Susheel Singh
Susheel Singh Jan 18, 2017

Susheel Singh ने यह पोस्ट की।

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Sanjay Singh Aug 14, 2020

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Sachin Kumar Trivedi Aug 14, 2020

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Ashok Singh Siksrwar Aug 14, 2020

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Raj Kumar Sharma Aug 14, 2020

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Savita Vaidwan Aug 14, 2020

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Savita Vaidwan Aug 14, 2020

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HNPANDEY Aug 14, 2020

👉 * झूठा अभिमान * * एक मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ गयी। हाथी को पता न चला मक्खी कब बैठी। * * बहुत भिनभिनाई आवाज की उड़ान, और कहा, भ भाई! तुझे कोई तकलीफ हो तो बता देना। * वजन मालूम पड़े तो खबर कर देना, मैं हत जाउंगी। ’लेकिन हाथी को कुछ सुनाई न पड़ा। फिर * हाथी एक पुल पर से गुजरने लगा बड़ी पहाड़ी नदी थी, भयंकर गढ्ढ था, मक्खी ने कहा कि, देख, दो हैं, कहीं पुल टूट न जाए! * अगर ऐसा कुछ डर लगे तो मुझे बता देना। मेरे पास पंख हैं, मैं उड़ जाऊंगी। ' हाथी के कान में मामूली-सी कुछ भिनभिनाहट पड़ी, पर उसने कुछ ध्यान न दिया। * फिर मक्खी के बिदा होने का वक्त आ गया। उन्होंने कहा, 'यात्रा बड़ी सुखद हुई, साथी-संगी रही, मित्रता बनी, अब मैं जाता हूं, कोई काम हो, तो मुझे कहना, तब उड़ान की आवाज थोड़ी हाथी को सुनाई पड़ी, उन्होंने कहा,' जो कौन है कुछ पता नहीं , जब तू आयी, कब तू मेरे शरीर पर बैठी, कब तू उड़ने गयी, इसका मुझे कोई पता नहीं है। * लेकिन मक्खी तब तक जा चुकी थी सन्त कहते हैं, 'हमारा होना भी ऐसा ही है। यह बड़ी पृथ्वी पर हमारे होने, ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। * हाथी और मक्खी के अनुपात से भी कहीं छोटा, हमारा और ब्रह्मांड का अनुपात है। हमारे ना रहने से क्या फर्क पड़ता है? लेकिन हम बड़े ब्रगुल मचाते हैं। * वह ब्रगुल किसलिये है? वह क्या चाहती थी? वह चाहता था हाथी भर्ती करे, तू भी है; तेरा भी अस्तित्व है, वह पूछना चाहता था। * हमारा अहंकार अकेले तो नहीं जीके रहा है। दूसरे उसे मानें, तो केवल जी हो सकता है। * इसलिए हम सब उपाय करते हैं कि किसी भांति दूसरे उसे मानें, ध्यान दें, हमारी तरफ देखें; उपेक्षा न हो। * सन्त विचार- हम वस्त्र पहनते हैं तो दूसरों को दिखाने के लिए, स्नान करते हैं दंडते-संवारते हैं ताकि दूसरे हमें समझ सकें। धन इकट्ठा करते हैं, मकान बनाते हैं, तो दूसरों को दिखाने के लिए। दूसरे देखें और स्वीकार करें कि आप कुछ विशिष्ट हो सकते हैं, ना की साधारण। * आप मिट्टी से ही बने हो और फिर मिट्टी में मिल जाओगे, आप अज्ञान के कारण खुद को विशेष दिखाना चाहते हो वरना तो आप बस एक मिट्टी के पुतले हो और कुछ नहीं। * अहंकार सद् इस खोज में है-वे आंखें मिल जाएं, जो मेरी छाया को वजन दे दो। * याद रखना आत्मा के निकलते ही यह मिट्टी का पुतला फिर मिट्टी बन जाएगा इसलिए अपना झूठा अहंकार छोड़ दो और सब का सम्मान करो क्योंकि जीवों में परमात्मा का अंश आत्मा है। * https://awgpskj.blogspot.com/2020/08/blog-post_58.html अपने ऊपर विश्वास है आपन उपर विश्वास कीजिय पं। श्रीराम शर्मा आचार्य 👇👇 https://youtu.be/7fLJThFZM-w

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Ravi joshi Aug 14, 2020

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