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Purvin kumar
Purvin kumar May 24, 2019

🌹 सुविचार 🌹

🌹 सुविचार 🌹

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कामेंट्स

Dhiraj May 25, 2019
સુભ વીચાર

Amar Jeet Mishra Jun 24, 2019

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Amar Jeet Mishra Jun 24, 2019

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Narendra Singh Rao Jun 24, 2019

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दया धर्म का मूल हैं, पाप मूल अभिमान,,, तुलसी दया ना छोडि़ये, जब लग घट में प्राण,, दर्द की भाषा कोलकाता में मुस्लिम महिला सम्मेलन का वार्षिक अधिवेशन था। सरोजिनी नायडू इसकी मुख्य अतिथि थीं। भाषण देने वालों में कोई बांग्ला में तो कोई ऊर्दू में। उनके पास बैठी महिलाओं में भी किसी ने बांग्ला की वकालत की तो किसी ने ऊर्दू की।  इसी बीच एक स्वयंसेविका ने आकर किसी महिला से कहा, आपके घर से फोन आया है कि आपकी बच्ची बहुत रो रही है। किसी भी तरह चुप नहीं हो रही है।  किसी भी तरह चुप नहीं हो रही। सरोजिनी नायडू ने सेविका से बहुत गंभीरता से कहा, बहन जरा फोन पर यह तो पूछ लो कि बच्ची ऊर्दु में रही है या बांग्ला में। उनकी बात सुन कर भाषाओं पर बहस कर रहीं महिलाओं का चेहरा शर्म से झुक गया। उन्होंने कहा कि कभी आपने दर्द की भाषा सुनी होती तो जानतीं।  संक्षेप में  सच है कि संवेदना और दर्द की भाषा एक ही होती है। वह न तो बांग्ला में होती है और न ही ऊर्दू में, न हिंदी में और न ही अंग्रेजी में। इसलिए भाषा और संवेदनाओं को कभी भी दरकिनार नहीं करना चाहिए,,,, किसी भी मार्मिक दृश्य को देखकर आपके अंदर वेचैनी नहीं हुई तो आपके मनुष्य होने का क्या अर्थ,,, हर हर महादेव जय शिव शंकर

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