pk d
pk d Jan 14, 2017

2017 sai Utsav kali Sai Mandir kadma Ecc flat jamsedpur jharkhand

2017 sai Utsav kali Sai Mandir kadma Ecc flat jamsedpur jharkhand
2017 sai Utsav kali Sai Mandir kadma Ecc flat jamsedpur jharkhand
2017 sai Utsav kali Sai Mandir kadma Ecc flat jamsedpur jharkhand
2017 sai Utsav kali Sai Mandir kadma Ecc flat jamsedpur jharkhand

2017 sai Utsav kali Sai Mandir kadma Ecc flat jamsedpur jharkhand

+31 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर

🍁*आज का सुविचार*🍁 🏯🌺✨👏🕉️👏✨🌺🏯 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩 सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है, जो देश की एकता एवं अखंडता के लिए बहुत जरूरी है। प्राणी मात्र की सेवा करना ही विराट ब्रह्म की आराधना है। प्राणी मात्र की सेवा करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। इसे ही विराट ब्रह्म की आराधना कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है - "ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व भूत हिते रता: ..."। अर्थात्, जो सब जीवों का हित-चिंतन करते हैं, वे मुझे प्राप्त होते हैं। अत: साधक के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह लोक-आराधक बनें, सेवाभावी बनें। विभिन्न दुर्गुणों का त्याग करने पर ही सेवाव्रत का पालन किया जा सकता है। स्वार्थ को छोड़े बिना सेवा का कार्य नहीं हो सकता। जिन्हें अपने इन्द्रिय सुखों की चिंता रहती है, वे व्यक्ति सेवा-कार्य में कभी भी सफल नहीं हो सकते। सेवाव्रती का हृदय करुणा और दया से ओत-प्रोत होता है। वह विषयों के प्रति आसक्त नहीं रहता। वह सब भोगों से निवृत्त रहता है। त्याग के कारण उसमें गुण-ग्राहयता बढ़ती जाती है। दीन-दु:खियों की सेवा, निर्बलों की रक्षा और रोगियों की सहायता ही सेवा का मुख्य लक्ष्य है। सेवाव्रती साधक किसी की हानि नहीं करता, किसी का निरादर नहीं करता। वह निरभिमानी, विनयी और त्यागी होता है। उसका अंत:करण पवित्र होने से मन की चंचलता भी नष्ट हो जाती है। मन शुद्ध हो तो अपने-पराये में भेद नहीं रहता। जब वस्तुओं का लोभ नष्ट हो जाता है, तब 'सत्' को अपनाना और 'शुद्ध संकल्पों' में लीन रहना साधक के अभ्यास में आ जाता है। उसमें कर्त्तव्य परायणता का उदय होता है और विषमता मिट जाती है। भेदभाव दूर होकर परम तत्व के अस्तित्व का बोध होता है। अहम् का शोधन होने पर मान-अपमान की चिंता नहीं रहती, असत्य से मोह मिट जाता है। अनित्य वस्तुओं के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो जाती है और राग-द्वेष, तेरा-मेरा का झंझट समाप्त हो जाता है। जीवन में निर्विकल्पता का आविर्भाव हो जाता है। सेवा द्वारा सुखों के उपभोग की आसक्ति समाप्त हो जाती है। अत: सब प्राणियों में परमात्मा को स्थित मानते हुए निष्काम सेवा करना ही परमात्मा की सच्ची उपासना है। सच्ची सेवा वह है जो संसार के आसक्ति पूर्ण संबंधों को समाप्त कर देती है। इसलिए केवल किसी को अपना मानकर सेवा न करें, बल्कि सेवा को कर्त्तव्य मानकर सभी की सेवा करें; क्योंकि परमात्मा के अंशभूत होने के कारण सभी प्राणियों को अपना समझना ही सद्बुद्धि है ...। 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩☀!! श्री हरि: शरणम् !! ☀ 🍃🎋🍃🎋🕉️🎋🍃🎋🍃 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

+74 प्रतिक्रिया 12 कॉमेंट्स • 53 शेयर
Manoj manu Aug 9, 2020

🚩🙏🌹ऊँ सूर्या:नमः राधे राधे जी 🌿🌹🙏 आप सभी को हलसष्टि वृत की हार्दिक शुभकामनाएँ :-- कैसे दें सूर्य भगवान को अर्घ आईये जानते हैं :- विधि,मंत्र एवं महत्व :- 🌹🌹भगवान सूर्य के अर्घ्यदान की विशेष महत्ता है। प्रतिदिन प्रात:काल रक्त चंदनादि से युक्त लाल पुष्प, चावल आदि ताम्रमय पात्र (तांबे के पात्र में) जल भरकर प्रसन्न मन से सूर्य मंत्र का जाप करते हुए भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर पुष्पांजलि देनी चाहिए। इस अर्घ्यदान से भगवान सूर्य भगवान प्रसन्न होकर आयु, आरोग्य, धन, धान्य, पुत्र, मित्र, तेज, वीर्य, यश, कान्ति, विद्या, वैभव और सौभाग्य को प्रदान करते हैं तथा सूर्य लोक की प्राप्ति होती है। इस तरह करें दिन की शुरुआत :- - सबसे पहले अलसुबह सूर्योदय में उठें। फिर स्नान करें। - नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल भी डालें। और साफ वस्त्र धारण करें। - इसके बाद सूर्यदेव के सामने आसन बिछाएं। - आसन पर खड़े होकर तांबे के बर्तन में पवित्र जल भरें। - उस जल में थोड़ी सी मिश्री भी मिलाएं। मान्यता है कि सूर्य को मीठा जल चढ़ाने से जन्मकुंडली के मंगल दोष दूर होते हैं। - जब सूर्य से नारंगी किरणें निकली रही हों यानी सूर्योदय के समय दोनों हाथों से तांबे के लोटे से जल ऐसे चढ़ाएं कि सूर्य जल की धारा में दिखाई दे। - जल चढ़ाते समय सूर्य मंत्र भी बोलना चाहिए। 1. सूर्य अघ्र्य मंत्र :- "ऊँ ऐही सूर्यदेव सहस्त्रांशो तेजो राशि जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहणाध्र्य दिवाकर:।।" ऊँ सूर्याय नम:, ऊँ आदित्याय नम:, ऊँ नमो भास्कराय नम:।अघ्र्य समर्पयामि।। 2. सूर्य ध्यान मंत्र :- "ध्येय सदा सविष्तृ मंडल मध्यवर्ती। नारायण: सर सिंजासन सन्नि: विष्ठ:।।" केयूरवान्मकर कुंडलवान किरीटी। हारी हिरण्यमय वपुधृत शंख चक्र।। जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाधुतिम। तमोहरि सर्वपापध्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम।। सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं योन तन्द्रयते। इसके साथ ही :- गायत्री मंत्र - "ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। " सूर्य को अर्घ्य देते समय इस मंत्र का जाप करने से मन शांत होता है और एकाग्रता बढ़ती है। मंत्र जाप कम से कम 108 बार करना चाहिए।और सूर्य देव को प्रणाम करना चाहिए, 🌿🌿🌹🌹भगवान सूर्य नारायण सदा कल्याण करें सदा मंगल प्रदान करें राधे राधे जी 🌹🌹🌿🌿🙏

+56 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 1 शेयर
Devendra Tiwari Aug 9, 2020

+11 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Ajit sinh Parmar Aug 9, 2020

+18 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 1 शेयर

+75 प्रतिक्रिया 31 कॉमेंट्स • 35 शेयर
dinesh patidar Aug 9, 2020

+24 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Umesh Sharma Aug 9, 2020

+23 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 8 शेयर
simran Aug 9, 2020

+322 प्रतिक्रिया 73 कॉमेंट्स • 779 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB