*जय श्री विश्वकर्मा जी की* श्री विश्वकर्मा वंशावली

*जय श्री विश्वकर्मा जी की* श्री विश्वकर्मा वंशावली

*शुभ रात्रि*
*जय श्री विश्वकर्मा जी की*


श्री विश्वकर्मा वंशावली

जैसे राम् कृष्णा आदि ईश्वर के अनेक अवतार पुराणों में वर्णन किये गये है, वैसे ही विश्वकर्मा भगवान के अवतारों का वर्णन मिलता है। स्कन्द पुराण के काशी खंड में महादेव जी ने पार्वती जी से कहा है कि हे पार्वती मैं आप से पाप नाशक कथा कहता हूं। इसी कथा में महादेव जी ने पार्वती जी को विश्वकर्मेश्वर लिगं प्रकट होने की कथा कहते हुए त्वष्टा प्रजापति के पुत्र के संबंध में कहाः

प्रथम अवतार

विश्वकर्माSभवत्पूर्व ब्रह्मण स्त्वपराSतनुः । त्वष्ट्रः प्रजापतेः पुत्रो निपुणः सर्व कर्मस ।।

अर्थः प्रत्यक्ष आदि ब्रह्मा विश्वकर्मा त्वष्टा प्रजापति का पुत्र पहले उत्पन्न हुआ और वह सब कामों मे निपुण था।

दूसरा अवतार

स्कन्द पुराण प्रभास खंड सोमनाथ माहात्म्य सोम पुत्र संवाद में विश्वकर्मा के दूसरे अवतार का वर्णन इस भातिं मिलता है। ईश्वर उचावः

शिल्पोत्पत्तिं प्रवक्ष्यामि श्रृणु षण्मुख यत्नतः । विश्वकर्माSभवत्पूर्व शिल्पिनां शिव कर्मणाम् ।।
मदंगेषु च सभूंताः पुत्रा पंच जटाधराः । हस्त कौशल संपूर्णाः पंच ब्रह्मरताः सदा ।।

एक समय कैलाश पर्वत पर शिवजी, पार्वती, गणपति आदि सब बैठे थे उस समय स्कन्दजी ने गणपतिजी के रत्नजडित दातों और पार्वती जी के जवाहरात से जडें हुए जेवरों को देखकर प्रश्न किया कि, हे पार्वतीनाथ, आप यह बताने की कृपा करे कि ये हीरे जवाहरात चमकिले पदार्थो किसने निर्मित किये? इसके उत्तर में भोलानाथ शंकर ने कहा कि शिल्पियों के अधिपति श्री विश्वकर्मा की उत्पति सुनो। शिल्प के प्रवर्त्तक विश्वकर्मा पांच मुखों से पांच जटाधरी पुत्र उत्पन्न हुए जिन के नाम मनु, मय, शिल्प,त्वष्टा, दैवेज्ञ थे। यह पांचों पुत्र ब्रह्मा की उपासना में सदा लगें रहतें थे इत्यादि।

तीसरा अवतार

आर्दव वसु प्रभास नामक को अंगिरा की पुत्री बृहस्पति जी की बहिन योगसिद्ध विवाही गई और अष्टम वसु प्रभाव से जो पुत्र उत्पन्न हुआ उसका नाम विश्वकर्मा हुआ जो शिल्प प्रजापति कहलाया इसका वर्णन वायुपुराण अ.22 उत्तर भाग में दिया हैः

बृहस्पतेस्तु भगिनो वरस्त्री ब्रह्मचारिणी । योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता चरते सदा ।।
प्रभासस्य तु सा भार्या वसु नामष्ट मस्य तु । विश्वकर्मा सुत स्तस्यां जातः शिल्प प्रजापतिः ।।

मत्स्य पुराण अ.5 में भी लिखा हैः

विश्वकर्मा प्रभासस्य पुत्रः शिल्प प्रजापतिः । प्रसाद भवनोद्यान प्रतिमा भूषणादिषु । तडागा राम कूप्रेषु स्मृतः सोमSवर्धकी ।।

अर्थः प्रभास का पुत्र शिल्प प्रजापति विश्वकर्मा देव, मन्दिर, भवन, देवमूर्ति, जेवर, तालाब, बावडी और कुएं निर्माण करने देव आचार्य थे।

आदित्य पुराण में भी कहा है किः

विश्वकर्मा प्रभासस्य धर्मस्थः पातु स ततः ।।

महाभारत आदि पर्व विष्णु पुराण औरं भागवत में भी इसका उल्लेख किया गया है।



विश्वकर्मा ऋषि

विश्वकर्मा नाम के ऋषि भी हुए है। विद्वानों को इसका पूरा पता है कि ऋग्वेद में विश्वकर्मा सूक्त दिया हुआ है, और इस सूक्त में 14 ऋचायें है इस सूक्त का देवता विश्वकर्मा है और मंत्र दृष्टा ऋषि विश्वकर्मा है। विश्वकर्मा सूक्त 14 उल्लेख इसी ग्रन्थ विश्वकर्मा-विजय प्रकाश में दिया है। 14 सूक्त मंत्र और अर्थ भावार्थ सब लिखे दिये है। पाठक इसी पुस्तक में देखे लेंवे। य़इमा विश्वा भुवनानि इत्यादि से सूक्त प्रारम्भ होता है यजुर्वेद 4/3/4/3 विश्वकर्मा ते ऋषि इस प्रमाण से विश्वकर्मा को होना सिद्ध है इत्यादि। पाठकगण। वेदों और पुराणों के अनेक प्रमाणों से हम विश्वकर्मा को परमात्मा परमपिता जगतपिर्त्ता, सृष्टि कर चुके तथा विश्वकर्मा के अवतारों को भी पुराणों से बता चुके है। अब भी कोई हटधमीं करें तो हमारे पास उनका इलाज करने का तरीका भी है। इन टकापन्थी भोजन भट्टों ने बहुत धूर्तता की है। विश्वकर्मा देव की अवेहलना करने से ही इस समय ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि कष्टमय जीवन व्यतीत कर रहे है। न इनके पास खुद की उत्पत्ति है यह टकशाली ब्राह्मण यह देख पद्म पुराण के वचनों पर तनिक ध्यान नहीं देते, देखों कितना साफ कहा है। अर्थ विष्णु और विश्वकर्मा में कोई भेद नही।

विश्वकर्मा अनेक नामों से विभूषित

जगतकर्ता विश्वकर्मा भौवन विश्वकर्मा, ऋषि विश्वकर्मा धर्म ग्रंन्थों में अनेक अवतरण आये है। विषय अनेकानेक नामॆ में बटा हुआ है विश्वकर्मा ब्राह्मण कर्म है, अर्थात विश्वकर्मा सन्तान कहने का दावा करने वाले तथा अपने को पांचाल शिल्पी ब्राह्मण बताने वाले खरे ब्राह्मण है। यहां हम धर्मग्रन्थों के प्रमामों को देकर अन्त में ग्रथों के आधार पर भृगु, अंगिरा, मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवेज्ञ आदि की वंशावली भी सप्रमाण दिखायेंगे।

प्राचीन धर्म शास्त्रों में

शिल्पज्ञ, विश्वकर्मा ब्राह्मणों को रथकार वर्धकी, एतब कवि, मोयावी, पाँचाल, रथपति, सुहस्त सौर और परासर आदि शब्दों में सम्बोधित किया गया था। उस समय आजकल के सामान लोहाकारों, काष्ठकारों और स्वर्णकारों आदि सभी के अलग-अलग सहस्त्रों जाति भेद नहीं थे। प्राचीन समय में शिल्प कर्म बहुत उंचा समझा जाता था, क्योंकि धर्मग्रंथों की खोज में हमें पता चलता है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों ही वर्ण रथ कर्म अर्थात शिल्प कर्म करतें थे। हम यहां विश्वकर्मा ब्राह्मणों के ब्राह्मणत्य विषयक कुछ प्रमाण देने से पूर्व यह उचित समझते है कि रथकार, पाचांल, नाराशस इत्यादि शब्दों के विषय में कुछ थोडा समजझा दें। जिससे आगे को जो धर्म शास्त्रों के प्रमाण हम दिखायेंगे उनमें जब इन शब्दों में से कोई आवे तो हमारे पाठकों को समझने में कठिनाई न पडें।



रथकार

यह शब्द प्राचीन धर्मग्रन्थों में अनेक स्थलों पर आया है, और उनकें शिल्पी ब्राह्मण के स्थान में प्रयोग हुआ है। अर्थात लोककार, काष्टकार, स्वर्णकार, सिलावट और ताम्रकार सब ही काम करने वाले कुशल प्रवीण शिल्पी ब्राह्मण का बोध केवल रथकार शब्द से ही कराया गया है, और यही शब्दों वेदों तथा पुराणों में भी शिल्पज्ञ ब्राह्मणों के लिए लिखा गया है। स्कन्द पुराण नागर खण्ड अध्याय 6 में रथकार शब्द का प्रयोग हुआ हैः

सद्योजाता दि पंचभ्यो मुखेभ्यः पंच निर्भये ।। विश्वकर्मा सुता होते रथ कारास्तु पचं च ।।
तास्मिन् काले महाभागो परमो मय रुप भाक् ।। पाषणदार कंटकं सौ वर्ण दशकं तदा ।।
काष्ठं च नव लोहानि रथ कृद्यों ददौ विभुः ।। रथ कारास्तदा चक्रुः पचं कृत्यानि सर्वदा ।।
षडदशनाद्य नुष्ठानं षट् कर्मनिरताश्च ये ।।

अर्थः शंकर बोले कि हे स्कंन्द, सद्योजात् वामदेव, तत्पुरूष, अधीर और ईशान यह पांच ब्रह्म सज्ञंक विश्वकर्मा के पांच मुखों से पैदा हुए। इन विश्वकर्मा पुत्रों की रथकार सज्ञां है। अनेक रूप धारण करने वाले उस विश्वकर्मा ने अपने पुत्रों को टांकी आदि दस शिल्प आयुध अर्थात दस औजार सोना आदि नौ धातु लोहा, लकडीं आत्यादि दिया। उसके यह षटेकर्म करने वाले रथकार सृष्टि कार्य के पंचनिध पवित्र कर्म करने लगे।

रथकार शब्द क ब्राह्मण सूचक होने के विषय में व्याकरण में भी अष्टाध्यायी पाणिनि सूत्र पाठ सूत्र - शिल्पिनि चा कुत्रः 6/2/76 सज्ञांयांच 6/2/77
सिद्धांत कौमुदी वृतिः- शिल्पि वाचिनि समासे अष्णते ।
परे पूर्व माद्युदात्तं, स चेदण कृत्रः परो न भवति ।
ततुंवायः शिल्पिनि किम- काडंलाव, अकृत्रः किं-कुम्भकारः ।
सज्ञां यांच अणयते परे तंतुवायो नाम कृमिः ।
अकृत्रः इत्येव रथकारों नाम ब्राह्मणः पाणिनिसूत्र 4/1-151 कृर्वादिभ्योण्यः ।

ब्राह्मण जाति सूचक अर्थ को बताने वाले जो गोत्र शब्द गण सूत्र में दियें है, वह यह हैः कुरू, गर्ग, मगुंष, अजमार, ऱथकार, बाबदूक, कवि, मति, काधिजल इत्यादि, कौरव्यां, ब्राह्मणा, मार्ग्य, मांगुयाः आजमार्याः राथकार्याः वावद्क्याः कात्या मात्याः कापिजल्याः ब्राह्मणाः इति सर्वत्र।

तात्पर्य यह है कि व्याकरण शास्त्र में भी रथकार शब्द को आर्य गोत्र, ब्राह्मण जाति बोधक सिद्ध किया हुआ है और उसका उदाहरण भी रथकारों नाम ब्राह्मण दिया है। जिससे सिद्ध किया गया है कि रथकार शब्द ब्राह्मण जाति बोधक है क्योकिं- रथं करोतिं इति रथकारः। अर्थात रथ निर्माण करने वाले ब्राह्मण का बोध प्राचीन ग्रथों में रथकार शब्द से होता है। यहां यह भी लिख देना जरूरी जान पडतां है कि स्मृतियों में रथकार एक संकीर्ण जाति को भी लिखा है, परन्तु जहां पवित्र देव शिल्प आदि का वर्णन आता है।वहां शिल्पी ब्राह्मण संतति रथकार का ही मतलब होता है। आपको रतकार विषय में शास्त्र के मन्त्र और रथकार का प्राचीन समय में जो मान, समान्न प्रतिष्ठा थी उस समय विश्वकर्मा का रथकार रूप विस्तृत था। राजे महाराजा सभी विश्वकर्मा रथकारों को आदर देते थे क्योंकि कलाकार राष्ट्रं के निर्माण करने मे अग्रसर रखतें थे यह ब्राह्मण वर्ग रथकारों में था।



पांचाल

रथकार शब्द के विषय के नमूने के तौर पर ऊपर उदाहरण देकर बता चुके है। अब इसी भातिं एक दो उदाहरण पांचाल शब्द के विषय में भी देकर बतावेंगे कि विश्वकर्मा ब्राह्मणों को प्राचीन धर्म ग्रन्थों में पांचाल भी कहा गया है। बराह पुराण में कहा हैः

पांचाल ब्राह्मणेति हासः कथं ।। तत्र सुवर्णालंकार वाणिज्यों प जीविनः पांचाल ब्राह्मणा ।।

शैवागम में कहा हैः

पंचालाना च सर्वेषामा चारोSप्य़थ गीयते । षट् कर्म विनिर्मित्यनी पचांलाना स्मुतानिच ।।

रूद्रयामल वास्तु तन्त्र में शिवाजी महाराज ने कहा किः

शिवा मनुमंय स्त्वष्टा तक्षा शिल्पी च पंचमः ।। विश्वकर्मसुता नेतान् विद्धि प्रवर्तकान् ।।
एतेषां पुत्र पौत्राणामप्येते शिल्पिनो भूवि ।। पंचालानां च सर्वेषां शाखास्याच्छौन कायनो ।।
पंचालास्ते सदा पूज्याः प्रतिमा विश्वकर्मणः ।। रूद्रवामल वास्तु तन्त्र व्रत्यादि ।।

उपरोक्त प्रमाणों में पाचांल शब्द का प्रयोग विश्वकर्माके स्थान में किया गया है। अर्थात् रथकार और पांचाल दोनों शब्द विश्वकर्मा ब्राह्मण बोधक ही है।

स्थापत्य

यज्ञ कर्म और देव कर्म संबंधी कर्म में कहीं कहीं विश्वकर्मा पाचांल ब्राह्मण की सज्ञां स्थापत्य भी कही गई है। जैसे भागवत स्कन्द 3 में स्थापत्य विश्वकर्म शास्त्र लिखा है, इसका यही अर्थ है कि यज्ञ सम्बधी और देव संबधी पवित्र शिल्प कर्म करने वाले विश्वकर्मा सन्तान ब्राह्मण है। इसकी पुष्टि अमर कोष के प्रमाण से भी होती है।

देखो - अमर कोष अ. ब्रह्मवर्ग - सगींष्प तोष्टय्या स्थपतिः

अर्थः बृहस्पति सज्ञंक इष्ट अर्थात् बृहस्पति सज्ञां वाले यह कर्म करने वाले बृहस्पति गुरू को कहते है और दूसरे बृहस्पति विश्व-कर्म कुलोत्पन्न शिल्पाचार्य हुए है।

नाराशंस

अंगिरा महर्षि को ऋग्वेद में नाराशंस कहा है इसका प्रमाण ऋग्वेद अ. 8/2/1 मे देखो - नराः अगिंरसः महर्षयः मनुष्य जाता वुत्पन्नत्वात् ते शंस्यते इति नाराशंसः।

बौधायन श्रौत् सूत्र के महा प्रवराध्याय में भी लिखा है - वसिष्ट शुनिकात्रि भृगु कण्व वाघ्रश्चाधूल राजन्य वैश्य इति नाराशंसः ।।

गोत्र प्रवर दर्पण में भी यह शब्द पाया जाता है - भृगु गणे त्वष्टयाः अग्ने नाराशंसान् व्याख्या स्यामः। वशिष्ठ शुनकात्रिभृगु काण्व बाघ्रश्चाधूल इति ।।

नाराशंस शब्द पितर सज्ञां में भी प्रयुक्त हुआ है। देखो ऋग्देव अध्याय 8/1/16/3 - मनोन्वा हुवामुहे नाराशंसेन सोमेने ।।

भाष्य - नरेः शस्यते इति नाराशंसः पितरः ।।

आश्वलायन श्रौत सूत्र में भी नाराशंस का प्रयोग मिलता है। देखो सूत्र 5/6/30 - आप्यायिताश्चिमतान् सादयंति ते नाराशंस भवति ।।

उपरोक्त अनेक प्रमाण हमने रथकार पांचाल, रथापत्य और नाराशंस शब्दों के प्रयोग को जिखाकर यह सिद्ध किया हा कि यह सब जहां कही भी धर्म ग्रन्थों में भी लिखे गये है। वहा वह शिल्पी ब्राह्मणों के बोधक है। अब आगे हम यह सिद्ध करके दिखोयेगें कि विश्वकर्मा वंश के ब्राह्मण होने के और भी अनेक प्रमाण सनातनी धर्म ग्रन्थों मे खोजने से मिले सकते है। उपरोक्त ऱथकार, पांचाल, रथकार, नाराशंस यह सब स्तंभ प्रमाण सग्रंह अर्थात विश्वकर्म - ब्राह्मण - भास्कर से संग्रहीत किए है। यह पुस्कत स्वः जयकृष्ण मणिठिया, शर्मा, गुरूदेव की सग्रंहीत है जिसे विश्वकर्मा-विजय-प्रकाश में कई स्तम्भ संग्रहीत कर प्रकाशित किये है।



भृगु ऋषि कुल

वायु पुराण अध्याय 4 के पढने से यह बात सिद्ध हो जाती है कि वास्तव में विश्वकर्मा सन्तान भृगु ऋषि कुल उत्पन्न है देखों लिखा हैः

भार्ये भृगोर प्रतिमे उत्तमेSभिजाते शुभे ।। हिरण्य कशिपोः कन्या दिव्यनाम्नी परिश्रुता ।।
पुलोम्नश्चापि पौलोमि दुहिता वर वर्णिनी ।। भृगोस्त्वजनयद्विव्या काव्यवेदविंदा वरं ।।
देवा सुराणामाचार्य शुक्रं कविसुंत ग्रहं ।। पितृंणा मानसी कन्या सोमपाना य़शस्विनी ।।
शुक्रस्य भार्यागीराम विजये चतुरः सुतान् ।। ब्राह्मणे मानसी कन्या सोमपाना यशस्विनीः ।।
तस्या मेव तु चत्वार पुत्राः शुक्रस्य जज्ञिर ।। त्वष्टावरूपी द्वावेतौ शण्डामर्कोतु ताबुभो ।।
ते तदादित्य सकाया ब्रह्मकल्पा प्रभावतः ।।

अर्थः हिरण्यकश्यप की बेटी दिव्या और पुलोमी की बेटी पौलीमी उत्तम कुलीन, यह दोनों मृग ऋषि को विवाही गई। दिव्या नाम वाली स्त्री के गर्भ से शुक्राचार्य पैदा हुए। सोम्य पितरों की मानसी कन्या अगीं नाम वाली शुक्राचार्य को विवाही गई। शुक्राचार्य जी के सूर्य के समान ब्रह्म तेज वाले त्वष्टा, वस्त्र, शंड और अर्मक यह पुत्र पैदा हुए, इन चारो मे त्वष्टा ब्रह्म तेज से विशेष सुक्त था । अर्थात त्वष्टा में ब्रह्म तेज अधिक था। पाठक गण इससे स्पष्ट है कि त्वष्टा भृगु कुल मे पैदा हुआ और ब्राह्मण था, ब्राह्म तेज की विशे,ता ब्राह्मणत्व को साफ बता रही है। अब इसी कुल में त्वष्टा से विश्वकर्मा का जन्म सुनों।

त्रिशिरा विश्वरूपस्तु त्वष्टाः पुत्राय भवताम् ।। विस्वरूपानुजश्चापि विश्वकर्मा प्रजापतिः ।।

अर्थः त्वष्टा प्रजापति के त्रिशिरा जिसका नाम विश्वरूप था बडा पराक्रमी औऱ उसका भाई विस्वकर्मा प्रपति यह दो पुत्र इसी विश्वकर्मा प्रजपति के विषय में स्कन्द पुराण रे प्रभास खंड में यह लिखा है।

विश्वकर्म महदभूतं विश्वकर्माणाम् मदंगेषु च सम्भूताः ।। पुत्रा पचं जटाधराः हस्त कौशल सम्पूर्णाः पंच ब्रह्मरताः सदा ।।

अर्थः शिल्पियों में विश्वकर्मा बडा महान हुआ, जिसके पांच जटाधारी पुत्र हुए। इन्ही विश्वकर्मा के पांच पुत्र मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी और दैवज्ञ का वायु पुराण अध्याय, 4 में उल्लेख किया हुआ है इन्हीं पाचं पुत्रों की सतांन जो हुई वह सब भृगु कुलोत्पन्न विश्व-ब्राह्मण या पांचाल ब्राह्मण कहलाई।

पाठकगण ध्यान दें कि उपरोक्त विदित वंश बिलकुल साफ-सुथरा और खरा है। इसमें कोई अण्ड-बण्ड ऐसी उत्पत्ति नहीं है। जैसा कि इस पुस्तक की भूमिका में हम अकसाली ब्राह्मणों की उत्पत्ति जाति भास्कर और ब्राह्मणोंत्पत्ति मार्तण्ड के अधार पर दिखा चुके है। पाठको की जानकारी के लिए हम यहां भृगु कुल में उत्पन्न हुए सब ही ऋषियों का उत्पत्ति क्रमानुसार दिखाते है।

इस कुल में भृगु, च्यवन, दिवोदास और गृत्समद और शौनक यह वेद मत्रं के द्रष्टा हुए है।

भृगुः ब्रह्मदेव का मानस पुत्र क् शाप से मर गये तब ब्रह्मदेव ने उनको फिर उत्पन्न किया और वह वरूण के यज्ञ में अग्नि से उत्पन्न हुए और वरूण ने इनको अपना पुत्र ग्रहण किया। इसी कारण यह वारूणी भृगु के नाम से प्रसिद्ध हुए। विशेष जिसे देखना हो वायुपुत्र अ. 4 मत्स्य पुराण अ.252 महाभारत अनुशासन पर्व अ.85 निरूक्त दैवज्ञ कांड भाग पृ. 193 औऱ भारत वर्षीय प्राचीन ऐतिहासिक कोष में देख सकतें है।

भार्गवः भृगु ऋषि के पुत्र सुक्राचार्य का ही नाम भार्गव है।यह देवों और दत्यों के दोनों के ही पुरोहित अर्तात् आचार्य थे। इन्होंने शिल्प शास्त्र का ओशनस नामक ग्रंथ भी लिखा है। वायु पुराण और बृहत्संहिता अ.50 में विशेष रूप से देख सकतें हैं।

त्वष्टाः शुक्राचार्य के चार पुत्रों में सें थे। इनमें अधिक ब्रह्मतेज था। विश्वरूप और विश्वकर्माइनके दो पुत्र थे।

शौनकः यह शुनक ऋषि के पुत्र और ऋग्वेद के द्रष्टा ऋषि थे। पांचालो की शौन कायनी शाखा इन्हीं से चली है।

उपरोक्त सब ही ऋषि शिल्प कार्य करते थे। गोत्र प्रवर दीपिका में इस भृगु कुल के गोत्र प्रवर इस प्रकार दिये है।

भृगु ऋषि - भार्गव, च्यवन,, देवो दासेति।

वाध्न्यस्वा - भार्गव, वाध्न्यश्वा, देवो दासेति।

भार्गव - भार्गव, त्वष्टा, विश्वरूपेति।

वाधूल - भार्गव, वैतहव्य,सावेतसेति।

शुनक - शौनक, भार्गव, शौन हौत्र गार्त्समदप्ति।

किसी किसी ग्रन्थकार जैसे बोधयन नामक सूत्रकार ने वरिष्ठ शुनक अत्रि, भृगु, कण्व, वाध्न्यश्वा, वाधूल,यह गोत्र बी नाराशंस पांचालों के आर्षेय गोत्र लिखे है।



केवल आंगिरस कुल के प्रसिद्ध ऋषि

उपरोक्त अगिंरा वशांवली दी गई है, यह प्रमाण-सग्रंह से उधृत है। अगिंरा ऋषि ब्रह्मा, के मुख से उत्पन्न हुय़े। इनका वर्णन वेद, ब्राह्मण ग्रथं, श्रुति, स्मृति, रामायण, महाभारत और सभी पुराणों में उल्लेख है। अगिंरा कुल परम श्रेष्ठ कुल है।

अंगिरा

अंगिरा ऋषि के विषय में मत्स्य पुराण, भागवत, वायु पुराण महाभारत और भारतवर्षीय प्राचीन ऐतिहासिक कोष में वर्णन किया गया है। मत्स्य पुराण में अंगिरा ऋषि की उत्पत्ति अग्नि से कही गई है। भागवत का कथन है कि अंगिरा जी ब्रह्मा के मुख से यज्ञ हेतु उत्पन्न हुए। महाभारत अनु पर्व अध्याय 83 में कहा गया है कि अग्नि से महा यशस्वी अंगिरा भृगु आदि प्रजापति ब्रह्मदेव है। ऋग्वेद 10-14-6 मे कहा है किः

अमगिरासों नः पितरो नवग्वा अर्थर्वाणो भृगबः सोम्यासः। तेषां वयं सुभतौं यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसः स्यामः।।

अर्थः जिसके कुल में भरद्वाज, गौतम और अनेक महापुरूष उत्पन्न हुए ऐसे जो अग्नि के पुत्र महर्षि अंगिरा बडे भारी विद्वान हुए है उनके वशं को सुनों। अंगिरस देव धनुष और बाण धारी थे, उनको ऋषि मारीच की बेटी सुरूपा व कर्दम ऋषि की बेटी स्वराट् और मनु ऋषि कन्या पथ्या यह तीनों विवाही गई। सुरूमा के गर्भ से बृहस्पति, स्वराट् से गौतम, प्रबंध, वामदेव उतथ्य और उशिर यह पांछ पुत्र जन्में, पथ्या के गर्भ से विष्णु संवर्त, विचित, अयास्य असिज, दीर्घतमा, सुधन्वा यह सात पुत्र उत्पन्न हुए। उतथ्य ऋषि से शरद्वान, वामदेव से बृहदुकथ्य उत्पन्न हुए। महर्षि सुधन्वा के ऋषि विभ्मा और बाज यह तीन पुत्र हुए। यह ऋषि पुत्र हुए। महर्षि सुधन्वा के ऋषि विभ्मा और बाज यह तीन पुत्र हुए। यह ऋषि पुत्र ऱथकार में बडें कुशल देवता थे, तो भी इनकी गणना ऋषियों में की गई है। बृहस्पति का पुत्र महा य़शस्वी भरद्वाज हुआ, यह सब अंगिरा भृगु आदि द्व शिल्प के निर्माण वाले रथकार नाम से प्रसिद्ध हुए। इसमे स्पष्ट सिद्ध हो गया की प्राचीन काल में शिल्पी ब्राह्मणों रथकार भी कहा करते थे और रथकार शब्द ब्राह्मण जाति बोधक है,इस विषय में हम पूर्व पर रथकार शब्द को व्याकरण की कसौटि पर कसकर ब्राह्मण बोधक सिद्ध कर चुके है।

महाभारत अमुसाशन पर्व अध्याय पर्व अध्याय 83 में अंगिरा ऋषि के आठ पुत्रों की आग्नेय सज्ञां होने के विषय में यह उल्लेख हैः

अष्टौ चांगिरसः पुत्राः आग्नेयास्तेSप्युवाह्रताः। बृहस्पतिरूतथ्यश्य पयस्यः शांतिरेवच। धोरो विरूपः संर्वतः सुधन्वा चाष्टमः स्मृतः।

✍ आपका *धर्मेन्द्र सुथार*

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Rameshchandra Padhiar Sep 17, 2017
अच्छी और शास्त्रोंके संदर्भके साथ जानकारी हैं। धन्यवाद।

Neha Sharma, Haryana Jan 27, 2020

*जय श्री राधेकृष्णा*🥀🥀🙏 *शुभ प्रभात् वंदन*🥀🥀🙏 *स्नान कब और कैसे करें घर की समृद्धि बढ़ाना हमारे हाथ में है। सुबह के स्नान को धर्म शास्त्र में चार उपनाम दिए हैं। *1* *मुनि स्नान।* जो सुबह 4 से 5 के बीच किया जाता है। . *2* *देव स्नान।* जो सुबह 5 से 6 के बीच किया जाता है। . *3* *मानव स्नान।* जो सुबह 6 से 8 के बीच किया जाता है। . *4* *राक्षसी स्नान।* जो सुबह 8 के बाद किया जाता है। ▶मुनि स्नान सर्वोत्तम है। ▶देव स्नान उत्तम है। ▶मानव स्नान सामान्य है। ▶राक्षसी स्नान धर्म में निषेध है। . किसी भी मानव को 8 बजे के बाद स्नान नहीं करना चाहिए। . *मुनि स्नान .......* 👉घर में सुख ,शांति ,समृद्धि, विद्या , बल , आरोग्य , चेतना , प्रदान करता है। . *देव स्नान ......* 👉 आप के जीवन में यश , कीर्ती , धन, वैभव, सुख ,शान्ति, संतोष , प्रदान करता है। . *मानव स्नान.....* 👉काम में सफलता ,भाग्य, अच्छे कर्मों की सूझ, परिवार में एकता, मंगलमय , प्रदान करता है। . *राक्षसी स्नान.....* 👉 दरिद्रता , हानि , क्लेश ,धन हानि, परेशानी, प्रदान करता है । . किसी भी मनुष्य को 8 के बाद स्नान नहीं करना चाहिए। . पुराने जमाने में इसी लिए सभी सूरज निकलने से पहले स्नान करते थे। *खास कर जो घर की स्त्री होती थी।* चाहे वो स्त्री माँ के रूप में हो, पत्नी के रूप में हो, बहन के रूप में हो। . घर के बड़े बुजुर्ग यही समझाते सूरज के निकलने से पहले ही स्नान हो जाना चाहिए। . *ऐसा करने से धन, वैभव लक्ष्मी, आप के घर में सदैव वास करती है।* . उस समय...... एक मात्र व्यक्ति की कमाई से पूरा हरा भरा परिवार पल जाता था, और आज मात्र पारिवार में चार सदस्य भी कमाते हैं तो भी पूरा नहीं होता। . उस की वजह हम खुद ही हैं। पुराने नियमों को तोड़ कर अपनी सुख सुविधा के लिए हमने नए नियम बनाए हैं। . प्रकृति ......का नियम है, जो भी उस के नियमों का पालन नहीं करता, उस का दुष्परिणाम सब को मिलता है। . इसलिए अपने जीवन में कुछ नियमों को अपनायें और उन का पालन भी करें । . आप का भला हो, आपके अपनों का भला हो। . मनुष्य अवतार बार बार नहीं मिलता। . अपने जीवन को सुखमय बनायें। जीवन जीने के कुछ जरूरी नियम बनायें। ☝ *याद रखियेगा !* 👇 *संस्कार दिये बिना सुविधायें देना, पतन का कारण है।* *सुविधाएं अगर आप ने बच्चों को नहीं दिए तो हो सकता है वह थोड़ी देर के लिए रोएं।* *पर संस्कार नहीं दिए तो वे जिंदगी भर रोएंगे।* मृत्यु उपरांत एक सवाल ये भी पूछा जायेगा कि अपनी अँगुलियों के नाम बताओ । जवाब:- अपने हाथ की छोटी उँगली से शुरू करें :- (1)जल (2) पथ्वी (3)आकाश (4)वायु (5) अग्नि ये वो बातें हैं जो बहुत कम लोगों को मालूम होंगी । 5 जगह हँसना करोड़ों पाप के बराबर है 1. श्मशान में 2. अर्थी के पीछे 3. शोक में 4. मन्दिर में 5. कथा में सिर्फ 1 बार ये message भेजो बहुत लोग इन पापों से बचेंगे ।। अकेले हो? परमात्मा को याद करो । परेशान हो? ग्रँथ पढ़ो । उदास हो? कथाएं पढ़ो। टेन्शन में हो? भगवत् गीता पढ़ो । फ्री हो? अच्छी चीजें करो हे परमात्मा हम पर और समस्त प्राणियों पर कृपा करो...... *सूचना* क्या आप जानते हैं ? हिन्दू ग्रंथ रामायण, गीता, आदि को सुनने,पढ़ने से कैन्सर नहीं होता है बल्कि कैन्सर अगर हो तो वो भी खत्म हो जाता है। व्रत,उपवास करने से तेज बढ़ता है, सरदर्द और बाल गिरने से बचाव होता है । आरती----के दौरान ताली बजाने से दिल मजबूत होता है । ये मैसेज असुर भेजने से रोकेगा मगर आप ऐसा नहीं होने दें और मैसेज सब नम्बरों को भेजें । श्रीमद् भगवद्गीता, भागवत्पुराण और रामायण का नित्य पाठ करें। . ''कैन्सर" एक खतरनाक बीमारी है... बहुत से लोग इसको खुद दावत देते हैं ... बहुत मामूली इलाज करके इस बीमारी से काफी हद तक बचा जा सकता है ... अक्सर लोग खाना खाने के बाद "पानी" पी लेते हैं ... खाना खाने के बाद "पानी" ख़ून में मौजूद "कैन्सर "का अणु बनाने वाले '''सैल्स'''को '''आक्सीजन''' पैदा करता है... ''हिन्दु ग्रंथों में बताया गया है कि... खाने से पहले 'पानी' पीना अमृत" है... खाने के बीच मे 'पानी' पीना शरीर की 'पूजा' है ... खाना खत्म होने से पहले 'पानी' पीना "औषधि'' है... खाने के बाद 'पानी' पीना बीमारियों का घर है... बेहतर है खाना खत्म होने के कुछ देर बाद 'पानी' पीयें ... ये बात उनको भी बतायें जो आपको 'जान' से भी ज्यादा प्यारे हैं ... हरि हरि जय जय श्री हरि !!! रोज एक सेब नो डाक्टर । रोज पांच बादाम, नो कैन्सर । रोज एक निंबू, नो पेट बढ़ना । रोज एक गिलास दूध, नो बौना (कद का छोटा)। रोज 12 गिलास पानी, नो चेहरे की समस्या । रोज चार काजू, नो भूख । रोज मन्दिर जाओ, नो टेन्शन । रोज कथा सुनो मन को शान्ति मिलेगी । "चेहरे के लिए ताजा पानी"। "मन के लिए गीता की बातें"। "सेहत के लिए योग"। और खुश रहने के लिए परमात्मा को याद किया करो । अच्छी बातें फैलाना पुण्य का कार्य है....किस्मत में करोड़ों खुशियाँ लिख दी जाती हैं । जीवन के अंतिम दिनों में इन्सान एक एक पुण्य के लिए तरसेगा ।

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Mahesh Bhargava Jan 26, 2020

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My Mandir Jan 25, 2020

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Neha Sharma, Haryana Jan 24, 2020

जय माता दी शुभ प्रभात वंदन *ईश्वर का न्याय* एक बार दो आदमी एक मंदिर के पास बैठे गपशप कर रहे थे। वहां अंधेरा छा रहा था और बादल मंडरा रहे थे। थोड़ी देर में वहां एक आदमी आया और वो भी उन दोनों के साथ बैठकर गपशप करने लगा। कुछ देर बाद वो आदमी बोला उसे बहुत भूख लग रही है, उन दोनों को भी भूख लगने लगी थी। पहला आदमी बोला मेरे पास 3 रोटी हैं, दूसरा बोला मेरे पास 5 रोटी हैं, हम तीनों मिल बांट कर खा लेते हैं। उसके बाद सवाल आया कि 8 (3+5) रोटी तीन आदमियों में कैसे बांट पाएंगे?? पहले आदमी ने राय दी कि ऐसा करते हैं कि हर रोटी के 3 टुकडे करते हैं, अर्थात 8 रोटी के 24 टुकडे (8 X 3 = 24) हो जाएंगे और हम तीनों में 8 - 8 टुकडे बराबर बराबर बंट जाएंगे। तीनों को उसकी राय अच्छी लगी और 8 रोटी के 24 टुकडे करके प्रत्येक ने 8 - 8 रोटी के टुकड़े खाकर भूख शांत की और फिर बारिश के कारण मंदिर के प्रांगण में ही सो गए। सुबह उठने पर तीसरे आदमी ने उनके उपकार के लिए दोनों को धन्यवाद दिया और प्रेम से 8 रोटी के टुकडो़ के बदले दोनों को उपहार स्वरूप 8 सोने की गिन्नी देकर अपने घर की ओर चला गया। उसके जाने के बाद पहला आदमी ने दुसरे आदमी से कहा हम दोनों 4 - 4 गिन्नी बांट लेते हैं। दुसरा बोला नहीं मेरी 5 रोटी थी और तुम्हारी सिर्फ 3 रोटी थी अतः मै 5 गिन्नी लुंगा, तुम्हें 3 गिन्नी मिलेंगी। इस पर दोनों में बहस और झगड़ा होने लगा। इसके बाद वे दोनों सलाह और न्याय के लिए मंदिर के पुजारी के पास गए और उसे समस्या बताई तथा न्यायपूर्ण समाधान के लिए प्रार्थना की। पुजारी भी असमंजस में पड़ गया, उसने कहा तुम लोग ये 8 गिन्नियाँ मेरे पास छोड़ जाओ और मुझे सोचने का समय दो, मैं कल सबेरे जवाब दे पाऊंगा। पुजारी को दिल में वैसे तो दूसरे आदमी की 3 - 5 की बात ठीक लगी रही थी पर फिर भी वह गहराई से सोचते सोचते गहरी नींद में सो गया। कुछ देर बाद उसके सपने में भगवान प्रगट हुए तो पुजारी ने सब बातें बताई और न्यायिक मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना की और बताया कि मेरे ख्याल से 3 - 5 बंटवारा ही उचित लगता है। भगवान मुस्कुरा कर बोले- नहीं। पहले आदमी को 1 गिन्नी मिलनी चाहिए और दुसरे आदमी को 7 गिन्नी मिलनी चाहिए। भगवान की बात सुनकर पुजारी अचंभित हो गया और अचरज से पूछा- *प्रभू ऐसा कैसे ?* भगवन फिर एकबार मुस्कुराए और बोले : इसमें कोई शंका नहीं कि पहले आदमी ने अपनी 3 रोटी के 9 टुकड़े किये परंतु उन 9 में से उसने सिर्फ 1 बांटा और 8 टुकड़े स्वयं खाया अर्थात उसका *त्याग* सिर्फ 1 रोटी के टुकड़े का था इसलिए वो सिर्फ 1 गिन्नी का ही हकदार है। दुसरे आदमी ने अपनी 5 रोटी के 15 टुकड़े किये जिसमें से 8 तुकडे उसने स्वयं खाऐ और 7 टुकड़े उसने बांट दिए। इसलिए वो न्यायानुसार 7 गिन्नी का हकदार है .. ये ही मेरा गणित है और ये ही मेरा न्याय है! ईश्वर की न्याय का सटीक विश्लेषण सुनकर पुजारी उनके चरणों में नतमस्तक हो गया। इस कहानी का सार ये ही है कि हमारा वस्तुस्थिति को देखने का, समझने का दृष्टिकोण और ईश्वर का दृष्टिकोण एकदम भिन्न है। हम ईश्वरीय न्यायलीला को जानने समझने में सर्वथा अज्ञानी हैं। हम अपने त्याग का गुणगान करते है परंतु ईश्वर हमारे त्याग की तुलना हमारे सामर्थ्य एवं भोग तौर कर यथोचित निर्णय करते हैं। किसी के पास 3000 रुपये हैं और उसमें से भी वो 300 रुपये सेवाभाव से दान कर देता है और किसी के पास 10 करोड़ रुपये है और उसमें से वो 1 लाख रुपये सेवाभाव से दान कर देता है तो भी ईश्वर की नजर में 1 लाख वाले दानदाता की जगह 300 रुपये दान करने वाला ज्यादा कीमती और *श्रेष्ठ* है क्योंकि उसने अपने कमतर भोग साधन में भी त्याग और परोपकार की भावना का सम्मान किया। 1 लाख रूपये वाला दानदाता भी जरूर अच्छा ही कहा जाएगा क्योंकि उसमें भी सेवाभाव त्याग की भावना विद्यमान है, परंतु *श्रेष्ठत्व* की तुलना में कमजोर का त्याग ईश्वर की नजर में और भी सर्वश्रेष्ठ कहलाता है। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि हम कितने धन संपन्न है, महत्वपूर्ण यहीं है कि हमारे सेवाभाव कार्य में त्याग कितना है। 🙏🙏 [🔱🔥🔱🔥🔱🔥🔱🔥🔱🔥🔱 : एक बार यशोदा मैया प्रभु श्री कृष्ण के उलाहनों से तंग आ गयीं और छड़ी लेकर श्री कृष्ण की ओर दौड़ी । जब प्रभु ने अपनी मैया को क्रोध में देखा तो वह अपना बचाव करने के लिए भागने लगे । भागते-भागते श्री कृष्ण एक कुम्भार के पास पहुँचे । कुम्भार तो अपने मिट्टी के घड़े बनाने में व्यस्त था । लेकिन जैसे ही कुम्भार ने श्री कृष्ण को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ । कुम्भार जानता था कि श्री कृष्ण साक्षात् परमेश्वर हैं । तब प्रभु ने कुम्भार से कहा कि 'कुम्भार जी, आज मेरी मैया मुझ पर बहुत क्रोधित है । मैया छड़ी लेकर मेरे पीछे आ रही है । भैया, मुझे कहीं छुपा लो ।' तब कुम्भार ने श्री कृष्ण को एक बडे से मटके के नीचे छिपा दिया । कुछ ही क्षणों में मैया यशोदा भी वहाँ आ गयीं और कुम्भार से पूछने लगी - 'क्यूँ रे, कुम्भार ! तूने मेरे कन्हैया को कहीं देखा है, क्या ?' कुम्भार ने कह दिया - 'नहीं, मैया ! मैंने कन्हैया को नहीं देखा ।' श्री कृष्ण ये सब बातें बडे से घड़े के नीचे छुपकर सुन रहे थे । मैया तो वहाँ से चली गयीं । अब प्रभु श्री कृष्ण कुम्भार से कहते हैं - 'कुम्भार जी, यदि मैया चली गयी हो तो मुझे इस घड़े से बाहर निकालो ।' कुम्भार बोला - 'ऐसे नहीं, प्रभु जी ! पहले मुझे चौरासी लाख यानियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।' भगवान मुस्कुराये और कहा - 'ठीक है, मैं तुम्हें चौरासी लाख योनियों से मुक्त करने का वचन देता हूँ । अब तो मुझे बाहर निकाल दो ।' कुम्भार कहने लगा - 'मुझे अकेले नहीं, प्रभु जी ! मेरे परिवार के सभी लोगों को भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करने का वचन दोगे तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकालूँगा ।' प्रभु जी कहते हैं - 'चलो ठीक है, उनको भी चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने का मैं वचन देता हूँ । अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।' अब कुम्भार कहता है - 'बस, प्रभु जी ! एक विनती और है । उसे भी पूरा करने का वचन दे दो तो मैं आपको घड़े से बाहर निकाल दूँगा ।' भगवान बोले - 'वो भी बता दे, क्या कहना चाहते हो ?' कुम्भार कहने लगा - 'प्रभु जी ! जिस घड़े के नीचे आप छुपे हो, उसकी मिट्टी मेरे बैलों के ऊपर लाद के लायी गयी है । मेरे इन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त करने का वचन दो ।' भगवान ने कुम्भार के प्रेम पर प्रसन्न होकर उन बैलों को भी चौरासी के बन्धन से मुक्त होने का वचन दिया ।' प्रभु बोले - 'अब तो तुम्हारी सब इच्छा पूरी हो गयी, अब तो मुझे घड़े से बाहर निकाल दो ।' तब कुम्भार कहता है - 'अभी नहीं, भगवन ! बस, एक अन्तिम इच्छा और है । उसे भी पूरा कर दीजिये और वो ये है - जो भी प्राणी हम दोनों के बीच के इस संवाद को सुनेगा, उसे भी आप चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त करोगे । बस, यह वचन दे दो तो मैं आपको इस घड़े से बाहर निकाल दूँगा ।' कुम्भार की प्रेम भरी बातों को सुन कर प्रभु श्री कृष्ण बहुत खुश हुए और कुम्भार की इस इच्छा को भी पूरा करने का वचन दिया । फिर कुम्भार ने बाल श्री कृष्ण को घड़े से बाहर निकाल दिया । उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम किया । प्रभु जी के चरण धोये और चरणामृत पीया । अपनी पूरी झोंपड़ी में चरणामृत का छिड़काव किया और प्रभु जी के गले लगकर इतना रोये क़ि प्रभु में ही विलीन हो गये । जरा सोच करके देखिये, जो बाल श्री कृष्ण सात कोस लम्बे-चौड़े गोवर्धन पर्वत को अपनी इक्क्नी अंगुली पर उठा सकते हैं, तो क्या वो एक घड़ा नहीं उठा सकते थे । लेकिन बिना प्रेम रीझे नहीं नटवर नन्द किशोर । कोई कितने भी यज्ञ करे, अनुष्ठान करे, कितना भी दान करे, चाहे कितनी भी भक्ति करे, लेकिन जब तक मन में प्राणी मात्र के लिए प्रेम नहीं होगा, प्रभु श्री कृष्ण मिल नहीं सकते । ! जय जय श्रीराधेकृष्णा.. [ 💐 सोच का फ़र्क 💐 🚩एक शहर में एक धनी व्यक्ति रहता था, उसके पास बहुत पैसा था और उसे इस बात पर बहुत घमंड भी था| एक बार किसी कारण से उसकी आँखों में इंफेक्शन हो गया| आँखों में बुरी तरह जलन होती थी, वह डॉक्टर के पास गया लेकिन डॉक्टर उसकी इस बीमारी का इलाज नहीं कर पाया| सेठ के पास बहुत पैसा था उसने देश विदेश से बहुत सारे नीम- हकीम और डॉक्टर बुलाए| एक बड़े डॉक्टर ने बताया की आपकी आँखों में एलर्जी है| आपको कुछ दिन तक सिर्फ़ हरा रंग ही देखना होगा और कोई और रंग देखेंगे तो आपकी आँखों को परेशानी होगी| अब क्या था, सेठ ने बड़े बड़े पेंटरों को बुलाया और पूरे महल को हरे रंग से रंगने के लिए कहा| वह बोला- मुझे हरे रंग से अलावा कोई और रंग दिखाई नहीं देना चाहिए मैं जहाँ से भी गुजरूँ, हर जगह हरा रंग कर दो| इस काम में बहुत पैसा खर्च हो रहा था लेकिन फिर भी सेठ की नज़र किसी अलग रंग पर पड़ ही जाती थी क्यूंकी पूरे नगर को हरे रंग से रंगना को संभव ही नहीं था, सेठ दिन प्रतिदिन पेंट कराने के लिए पैसा खर्च करता जा रहा था| वहीं शहर के एक सज्जन पुरुष गुजर रहा था उसने चारों तरफ हरा रंग देखकर लोगों से कारण पूछा| सारी बात सुनकर वह सेठ के पास गया और बोला सेठ जी आपको इतना पैसा खर्च करने की ज़रूरत नहीं है मेरे पास आपकी परेशानी का एक छोटा सा हल है.. आप हरा चश्मा क्यूँ नहीं खरीद लेते फिर सब कुछ हरा हो जाएगा| सेठ की आँख खुली की खुली रह गयी उसके दिमाग़ में यह शानदार विचार आया ही नहीं वह बेकार में इतना पैसा खर्च किए जा रहा था| तो जीवन में हमारी सोच और देखने के नज़रिए पर भी बहुत सारी चीज़ें निर्भर करतीं हैं कई बार परेशानी का हल बहुत आसान होता है लेकिन हम परेशानी में फँसे रहते हैं| तो इसे कहते हैं सोच का फ़र्क| 🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉🕉 💐💐💐💐💐💐💐

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Rammurti Gond Jan 26, 2020

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Rammurti Gond Jan 26, 2020

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Neha Sharma, Haryana Jan 25, 2020

जय श्री राधेकृष्णा शुभ प्रभात् वंदन : मन को जीतना ही सबसे बड़ा तप है 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 एक ऋषि यति-मुनि एक समय घूमते-घूमते नदी के तट पर चल रहे थे। मुनि को मौज आई। हम भी आज नाव पर बैठकर नदी की सैर करें और प्रभु की प्रकृति के दृश्यों को देखें'। चढ़ बैठे नाव को देखने के विचार से नीचे के खाने में जहां नाविक का सामान और निवास होता है, चले गये। जाते ही उनकी दृष्टि एक कुमारी कन्या पर जो नाविक की थी, पड़ी। कुमारी इतनी रुपवती थी कि विवश हो गया, उसे मूर्च्छा सी आ गई।.देवी ने उसके मुख में पानी डाला होश आई। पूछा―'मुनिवर ! क्या हो गया' ? *मुनि बोला―*'देवी ! मैं तुम्हारे सौन्दर्य पर इतना मोहित हो गया कि मैं अपनी सुध-बुध भूल गया अब मेरा मन तुम्हारे बिना नहीं रह सकता। मेरी जीवन मृत्यु तुम्हारे आधीन है।' *देवी―*'आपका कथन सत्य है, परन्तु मैं तो नीच जाति की मछानी हूं।' *मुनि―*मुझमें यह सामर्थ्य है कि मेरे स्पर्श से तुम शुद्ध हो जाओगी। *देवी―*'पर अब तो दिन है।' *मुनि―*'मैं अभी रात कर दिखा सकता हूं।' *देवी―*'फिर भी यह जल (नदी) है।' *मुनि―*'मैं आन की आन में इसे स्थल (रेत) बना सकता हूं।' *देवी―*'मैं तो अपने माता-पिता के आधीन हूं। उनकी सम्मति तो नहीं होगी।' *मुनि―*'मैं उनको शाप देकर अभी भस्म कर सकता हूं।' *देवी―*'भगवन् ! जब परमात्मा ने आपको आपके भजन, तप के प्रताप से इतनी सामर्थ्य और सिद्धि वरदान दी है तो कितनी मूर्खता है कि अपने जन्म जन्मान्तरों के तप को एक नीच काम और नीच आनन्द और वह भी एक दो मिनट के लिए विनष्ट करते हो। शोक ! आपमें इतनी सामर्थ्य है कि जल को थल, दिन को रात बना सको पर यह सामर्थ्य नहीं कि मन को रोक सको।' मुनि ने इतना सुना ही था कि उसके ज्ञाननेत्र खुल गए। तत्काल देवी के चरणों में गिर पड़ा कि तुम मेरी गुरु हो, सम्भवतः यही न्यूनता थी जो मुझे नाव की सैर का बहाना बनाकर खींच लाई। *दृष्टान्त―* (१) रुप और काम बड़े-बड़े तपस्वियों को गिरा देता है। (२) तपी-जती स्त्री रुप से बचें। (३) कच्चे पक्के की परीक्षा तो संसार में होती है, जंगल में नहीं। (४) जब अपनी भूल का भान हो जावे, तब हठ मत करो। (५) जिन पर प्रभु की दया होती है, उनका साधन वे आप बनाते हैं। इसी सन्देश को मनुस्मृति में बताया गया है- इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहारिषु | संयमे यतनमातिष्ठेद्विद्वान यंतेव वाजिनाम || [ मनु - 2 / 88 ] जिस प्रकार से विद्वान सारथि घोड़ों को नियम में रखता है , उसी प्रकार हमको अपने मन तथा आत्मा को खोटे कामों में खींचने वाले विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों को सब प्रकार से खींचने का प्रयत्न करना चाहिए। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 *ऋणमोचक मंगळ स्तोत्र* यदि आपके ऊपर ऋण/कर्ज का बोझ अधिक बढ़ गया है और आप उस कर्ज को चाह कर भी नहीं उतार पा रहे है तब यदि आप ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का नियमित पाठ करते है तो निश्चित ही धीरे धीरे आपका ऋण उतर जाएगा। जैसा की आप जानते है मंगल का सम्बन्ध हनुमानजी से है और हनुमानजी सर्वबाधा मुक्ति प्रदाता है यह श्लोक भी हनुमान जी की ही आराधना के रूप में प्रतिष्ठित है। कैसे आरम्भ करे ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ....?? इस पाठ को प्रारम्भ करने के लिए सर्वप्रथम आपको किसी शुभ तिथि का चयन भारतीय पञ्चाङ्गानुसार कर लेना चाहिए। यह पाठ मंगलवार को ही शुरू करना चाहिए अन्य दिन को नही। इस पाठ को करने से पूर्व लाल वस्त्र बिछाकर मंगल यन्त्र व महावीर हनुमान जी को स्थापित करना चाहिए , सिंदूर व चमेली के तेल का चोला अर्पित कर अपने बाये हाथ की तरफ देशी घी का दीप व दाहिने हाथ की तरफ तिल के तेल का दीप स्थापित करना चाहिए। इसके बाद हनुमान जी को गुड़, चने व बेसन का भोग लगाना चाहिए। मंगल देव (मंगल यन्त्र को प्राण प्रतिष्ठित कर) व हनुमान जी के सामने ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ, लाल वस्त्र धारण करके ही आरम्भ करना चाहिए। यह पाठ अपनी श्रद्धा अनुसार 1, 3, 5, 9 , अथवा 11 पाठ 43 दिन तक नित्य करना चाहिए | इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से निश्चित ही कर्ज, ऋण व आर्थिक बाधा से मुक्ति मिलती है। *ऋणमोचक मंगल स्तोत्र -* मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः। स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः ॥1॥ लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः। धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः॥2॥ अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः। व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः॥3॥ एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत्। ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्॥4॥ धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्। कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्॥5॥ स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः। न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्॥6॥ अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल। त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय॥7॥ ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः। भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा॥ 8 || अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः। तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात्॥9॥ विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा। तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः॥10॥ पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः। ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः॥11॥ एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम्। महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा॥12॥ || इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ||

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