्तक के स्थूल रूप के श्लोक में कोई कमी नहीं आई । इसी प्रकार पूरे विश्व में व्याप्त परमात्मा हमारे द्वारा चढ़ाए गए निवेदन को सूक्ष्म रूप में ग्रहण करते हैं और इससे स्थूल रूप के वस्तु में कोई कमी नहीं होती । उसी को हम प्रसाद के रूप में स्वीकार करते हैं ।* *शिष्य को उसके प्रश्न का उत्तर मिल चुका था ।यह केवल उस शिष्य की ही जिज्ञासा नहीं , हम सर्वसाधारण जनों की भी यही स्थिति है । यदि भोग को प्रसाद के भाव से ग्रहण करें तो उस भोज्य पदार्थ का प्रभाव उस रुप में ही प्राप्त होता है ।* *श्लोक या पाठ शब्द ही हैं पर भाव द्वारा वह पूजा का रूप ले लेते हैं । भाव की पवित्रता और समर्पण आवश्यक है ।* *🙏शुभ की कामना सहित🙏* ‌‌ *🕉️🙏ऊं श्री गुरूवे नमः🙏🕉️*

+7 प्रतिक्रिया 5 कॉमेंट्स • 23 शेयर

+10 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 8 शेयर

बाल संस्कार : अपने बच्चों को अवश्य सिखाएं ये दिव्य श्लोक हमारे पुराणों में वर्णित मंत्र-श्लोक अपने बच्चों को जरूर सिखाएं,जीवन की विपरीत परिस्थिति में इनके स्मरण से शक्ति मिलती है.... 1.प्रात: कर-दर्शनम् कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥ 2.पृथ्वी क्षमा प्रार्थना समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमंडिते। विष्णु पत्नि नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमस्व मे॥ 3.त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण ब्रह्मा मुरारी स्त्री पुरान्तकारी भानु: शशि भूमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्र: शनि राहु केतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ 4.स्नान मंत्र गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु॥ 5.सूर्य नमस्कार ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च।। आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने। दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम् सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥ ॐ मित्राय नम: ॐ रवये नम: ॐ सूर्याय नम: ॐ भानवे नम: ॐ खगाय नम: ॐ पूष्णे नम: ॐ हिरण्यगर्भाय नम: ॐ मरीचये नम: ॐ आदित्याय नम: ॐ सवित्रे नम: ॐ अर्काय नम: ॐ भास्कराय नम: ॐ श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम: आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥ 6.संध्या दीप दर्शन शुभं करोतु कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योति नमोऽस्तु ते॥ दीपो ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते॥ 7.गणपति स्तोत्र गणपति: विघ्नराजो लम्बतुंडो गजानन:। द्वै मातुरश्च हेरम्ब एकदंतो गणाधिप:॥ विनायक: चारुकर्ण: पशुपालो भवात्मज:। द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय य: पठेत्॥ विश्वं तस्य भवेद् वश्यं न च विघ्नं भवेत् क्वचित्। विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय। लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥ नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय। गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥ शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥ 8.आदिशक्ति वंदना सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥ 9.शिव स्तुति कर्पूर गौरं करुणावतारं, संसार सारं भुजगेन्द्रहारं। सदा वसंतं हृदयारविन्दे, भवं भवानी सहितं नमामि॥ 10. विष्णु स्तुति शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥ 11. श्री कृष्ण स्तुति कस्तूरी तिलकं ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभं। नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले, वेणु करे कंकणम्॥ सर्वांगे हरिचन्दनं सुललितं, कंठे च मुक्तावलि। गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपाल चूडामणी॥ मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्। यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्॥ 12.श्रीराम वंदना लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्। कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥ 13. एक श्लोकी रामायण आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्। वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीवसम्भाषणम्॥ बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्। पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद् श्री रामायणम्॥ 14.सरस्वती वंदना या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता। या वींणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपदमासना॥ या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता। सा माम पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्याऽपहा॥ 15.हनुमंत वंदना अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्। दनुजवनकृषानुम् ज्ञानिनांग्रगणयम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्। रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ मनोजवं मारुततुल्यवेगम जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये॥ 16.स्वस्ति-वाचन ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्ट्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ 17.शांति पाठ ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गुँ) शान्ति:, पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:, सर्व (गुँ) शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ ॥ॐ शांति: शांति:शांति:॥

+21 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 68 शेयर
Ajay Verma Aug 13, 2020

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
khushiram sharma Aug 13, 2020

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर

+7 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 23 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB