Aman
Aman Apr 12, 2018

तुमसे लागी लगन लेलो अपनी शरण

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Rajesh Jain Feb 25, 2021

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Rajesh Jain Feb 25, 2021

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Rajesh Jain Feb 25, 2021

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Rajesh Jain Feb 25, 2021

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*🌝आज की रात्रि कहानी🌝* *✊🏻बंद मुट्ठी सवा लाख💰 की* यह कहावत हमने बचपन से सुनी है मुहावरे के रूप में। तो आज कहावत कैसे शुरू हुई की कहानी जानते हैं। एक समय एक राज्य में राजा ने घोषणा की कि वह राज्य के मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए अमुक दिन जाएगा। इतना सुनते ही मंदिर के पुजारी ने मंदिर की रंग रोगन और सजावट करना शुरू कर दिया, क्योंकि राजा आने वाले थे। इस खर्चे के लिए उसने ₹6000/- का कर्ज लिया । नियत तिथि पर राजा मंदिर में दर्शन ,पूजा, अर्चना के लिए पहुंचे और पूजा अर्चना करने के बाद आरती की थाली में *चार आने दक्षिणा* स्वरूप रखें और अपने महल में प्रस्थान कर गए। पूजा की थाली में चार आने देखकर पुजारी बड़ा नाराज हुआ, उसे लगा कि राजा जब मंदिर में आएंगे तो काफी दक्षिणा मिलेगी पर चार आने । बहुत ही दुखी हुआ कि कर्ज कैसे चुका पाएगा, इसलिए उसने एक उपाय सोचा। गांव भर में ढिंढोरा पिटवाया की राजा की दी हुई वस्तु को वह नीलाम कर रहा है। नीलामी पर उसने अपनी मुट्ठीमें चार आने रखे पर मुट्ठी बंद रखी और किसी को दिखाई नहीं।। लोग समझे की राजा की दी हुई वस्तु बहुत अमूल्य होगी इसलिए बोली रु10,000/- से शुरू हुई। रु 10,000/- की बोली बढ़ते बढ़ते रु50,000/- तक पहुंची और पुजारी ने वो वस्तु फिर भी देने से इनकार कर दिया। यह बात राजा के कानों तक पहुंची । राजा ने अपने सैनिकों से पुजारी को बुलवाया और पुजारी से निवेदन किया कि वह मेरी वस्तु को नीलाम ना करें मैं तुम्हें रु50,000/-की बजाय *सवा लाख रुपए* देता हूं और इस प्रकार राजा ने सवा लाख रुपए देकर अपनी प्रजा के सामने अपनी इज्जत को बचाया । तब से यह कहावत बनी *बंद मुट्ठी सवा लाख की* यह मुहावरा आज भी प्रचलन में है।।। *नित याद करो मन से शिव को* ☝🏻💥 *सदैव प्रसन्न रहिये!!* *जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!* 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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👍🌹 राम राम दोस्तों 🌹👍 *दूसरा पहलू* ००००००००००००० एक समय संत प्रात: काल भ्रमण हेतू समुद्र के किनारे गए! समुद्र के किनारे उन्होने एक पुरुष को देखा जो एक स्त्री की गोद में सर रख कर सोया हुआ था । पास में शराब की खाली बोतल पड़ी हुई थी। संत बहुत दु:खी हुए! उन्होने ये विचार किया की ये मनुष्य कितना बेकार हैं! जो प्रात:काल शराब सेवन कर के स्त्री की गोदी में सर रख कर प्रेमालाप कर रहा हैं! थोड़ी देर बाद समुद्र से बचाओ, बचाओ की आवाज आई, संत नें देखा की एक मनुष्य समुद्र में डूब रहा हैं! मगर स्वयं को तैरना नहीं आने के कारण वो संत देखने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते थे! स्त्री की गोद में सिर रख कर सोया हुआ व्यक्ति उठा और डूबने वाले को बचाने हेतू पानी में कूद गया! थोड़ी देर में उसने डूबने वाले को बचा लिया और किनारे ले आया! संत विचार में पड़ गए की इस व्यक्ति को बुरा कहें या भला! वो उसके पास गए और बोले भाई तूं कौन हैं और यहां क्या कर रहा हैं? उस व्यक्ति ने उत्तर दिया की में एक मछुआरा हूं और मछली मारनें का काम करता हूं.आज कई दिनों से समुद्र से मछली पकड़ कर प्रात: जल्दी यहां लौटा हूं। मेरी मां मुझे लेने के लिए आई थी और साथ में(घर में कोई दूसरा बर्तन नहीं होने पर)इस दारू की बोतल में पानी ले आई. कई दिनो की यात्रा से में थका हुआ था और भोर के सुहावने वातावरण में ये पानी पी कर थकान कम करने हेतू मां की गोदी में सिर रख कर ऐसे ही सो गया. संत की आंखों में आंसु आ गए की मैं कैसा मनुष्य हूं जो देखा उसके बारे में गलत विचार किया । जिसकी वास्तविकता अलग थी! दोस्तों............ *इसीलिए कहते हैं कानों सुना और आँखों देखा भी झूठ हो सकता है क्योंकि कई बार हम जो देखते हैं वो सच नहीं होता। उसका एक दूसरा पहलू भी हो सकता है,किसी के प्रति कोई निर्णय लेने से पहले सौ बार सोचो.* 👍🌹 जय श्री कृष्णा 🌹👍

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ओम नमः श्री लक्ष्मीनारायण 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏 *भक्त की दरिद्रता* ***************************** जगत−जननी पार्वती ने एक भूखे भक्त को श्मशान में चिता के अंगारों पर रोटी सेंकते देखा तो उनका कलेजा मुँह को आ गया। वह दौड़ी−दौड़ी ओघड़दानी शंकर के पास गयीं और कहने लगीं−”भगवन्! मुझे ऐसा लगता है कि आपका कठोर हृदय अपने अनन्य भक्तों की दुर्दशा देखकर भी नहीं पसीजता। कम−से−कम उनके लिए भोजन की उचित व्यवस्था तो कर ही देनी चाहिए। देखते नहीं वह बेचारा भर्तृहरि अपनी कई दिन की भूख मृतक को पिण्ड के दिये गये आटे की रोटियाँ बनाकर शान्त कर रहा है।” महादेव ने हँसते हुए कहा- “शुभे! ऐसे भक्तों के लिए मेरा द्वार सदैव खुला रहता है। पर वह आना ही कहाँ चाहते हैं यदि कोई वस्तु दी भी जाये तो उसे स्वीकार नहीं करते। कष्ट उठाते रहते हैं फिर ऐसी स्थिति में तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं?” माँ भवानी अचरज से बोलीं- “तो क्या आपके भक्तों को उदरपूर्ति के लिए भोजन को आवश्यकता भी अनुभव नहीं होती?” श्री शिव जी ने कहा- “परीक्षा लेने की तो तुम्हारी पुरानी आदत है यदि विश्वास न हो तो तुम स्वयं ही जाकर क्यों न पूछ लो। परन्तु परीक्षा में सावधानी रखने की आवश्यकता है।” भगवान शंकर के आदेश की देर थी कि माँ पार्वती भिखारिन का छद्मवेश बनाकर भर्तृहरि के पास पहुँचीं और बोली- ”बेटा! मैं पिछले कई दिन से भूखी हूँ। क्या मुझे भी कुछ खाने को देगा?” “अवश्य" भर्तृहरि ने केवल चार रोटियाँ सेंकी थीं उनमें से दो बुढ़िया माता के हाथ पर रख दीं। शेष दो रोटियों को खाने के लिए आसन लगा कर खाने का उपक्रम करने लगे। भिखारिन ने दीन भाव से निवेदन किया- "बेटा! इन दो रोटियों से कैसे काम चलेगा? मैं अपने परिवार में अकेली नहीं हूँ एक बुड्ढा पति भी है उसे भी कई दिन से खाने को नहीं मिला है।” भर्तृहरि ने वे दोनों रोटियाँ भी भिखारिन के हाथ पर रख दीं। उन्हें बड़ा सन्तोष था कि इस भोजन से मुझसे भी अधिक भूखे प्राणियों का निर्वाह हो सकेगा। उन्होंने कमण्डल उठाकर पानी पिया। सन्तोष की साँस ली और वहाँ से उठकर जाने लगे। तभी आवाज सुनाई दी- "वत्स! तुम कहाँ जा रहे हो?" भर्तृहरि ने पीछे मुड़ कर देखा। माता पार्वती दर्शन देने के लिए पधारी हैं। माता बोलीं- "मैं तुम्हारी साधना से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें जो वरदान माँगना हो माँगो।" प्रणाम करते हुए भर्तृहरि ने कहा- "अभी तो अपनी और अपने पति की क्षुधा शाँत करने हेतु मुझसे रोटियाँ माँगकर ले गई थीं। जो स्वयं दूसरों के सम्मुख हाथ फैला कर अपना पेट भरता है वह क्या दे सकेगा। ऐसे भिखारी से मैं क्या माँगू।" पार्वती जी ने अपना असली स्वरूप दिखाया और कहा- "मैं सर्वशक्ति मान हूँ। तुम्हारी पर दुःख कातरता से बहुत प्रसन्न हूँ जो चाहो सो वर माँगो।" भर्तृहरि ने श्रद्धा पूर्वक जगदम्बा के चरणों में शिर झुकाया और कहा- "यदि आप प्रसन्न हैं तो यह वर दें कि जो कुछ मुझे मिले उसे दीन−दुखियों के लिए लगाता रहे और अभावग्रस्त स्थिति में बिना मन को विचलित किये शान्त पूर्वक रह सकूँ।" पार्वती जी 'एवमस्तु' कहकर भगवान् शिव के पास लौट गई। त्रिकालदर्शी शम्भु यह सब देख रहे थे उन्होंने मुसकराते हुए कहा- "भद्रे, मेरे भक्त इसलिए दरिद्र नहीं रहते कि उन्हें कुछ मिलता नहीं है। परंतु भक्ति के साथ जुड़ी उदारता उनसे "अधिकाधिक दान" कराती रहती हैं और वे खाली हाथ रहकर भी विपुल सम्पत्तिवानों से अधिक सन्तुष्ट बने रहते है।" हर-हर महादेव..!! >>>>>>>>>>>>>>>>>>> 11 >>>>>>>>>>>> प्रभु कृपा की महत्ता आज इस माया से भरे संसार में सत्कर्म करने की इच्छा किसी की नहीं होती है । सब अपनी वासनाओं / इन्द्रियों को पुष्ट करने में लगे रहते हैं । प्रभु कृपा होने पर ही जीव की सत्कर्म करने की इच्छा जागृत होती है । अतः प्रभु कृपा प्राप्त करने के लिए धर्म के मौलिक सिद्धांतो का अनुकरण करते हुए ब्रह्म को धारण करिये l >>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>> II जय श्रीहरिः II शरणागति क्या है ? शरणागति के 4 प्रकार है --- 1. जिह्वा से भगवान के नाम का जप- भगवान् के स्वरुप का चिंतन करते हुए उनके परम पावन नाम का नित्य निरंतर निष्काम भाव से परम श्रद्धापूर्वक जप करना तथा हर समय भगवान् की स्मृति रखना। 2. भगवान् की आज्ञाओं का पालन करना- श्रीमद्भगवद्गीता जैसे भगवान् के श्रीमुख के वचन, भगवत्प्राप्त महापुरुषों के वचन तथा महापुरुषों के आचरण के अनुसार कार्य करना। 3. सर्वस्व प्रभु के समर्पण कर देना-वास्तव मे तो सब कुछ है ही भगवान् का,क्योंकि न तो हम जन्म के समय कुछ साथ लाये और न जाते समय कुछ ले ही जायेंगे। भ्रम से जो अपनापन बना रखा है,उसे उठा देना है। 4 .भगवान् के प्रत्येक विधान मे परम प्रसन्न रहना-मनचाहा करते-करते तो बहुत-से जन्म व्यतीत कर दिए,अब तो ऐसा नही होना चाहिए।अब तो वही हो जो भगवान् चाहते है। भक्त भगवान् के विधानमात्र मे परम प्रसन्न रहता है फिर चाहे वह विधान मन,इंद्रिय और शरीर के प्रतिकूल हो या अनुकूल।I II ॐ नमो नारायणायः ी ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, " जीवन का सत्य आत्मिक कल्याण है ना की भौतिक सुख !" ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, "सत्य वचन में प्रीति करले,सत्य वचन प्रभु वास। सत्य के साथ प्रभु चलते हैं, सत्य चले प्रभु साथ।। " ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, किसी भी गौशाला में जाकर गौ सेवा करे और गोरक्षा की आवाज को समाज में बुलंद करे !गौ माता के जीवन को किसी भी धर्म विशेष के लोगो से इतना खतरा नहीं है जितना काले अंग्रेजो से है जो गौ मांस का निर्यात बढ़ाने के लिए कसाई घरों को अंशदान ( सब्सिडी ) देती है ! इस प्रकार गौवंश समाप्त करने और खेतों से जैविक खाद को गायब कर यूरिआ को बढ़ावा देने का प्रयास सफल हो रहा है ! गौ माता को बचाये और देवताओं का आशीर्वाद एवं कृपा प्राप्त करे ! साथ ही अपने प्रारब्ध ( भाग्य ) में पुण्य संचित करे ! यह एक ऐसा पुण्य है जिससे इहलोक में देवताओ से सुख समृद्धि मिलती है एवं परलोक में स्वर्ग ! 🙏👏🌹🌲🌿🌹 इस घोर कलियुग में वही परिवार सुख पायेगा ! गौमाता को पहली रोटी देकर हरिनाम गुण गायेगा !! दया प्रेम सब जीवों पर करके सेवाभाव अपनायेगा ! गुरूजनों की आज्ञा मान माता पिता के चरण दबायेगा !! गीता रामायण भागवत के द्वारा सोये मन को जगाता हूँ ! भूखों को भोजन पानी देकर पशु पंक्षियों को चुगाता हूँ !! ईष्या,क्रोध ,आलस्य,वैमनष्यता ,बुराई का त्याग करे ! सेवा,प्रेम,करूणा,ममता,दया,क्षमा को अपनाये !! 🙏जय गौमाता जय गोपाल जय गुरूदेव🙏 निवेदन = यदि आप यह सोचते है की देवलोक गौशाला के लेखों को पढ़कर विचारों में " परिपक्वत्ता एवं सुन्दर प्रवृतियों " का आगमन होता है तो हमारे लेखो को दूसरे ग्रुप्स में पोस्ट्स / शेयर करे जिससे दूसरे वंचित रह रहे लोग भी पढ़ सके ! आपको बहुत ही पुण्य प्राप्त होगा ! *संकलित*

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gulab singh Feb 24, 2021

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*मौत का भय* दो उल्लू एक वृक्ष पर आ कर बैठे थे। एक ने अपने मुंह में सांप को दबोच रखा था। दूसरा उल्लू एक चूहा पकड़ लाया था। दोनों वृक्ष पर पास—पास बैठे थे —सांप ने चूहे को देखा तो वह यह भूल ही गया कि वह उल्लू के मुंह में है और मौत के करीब है, चूहे को देख कर उसके मुंह में लार बहने लगी। चूहे ने जैसे ही सांप को देखा वह कांपने लगा, जबकि दोनों ही मौत के मुंह मे बैठे हैं। दोनों उल्लू बड़े हैरान हुए। एक उल्लू ने दूसरे उल्लू से पूछा कि भाई, इसका कुछ राज समझे? दूसरे ने कहा, बिल्कुल समझ में आया। पहली बात तो यह है कि जीभ की इच्छा इतनी प्रबल है कि सामने मृत्यु खड़ी हो तो भी दिखाई नहीं पड़ती। दूसरी बात यह समझ में आयी कि भय मौत से भी बड़ा भय है। मौत सामने खड़ी है, उससे यह भयभीत नहीं है चूहा; लेकिन भय से भयभीत है कि कहीं सांप हमला न कर दे। *शिक्षा:-* हम भी मौत से भयभीत नहीं हैं, भय से ज्यादा भयभीत हैं। ऐसे ही जिह्वा का स्वाद इतना प्रगाढ़ है कि मौत चौबीस घंटे खड़ी है, फिर भी हमें दिखाई नहीं पड़ती है और हम अंधे होकर कुछ भी डकारते रहते हैं। *सदैव प्रसन्न रहिये।* *जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*shree ganesha namah ji🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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