अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य, setu samaganam

Audio - अहमस्मि प्रथमजा ऋतस्य, setu samaganam

मंत्र :- अ³ह¹म²स्मि प्रथम³जा² ऋ³त²स्य³ पू¹र्वे² दे³वे¹भ्यो² अ³मृ¹त²स्य³ ना¹म²।
यो² मा³ द¹दा²ति³ स²ᵘ इदे²व¹ मा²वद³ह²ᵘमन्न³म¹न्न²म³द¹न्त²मद्मि॥५९४॥

अ³ह²म् अ³स्मि प्रथमजा:² प्र³थम | जाः² ऋ³त¹स्य² | पू¹र्व²म्¹ दे³वे¹भ्यः² अ³मृ¹त²स्य अ³ | मृ¹त²स्य¹ ना¹म | यः मा³ द¹दा²ᵘति सः इत् ए³व मा³ अवत्, अह²म् अ¹न्न²ᵘम् अ¹न्न²ᵘम् अ³द¹न्त²म् अ³द्मि ||

ॐ स्वगर्यम् सेतुषाम् पुरूषगतिर्वा प्रजापति ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, देवता -अत्मान्ने, धैवत् स्वरः॥

सामगानम् :-
ॐ हा²ʳ उहा उहा उ ॥ से¹ʳतूʳ्ँ स्त²र (3)॥ दुस्त¹ ॥ रान्॥(-2 3)
दाʳने²ʳ ना¹ʳ दाʳन²म् (3)॥ हा²ʳ उहा उहा उ॥
अ²हमस्मि प्रथमजाʳ ऋ¹ताऽ२३ स्या²ऽ३²४²५²॥
हा²ʳ उहा उहा उ ॥ से¹ʳतूʳ्ँ स्त²र (3)॥ दुस्त¹ ॥ रान्॥(-2 3)
अʳक्रो²ʳधेन क्रो¹ʳधम् (2)॥ अ¹क्रो¹ʳʳ धेन क्रो¹ʳधम्॥
हा²ʳ उहा उहा उ ॥ पूर्वंʳ देʳवेʳभ्योʳ अमृतस्य¹ नाऽ२३ मा²ऽ३¹४¹५¹॥
हा²ʳ उहा उहा उ ॥ से¹ʳतूʳ्ँ स्त²र (3)॥ दुस्त¹ ॥ रान्॥(-2 3)
श्र²द्ध¹याʳ श्रद्धा²ʳम्(3)॥ हा²ʳ उहा उहा उ॥
योʳ माʳ ददाʳति सइदेʳ व¹ माऽ२३ वा²ऽ३¹४¹५¹ त्॥
हा²ʳ उहा उहा उ ॥ से¹ʳतूʳ्ँ स्त²र (3)॥ दुस्त¹ ॥ रान्॥(-2 3)
स²त्ये¹ʳनाʳ नृत²म् (3)॥ हा²ʳ उहा उहा उ ॥
अ²हमन्नमन्नमदन्त¹माऽ२३ द्मी²ऽ३¹४¹५¹ ॥ हाʳˢ उहा उहाˢ उˢवा ॥
एषाʳ¹ गतिः (3) ॥ ए²ʳत¹द²मृ¹तम् (3) ॥ स्व​¹र्ग²च्छ (3) ॥ ज्यो¹ʳतिर्ग²च्छ (3)॥
से¹ʳतूʳ्ँ स्ती²ʳर्त्वा¹ʳ२३​¹४​¹५​¹ ॥ च²तु¹रा: २३४५॥
ॐ शान्ति³श्शा¹न्ति³श्शा¹न्तिः²

मैं अन्नरूपी देवता, ऋतम् - सनातन सत्य , यज्ञ की प्रथम रचना हुं, मैं देवों से पूर्व भी विद्यमान था, मैं ही मोक्ष के आनन्दामृत का नाभि हुं। जो मनुष्य मुझे अपने आत्मा में समर्पित करता है वह अवश्य मुझे हि प्राप्त होता है। मैं अन्न , ही अन्न खाने वालों को खाता हुं, अर्थात प्रलय में ग्रास कर लेता हुं - यहां विरोधालंकार व्यङ्य है। जैसे प्राणियों के लिये अन्न आवश्यक है, वैसे ही उपासकों के लिये ईश्वर​। प्राणी अन्न खाते हैं, और परमेश्वर चराचर जगत् को| अन्न अर्थात् शरीर को संचालित करने के लिये हम जिन​ पदार्थों को ग्रहण करते हैं, उनमें भी परमेश्वर समाहित हैं, जो व्यक्ति इसे दान करते हुए अर्थात परमेश्वर को समर्पित करते हुए उपभोग करता है, वह उस परब्रह्म को प्राप्त होता है, किन्तु जो लोभी मनुष्य इसमें लिप्त होकर इसका भोग करता है, यह अन्न ही उसका विनाश कर देता है| साथ ही जिस तरह ऋतम् से सृष्टि के आदि में उत्पन्न परमेश्वर होते हैं, उसी प्रकार इस अन्न जिसके कण कण में परमात्मा समाहित हैं उसीसे ही प्राणी के शरीर।
शरीर और अन्न का सम्बंध माण्डूक्य उपनिषद मे _'अन्नमयकोष:'_ के रूप मे समझाया गया है।
इस मंत्र को यदि देखें तो यह एक आध्यात्मिक​ ऋचा है, अर्थात् इसमें परमेश्वर स्वयं अपना परिचय देते हैं, इस कान्ड का यह पहले अध्याय के ही पहले खन्ड में ही यह पवित्र मन्त्र अन्त में उसके अन्तिम निष्कर्ष बनकर आता है, इसी कान्ड में और भी महत्वपूर्ण मन्त्र हैं, यथा अग्निमीळे, अस्मभ्यं त्वा, अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा, यह मन्त्र महत्वपुर्ण वैदिक​ मन्त्रों में से एक है, तथा मेरे सबसे अधिक प्रिय मन्त्रों में से एक जिसे मैं साझा कर रहा हुं।

यह ज्ञान तैतरीय उपनिषद में भी वर्णित है, 'अह्मन्नम् , अह्मन्नम्,अह्मन्नादोऽह्मन्नादोऽह्मन्नादः' ।
यह मंत्र वहां भी प्राप्त होता है, 'अहमस्मि प्रथमजा' अन्न शुद्धिकरणं मंत्र के रूप में।

बादरायण भी ब्रह्म के लिये लिखते हैं, 'अत्ता चराचरग्रहणात्'।

गीता में भी कहा गया है
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् |
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ||3.13||

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतो़ऽन्यः कुरुसत्तम।।4.31।।

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ 4.24॥


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Queen Apr 22, 2019

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MAMTA Kapoor Apr 22, 2019

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MAMTA Kapoor Apr 22, 2019

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Devidas Chitale Apr 22, 2019

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Devidas Chitale Apr 22, 2019

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