सती #अनुसूया: महर्षि अत्रि पत्नि..🍀🍀 भारत में सतीत्व को शक्ति और भक्ति का समन्वय माना जाता है । इसे चारित्रिक शुचिता का चरम आदर्श भी माना जाता है। भारत में ऐसी उज्जवल चरित्र की महिलाओं की एक लंबी श्रृंखला है और इस श्रृंखला में सती अनुसूया का नाम सबसे ऊपर आता है। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि #अत्रि इनके पति थे। अपनी सतत सेवा तथा प्रेम से इन्होंने महर्षि अत्रि के हृदय को जीत लिया था। सती अनुसूया पतिव्रत धर्म के लिए प्रसिद्ध हैं। वनवास काल में जब राम सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुंचे तो अनुसूया ने सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी। सती अनुसुइया की परीक्षा – जब सती के तप से त्रिदेव बन गए शिशु: एक बार माँ लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सरस्वती जी को अपने पतिव्रता होने का बड़ा अभिमान होने लगा था। उन्हें ऐसा लगता था कि जितनी एकनिष्ठ होकर वह अपने पतियों की सेवा करती हैं, उसकी बराबरी करने वाला दुनिया में कोई भी नहीं है। इनके अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान ने नारद जी के मन में प्रेरणा दी। नारद जी ने तीनों देवियों के समक्ष उपस्थिति होकर अनुसूया के पतिव्रता धर्म का गुणगान किया। त्रिदेवियों को यह प्रशंसा बहुत चुभ गई। ईर्ष्यावश त्रिदेवियों ने अपने पतियों को अनुसूया के पतिव्रता धर्म की परीक्षा लेने के लिए भेजा। त्रिदेव यतियों के वेष धारण कर अत्रि के आश्रम में पहुंचे और भिक्षा देने का आग्रह किया। अनुसूया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत करके उन्हें भोजन के लिए निमंत्रित किया। तभी उन यति वेशधारी त्रिदेवों ने यह शर्त रख दी कि वह नग्न स्त्री के हाथों से परोसा गया भोजन ही ग्रहण करते हैं । इससे सती के समक्ष धर्मसंकट पैदा हो गया। इस समस्या का समाधान करने हेतु सती अनुसूया ने त्रिदेवों को बालक बना दिया और उनका उचित सत्कार किया और दुग्धपान कराया। उसी समय कहीं से एक सफेद बैल आश्रम में पहुंचा और द्वार के सम्मुख खड़े होकर सिर हिलाते हुए उसने पायलों की ध्वनि की। एक विशाल गरुड़ पंख फड़फड़ाते हुए आश्रम के ऊपर से उड़ने लगा। एक राजहंस विकसित कमल को चोंच में लिए हुए आश्रम में उतर आया। उसी समय महती वीणा पर नीलांबरी राग का आलाप करते हुए नारद जी और उनके पीछे लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुंचे। नारद जी अनुसूया से बोले- “माताजी! अपने पतियों से संबंधित प्राणियों को आपके द्वार पर पाकर ये तीनों देवियां यहां पर आ गई हैं। इनके पतियों को कृपया इन्हें सौंप दीजिए।” अनुसूया ने विनयपूर्वक तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा- “माताओं! उन झूलों में सोने वाले शिशु अगर आप के पति हैं तो इनको आप ले जा सकती हैं।” तीनों देवियों ने चकित होकर एक-दूसरे की तरफ देखा। एक समान लगने वाले तीनों शिशु गहरी निद्रा में सो रहे थे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती संकोच करने लगीं। तब नारद ने उनसे पूछा, ”क्या आप अपने पति को पहचान नहीं सकती?” नारद जी के ऐसा कहने पर देवियों ने जल्दी-जल्दी एक-एक शिशु को उठा लिया। इसके बाद वे शिशु एक साथ त्रिमूर्तियों के रूप में खड़े हो गए। तब उन्हें मालूम हुआ कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियां लज्जित होकर दूर जा खड़ी हो गई। इस पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश इस तरह सटकर खड़े हो गए, मानो तीनों एक ही मूर्ति के रूप में मिल गए हो । उसी समय अत्रि महर्षि अपने घर लौट आए। अपने घर त्रिमूर्तियों को पाकर हाथ जोड़ने लगे। त्रिमूर्तियों ने प्रसन्न होकर अत्रि एवं अनुसूया को वरदान दिया कि वे सभी स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतार लेंगे। बाद में त्रिमूर्तियों की समन्वित शक्ति का अवतरण भगवान विष्णु अवतारी भगवान #दत्तात्रेय के रूप में हुआ तो साथ ही ब्रह्मा जी के स्वरुप से #चन्दमा (सोमदेव) और भगवान शिव के स्वरूप से #दुर्वासा मुनि का आविर्भाव हुआ। सति अनुसुइया ने #सीता जी को समझाया था पति धर्म: जब राम बनवास के बाद भगवान राम की चरण पादुका लेकर लौटे अनुज भरत ने अयोध्या का राजपाठ संभाल लिया। अयोध्या की प्रजा को न्याय दिलाने के साथ ही नैतिक फैसले भी लेने लगे। इधर वन-वन भटक रहे भगवान राम जयंत की परीक्षा के साथ जब चित्रकूट से जाने लगे तभी सती अनुसुइया ने मां सीता की परीक्षा लेने के साथ ही उन्हें पतिव्रत धर्म की विस्तार से जानकारी की। इसके बाद उनका रुख पंचवटी आश्रम की ओर हो गया। कुमार रौनक कश्यप,,,,,

सती #अनुसूया: महर्षि अत्रि पत्नि..🍀🍀

भारत में सतीत्व को शक्ति और भक्ति का समन्वय माना जाता है । इसे चारित्रिक शुचिता का चरम आदर्श भी  माना जाता है। भारत में ऐसी उज्जवल चरित्र की महिलाओं की एक लंबी श्रृंखला है और इस श्रृंखला में सती अनुसूया का नाम सबसे ऊपर आता है। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि #अत्रि इनके पति थे। अपनी सतत सेवा तथा प्रेम से इन्होंने महर्षि अत्रि के हृदय को जीत लिया था। सती अनुसूया पतिव्रत धर्म के लिए प्रसिद्ध हैं। वनवास काल में जब राम सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुंचे तो अनुसूया ने सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी। 

सती अनुसुइया की परीक्षा – जब सती के तप से त्रिदेव बन गए शिशु:

एक बार माँ लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सरस्वती जी को अपने पतिव्रता होने का बड़ा अभिमान होने लगा था। उन्हें ऐसा लगता था कि जितनी एकनिष्ठ होकर वह अपने पतियों की सेवा करती हैं, उसकी बराबरी करने वाला दुनिया में कोई भी नहीं है। इनके अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान ने नारद जी के मन में प्रेरणा दी। नारद जी ने तीनों देवियों के समक्ष उपस्थिति होकर अनुसूया के पतिव्रता धर्म का गुणगान किया। त्रिदेवियों को यह प्रशंसा बहुत चुभ गई। ईर्ष्यावश त्रिदेवियों ने अपने पतियों को अनुसूया के पतिव्रता धर्म की परीक्षा लेने के लिए भेजा। 

त्रिदेव यतियों के वेष धारण कर अत्रि के आश्रम में पहुंचे और भिक्षा देने का आग्रह किया। अनुसूया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत करके उन्हें भोजन के लिए निमंत्रित किया। तभी उन यति वेशधारी त्रिदेवों ने यह शर्त रख दी कि वह नग्न स्त्री के हाथों से परोसा गया भोजन ही ग्रहण करते हैं । इससे सती के समक्ष धर्मसंकट पैदा हो गया। इस समस्या का समाधान करने हेतु सती अनुसूया ने त्रिदेवों को बालक बना दिया और उनका उचित सत्कार किया और दुग्धपान कराया। 

उसी समय कहीं से एक सफेद बैल आश्रम में पहुंचा और द्वार के सम्मुख खड़े होकर सिर हिलाते हुए उसने पायलों की ध्वनि की। एक विशाल गरुड़ पंख फड़फड़ाते हुए आश्रम के ऊपर से उड़ने लगा। एक राजहंस विकसित कमल को चोंच में लिए हुए आश्रम में उतर आया। उसी समय महती वीणा पर नीलांबरी राग का आलाप करते हुए नारद जी और उनके पीछे लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुंचे। 

नारद जी अनुसूया से बोले- “माताजी! अपने पतियों से संबंधित प्राणियों को आपके द्वार पर पाकर ये तीनों देवियां यहां पर आ गई हैं। इनके पतियों को कृपया इन्हें सौंप दीजिए।” अनुसूया ने विनयपूर्वक तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा- “माताओं! उन झूलों में सोने वाले शिशु अगर आप के पति हैं तो इनको आप ले जा सकती हैं।” 

तीनों देवियों ने चकित होकर एक-दूसरे की तरफ देखा। एक समान लगने वाले तीनों शिशु गहरी निद्रा में सो रहे थे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती संकोच करने लगीं। तब नारद ने उनसे पूछा, ”क्या आप अपने पति को पहचान नहीं सकती?” नारद जी के ऐसा कहने पर देवियों ने जल्दी-जल्दी एक-एक शिशु को उठा लिया। इसके बाद वे शिशु एक साथ त्रिमूर्तियों के रूप में खड़े हो गए। तब उन्हें मालूम हुआ कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियां लज्जित होकर दूर जा खड़ी हो गई। इस पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश इस तरह सटकर खड़े हो गए, मानो तीनों एक ही मूर्ति के रूप में मिल गए हो । उसी समय अत्रि महर्षि अपने घर लौट आए। अपने घर त्रिमूर्तियों को पाकर हाथ जोड़ने लगे। 

त्रिमूर्तियों ने प्रसन्न होकर अत्रि एवं अनुसूया को वरदान दिया कि वे सभी स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतार लेंगे। बाद में त्रिमूर्तियों की समन्वित शक्ति का अवतरण भगवान विष्णु अवतारी भगवान #दत्तात्रेय के रूप में हुआ तो साथ ही ब्रह्मा जी के स्वरुप से #चन्दमा (सोमदेव) और भगवान शिव के स्वरूप से #दुर्वासा मुनि का आविर्भाव हुआ।

सति अनुसुइया ने #सीता जी को समझाया था पति धर्म:

जब राम बनवास के बाद भगवान राम की चरण पादुका लेकर लौटे अनुज भरत ने अयोध्या का राजपाठ संभाल लिया। अयोध्या की प्रजा को न्याय दिलाने के साथ ही नैतिक फैसले भी लेने लगे। इधर वन-वन भटक रहे भगवान राम जयंत की परीक्षा के साथ जब चित्रकूट से जाने लगे तभी सती अनुसुइया ने मां सीता की परीक्षा लेने के साथ ही उन्हें पतिव्रत धर्म की विस्तार से जानकारी की। इसके बाद उनका रुख पंचवटी आश्रम की ओर हो गया।
कुमार रौनक कश्यप,,,,,
सती #अनुसूया: महर्षि अत्रि पत्नि..🍀🍀

भारत में सतीत्व को शक्ति और भक्ति का समन्वय माना जाता है । इसे चारित्रिक शुचिता का चरम आदर्श भी  माना जाता है। भारत में ऐसी उज्जवल चरित्र की महिलाओं की एक लंबी श्रृंखला है और इस श्रृंखला में सती अनुसूया का नाम सबसे ऊपर आता है। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि #अत्रि इनके पति थे। अपनी सतत सेवा तथा प्रेम से इन्होंने महर्षि अत्रि के हृदय को जीत लिया था। सती अनुसूया पतिव्रत धर्म के लिए प्रसिद्ध हैं। वनवास काल में जब राम सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुंचे तो अनुसूया ने सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी। 

सती अनुसुइया की परीक्षा – जब सती के तप से त्रिदेव बन गए शिशु:

एक बार माँ लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सरस्वती जी को अपने पतिव्रता होने का बड़ा अभिमान होने लगा था। उन्हें ऐसा लगता था कि जितनी एकनिष्ठ होकर वह अपने पतियों की सेवा करती हैं, उसकी बराबरी करने वाला दुनिया में कोई भी नहीं है। इनके अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान ने नारद जी के मन में प्रेरणा दी। नारद जी ने तीनों देवियों के समक्ष उपस्थिति होकर अनुसूया के पतिव्रता धर्म का गुणगान किया। त्रिदेवियों को यह प्रशंसा बहुत चुभ गई। ईर्ष्यावश त्रिदेवियों ने अपने पतियों को अनुसूया के पतिव्रता धर्म की परीक्षा लेने के लिए भेजा। 

त्रिदेव यतियों के वेष धारण कर अत्रि के आश्रम में पहुंचे और भिक्षा देने का आग्रह किया। अनुसूया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत करके उन्हें भोजन के लिए निमंत्रित किया। तभी उन यति वेशधारी त्रिदेवों ने यह शर्त रख दी कि वह नग्न स्त्री के हाथों से परोसा गया भोजन ही ग्रहण करते हैं । इससे सती के समक्ष धर्मसंकट पैदा हो गया। इस समस्या का समाधान करने हेतु सती अनुसूया ने त्रिदेवों को बालक बना दिया और उनका उचित सत्कार किया और दुग्धपान कराया। 

उसी समय कहीं से एक सफेद बैल आश्रम में पहुंचा और द्वार के सम्मुख खड़े होकर सिर हिलाते हुए उसने पायलों की ध्वनि की। एक विशाल गरुड़ पंख फड़फड़ाते हुए आश्रम के ऊपर से उड़ने लगा। एक राजहंस विकसित कमल को चोंच में लिए हुए आश्रम में उतर आया। उसी समय महती वीणा पर नीलांबरी राग का आलाप करते हुए नारद जी और उनके पीछे लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुंचे। 

नारद जी अनुसूया से बोले- “माताजी! अपने पतियों से संबंधित प्राणियों को आपके द्वार पर पाकर ये तीनों देवियां यहां पर आ गई हैं। इनके पतियों को कृपया इन्हें सौंप दीजिए।” अनुसूया ने विनयपूर्वक तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा- “माताओं! उन झूलों में सोने वाले शिशु अगर आप के पति हैं तो इनको आप ले जा सकती हैं।” 

तीनों देवियों ने चकित होकर एक-दूसरे की तरफ देखा। एक समान लगने वाले तीनों शिशु गहरी निद्रा में सो रहे थे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती संकोच करने लगीं। तब नारद ने उनसे पूछा, ”क्या आप अपने पति को पहचान नहीं सकती?” नारद जी के ऐसा कहने पर देवियों ने जल्दी-जल्दी एक-एक शिशु को उठा लिया। इसके बाद वे शिशु एक साथ त्रिमूर्तियों के रूप में खड़े हो गए। तब उन्हें मालूम हुआ कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियां लज्जित होकर दूर जा खड़ी हो गई। इस पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश इस तरह सटकर खड़े हो गए, मानो तीनों एक ही मूर्ति के रूप में मिल गए हो । उसी समय अत्रि महर्षि अपने घर लौट आए। अपने घर त्रिमूर्तियों को पाकर हाथ जोड़ने लगे। 

त्रिमूर्तियों ने प्रसन्न होकर अत्रि एवं अनुसूया को वरदान दिया कि वे सभी स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतार लेंगे। बाद में त्रिमूर्तियों की समन्वित शक्ति का अवतरण भगवान विष्णु अवतारी भगवान #दत्तात्रेय के रूप में हुआ तो साथ ही ब्रह्मा जी के स्वरुप से #चन्दमा (सोमदेव) और भगवान शिव के स्वरूप से #दुर्वासा मुनि का आविर्भाव हुआ।

सति अनुसुइया ने #सीता जी को समझाया था पति धर्म:

जब राम बनवास के बाद भगवान राम की चरण पादुका लेकर लौटे अनुज भरत ने अयोध्या का राजपाठ संभाल लिया। अयोध्या की प्रजा को न्याय दिलाने के साथ ही नैतिक फैसले भी लेने लगे। इधर वन-वन भटक रहे भगवान राम जयंत की परीक्षा के साथ जब चित्रकूट से जाने लगे तभी सती अनुसुइया ने मां सीता की परीक्षा लेने के साथ ही उन्हें पतिव्रत धर्म की विस्तार से जानकारी की। इसके बाद उनका रुख पंचवटी आश्रम की ओर हो गया।
कुमार रौनक कश्यप,,,,,
सती #अनुसूया: महर्षि अत्रि पत्नि..🍀🍀

भारत में सतीत्व को शक्ति और भक्ति का समन्वय माना जाता है । इसे चारित्रिक शुचिता का चरम आदर्श भी  माना जाता है। भारत में ऐसी उज्जवल चरित्र की महिलाओं की एक लंबी श्रृंखला है और इस श्रृंखला में सती अनुसूया का नाम सबसे ऊपर आता है। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि #अत्रि इनके पति थे। अपनी सतत सेवा तथा प्रेम से इन्होंने महर्षि अत्रि के हृदय को जीत लिया था। सती अनुसूया पतिव्रत धर्म के लिए प्रसिद्ध हैं। वनवास काल में जब राम सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुंचे तो अनुसूया ने सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी। 

सती अनुसुइया की परीक्षा – जब सती के तप से त्रिदेव बन गए शिशु:

एक बार माँ लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सरस्वती जी को अपने पतिव्रता होने का बड़ा अभिमान होने लगा था। उन्हें ऐसा लगता था कि जितनी एकनिष्ठ होकर वह अपने पतियों की सेवा करती हैं, उसकी बराबरी करने वाला दुनिया में कोई भी नहीं है। इनके अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान ने नारद जी के मन में प्रेरणा दी। नारद जी ने तीनों देवियों के समक्ष उपस्थिति होकर अनुसूया के पतिव्रता धर्म का गुणगान किया। त्रिदेवियों को यह प्रशंसा बहुत चुभ गई। ईर्ष्यावश त्रिदेवियों ने अपने पतियों को अनुसूया के पतिव्रता धर्म की परीक्षा लेने के लिए भेजा। 

त्रिदेव यतियों के वेष धारण कर अत्रि के आश्रम में पहुंचे और भिक्षा देने का आग्रह किया। अनुसूया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत करके उन्हें भोजन के लिए निमंत्रित किया। तभी उन यति वेशधारी त्रिदेवों ने यह शर्त रख दी कि वह नग्न स्त्री के हाथों से परोसा गया भोजन ही ग्रहण करते हैं । इससे सती के समक्ष धर्मसंकट पैदा हो गया। इस समस्या का समाधान करने हेतु सती अनुसूया ने त्रिदेवों को बालक बना दिया और उनका उचित सत्कार किया और दुग्धपान कराया। 

उसी समय कहीं से एक सफेद बैल आश्रम में पहुंचा और द्वार के सम्मुख खड़े होकर सिर हिलाते हुए उसने पायलों की ध्वनि की। एक विशाल गरुड़ पंख फड़फड़ाते हुए आश्रम के ऊपर से उड़ने लगा। एक राजहंस विकसित कमल को चोंच में लिए हुए आश्रम में उतर आया। उसी समय महती वीणा पर नीलांबरी राग का आलाप करते हुए नारद जी और उनके पीछे लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुंचे। 

नारद जी अनुसूया से बोले- “माताजी! अपने पतियों से संबंधित प्राणियों को आपके द्वार पर पाकर ये तीनों देवियां यहां पर आ गई हैं। इनके पतियों को कृपया इन्हें सौंप दीजिए।” अनुसूया ने विनयपूर्वक तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा- “माताओं! उन झूलों में सोने वाले शिशु अगर आप के पति हैं तो इनको आप ले जा सकती हैं।” 

तीनों देवियों ने चकित होकर एक-दूसरे की तरफ देखा। एक समान लगने वाले तीनों शिशु गहरी निद्रा में सो रहे थे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती संकोच करने लगीं। तब नारद ने उनसे पूछा, ”क्या आप अपने पति को पहचान नहीं सकती?” नारद जी के ऐसा कहने पर देवियों ने जल्दी-जल्दी एक-एक शिशु को उठा लिया। इसके बाद वे शिशु एक साथ त्रिमूर्तियों के रूप में खड़े हो गए। तब उन्हें मालूम हुआ कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियां लज्जित होकर दूर जा खड़ी हो गई। इस पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश इस तरह सटकर खड़े हो गए, मानो तीनों एक ही मूर्ति के रूप में मिल गए हो । उसी समय अत्रि महर्षि अपने घर लौट आए। अपने घर त्रिमूर्तियों को पाकर हाथ जोड़ने लगे। 

त्रिमूर्तियों ने प्रसन्न होकर अत्रि एवं अनुसूया को वरदान दिया कि वे सभी स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतार लेंगे। बाद में त्रिमूर्तियों की समन्वित शक्ति का अवतरण भगवान विष्णु अवतारी भगवान #दत्तात्रेय के रूप में हुआ तो साथ ही ब्रह्मा जी के स्वरुप से #चन्दमा (सोमदेव) और भगवान शिव के स्वरूप से #दुर्वासा मुनि का आविर्भाव हुआ।

सति अनुसुइया ने #सीता जी को समझाया था पति धर्म:

जब राम बनवास के बाद भगवान राम की चरण पादुका लेकर लौटे अनुज भरत ने अयोध्या का राजपाठ संभाल लिया। अयोध्या की प्रजा को न्याय दिलाने के साथ ही नैतिक फैसले भी लेने लगे। इधर वन-वन भटक रहे भगवान राम जयंत की परीक्षा के साथ जब चित्रकूट से जाने लगे तभी सती अनुसुइया ने मां सीता की परीक्षा लेने के साथ ही उन्हें पतिव्रत धर्म की विस्तार से जानकारी की। इसके बाद उनका रुख पंचवटी आश्रम की ओर हो गया।
कुमार रौनक कश्यप,,,,,
सती #अनुसूया: महर्षि अत्रि पत्नि..🍀🍀

भारत में सतीत्व को शक्ति और भक्ति का समन्वय माना जाता है । इसे चारित्रिक शुचिता का चरम आदर्श भी  माना जाता है। भारत में ऐसी उज्जवल चरित्र की महिलाओं की एक लंबी श्रृंखला है और इस श्रृंखला में सती अनुसूया का नाम सबसे ऊपर आता है। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि #अत्रि इनके पति थे। अपनी सतत सेवा तथा प्रेम से इन्होंने महर्षि अत्रि के हृदय को जीत लिया था। सती अनुसूया पतिव्रत धर्म के लिए प्रसिद्ध हैं। वनवास काल में जब राम सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुंचे तो अनुसूया ने सीता को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी। 

सती अनुसुइया की परीक्षा – जब सती के तप से त्रिदेव बन गए शिशु:

एक बार माँ लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सरस्वती जी को अपने पतिव्रता होने का बड़ा अभिमान होने लगा था। उन्हें ऐसा लगता था कि जितनी एकनिष्ठ होकर वह अपने पतियों की सेवा करती हैं, उसकी बराबरी करने वाला दुनिया में कोई भी नहीं है। इनके अहंकार को नष्ट करने के लिए भगवान ने नारद जी के मन में प्रेरणा दी। नारद जी ने तीनों देवियों के समक्ष उपस्थिति होकर अनुसूया के पतिव्रता धर्म का गुणगान किया। त्रिदेवियों को यह प्रशंसा बहुत चुभ गई। ईर्ष्यावश त्रिदेवियों ने अपने पतियों को अनुसूया के पतिव्रता धर्म की परीक्षा लेने के लिए भेजा। 

त्रिदेव यतियों के वेष धारण कर अत्रि के आश्रम में पहुंचे और भिक्षा देने का आग्रह किया। अनुसूया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत करके उन्हें भोजन के लिए निमंत्रित किया। तभी उन यति वेशधारी त्रिदेवों ने यह शर्त रख दी कि वह नग्न स्त्री के हाथों से परोसा गया भोजन ही ग्रहण करते हैं । इससे सती के समक्ष धर्मसंकट पैदा हो गया। इस समस्या का समाधान करने हेतु सती अनुसूया ने त्रिदेवों को बालक बना दिया और उनका उचित सत्कार किया और दुग्धपान कराया। 

उसी समय कहीं से एक सफेद बैल आश्रम में पहुंचा और द्वार के सम्मुख खड़े होकर सिर हिलाते हुए उसने पायलों की ध्वनि की। एक विशाल गरुड़ पंख फड़फड़ाते हुए आश्रम के ऊपर से उड़ने लगा। एक राजहंस विकसित कमल को चोंच में लिए हुए आश्रम में उतर आया। उसी समय महती वीणा पर नीलांबरी राग का आलाप करते हुए नारद जी और उनके पीछे लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती आ पहुंचे। 

नारद जी अनुसूया से बोले- “माताजी! अपने पतियों से संबंधित प्राणियों को आपके द्वार पर पाकर ये तीनों देवियां यहां पर आ गई हैं। इनके पतियों को कृपया इन्हें सौंप दीजिए।” अनुसूया ने विनयपूर्वक तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा- “माताओं! उन झूलों में सोने वाले शिशु अगर आप के पति हैं तो इनको आप ले जा सकती हैं।” 

तीनों देवियों ने चकित होकर एक-दूसरे की तरफ देखा। एक समान लगने वाले तीनों शिशु गहरी निद्रा में सो रहे थे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती संकोच करने लगीं। तब नारद ने उनसे पूछा, ”क्या आप अपने पति को पहचान नहीं सकती?” नारद जी के ऐसा कहने पर देवियों ने जल्दी-जल्दी एक-एक शिशु को उठा लिया। इसके बाद वे शिशु एक साथ त्रिमूर्तियों के रूप में खड़े हो गए। तब उन्हें मालूम हुआ कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियां लज्जित होकर दूर जा खड़ी हो गई। इस पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश इस तरह सटकर खड़े हो गए, मानो तीनों एक ही मूर्ति के रूप में मिल गए हो । उसी समय अत्रि महर्षि अपने घर लौट आए। अपने घर त्रिमूर्तियों को पाकर हाथ जोड़ने लगे। 

त्रिमूर्तियों ने प्रसन्न होकर अत्रि एवं अनुसूया को वरदान दिया कि वे सभी स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतार लेंगे। बाद में त्रिमूर्तियों की समन्वित शक्ति का अवतरण भगवान विष्णु अवतारी भगवान #दत्तात्रेय के रूप में हुआ तो साथ ही ब्रह्मा जी के स्वरुप से #चन्दमा (सोमदेव) और भगवान शिव के स्वरूप से #दुर्वासा मुनि का आविर्भाव हुआ।

सति अनुसुइया ने #सीता जी को समझाया था पति धर्म:

जब राम बनवास के बाद भगवान राम की चरण पादुका लेकर लौटे अनुज भरत ने अयोध्या का राजपाठ संभाल लिया। अयोध्या की प्रजा को न्याय दिलाने के साथ ही नैतिक फैसले भी लेने लगे। इधर वन-वन भटक रहे भगवान राम जयंत की परीक्षा के साथ जब चित्रकूट से जाने लगे तभी सती अनुसुइया ने मां सीता की परीक्षा लेने के साथ ही उन्हें पतिव्रत धर्म की विस्तार से जानकारी की। इसके बाद उनका रुख पंचवटी आश्रम की ओर हो गया।
कुमार रौनक कश्यप,,,,,

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Anuradha Tiwari May 20, 2019

चौरासी लाख योनियों का रहस्य,,,,,,, पुराणों में वर्णित ८४००००० योनियों के बारे में आपने कभी ना कभी अवश्य सुना होगा। हम जिस मनुष्य योनि में जी रहे हैं वो भी उन चौरासी लाख योनियों में से एक है। अब समस्या ये है कि कई लोग ये नहीं समझ पाते कि वास्तव में इन योनियों का अर्थ क्या है? ये देख कर और भी दुःख होता है कि आज की पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी इस बात पर व्यंग करती और हँसती है कि इतनी सारी योनियाँ कैसे हो सकती है। अपने सीमित ज्ञान के कारण वे इसे ठीक से समझ नहीं पाते। गरुड़ पुराण में योनियों का विस्तार से वर्णन दिया गया है। तो आइये आज इसे समझने का प्रयत्न करते हैं। सबसे पहले ये प्रश्न आता है कि क्या एक जीव के लिए ये संभव है कि वो इतने सारे योनियों में जन्म ले सके? तो उत्तर है - हाँ। एक जीव, जिसे हम आत्मा भी कहते हैं, इन ८४००००० योनियों में भटकती रहती है। अर्थात मृत्यु के पश्चात वो इन्ही ८४००००० योनियों में से किसी एक में जन्म लेती है। ये तो हम सब जानते हैं कि आत्मा अजर एवं अमर होती है इसी कारण मृत्यु के पश्चात वो एक दूसरे योनि में दूसरा शरीर धारण करती है। अब प्रश्न ये है कि यहाँ "योनि" का अर्थ क्या है? अगर आसान भाषा में समझा जाये तो योनि का अर्थ है जाति (नस्ल), जिसे अंग्रेजी में हम स्पीशीज (Species) कहते हैं। अर्थात इस विश्व में जितने भी प्रकार की जातियाँ है उसे ही योनि कहा जाता है। इन जातियों में ना केवल मनुष्य और पशु आते हैं, बल्कि पेड़-पौधे, वनस्पतियाँ, जीवाणु-विषाणु इत्यादि की गणना भी उन्ही ८४००००० योनियों में की जाती है। आज का विज्ञान बहुत विकसित हो गया है और दुनिया भर के जीव वैज्ञानिक वर्षों की शोधों के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस पृथ्वी पर आज लगभग ८७००००० (सतासी लाख) प्रकार के जीव-जंतु एवं वनस्पतियाँ पाई जाती है। इन ८७ लाख जातियों में लगभग २-३ लाख जातियाँ ऐसी हैं जिन्हे आप मुख्य जातियों की उपजातियों के रूप में वर्गीकृत कर सकते हैं। अर्थात अगर केवल मुख्य जातियों की बात की जाये तो वो लगभग ८४ लाख है। अब आप सिर्फ ये अंदाजा लगाइये कि हमारे हिन्दू धर्म में ज्ञान-विज्ञान कितना उन्नत रहा होगा कि हमारे ऋषि-मुनियों ने आज से हजारों वर्षों पहले केवल अपने ज्ञान के बल पर ये बता दिया था कि ८४००००० योनियाँ है जो कि आज की उन्नत तकनीक द्वारा की गयी गणना के बहुत निकट है। हिन्दू धर्म के अनुसार इन ८४ लाख योनियों में जन्म लेते रहने को ही जन्म-मरण का चक्र कहा गया है। जो भी जीव इस जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है, अर्थात जो अपनी ८४ लाख योनियों की गणनाओं को पूर्ण कर लेता है और उसे आगे किसी अन्य योनि में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं होती है, उसे ही हम "मोक्ष" की प्राप्ति करना कहते है। मोक्ष का वास्तविक अर्थ जन्म-मरण के चक्र से निकल कर प्रभु में लीन हो जाना है। ये भी कहा गया है कि सभी अन्य योनियों में जन्म लेने के पश्चात ही मनुष्य योनि प्राप्त होती है। मनुष्य योनि से पहले आने वाले योनियों की संख्या ८०००००० (अस्सी लाख) बताई गयी है। अर्थात हम जिस मनुष्य योनि में जन्मे हैं वो इतनी विरली होती है कि सभी योनियों के कष्टों को भोगने के पश्चात ही ये हमें प्राप्त होती है। और चूँकि मनुष्य योनि वो अंतिम पड़ाव है जहाँ जीव अपने कई जन्मों के पुण्यों के कारण पहुँचता हैं, मनुष्य योनि ही मोक्ष की प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन माना गया है। विशेषकर कलियुग में जो भी मनुष्य पापकर्म से दूर रहकर पुण्य करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति की उतनी ही अधिक सम्भावना होती है। किसी भी अन्य योनि में मोक्ष की प्राप्ति उतनी सरल नहीं है जितनी कि मनुष्य योनि में है। किन्तु दुर्भाग्य ये है कि लोग इस बात का महत्त्व समझते नहीं हैं कि हम कितने सौभाग्यशाली हैं कि हमने मनुष्य योनि में जन्म लिया है। एक प्रश्न और भी पूछा जाता है कि क्या मोक्ष पाने के लिए मनुष्य योनि तक पहुँचना या उसमे जन्म लेना अनिवार्य है? इसका उत्तर है - नहीं। हालाँकि मनुष्य योनि को मोक्ष की प्राप्ति के लिए सर्वाधिक आदर्श योनि माना गया है क्यूंकि मोक्ष के लिए जीव में जिस चेतना की आवश्यकता होती है वो हम मनुष्यों में सबसे अधिक पायी जाती है। इसके अतिरिक्त कई गुरुजनों ने ये भी कहा है कि मनुष्य योनि मोक्ष का सोपान है और मोक्ष केवल मनुष्य योनि में ही पाया जा सकता है। हालाँकि ये अनिवार्य नहीं है कि केवल मनुष्यों को ही मोक्ष की प्राप्ति होगी, अन्य जंतुओं अथवा वनस्पतियों को नहीं। इस बात के कई उदाहरण हमें अपने वेदों और पुराणों में मिलते हैं कि जंतुओं ने भी सीधे अपनी योनि से मोक्ष की प्राप्ति की। महाभारत में पांडवों के महाप्रयाण के समय एक कुत्ते का जिक्र आया है जिसे उनके साथ ही मोक्ष की प्राप्ति हुई थी, जो वास्तव में धर्मराज थे। महाभारत में ही अश्वमेघ यज्ञ के समय एक नेवले का वर्णन है जिसे युधिष्ठिर के अश्वमेघ यज्ञ से उतना पुण्य नहीं प्राप्त हुआ जितना एक गरीब के आंटे से और बाद में वो भी मोक्ष को प्राप्त हुआ। विष्णु एवं गरुड़ पुराण में एक गज और ग्राह का वर्णन आया है जिन्हे भगवान विष्णु के कारण मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। वो ग्राह पूर्व जन्म में गन्धर्व और गज भक्त राजा थे किन्तु कर्मफल के कारण अगले जन्म में पशु योनि में जन्मे। ऐसे ही एक गज का वर्णन गजानन की कथा में है जिसके सर को श्रीगणेश के सर के स्थान पर लगाया गया था और भगवान शिव की कृपा से उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई। महाभारत की कृष्ण लीला में श्रीकृष्ण ने अपनी बाल्यावस्था में खेल-खेल में "यमल" एवं "अर्जुन" नमक दो वृक्षों को उखाड़ दिया था। वो यमलार्जुन वास्तव में पिछले जन्म में यक्ष थे जिन्हे वृक्ष योनि में जन्म लेने का श्राप मिला था। अर्थात, जीव चाहे किसी भी योनि में हो, अपने पुण्य कर्मों और सच्ची भक्ति से वो मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। एक और प्रश्न पूछा जाता है कि क्या मनुष्य योनि सबसे अंत में ही मिलती है। तो इसका उत्तर है - नहीं। हो सकता है कि आपके पूर्वजन्मों के पुण्यों के कारण आपको मनुष्य योनि प्राप्त हुई हो लेकिन ये भी हो सकता है कि मनुष्य योनि की प्राप्ति के बाद किये गए आपके पाप कर्म के कारण अगले जन्म में आपको अधम योनि प्राप्त हो। इसका उदाहरण आपको ऊपर की कथाओं में मिल गया होगा। कई लोग इस बात पर भी प्रश्न उठाते हैं कि हिन्दू धर्मग्रंथों, विशेषकर गरुड़ पुराण में अगले जन्म का भय दिखा कर लोगों को डराया जाता है। जबकि वास्तविकता ये है कि कर्मों के अनुसार अगली योनि का वर्णन इस कारण है ताकि मनुष्य यथासंभव पापकर्म करने से बच सके। हालाँकि एक बात और जानने योग्य है कि मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत ही कठिन है। यहाँ तक कि सतयुग में, जहाँ पाप शून्य भाग था, मोक्ष की प्राप्ति अत्यंत कठिन थी। कलियुग में जहाँ पाप का भाग १५ है, इसमें मोक्ष की प्राप्ति तो अत्यंत ही कठिन है। हालाँकि कहा जाता है कि सतयुग से उलट कलियुग में केवल पाप कर्म को सोचने पर उसका उतना फल नहीं मिलता जितना करने पर मिलता है। और कलियुग में किये गए थोड़े से भी पुण्य का फल बहुत अधिक मिलता है। कई लोग ये समझते हैं कि अगर किसी मनुष्य को बहुत पुण्य करने के कारण स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो इसी का अर्थ मोक्ष है, जबकि ऐसा नहीं है। स्वर्ग की प्राप्ति मोक्ष की प्राप्ति नहीं है। स्वर्ग की प्राप्ति केवल आपके द्वारा किये गए पुण्य कर्मों का परिणाम स्वरुप है। स्वर्ग में अपने पुण्य का फल भोगने के बाद आपको पुनः किसी अन्य योनि में जन्म लेना पड़ता है। अर्थात आप जन्म और मरण के चक्र से मुक्त नहीं होते। रामायण और हरिवंश पुराण में कहा गया है कि कलियुग में मोक्ष की प्राप्ति का सबसे सरल साधन "राम-नाम" है। पुराणों में ८४००००० योनियों का गणनाक्रम दिया गया है कि किस प्रकार के जीवों में कितनी योनियाँ होती है। पद्मपुराण के ७८/५ वें सर्ग में कहा गया है: जलज नवलक्षाणी, स्थावर लक्षविंशति कृमयो: रुद्रसंख्यकः पक्षिणाम् दशलक्षणं त्रिंशलक्षाणी पशवः चतुरलक्षाणी मानव अर्थात, जलचर जीव - ९००००० (नौ लाख) वृक्ष - २०००००० (बीस लाख) कीट (क्षुद्रजीव) - ११००००० (ग्यारह लाख) पक्षी - १०००००० (दस लाख) जंगली पशु - ३०००००० (तीस लाख) मनुष्य - ४००००० (चार लाख) इस प्रकार ९००००० + २०००००० + ११००००० + १०००००० + ३०००००० + ४००००० = कुल ८४००००० योनियाँ होती है। जैन धर्म में भी जीवों की ८४००००० योनियाँ ही बताई गयी है। सिर्फ उनमे जीवों के प्रकारों में थोड़ा भेद है। जैन धर्म के अनुसार: पृथ्वीकाय - ७००००० (सात लाख) जलकाय - ७००००० (सात लाख) अग्निकाय - ७००००० (सात लाख) वायुकाय - ७००००० (सात लाख) वनस्पतिकाय - १०००००० (दस लाख) साधारण देहधारी जीव (मनुष्यों को छोड़कर) - १४००००० (चौदह लाख) द्वि इन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख) त्रि इन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख) चतुरिन्द्रियाँ - २००००० (दो लाख) पञ्च इन्द्रियाँ (त्रियांच) - ४००००० (चार लाख) पञ्च इन्द्रियाँ (देव) - ४००००० (चार लाख) पञ्च इन्द्रियाँ (नारकीय जीव) - ४००००० (चार लाख) पञ्च इन्द्रियाँ (मनुष्य) - १४००००० (चौदह लाख) इस प्रकार ७००००० + ७००००० + ७००००० + ७००००० + १०००००० + १४००००० + २००००० + २००००० + २००००० + ४००००० + ४००००० + ४००००० + १४००००० = कुल ८४००००० अतः अगर आगे से आपको कोई ऐसा मिले जो ८४००००० योनियों के अस्तित्व पर प्रश्न उठाये या उसका मजाक उड़ाए, तो कृपया उसे इस शोध को पढ़ने को कहें। साथ ही ये भी कहें कि हमें इस बात का गर्व है कि जिस चीज को साबित करने में आधुनिक/पाश्चात्य विज्ञान को हजारों वर्षों का समय लग गया, उसे हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने सहस्त्रों वर्षों पूर्व ही सिद्ध कर दिखाया था। **** जय ब्रह्मदेव।****** ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, " जीवन का सत्य आत्मिक कल्याण है ना की भौतिक सुख !" ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, जिस प्रकार मैले दर्पण में सूर्य देव का प्रकाश नहीं पड़ता है उसी प्रकार मलिन अंतःकरण में ईश्वर के प्रकाश का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता है अर्थात मलिन अंतःकरण में शैतान अथवा असुरों का राज होता है ! अतः ऐसा मनुष्य ईश्वर द्वारा प्रदत्त अनेक दिव्य सिद्धियों एवं निधियों का अधिकारी नहीं बन सकता है ! ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, "जब तक मन में खोट और दिल में पाप है, तब तक बेकार सारे मन्त्र और जाप है !" ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

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भारत में मुसलमानो के 800 वर्ष के शासन का झूठ : श्री राजिव दीक्षित द्वारा 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ क्या भारत में मुसलमानों ने 800 वर्षों तक शासन किया है। सुनने में यही आता है पर न कभी कोई आत्ममंथन करता है और न इतिहास का सही अवलोकन। आईये देखते हैं, इतिहास के वास्तविक नायक कौन थे? और उन्होंने किस प्रकार मुगलिया ताकतों को रोके रखा और भारतीय संस्कृति की रक्षा में सफल रहे। राजा दाहिर : 〰️〰️〰️〰️ प्रारम्भ करते है मुहम्मद बिन कासिम के समय से भारत पर पहला आक्रमण मुहम्मद बिन ने 711 ई में सिंध पर किया। राजा दाहिर पूरी शक्ति से लड़े और मुसलमानों के धोखे के शिकार होकर वीरगति को प्राप्त हुए। बप्पा रावल: 〰️〰️〰️〰️ दूसरा हमला 735 में राजपुताना पर हुआ जब हज्जात ने सेना भेजकर बप्पा रावल के राज्य पर आक्रमण किया। वीर बप्पा रावल ने मुसलमानों को न केवल खदेड़ा बल्कि अफगानिस्तान तक मुस्लिम राज्यों को रौंदते हुए अरब की सीमा तक पहुँच गए। ईरान अफगानिस्तान के मुस्लिम सुल्तानों ने उन्हें अपनी पुत्रियां भेंट की और उन्होंने 35 मुस्लिम लड़कियों से विवाह करके सनातन धर्म का डंका पुन: बजाया। बप्पा रावल का इतिहास कही नहीं पढ़ाया जाता। यहाँ तक की अधिकतर इतिहासकर उनका नाम भी छुपाते है। गिनती भर हिन्दू होंगे जो उनका नाम जानते हैं! दूसरे ही युद्ध में भारत से इस्लाम समाप्त हो चुका था। ये था भारत में पहली बार इस्लाम का नाश। सोमनाथ के रक्षक राजा जयपाल और आनंदपाल: 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अब आगे बढ़ते है गजनवी पर। बप्पा रावल के आक्रमणों से मुसलमान इतने भयक्रांत हुए की अगले 300 सालों तक वे भारत से दूर रहे। इसके बाद महमूद गजनवी ने 1002 से 1017 तक भारत पर कई आक्रमण किये पर हर बार उसे भारत के हिन्दू राजाओ से कड़ा उत्तर मिला। पहले राजा जयपाल और फिर उनका पुत्र आनंदपाल, दोनों ने उसे मार भगाया था। महमूद गजनवी ने सोमनाथ पर भी कई आक्रमण किये पर 17 वे युद्ध में उसे सफलता मिली थी। सोमनाथ के शिवलिंग को उसने तोडा नहीं था बल्कि उसे लूट कर वह काबा ले गया था। जिसका रहस्य आपके समक्ष जल्द ही रखता हु। यहाँ से उसे शिवलिंग तो मिल गया जो चुम्बक का बना हुआ था। पर खजाना नहीं मिला। भारतीय राजाओ के निरंतर आक्रमण से वह वापिस गजनी लौट गया और अगले 100 सालो तक कोई भी मुस्लिम आक्रमणकारी भारत पर आक्रमण न कर सका। सम्राट पृथ्वीराज चौहान: 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 1098 में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज राज चौहान को 16 युद्द के बाद परास्त किया और अजमेर व दिल्ली पर उसके गुलाम वंश के शासक जैसे कुतुबुद्दीन, इल्तुमिश व बलवन दिल्ली से आगे न बढ़ सके। उन्हें हिन्दू राजाओ के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। पश्चिमी द्वार खुला रहा जहाँ से बाद में ख़िलजी लोधी तुगलक आदि आये। ख़िलजी भारत के उत्तरी भाग से होते हुए बिहार बंगाल पहुँच गए। कूच बिहार व बंगाल में मुसलमानो का राज्य हो गया पर बिहार व अवध प्रदेश मुसलमानो से अब भी दूर थे। शेष भारत में केवल गुजरात ही मुसलमानो के अधिकार में था। अन्य भाग स्वतन्त्र थे। राणा सांगा:- 〰️〰️〰️ 1526 में राणा सांगा ने इब्राहिम लोधी के विरुद्ध बाबर को बुलाया। बाबर ने लोधियों की सत्ता तो उखाड़ दी पर वो भारत की सम्पन्नता देख यही रुक गया और राणा सांगा को उसने युद्ध में हरा दिया। चित्तोड़ तब भी स्वतंत्र रहा पर अब दिल्ली मुगलो के अधिकार में थी। हुमायूँ दिल्ली पर अधिकार नहीं कर पाया पर उसका बेटा अवश्य दिल्ली से आगरा के भाग पर शासन करने में सफल रहा। तब तक कश्मीर भी मुसलमानो के अधिकार में आ चूका था। महाराणा प्रताप:- 〰️〰️〰️〰️〰️ अकबर पुरे जीवन महाराणा प्रताप से युद्ध में व्यस्त रहा। जो बाप्पा रावल के ही वंशज थे और उदय सिंह के पुत्र थे जिनके पूर्वजो ने 700 सालो तक मुस्लिम आक्रमणकारियों का सफलतापूर्वक सामना किया। जहाँगीर व शाहजहाँ भी राजपूतों से युद्धों में व्यस्त रहे व भारत के बाकी भाग पर राज्य न कर पाये। दक्षिण में बीजापुर में तब तक इस्लाम शासन स्थापित हो चुका था। छत्रपति शिवाजी महाराज: औरंगजेब के समय में मराठा शक्ति का उदय हुआ और शिवाजी महाराज से लेकर पेशवाओ ने मुगलो की जड़े खोद डाली। शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिंदवी स्वराज्य का विस्तार उनके बाद आने वाले मराठा वीरों ने किया। बाजीराव पेशवा इन्होने मराठा सम्राज्य को भारत में हिमाचल बंगाल और पुरे दक्षिण में फैलाया। दिल्ली में उन्होंने आक्रमण से पहले गौरी शंकर भगवान से मन्नत मांगी थी कि यदि वे सफल रहे तो चांदनी चौक में वे भव्य मंदिर बनाएंगे। जहाँ कभी पीपल के पेड़ के नीचे 5 शिवलिंग रखे थे। बाजीराव ने दिल्ली पर अधिकार किया और गौरी शंकर मंदिर का निर्माण किया। जिसका प्रमाण मंदिर के बाहर उनके नाम का लगा हुआ शिलालेख है। बाजीराव पेशवा ने एक शक्तिशाली हिन्दुराष्ट्र की स्थापना की जो 1830 तक अंग्रेजो के आने तक स्थापित रहा।_ अंग्रेजों और मुगलों की मिलीभगत:। 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ मुगल सुल्तान मराठाओ को चौथ व कर देते रहे थे और केवल लालकिले तक सिमित रह गए थे। और वे तब तक शक्तिहीन रहे। जब तक अंग्रेज भारत में नहीं आ गए। 1760 के बाद भारत में मुस्लिम जनसँख्या में जबरदस्त गिरावट हुई जो 1800 तक मात्र 7 प्रतिशत तक पहुँच गयी थी। अंग्रेजो के आने के बाद मुसल्मानो को संजीवनी मिली और पुन इस्लाम को खड़ा किया गया, ताकि भारत में सनातन धर्म को नष्ट किया जा सके। इसलिए अंग्रेजो ने 50 साल से अधिक समय से पहले ही मुसलमानो के सहारे भारत विभाजन का षड्यंत्र रच लिया था। मुसलमानो के हिन्दु विरोधी रवैये व उनके धार्मिक जूनून को अंग्रेजो ने सही से प्रयोग किया तो यह झूठा इतिहास क्यों पढ़ाया गया? असल में हिन्दुओ पर 1200 सालो के निरंतर आक्रमण के बाद भी जब भारत पर इस्लामिक शासन स्थापित नहीं हुआ और न ही अंग्रेज इस देश को पूरा समाप्त कर सके। तो उन्होंने शिक्षा को अपना अस्त्र बनाया और इतिहास में फेरबदल किये। अब हिन्दुओ की मानसिकता को बदलना है तो उन्हें ये बताना होगा की तुम गुलाम हो। लगातार जब यही भाव हिन्दुओ में होगा तो वे स्वयं को कमजोर और अत्याचारी को शक्तिशाली समझेंगे। इसी चाल के अंतर्गत ही हमारा जातीय नाम आर्य के स्थान पर हिन्दू रख दिया गया, जिसका अर्थ होता है काफ़िर, काला, चोर, नीच आदि ताकि हम आत्महीनता के शिकार हो अपने गौरव, धर्म, इतिहास और राष्ट्रीयता से विमुख हो दासत्व मनोवृति से पीड़ित हो सकें। *वास्तव में हमारे सनातन धर्म के किसी भी शास्त्र और ग्रन्थ में हिन्दू शब्द कहीं भी नहीं मिलता बल्कि शास्त्रो में हमे आर्य, आर्यपुत्र और आर्यवर्त राष्ट्र के वासी बताया गया है। आज भी पंडित लोग संकल्प पाठ कराते हुए "आर्यवर्त अन्तर्गते..."* का उच्चारण कराते हैं । अत: भारत के हिन्दुओ को मानसिक गुलाम बनाया गया जिसके लिए झूठे इतिहास का सहारा लिया गया और परिणाम सामने है। लुटेरे और चोरो को आज हम बादशाह सुलतान नामो से पुकारते है उनके नाम पर सड़के बनाते है। शहरो के नाम रखते है और उसका कोई हिन्दू विरोध भी नहीं करता जो बिना गुलाम मानसिकता के संभव नहीं सकता था। इसलिए उन्होंने नई रण नीति अपनाई। इतिहास बदलो, मन बदलो और गुलाम बनाओ। यही आज तक होता आया है। जिसे हमने मित्र माना वही अंत में हमारी पीठ पर वार करता है। इसलिए झूठे इतिहास और झूठे मित्र दोनों से सावधान रहने की आवश्यकता है। इस लेख को अधिक से अधिक जनता तक पहुंचाएं। हमें अपना वास्तविक इतिहास जानने का न केवल अधिकार है अपितु तीव्र आवश्यकता भी, ताकि हम उस दास मानसिकता से मुक्त हो सकें जो हम सब के अंदर घर कर गयी है, ताकि हम जान सकें की हम कायर और विभाजित पूर्वजों की सन्तान नहीं, हम कर्मठ और संगठित वीरों की सन्तान हैं। 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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धेनुक के पूर्वजन्म का परिचय, बलि-पुत्र साहसिक तथा तिलोत्तमा का स्वच्छन्द विहार, दुर्वासा का शाप और वर, साहसिक का गदहे की योनि में जन्म लेना तथा तिलोत्तमा का बाणपुत्री ‘उषा’ होना---------------------------------------- नारद जी ने पूछा– भगवन! किस पाप से बलि-पुत्र साहसिक को गदहे की योनि प्राप्त हुई? दुर्वासा जी ने किस अपराध से दानवराज को शाप दिया? नाथ! फिर किस पुण्य से दानवेश्वर ने सहसा महाबली श्रीहरि का धाम एवं उनके साथ एकत्व (सायुज्य) मोक्ष प्राप्त कर लिया? . संदेह-भंजन करने वाले महर्षे! इन सब बातों को आप विस्तारपूर्वक बताइये। अहो! कवि के मुख में काव्य पद-पद पर नया-नया प्रतीत होता है। भगवान श्रीनारायण ने कहा– वत्स! नारद! सुनो। मैं इस विषय में प्राचीन इतिहास कहूँगा। मैंने इसे पिता धर्म (देवता) के मुख से गन्धमादन पर्वत पर सुना था। यह विचित्र एवं अत्यन्त मनोहर वृत्तान्त पाद्म-कल्प का है और श्री नारायण देव की कथा से युक्त होने के कारण कानों के लिये उत्तम अमृत है। जिस कल्प की यह कथा है, उसमें तुम उपबर्हण नामक गन्धर्व के रूप में थे। तुम्हारी आयु एक कल्प की थी। तुम शोभायमान, सुन्दर और सुस्थिर यौवन से सम्पन्न थे। पचास कामिनियों के पति होकर सदा श्रृंगार में ही तत्पर रहते थे। ब्रह्मा जी के वरदान से तुम्हें सुमधुर कण्ठ प्राप्त हुआ था और तुम सम्पूर्ण गायकों के राजा समझे जाते थे। उन्हीं दिनों दैववश ब्रह्मा का शाप प्राप्त हुआ था और तुम दासीपुत्र हुए और वैष्णवों के अवशिष्ट भोजन जनित पुण्य से इस समय साक्षात ब्रह्मा जी के पुत्र हो। अब तो तुम असंख्य कल्पों तक जीवित रहने वाले महान वैष्णवशिरोमणि हो। ज्ञानमयी दृष्टि से सब कुछ देखते और जानते हो तथा महादेव जी के प्रिय शिष्य हो। मुने! उस पाद्म-कल्प का वृत्तान्त मुझसे सुनो। दैत्य के इस सुधा-तुल्य मधुर वृत्तान्त को मैं तुम्हें सुना रहा हूँ। एक दिन की बात है। बलि का बलवान पुत्र साहसिक अपने तेज से देवताओं को परास्त करके गन्धमादन की ओर प्रस्थित हुआ। उसके सम्पूर्ण अंग चन्दन से चर्चित थे। वह रत्नमय आभूषणों से विभूषित हो रत्न के ही सिंहासन पर विराजमान था। उसके साथ बहुत बड़ी सेना थी। इसी समय स्वर्ग की परम सुन्दरी अप्सरा तिलोत्तमा उस मार्ग से आ निकली। उसने साहसिक को देखा और साहसिक ने उसको। पुंश्चली स्त्रियों का आचरण दोषपूर्ण होता ही है। वहीं दोनों एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो गये। चन्द्रमा के समीप जाती हुई तिलोत्तमा वहाँ बीच में ही ठहर गयी। कुलटा स्त्रियाँ कैसी दुष्टहृदया होती हैं और वे किसी भी पाप का विचार न करके सदा पापरत ही रहा करती हैं– यह सब बतलाकर भी तिलोत्तमा ने अपने बाह्य रूप-सौन्दर्य से साहसिक को मोहित कर लिया। तदनन्तर वे दोनों गन्धमादन के एकान्त रमणीय स्थान में जाकर यथेच्छ विहार करने लगे। वहीं मुनिवर दुर्वासा योगासन से विराजमान होकर श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों का चिन्तन कर रहे थे। तिलोत्तमा और साहसिक उस समय कामवश चेतनाशून्य थे। उन्होंने अत्यन्त निकट ध्यान लगाये बैठे हुए मुनि को नहीं देखा। उनके उच्छृंखल अभिसार से मुनि का ध्यान सहसा भंग हो गया। उन्होंने उन दोनों की कुत्सिक चेष्टाएँ देख क्रोध में भरकर कहा। दुर्वासा बोले– ओ गदहे के समान आकार वाले निर्लज्ज नराधम! भक्तशिरोमणि बलि का पुत्र होकर भी तू इस तरह पशुवत आचरण कर रहा है। देवता, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व तथा राक्षस –ये सभी सदा अपनी जाति में लज्जा का अनुभव करते हैं। पशुओं के सिवा सभी मैथुन-कर्म में लज्जा करते हैं। विशेषतः गदहे की जाति ज्ञान तथा लज्जा से हीन होती है; अतः दानवश्रेष्ठ! अब तू गदहे की योनि में जा। तिलोत्तमे! पुंश्चली स्त्री तो निर्लज्ज होती ही है। दैत्य के प्रति तेरी ऐसी आसक्ति है तो अब तू दानव योनि में ही जन्म ग्रहण कर। ऐसा कहकर रोष से जलते हुए दुर्वासा मुनि वहाँ चुप हो गये। फिर वे दोनों लज्जित और भयभीत होकर उठे तथा मुनि की स्तुति करने लगे। साहसिक बोला– मुने! आप ब्रह्मा, विष्णु और साक्षात महेश्वर हैं। अग्नि और सूर्य हैं। आप संसार की सृष्टि, पालन तथा संहार करने में समर्थ हैं। भगवन! मेरे अपराध को क्षमा करें। कृपानिधे! कृपा करें। जो सदा मूढ़ों के अपराध को क्षमा करे, वही संत-महात्मा एवं ईश्वर है। यों कहकर वह दैत्यराज मुनि के आगे उच्चस्वर से फूट-फूटकर रोने लगा और दाँतों में तिनके दबाकर उनके चरणकमलों में गिर पड़ा। तिलोत्तमा बोली– हे नाथ! हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! मुझ पर कृपा कीजिये। विधाता की सृष्टि में सबसे अधिक मूढ़ स्त्रीजाति ही है। सामान्य स्त्री की अपेक्षा अधिक मतवाली एवं मूढ़ कुलटा होती है, जो सदा अत्यन्त कामातुर रहती है। प्रभो! कामुक प्राणी में लज्जा, भय और चेतना नहीं रह जाती है। नारद! ऐसा कहकर तिलोत्तमा रोती हुई दुर्वासा जी की शरण में गयी। भूतल पर विपत्ति में पड़े बिना भला किन्हें ज्ञान होता है? उन दोनों की व्याकुलता देखकर मुनि को दया आ गयी। उस समय उन मुनिवर ने उन्हें अभय देकर कहा। दुर्वासा बोले– दानव! तू विष्णुभक्त बलि का पुत्र है। उत्तम कुल में तेरा जन्म हुआ है। तू पैतृक परम्परा से विष्णुभक्त है। मैं तुझे निश्चितरूप से जानता हूँ। पिता का स्वभाव पुत्र में अवश्य रहता है। जैसे कालिय के सिर पर अंकित हुआ श्रीकृष्ण का चरणचिह्न उसके वंश में उत्पन्न हुए सभी सर्पों के मस्तक पर रहता है। वत्स! एक बार गदहे की योनि में जन्म लेकर तू निर्वाण (मोक्ष)– को प्राप्त हो , सत्पुरुषों द्वारा पहले जो चिरकाल तक श्रीकृष्ण की आराधना की गयी होती है, इसके पुण्य-प्रभाव का कभी लोप नहीं होता। अब तू शीघ्र ही व्रज के निकट वृन्दावन के ताल-वन में जा। वहाँ श्रीहरि के चक्र से प्राणों का परित्याग करके तू निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेगा। तिलोत्तमे! तू भारतवर्ष में बाणासुर की पुत्री होगी; फिर श्रीकृष्ण-पौत्र अनिरुद्ध का आलिंगन प्राप्त करके शुद्ध हो जायेगी। महामुने! यों कहकर दुर्वासा मुनि चुप हो गये। तत्पश्चात वे दोनों भी उन मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम करके यथास्थान चले गये। इस प्रकार दैत्य साहसिक के गदर्भ-योनि में जन्म लेने का सारा वृत्तान्त मैंने कह सुनाया। तिलोत्तमा बाणासुर की पुत्री उषा होकर अनिरुद्ध की पत्नी हुई।

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अंगदेश से अंगकोरवाट कंबोडिया तक.. मैं #अंगदेश बोल रहा हूं। अंगराज कर्ण का अंगदेश और आज का #भागलपुर शहर। गंगा मैया के दक्षिणी किनारे पर तकरीबन पिछले तीन हजार साल से मेरा अस्तित्व कायम है। लिहाजा आप यह कह सकते हैं कि मेरा अस्तित्व विश्व सबसे पुराने शहरों में से एक है। एक ऐसा शहर जिसके जलवे समय-सागर के थपेड़ों से वक्त बेवक्त बेरौनक जरूर हुए पर मिटे नहीं। महलों की रंगीनियां, शासकों की शौर्यगाथाएं और विद्वानों का तेज हमेशा मेरे हिस्से में रहा, पर मेरी असली पहचान हमेशा एक व्यावसायिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में रही। वस्त्रों में सबसे अनुपम #रेशम के उत्पादन के लिये मेरा नाम चांदो सौदागर के जमाने से पूरी दुनिया में फैला है और उसी के साथ फैली है #विक्रमशिला विश्वविद्यालय की ख्याति, #कर्ण की दानवीरता की कहानियां, जदार्लू आम और कतरनी चावल की खुशबू, जैन तीर्थंकर वासुपूज्य की ख्याति, महर्षि मेहीं का अध्यात्म और ऐसी ही सैकड़ों चीजें. हजारों साल का वृद्ध मैं भागलपुर आज अपनी कहानी लेकर आपके समक्ष उपस्थित हूँ। पुण्य देश के राजा थे #भागदत्त, जिन्होंने मुझे अपना नाम दिया। पहले मुझे भागदत्तपुरम पुकारा जाता था। बाद में बदलकर यह भागलपुर हो गया। पहले मेरा अस्तित्व एक उपनगर के रूप में था जो अंगदेश की राजधानी चंपा से सटा था। समय का फेर देखिये अब चंपा ही उपनगर बनकर चंपानगर हो गयी है और मैं भागलपुर ही नगर का मुख्यकेंद्र बन चुका हूँ। चंपा का नाम अंगराज चंपा के नाम पर उनके पिता ने रखा था, पहले उस नगरी का नाम मालिनी था। फूल से दो नामों वाले उस शहर की भी क्या रौनक थी। जहां राजा बलि के सबसे बड़े पुत्र अंग का राज्य चलता था, जिन्हें पृथ्वीपति की उपाधि मिली थी, उसी वंश में आगे चलकर चित्ररथ नामक न्यायप्रिय सम्राट हुए जिनके राज्य में लक्ष्मी और सरस्वती अपनी श्रेष्ठता का फैसला कराने पहुंची थीं। राजा रोमपाद जो अयोध्या के राजा दशरथ के समकालीन थे और उनका एक नाम भी दशरथ ही था। अयोध्या नरेश दशरथ की पुत्री शांता रोमपाद के ही महल में उनकी दत्तक पुत्री के रूप में रहती थीं, जिनका विवाह श्रृंगी ऋषि के साथ हुआ और उसी श्रृंगी ऋषि द्वारा कराये गये अनुष्ठान से दशरथ को राम जैसे पुत्र मिले। राजा कर्ण की वीरता और दानशीलता की कहानी जगजाहिर है. वे इसी चंपा शहर में वास करते थे, उनका महल कर्णगढ़ कहलाता था। जहां आजकल पुलिस प्रशिक्षण अकादमी संचालित हो रही है। उनका विवाह भागदत्त की एक पुत्री से हुआ था, जबकि दूसरी पुत्री का विवाह उनके मित्र दुर्योधन से हुआ था। फिर इस शहर पर जगत प्रसिद्ध चांदो सौदागर का राज हुआ, जिसकी बहू बिहुला ने अपने तप से अपने मृत पति और पांच जेठों को फिर से जिलाने में सफलता प्राप्त की और मनसा पूजा की शुरुआत की। अविश्वसनीय सी लगने वाली ये तमाम कहानियां पुराण के पन्नों में दर्ज हैं। और यह भी कि #कंबोडिया कभी भागलपुर का सांस्कृतिक उपनिवेश हुआ करता था और वहां का #अंकोरवाट मंदिर वस्तुत: अंगकोरवाट मंदिर है। हालांकि इस तथ्य से देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी सहमत नजर आते हैं और राष्ट्र कवि दिनकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय में भी इस तथ्य का उल्लेख किया है। बहरहाल इसके बाद की ऐतिहासिक कथा भी कम गौरवशाली नहीं। खास तौर पर पाल राजाओं का जमाना, जब मेरे शहर के पड़ोस में एक गांव अंतीचक में एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय खुला, जिसे विक्रमशिला महाविहार का नाम दिया गया। उस तंत्र शिक्षण केंद्र में दुनिया भर से छात्र आते थे। इसी विश्वविद्यालय का कमाल था कि मेरे इलाके से आर्यभट्ट और अतिश दीपंकर जैसे विद्वान पैदा हुए। आर्यभट्ट की कीर्ति तो दुनिया जानती ही है पर सबौर वासी अतिश दीपंकर का योगदान भी कम नहीं है, जिन्होंने तिब्बत में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया और लामा संप्रदाय की शुरुआत की। बहरहाल काल के कपाल में चंपा, मालिनी, कर्णगढ़ तो समा ही गये और विक्रमशिला महाविहार भी जमींदोज हो गया और उसके साथ ही मिटने लगी यहां पैदा हुई तंत्र साधना व सिद्ध और नाथ संप्रदाय की परंपराएं। पहले अंग देश मगध का हिस्सा बना फिर बंगाल का। बंगाल से पाल और सेन वंश मिटे और तुर्क-अफगानों और मुगलों का शासन हुआ। फिर अंग देश से राज्य और राज्य से क्षेत्र बनकर रह गया। सम्राट मिटे, राजा आये और राजा मिटे तो शासक और फिर महज जमींदार। मगर इसके बावजूद इस क्षेत्र की महत्ता कभी कम नहीं हुई। यह उसी दौर की बात है जब शहर का केंद्र चंपानगर और नाथनगर से हटकर भागलपुर में मेरे आगोश में समाने लगा था। पाल वंश के बाद सेन वंश के राजाओं ने बंगाल पर शासन करना शुरू किया, मगर उसका एक राजा लक्ष्मण सेन इतना कायर निकला कि वह मोहम्मद गोरी को आता देख गद्दी छोड़ भाग खड़ा हुआ। इस तरह बंग के अधीन अंग के इलाकों तुर्क-अफगानों और फिर मुगलों का आधिपत्य कायम हुआ। इसके बाद मेरे इलाकों में रोशन खयाल और कला प्रेमी मुसलमानों की आबादी ने ठिकाना बनाना शुरू किया। मेरे इन बाशिंदों ने पूरे शहर में जगह-जगह इमारतें, मसजिदें और मकबरे खड़े किये जो आज भी मेरी धरोहरों की श्रृंखला में चार चांद लगाते हैं। उनकी हुनरमंदी इमारतों के कंगूरों से उतर कर रेशम के डिजाइनों तक में जा पहुंची। इसकी जौहर का नमूना था कि लोग मुझे सिल्क सिटी या रेशम नगरी कह कर पुकारने लगे हैं। फिर शायरी के तरानों का क्या कहना कि बीड़ी बनाने वाला एक मजदूर कौस भी अपने शेरों से मीर और मोमिन को टक्कर देता रहा। वैसे तो मोहम्मद गोरी के आगमन से लेकर मीर कासिम के पतन तक इस शहर पर मुसलमानों की ही हुकूमत चली पर कई दौर ऐसे आये जब यह दिल्ली की सल्तनत से आजाद अस्तित्व बनाने में सफल रही। यही वजह है कि दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक उठा पटक में मात खाने वाले कई शहजादे गुप्त रूप से भागलपुर में अपना ठिकाना बनाकर रहने लगे। शहर के लोग कई गुमनाम मकबरों के बारे में बताते हैं कि फलां मुहम्मद शाह का मकबरा है तो फलां अहमद शाह का। इसके अलावा कई पीर-फकीरों ने भी मुझे अपना आशियाना बनाये। इनमें से कइयों के मजार आज भी कायम हैं। कई लोगों का यह भी मानना है कि मेरा नाम भागलपुर इसलिये पड़ा क्योंकि यहां दूसरे इलाकों से भागकर आये लोगों ने अपना ठिकाना बनाया है। यह भाग कर आये लोगों की नगरी है इसलिये भागलपुर है। पता नहीं भागदत्त वाली कथा सही है या यह, मगर इस बात में सच्चाई जरूर है कि मेरे शहर के आगोश में कई दूर दराज के वाशिंदों ने पनाह ली है। चाहे वह सरयूपारी ब्राह्मण हों या बंग भाषी या दरभंगा-मधुबनी के मैथिल या राजस्थान से पहुंचे माड़वाड़ी समुदाय के लोग। पता नहीं मेरी आबोहवा में क्या आकर्षण था कि इन सारे लोगों ने रहने के लिये मुझे ही चुना। मगर मेरे मिजाज को तय करने में इन लोगों का बड़ा योगदान है, खास तौर पर बंग भाषियों का जिन्होंने इस शहर के लोगों को कविता-कहानी लिखने और जात्रा-नाटक करने का चस्का लगाया। मेरे शहर में बसे मुहल्ले आदमपुर की गलियों में मशहूर कथाकार शरतचंद्र को #देवदास उपन्यास की कथा मिली तो टील्हा कोठी के एकांत में रविन्द्रनाथ टैगोर के #गीतांजलि की प्रथम कड़ियों ने आकार लिया। यह उन्हीं लोगों की रोशन खयाली का नतीजा था कि इस शहर की एक बेटी कादंबिनी गांगुली को ग्रेजुएट होने वाली देश की पहली महिला बनने का सौभाग्य हासिल हुआ और अशोक कुमार और किशोर कुमार जैसे जमींदार खानदान के नवासे फिल्मी दुनिया के सतरंगी परदे पर अपनी हुकूमत कायम करने में कामयाब रहे। प्रीतीश नंदी ने साहित्य और मनोरंजन की दुनिया को एक नई पहचान दी। इसी आजाद ख्याली का नतीजा था कि यह शहर अंग्रेजी हुकूमत की खिलाफत में भी अगुआ साबित हुआ। पहाड़िया विद्रोही तिलकामांझी ने जब विद्रोह की लौ सुलगाई थी तब दुनिया अंग्रेजी जुल्म की हकीकत का आंकलन भी नहीं कर पाये थे। गांधी जी के सत्याग्रह के मौके पर शहर में आंदोलनकारियों का हुजूम उमड़ता था। 1934 में जब मुंगेर में भीषण भूकंप आया और जबरदस्त तबाही मची तो इन्हीं सेनानियों ने बाना बदला और रिलीफ के काम में जुट गये। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कई जगह प्रदर्शन हुए और प्रदर्शनकारियों ने अंग्रेजी फौज की गोलियों का सामना बहादुरी के साथ किया। देश आजाद हुआ तो नेहरूजी प्रधानमंत्री बने। इसके बाद वे जब पहली बार भागलपुर आये तो लोगों ने सैंडिस कंपाउंड में चांदी कुर्सी उन्हें बैठने के लिये दी। मगर उस जननायक ने चांदी की कुर्सी यह कहते हुए फेंक दी कि जनता जमीन पर और नेता सिंहासन पर यह नहीं चलेगा। आजादी की लड़ाई में इस शहर ने जितनी कुर्बानियां दीं आजादी के बाद उसका हासिल हमारे हिस्से में बहुत कम आया। शहर धीरे-धीरे ढहता रहा और लोगों में निराशा बढ़ती रही। उस निराशा का विस्फोट तब हुआ जब जेपी ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। एक बार फिर मैं व्यवस्था की तानाशाही के खिलाफ लड़ने वालों का केंद्र बन गया। भागलपुर जेल में ही उस दौरान इमरजेंसी की खिलाफत करने वाले बंदियों को रखा गया था और जेल की चाहरदीवारी के अंदर से विरोध के स्वर फूटते रहे। कुछ ही सालों बाद शहर में ऐसी वारदातें हुईं जो आज भी मेरे चरित्र पर बदनुमा दाग बनकर कायम है। अपराध नियंत्रण में नाकामयाब होकर पुलिस कर्मियों ने ३३ युवकों की आंखों में तेजाब डाल दिया। खुद फैसला करने की इस पुलिसिया मनोवृत्ति ने एक गलत काम के कारण पूरी दुनिया में मुझे चर्चा का केंद्र बना दिया। दस साल बाद फिर पुलिसिया करतूत के कारण शहर की फिजा बिगड़ी और हजारों लोग सांप्रदायिक हिंसा की बलि चढ़ गये। पहली घटना ने तो शहर के चरित्र का हनन किया था दूसरी ने शहर की आबोहवा में जहर घोल दिया। इस कारोबारी शहर के कारोबारी रिश्ते तक गड़बड़ाने लगे। खैर यह बुनकर-व्यवसायी का ही रिश्ता था कि शहर के अमन-चैन को पटरी पर आ गया। खैर उसके बाद से शहर का अमन-चैन बरकरार है। लोग जात-धर्म के बदले कारोबार की बातें करते हैं। सन २००१ में विक्रमशिला सेतु बना तो उत्तर बिहार के कई जिले भागलपुर के संपर्क में आ गये। इसके बाद यहां के कारोबार ने तो जैसे उड़ान पकड़ लिया। डल चादर के लिये मशहूर यह शहर तो पहले डल स्वभाव का था अब महानगरों की तेज रफ्तार जिंदगी से कदम मिलाने की कोशिश कर रहा है। धड़ाधड़ अपार्टमेंट बन रहे हैं, शोरूम खुल रहे हैं। लक्ज़री कारों से शहर की सड़कें अटी रहती हैं। इसके बावजूद शहर के शोर में अंगिका की खनक कायम है। बिहुला विषहरी के बोल अब भी गूंजते हैं, गंगा घाटों पर अब भी स्नानार्थियों का मेला लगता है। कतरनी की खुशबू और जरदालू आम की गमक अब भी सैलानियों को मेरे पास खींच लाती है। मैं आज भी आपका ही शहर हूं, वही भागलपुर। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,,

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#पुण्ड्रवर्धन का उल्लेख गुप्तकालीन अभिलेखों में हुआ है। इन अभिलेखों से सूचित होता है कि गुप्त साम्राज्य में 'पुण्ड्रवर्धन' नाम की एक 'भुक्ति' थी, जो 'पुंड्र देश' के अंतर्गत आती थी। इसमें कोटिवर्ष आदि अनेक वर्ष सम्मलित थे। इन ताम्रपट्ट लेखों से सूचित होता है कि लगभग समग्र उत्तरी बंगाल या पुंड्र देश, पुंड्रवर्धन भुक्ति में सम्मलित था और यह ४४३ ई. से ५४३ ई. तक गुप्त साम्राज्य का अविछिन्न अंग था। यहाँ के शासक 'उपरिक महाराज' की उपाधि धारण करते थे और इन्हें गुप्त नरेश नियुक्त करते थे। कुमारगुप्त प्रथम के समय में उपरिक चिरातदत्त को पुण्ड्रवर्धन का शासक नियुक्त किया गया था और बुधगुप्त के समय में यहाँ का शासक ब्रह्मदत्त था। संभवत: पुण्ड्रवर्धन भुक्ति का प्रधान नगर वर्तमान रंगपुर के निकट रहा होगा। भारत के बिहार राज्य के #पूर्णिया ज़िले में मौर्य सम्राट अशोक के स्तूप हैं। पूर्व में बंगाल तक मौर्य साम्राज्य के विस्तृत होने की पुष्टि 'महास्थान शिलालेख' से होती है। यह अभिलेख ब्राह्मी लिपि में है और मौर्य काल का माना जाता है। महावंश के अनुसार अशोक अपने पुत्र को विदा करने के लिए ताम्रलिप्ति तक आया था। ह्वेनसांग को भी ताम्रलिप्ति, कर्णसुवर्ण, समतट, पूर्वी बंगाल तथा पुण्ड्रवर्धन में अशोक के स्तूप देखने को मिले थे। महाभारत काल में आज का बिहार राज्य का नेपाल देश की सीमाओं से सटा जिला पूर्णियाँ भी #पौन्ड्रिया क्षत्रियों की गढ मानी जाती थी। जिन्होंने कुरुक्षेत्र महाभारत के युद्ध में कौरवों का साथ दिया था। इसके दक्षिण में गंगा नदी के उस पार कुंती पुत्र अंगराज #कर्ण का अंग देश का विस्तृत भूभाग, जिसकी सीमाएं कभी आज के #भागलपुर मुंगेर से बढकर बर्मा #अंगकोरवाट की सीमाओं से जा लगती थी। आधिपत्य के कालखण्ड बदलते गए और एक विस्तृत आधिपत्य भूभाग अपने बदलते नामों के साथ सिमटते चले गए। #महाभारत काल का ये जंगलों या अरण्यों का वृहत क्षेत्र ही था जिसके पेड़ों की ओट में पांडव अपने अस्त्र शस्त्रों व वस्त्रों को छिपाकर #नेपाल विराट देश को अज्ञातवास के दौरान गए थे, और फिर इन्हीं भूभागीय पूर्ण अरण्य क्षेत्र के कारण आज का पूर्णियाँ नाम भी सार्थक जान पड़ता है। यहाँ के इन्हीं अरण्य संपदा के मध्य कितने ही वृहत जलाशयों का भंडार भी मौजूद था। कहते हैं #वैदिककाल में यहाँ के जलाशयों से कमल फूल के पत्ते देवलोक व स्वर्गलोक यक्षों, गंधर्वों व अप्सराओं के माध्यम से जाते थे, और इन पत्तों पे भोजन करना ही श्रेष्ठ व उत्तम माना जाता था। कमल फूल के इन पत्तों को #पुरैन कहा जाता है और फिर इसी पुरैन नाम से पूर्णियाँ का पुराना नाम पुरैनियाँ भी सिद्ध जान पड़ता है। कमल के फूल व पत्तों से भरे ऐसे जलाशय अब भले ही कम पड़ गए हों लेकिन इनके बदले स्वरुप में इस क्षेत्र में होने वाली #मखाना की खेती आज विश्व प्रसिद्ध है, जिसके आरंभिक फल कमल फूल के पत्ते से दिखने वाले इन्हीं तरह के बड़े बड़े पत्तों के उपर ही अंकुरित होती है। हिन्दू मान्यतानुसार पूजा पाठों व पर्वों में बहुलता से प्रयोग होने वाले इस मखाना फल को अमृत फल या देव फल की संज्ञा दी गई है। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,,

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सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र: इक्ष्वाकु 'सूर्य' वंश..☀ चन्द्र टरे सूरज टरे, टरे जगत व्यवहार। पै दृढ़व्रत हरिश्चन्द्र को, टरे न सत्य विचार।। सत्यवादी राजा #हरिश्चंद्र पौरणिक ग्रंथों के आधार पर धार्मिक, सत्यप्रिय तथा न्यायी राजा थे। राजा हरिश्चंद्र ने महर्षि #विश्वामित्र को दिये अपने वादे को निभाने के लिए अपनी पत्नी और पुत्र को बेच डाला था। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार भगवान #श्रीराम चन्द्र के पूर्वज इक्ष्वाकु वंश त्रेता युग के राजा सत्यवृत त्रिशंकु के पुत्र राजा हरिश्चंद्र धार्मिक, सत्यप्रिय तथा न्यायी थे। एक बार उन्होंने स्त्रियों का आर्त्तनाद सुना। वे रक्षा के लिए पुकार रही थीं। हरिश्चंद्र ने उनकी रक्षा के निमित्त पग पढ़ाया तो उसके हृदय में विघ्नराज (संपूर्ण कार्यों में बाधा स्वरूप) ने प्रवेश किया, क्योंकि वह आर्त्तनाद उन विधाओं का ही था, जिनका विश्वामित्र अध्ययन करते थे। मौन और आत्मसंयम से जिन विधाओं को वे पहले सिद्ध नहीं कर पाये थे, वह नारी-रूप में उनके भय से पीड़ित होकर रो रही थीं। रुद्रकुमार विघ्नराज ने उनकी सहायता के निमित्त ही राजा के हृदय में प्रवेश किया था। हरिश्चंद्र ने अभिमानपूर्वक कहा—'वह कौन पापात्मा है जो हमारे राज्य में किसी को सता रहा है?' विश्वामित्र ने उसके अभिमान से रुष्ट होकर उससे पूछा—'दान किसे देना चाहिए? किसकी रक्षा करनी चाहिए और किससे युद्ध करना चाहिए?' राजा ने तीनों प्रश्नों के उत्तर क्रमश: ये दिये: दान ब्राह्मण अथवा आजीविका विहीन प्राणी को ही दान देना सर्वथा उचित है, भयभीत प्राणियों की रक्षा ही धर्माथ है और केवल अपने शत्रुओं से ही युद्ध करना नीतिपरकता है। विश्वामित्र ने ब्राह्मण होने के नाते राजा से उसका समस्त राज्य दानस्वरूप ले लिया। तदनंतर उसे उस राज्य की सीमाएं छोड़कर चले जाने को कहा और यह भी कहा कि एक माह के उपरांत हरिश्चंद्र उनके राजसूय यज्ञ के लिए दीक्षास्वरूप धन (दक्षिणा) भी प्रदान करे। राजा अपनी पत्नी #तारामती (#शैव्या) तथा पुत्र #रोहिताश्व को साथ लेकर पैदल ही काशी की ओर चल दिया। तारामती धीरे-धीरे चल रही थी, अतः क्रुद्ध मुनि ने उस पर डंडे से प्रहार किया। कालांतर में वे लोग काशी पहुंचे। वहां विश्वामित्र दक्षिणा लेने के निमित्त पहले से ही विद्यमान थे। कोई और मार्ग न देख राजा ने शैव्या और रोहिताश्व को एक ब्राह्मण के हाथों बेच दिया। दक्षिणा के लिए धन पर्याप्त न होने के कारण स्वयं चांडाल के हाथों बिक गया। वास्तव में धर्म ने ही चांडाल का रूप धारण कर रखा था। हरिश्चंद्र का कार्य शवों के वस्त्र आदि एकत्र करना था। उसे श्मशान भूमि में ही रहना भी पड़ता था। कुछ समय उपरांत किसी सर्प ने रोहिताश्व का दंशन कर लिया। उसका शव लेकर शैव्या श्मशान पहुँची। हरिश्चंद्र और शैव्या ने परस्पर पहचाना तो अपने-अपने कष्ट की गाथा कह सुनायी। तदनंतर चिता तैयार करके बालक रोहिताश्व के साथ ही हरिश्चंद्र और शैव्या ने आत्मदाह का निश्चय कर किया। धर्म ने प्रकट होकर उन्हें प्राण त्यागने से रोका। इन्द्र ने प्रकट होकर प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्वर्ग-लोक चलने के लिए कहा किंतु चांडाल की आज्ञा के बिना हरिश्चंद्र कहीं भी जाने के लिए तैयार नहीं था। रोहिताश्व चिता से जीता-जागता उठ खड़ा हुआ। धर्म ने बताया कि उसी ने चांडाल का रूप धारण किया था। तदुपरांत विश्वामित्र ने प्रसन्न होकर रोहिताश्व को अयोध्या का राजा घोषित कर उसका राज्य-तिलक किया। राजा हरिश्चंद्र ने शैव्या तथा अपने राज्य के अन्य अनेक व्यक्तियों सहित स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। हरिश्चंद्र के पुरोहित महर्षि #वसिष्ठ थे। वे बारह वर्ष तक जल में रहने के बाद बाहर निकले तो हरिश्चंद्र के ऐहिक कष्ट तथा स्वर्ग गमन के विषय में सुनकर बहुत क्रुद्ध हुए। उन्होंने विश्वामित्र को तिर्यक-योनि प्राप्त करने का शाप दिया। विश्वामित्र ने भी वसिष्ठ को वही शाप दिया, दोनो ने क्रमशः चील और बगुले का रूप प्राप्त किया। वे दोनों परस्पर लड़ने लगे, जिससे समस्त पृथ्वी तहस-नहस होने लगी। ब्रह्मा ने दोनों का पक्षी-रूप वापस ले लिया और उन्हें शांत कर फिर से मित्रता के सूत्र से आबद्ध किया। देवी भागवत के अनुसार एक बार इन्द्रलोक में विश्वामित्र वसिष्ठ से मिले। विश्वामित्र ने उनसे पूछा कि उन्हें इन्द्रलोक पहुंचने का पुण्य कैसे प्राप्त हुआ। वसिष्ठ ने कहा—'हरिश्चंद्र अत्यंत सत्यवादी हैं—उन्हीं के पुण्यों से इन्द्रलोक की प्राप्ति हुई है।' विश्वामित्र ने शेष घटना को स्मरण करके हरिश्चंद्र को मिथ्यावादी कहा। घर लौटकर उन्होंने अपना कथन सिद्ध करने का निश्चय किया। एक दिन राजा मृगया के लिए वन गये, वहां एक सुंदरी रो रही थी। उससे ज्ञात हुआ कि वह सिद्धिरुपिणी थी। उसे प्राप्त करने के लिए विश्वामित्र घोर तप कर रहे थे, अतः वह क्लेश पा रही थी। राजा ने उसका दुःख हरने के लिए विश्वामित्र को तपस्या छोड़ने के लिए कहा। विश्वामित्र तपस्या भंग होने से बहुत क्रुद्ध हो उठे। उन्होंने एक भंयकर दानव को शूकर का रूप देकर राजा के राज्य में भेजा। प्रजा के त्रास की निवृति के लिए राजा धनुष-वाण लेकर उसका पीछा करते हुए जंगल में गंगा तटीय एक तीर्थ स्थान पर पहुंच गये। नगर का मार्ग पूछते हुए राजा को विश्वामित्र ने तीर्थस्थान करने के लिए प्रेरित किया। तदनंतर दक्षिणा स्वरूप अपने मायावी पुत्र के विवाह में राजा ने समस्त राज्य देने को कहा। राजा दान देने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध थे। अतः उन्होंने राज्य प्रदान किया। विश्वामित्र ने ब्राह्मण के रूप ही फिर ढाई भार स्वर्ण की दक्षिणा मांगी। राजा ने दक्षिणा देना का वायदा तो कर लिया किंतु अब उसके पास स्वर्ण अथवा मुद्रा नहीं थी। अतः उसने पत्नी के कहने पर उसे बेचने का निश्चय किया। विश्वामित्र ने एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप धरकर उसकी पत्नी तथा बालक रोहिताश्व को ख़रीद लिया तथा एक चांडाल के हाथों राजा को बेचकर पर्याप्त मुद्रा प्राप्त कर ली। चांडाल का नाम वीरबाहु था। उसने राजा को श्मशान में मृत व्यक्तियों के वस्त्र लेने के लिए नियुक्त कर दिया। एक दिन रोहिताश्व बच्चों के साथ खेल रहा था। सांप के डंस लेने से उसका निधन हो गया। माँ अत्यंत दीनहीन स्थिति में विलाप करने लगी। नगर के लोग एकत्र हो गये। उनके परिचय पूछने पर उसने कोई उत्तर नहीं दिया, अतः सबने उसे मायावी राक्षसी जानकर चांडाल से कहा कि उसका वध कर दे। चांडाल ने पाशबद्ध करके हरिश्चंद्र को वध करने के निमित्त बुलाया। शैव्या ने अपने पुत्र का दाह-संस्कार करने तक उसे रुकने के लिए कहा। रोहिताश्व को देखने किए उपरांत राजा ने रानी को तथा शैव्या ने चांड़ाल वेशी राजा को पहचाना। दोनों ने विलाप करते हुए बालक का शव चिता पर रखा। तभी इन्द्र, विष्णु तथा विश्वामित्र सहित समस्त देवताओं ने वहां प्रकट होकर उन दोनों को सहनशीलता की सराहना की। धर्म ने हरिश्चंद्र को स्वर्ग प्रदान किया। राजा चांडाल से आज्ञा लेना नहीं भूले। धर्म ने कहा—'वास्तव में तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए मैंने ही ब्राह्माण, चांडाल तथा सर्प का रूप धारण किया था।' उनके आशीर्वाद से रोहिताश्व भी पुनर्जीवित हो उठा। राजा के कहने से उसकी समस्त प्रजा को भी स्वर्ग की प्राप्ति हुई। महाभारत वर्णित कथा में; इक्ष्वाकु वंश में त्रिशंकु नामक राजा तथा उनकी पत्नी सत्यवती के पुत्र का नाम हरिश्चंद्र था। हरिश्चंद्र ने समस्त पृथ्वी को जीतकर राजसूय यज्ञ किया। प्राचीन भारत के इक्ष्वाकु कुल वंश के प्रथम राजा इक्ष्वाकु थे। 'इक्ष्वाकु' शब्द 'इक्षु' से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ ईख होता है। पौराणिक परंपरा के अनुसार इक्ष्वाकु, #विवस्वान् (सूर्य) के पुत्र #वैवस्वत मनु के पुत्र थे। वैवस्वत मनु हिन्दू धर्म के अनुसार मानव जाति के प्रणेता व प्रथम पुरुष स्यंभुव मनु के बाद सातवें मनु थे। हरेक मन्वंतर में एक प्रथम पुरुष होता है, जिसे मनु कहते हैं। वर्तमान काल में वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है, जिसके प्रथम पुरुष वैवस्वत मनु थे, जिनके नाम पर ही मन्वन्तर का भी नाम है। भगवान सूर्य विवस्वान का विवाह विश्वकर्मा की पुत्री #संज्ञा से हुआ। विवाह के बाद संज्ञा ने वैवस्वत और यम (यमराज) नामक दो पुत्रों और यमुना(नदी) नामक एक पुत्री को जन्म दिया। यही विवस्वान यानि सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु कहलाये। वैवस्वत मनु के नेतृत्व में त्रिविष्टप अर्थात तिब्बत या देवलोक से प्रथम पीढ़ी के मानवों (देवों) का #मेरु प्रदेश में अवतरण हुआ। वे देव स्वर्ग से अथवा अम्बर (आकाश) से पवित्र वेद भी साथ लाए थे। इसी से श्रुतिऔर स्मृति की परम्परा चलती रही। वैवस्वत मनु के समय ही भगवान विष्णु का #मत्स्य अवतार हुआ। इनकी शासन व्यवस्था में देवों में पाँच तरह के विभाजन थे: देव, दानव, यक्ष, किन्नर और गंधर्व। इनके के दस पुत्र हुए थे। इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध पुत्र थे। इसमें इक्ष्वाकु कुल का ही मुख्यतः विस्तार हुआ। इक्ष्वाकु कुल में कई महान प्रतापी राजा, ऋषि, अरिहंत और भगवान हुए हैं। वैवस्वत सातवें मन्वंतर का स्वामी बनकर मनु पद पर आसीन हुए थे। इस मन्वंतर में ऊर्जस्वी नामक इन्द्र थे। अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र और जमदग्नि- ये सातों इस मन्वंतर के सप्तर्षि थे। वेद, पुराणों और अन्य धर्मग्रंथों के साथ वैज्ञानिक शोधों व अध्ययनों से ज्ञात होता है कि मनुष्य व अन्य जीव-जंतुओं की वर्तमान आदि सृष्टि हिमालय के आसपास की भूमि पर हुई थी जिसमें तिब्बत का सर्वधिक महत्त्व है। हिमालय के पास होने के कारण पूर्व में भारत वर्ष को हिमवर्ष भी कहा जाता था। वेद-पुराणों में तिब्बत को त्रिविष्टप कहा गया है। महाभारत के महाप्रस्थानिक पर्व में स्वर्गारोहण में स्पष्ट किया गया है कि तिब्बत हिमालय के उस राज्य को पुकारा जाता था जिसमें नंदनकानन नामक देवराज इंद्र का देश था। इससे सिद्ध होता है कि इंद्र स्वर्ग में नहीं धरती पर ही हिमालय क्षेत्र में रहते थे। पूर्व में यह धरती जल प्रलय के कारण जल से ढँक गई थी। कैलाश, गोरी-शंकर की चोटी तक पानी चढ़ गया था। इससे यह सिद्ध होता है कि संपूर्ण धरती ही जलमग्न हो गई थी। कई माह तक वैवस्वत मनु द्वारा नाव में ही गुजारने के बाद उनकी नाव गौरी-शंकर के शिखर से होते हुए नीचे उतरी। गोरी-शंकर जिसे माउंट एवरेस्ट शिखर भी कहा जाता है, विश्व में सबसे ऊँचा, बर्फ से ढँका हुआ और ठोस पहाड़ है। तिब्बत में धीरे-धीरे जनसंख्या वृद्धि और वातावरण में तेजी से होते परिवर्तन के कारण वैवस्वत मनु की संतानों ने अलग-अलग भूमि की बढ़ना आरंभ किया। विज्ञान के अनुसार भी पहले पृथ्वी के सभी महाद्वीप इकट्ठे थे। अर्थात अमेरिका द्वीप इधर अफ्रीका और उधर चीन तथा रूस से जुड़ा हुआ था। अफ्रीका भारत से जुड़ा हुआ था। धरती की घूर्णन गति और भू-गर्भीय परिवर्तन के कारण धरती द्वीपों में बँट गई। इस जुड़ी हुई धरती पर ही हिमालय की निम्न श्रेणियों को पार कर मनु की संतानें कम ऊँचाई वाले पहाड़ी विस्तारों में बसती गईं। फिर जैसे-जैसे समुद्र का जल स्तर घटता गया वे और भी मध्य भाग में आते गए। दक्षिण के इलाके तो जलप्रलय से जलमग्न ही थे। लेकिन बहुत काल के बाद धीरे-धीरे जैसे-जैसे समुद्र का जलस्तर घटा मनु का कुल पश्चिमी, पूर्वी और दक्षिणी मैदान और पहाड़ी प्रदेशों में फैल गए। जो हिमालय के इधर फैलते गए उन्होंने ही अखंड भारत की सम्पूर्ण भूमि को ब्रह्मावर्त, ब्रह्मार्षिदेश, मध्यदेश, आर्यावर्त एवं भारतवर्ष आदि नाम दिए। जो इधर आए वे सभी मनुष्य आर्य कहलाने लगे। यही लोग साथ में वेद लेकर आए थे। इसी से यह धारणा प्रचलित हुई कि देवभूमि से वेद धरती पर उतरे। स्वर्ग से गंगा को उतारा गया आदि अनेक धारणाएँ। इन आर्यों के ही कई समूह अलग-अलग झुंडों में पूरी धरती पर फैल गए और वहाँ बस कर भाँति-भाँति के धर्म और संस्कृति आदि को जन्म दिया। मनु की संतानें ही आर्य-अनार्य में बँटकर धरती पर फैल गईं। पूर्व में यह सभी देव-दानव कहलाती थीं। इस धरती पर आज जो भी मनुष्य हैं वे सभी वैवस्वत मनु की ही संतानें हैं इस विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। पौराणिक कथा इक्ष्वाकु को अमैथुनी सृष्टि द्वारा मनु की छींक से उत्पन्न बताती है। वे सूर्यवंशी राजाओं में पहले माने जाते हैं। उनकी राजधानी कोसल (अयोध्या) थी। उनके १०० पुत्र बताए जाते हैं जिनमें ज्येष्ठ विकुक्षि था। इक्ष्वाकु के एक दूसरे पुत्र निमि ने मिथिलाराजकुल स्थापित किया। साधारणत: बहुवचनांतक इक्ष्वाकुओं का तात्पर्य इक्ष्वाकु से उत्पन्न सूर्यवंशी राजाओं से होता है, परंतु प्राचीन साहित्य में उससे एक इक्ष्वाकु जाति का भी बोध होता है। इक्ष्वाकु का नाम, केवल एक बार, ऋग्वेद में भी प्रयुक्त हुआ है जिसे मैक्समूलर ने राजा की नहीं, बल्कि जातिवाचक संज्ञा माना है। इक्ष्वाकुओं की जाति जनपद में उत्तरी भागीरथी की घाटी में संभवत: कभी बसी थी। कुछ विद्वानों के मत से उत्तर पश्चिम के जनपदों में भी उनका संबंध था। सूर्यवंश की शुद्ध अशुद्ध सभी प्रकार की वंशावलियाँ देश के अनेक राजकुलों में प्रचलित हैं। उनमें वैयक्तिक राजाओं के नाम अथवा स्थान में चाहे जितने भेद हों, उनका आदि राजा इक्ष्वाकु ही है। इससे कुछ अजब नहीं, जो वह सुदूर पूर्वकाल में कोई ऐतिहासिक व्यक्ति रहे हों। इक्ष्वाकु वंश प्राचीन भारत के शासकों का एक वंश है। इनकी उत्पत्ति सूर्यवंशियों में से हुई थी। ये प्राचीन कोशल देश के राजा थे और इनकी राजधानी अयोध्या थी। रामायण और महाभारत में इन दोनों वंशों के अनेक प्रसिद्ध शासकों का उल्लेख है। ब्रह्मा जी के 10 मानस पुत्रों मे से एक मरीचि हैं। 1- ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि 2- मरीचि के पुत्र कश्यप 3- कश्यप के पुत्र विवस्वान या सूर्य 4- विवस्वान के पुत्र वैवस्वत मनु - जिनसे सूर्यवंश का आरम्भ हुआ। 5- वैवस्वत के पुत्र नभग 6- नाभाग 7- अम्बरीष- संपूर्ण पृथवी के चक्रवर्ती सम्राट हुये। 8- विरुप 9- पृषदश्व 10- रथीतर 11- इक्ष्वाकु - ये परम प्रतापी राजा थे, इनसे इस वंश का एक नाम इक्ष्वाकु वंश हुआ। 12- कुक्षि 13- विकुक्षि 14- पुरन्जय 15- अनरण्य प्रथम 16- पृथु 17- विश्वरन्धि 18- चंद्र 19- युवनाश्व 20- वृहदश्व 21- धुन्धमार 22- दृढाश्व 23- हर्यश्व 24- निकुम्भ 25- वर्हणाश्व 26- कृशाष्व 27- सेनजित 28- युवनाश्व द्वितीय; यहाँ से त्रेतायुग आरम्भ होता है। 29- मान्धाता 30- पुरुकुत्स 31- त्रसदस्यु 32- अनरण्य 33- हर्यश्व 34- अरुण 35- निबंधन 36- सत्यवृत (त्रिशंकु) 37- सत्यवादी हरिस्चंद्र 38- रोहिताश 39- चम्प 40- वसुदेव 41- विजय 42- भसक 43- वृक 44- बाहुक 45- सगर 46- अमंजस 47- अंशुमान 48- दिलीप प्रथम 49- भगीरथ - जो गंगा को धरती पर लाये। 50- श्रुत 51- नाभ 52- सिन्धुदीप 53- अयुतायुष 54- ऋतुपर्ण 55- सर्वकाम 56- सुदास 57- सौदास 58-अश्मक 59- मूलक 60- सतरथ 61- एडविड 62- विश्वसह 63- खटवाँग 64- दिलीप (दीर्घवाहु) 65- रघु - ये सूर्यवंश के सवसे प्रतापी राजा हे। 66- अज 67- दशरथ 68- राम (लक्ष्मण, भरत, शत्रुघन) 69-कुश; यहाँ से द्वापर युग शुरु होता है। 70- अतिथि 71- निषध 72- नल 73- नभ 74- पुण्डरीक 75- क्षेमधन्मा 76- देवानीक 77- अनीह 78- परियात्र 79- बल 80- उक्थ 81- वज्रनाभ 82- खगण 83- व्युतिताष्व 84- विश्वसह 85- हिरण्याभ 86- पुष्य 87- ध्रुवसंधि 88- सुदर्शन 89- अग्निवर्ण 90- शीघ्र 91- मरु 92- प्रश्रुत 93- सुसंधि 94- अमर्ष 95- महस्वान 96- विश्वबाहु 97- प्रसेनजित 98- तक्षक 99- वृहद्वल 100- वृहत्रछत्र; यहाँ से कलियुग आरम्भ होता है। सम्राट अशोक , गौत्तम बुद्ध इसी कोलिय इष्वांकु वंश में हुए। सूर्यवंश,अर्कवंश पुराणों के अनुसार एक प्राचीन भारतीय वंश है जिसकी उत्पत्ति सूर्य देव से मानी गयी है। ये ब्राह्मण एवं क्षत्रिय होते हें। इसी वंश परम्परा में से जैन एवं बुद्ध (बौद्ध) पंथ का प्रर्दुभाव हुआ है। भगीरथ इक्ष्वाकुवंशीय सम्राट् दिलीप के पुत्र थे जिन्होंने घोर तपस्या से गंगा को पृथ्वी पर अवतरित कर कपिल मुनि के शाप से भस्म हुए ६० हजार सगरपुत्रों के उद्धारार्थ पीढ़ियों से चले प्रयत्नों को सफल किया था। गंगा को पृथ्वी पर लाने का श्रेय भगीरथ को है, इसलिए इनके नाम पर उन्हें 'भागीरथी' कहा गया। गंगावतरण की इस घटना का क्रमबद्ध वर्णन वायुपुराण (४७.३७), विष्णुपुराण (४.४.१७), हरवंश पुराण(१.१५), ब्रह्मवैवर्त पुराण(१.०), महाभारत (अनु. १२६.२६), भागवत(९.९) आदि पुराणों तथा वाल्मीकीय रामायण (बाल., १.४२-४४) में मिलता है। #रघु अयोध्या के प्रसिद्ध इक्ष्वाकुवंशीय राजा थे जिनके नाम पर #रघुवंश की रचना हुई। ये दिलीप के पुत्र (रघुवंश, २) थे। अपने कुल में ये सर्वश्रेष्ठ गिने जाते हैं जिसके फलस्वरूप मर्यादापुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी भी अपने को रघुवंशी कहने में परम गर्व अनुभव करते हैं। सारा सूर्यवंश इन्हीं के कारण रघुवंश कहलाने लगा। इन्हीं के नाम पर रामचंद्र को राघव, रघुवर, रघुराज, रघुनाथ, रघुवीर आदि कहा जाता है। जब पिता के अश्वमेघ यज्ञ के अश्व की रक्षा का भार रघु को मिला और घोड़े को इंद्र चुरा ले गए तो रघु ने इंद्र से घोर युद्ध करके उन्हें परास्त कर दिया। रघु जब स्वयं गद्दी पर बैठे तो अपने पूरे राज्य में शांति स्थापित करके द्विग्विजय करने निकले। चारों दिशाओं में अपना प्रभुत्व स्थापित कर रघु ने अतुल धनराशि एकत्र की। अपने गुरु विश्वामित्र या वरतंतु को गुरुदक्षिणा के लिए कौत्स मुनि द्वारा धन माँगने पर रघु ने कुबेर पर चढ़ाई कर चौदह करोड़ स्वर्णमुद्रा प्राप्त की थी। फिर इन्होंने विश्वजित् नामक दूसरा महायज्ञ किया जिसमें अपनी सारी संपत्ति ब्राह्मणों को दान दे दी। रघुवंशी ब्रह्मांड के सबसे प्राचीन क्षत्रिय कुल है। रघुवंशी, अर्कवंशी (इक्षवाकु) राजवंश (1000 ईपू. से 364 ईपू. तक) यह भारत का प्राचीन क्षत्रिय कुल है । जो भारतवर्ष के सभी क्षत्रीय कुलों में सर्वश्रेष्ठ क्षत्रियकुल माना जाता है। ऐतिहासिक दृष्टि से रघुकुल मर्यादा, सत्य, चरित्र, वचनपालन, त्याग, तप, ताप व शौर्य का प्रतीक रहा है । अयोध्या के सूर्यवंशी सम्राट रघु ने इस वंश की नींव रखी थी। रघुवंशी का अर्थ है रघु के वंशज। अर्थात् सम्राट रघु के वंशज रघुवंशी कहलाते है । बौद्ध काल तक रघुवंशियो को इक्ष्वाकु, रघुवंशी तथा सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा जाता था। मूलरुप से यह वंश भगवान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु से प्रारम्भ हुआ था। जो सूर्यवंश, इक्ष्वाकु वंश, ककुत्स्थ वंश व रघुवंश नाम से जाना जाता है। आदिकाल में ब्रह्मा जी ने भगवान सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु को पृथ्वी का प्रथम राजा बनाया था। भगवान सूर्य के पुत्र होने के कारण मनु जी सूर्यवंशी कहलाये तथा इनसे चला यह वंश सूर्यवंश कहलाया। अयोध्या के सूर्यवंश में आगे चल कर प्रतापी राजा रघु हुये। राजा रघु से यह वंश रघुवंश कहलाया। इस वंश मे इक्ष्वाकु, ककुत्स्थ, हरिश्चंद्र, मांधाता, सगर, भगीरथ, अंबरीष, दिलीप, रघु, दशरथ, राम जैसे प्रतापी राजा हुये हैं। रघुवंशियों के कुछ राजाओं कावर्णन रघुवंशकाव्य में दिया गया है। उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध कत्यूरी राजवंश भी अयोध्या के भगवान राम के वंशज रघुवंशी थे । उज्जैन के राजा के दरबार में प्रसिद्ध महाकवि कालिदास रघुवंशी राजा के दरबार मे रह के रघुवंश महाकाव्य लिखे थे । भारत का इतिहास 700 ई॰पू॰ से प्रमाणिक व सतत् रूप से प्राप्त होता है । इस समय का विवरण अष्टाध्यायी सूत्र,अंगूतर निकाय, भगवती सूत्र आदि गृंथो में मिलता। 700 ई॰पू॰ में भारत जनपदों में बँटा था इस समय भारत में १६ महाजनपद और इनके अंतर्गत बहुत से छोटे छोटे जनपद थे। इनमें अवंती, मगध, वत्स और कौशल महाजनपद प्रमुख थे। कौशल जनपद पर इक्ष्वाकुवंशी रघुवंशी राजा राहुल (महाकौशला) का शासन था। राजा राहुल महाकौशला ने काशी, लुम्बनी, कपिलवस्तु, कौलिय आदि राज्यों को जीत कर एक विशाल सामृाज्य की स्थापना की थी। कौशल राज्य की राजधानी साकेत (अयोध्या) थी। साकेत(अयोध्या), श्रावस्ती व वाराणसी कौशल राज्य के प्रमुख नगर थे। साकेत(अयोध्या) व श्रावस्ती दोनो नगर चारो ओर से चौड़ी चौड़ी दीवारों से घिरे थे चारो दिशाओ में बड़े बड़े दरवाजे थे। दरवाजे बड़े बड़े, चोड़े व ऊँचे थे। जिन पर सुन्दर नक्काशी थी। नगरो में चौड़े चौड़े मार्ग थे। जब रघुवंशी क्षत्रिय हाथी घोड़ो पर सवार होकर इन मार्गो पर निकलते थे तो रघुवंशी क्षत्रियो का वैभव देखते ही बनता था। इस समय के साहित्य में कौशल राज्य के वैभव का जो वर्णन मिलता है वह इक्ष्वाकुवंशी रघुवंशी क्षत्रियों के उत्कर्ष की कहानी को व्यक्त करता है। जो यह बताने के लिये काफी है कि कौशल जनपद पर रघुवंशी क्षत्रिय का शासन बहुत पहले से रहा है। महाकौशला के बाद प्रसेनजित, क्षुदृक, रणक, सुरथ, सौमित्र कौशल(अयोध्या) के राजा हुये। सौमित्र कौशल(अयोध्या) के अंतिम रघुवंशी राजा थे। मगध (नंदवंश) के शासक महापदमनंद ने सौमित्र को हराकर रघुवंशी किंगडम को समाप्त कर दिया था। चन्द्र टरे सूरज टरे, टरे जगत व्यवहार। पै दृढ़व्रत हरिश्चन्द्र को, टरे न सत्य विचार।। संपूर्ण कथा: सत्य की चर्चा जब भी कही जाएगी, महाराजा हरिश्चन्द्र का नाम जरुर लिया जायेगा। हरिश्चन्द्र इकक्षवाकू वंश के प्रसिद्ध राजा थे। कहा जाता है कि सपने में भी वे जो बात कह देते थे उसका पालन निश्चित रूप से करते थे। इनके राज्य में सर्वत्र सुख और शांति थी। इनकी पत्नी का नाम तारामती तथा पुत्र का नाम रोहिताश्व था। तारामती को कुछ लोग शैव्या भी कहते थे। महाराजा हरिश्चन्द्र की सत्यवादिता और त्याग की सर्वत्र चर्चा थी। महर्षि विश्वामित्र ने हरिश्चन्द्र के सत्य की परीक्षा लेने का निश्चय किया। रात्रि में महाराजा हरिश्चन्द्र ने स्वप्न देखा कि कोई तेजस्वी ब्राहमण राजभवन में आया है। उन्हें बड़े आदर से बैठाया गया तथा उनका यथेष्ट आदर – सत्कार किया गया। महाराजा हरिश्चन्द्र ने स्वप्न में ही इस ब्राह्मण को अपना राज्य दान में दे दिया। सुबह नींद से जागने पर महाराज इस स्वप्न को भूल गये। दुसरे दिन महर्षि विश्वामित्र इनके दरबार में आये। उन्होंने महाराज को स्वप्न में दिए गये दान की याद दिलाई। ध्यान करने पर महाराज को स्वप्न की सारी बातें याद आ गयी और उन्होंने इस बात को स्वीकार कर लिया। ध्यान देने पर उन्होंने पहचाना कि स्वप्न में जिस ब्राह्मण को उन्होंने राज्य दान किया था वे महर्षि विश्वामित्र ही थे। विश्वामित्र ने राजा से दक्षिणा माँगी क्योंकि यह धार्मिक परम्परा है की दान के बाद दक्षिणा दी जाती है। राजा ने मंत्री से दक्षिणा देने हेतु राजकोष से मुद्रा लाने को कहा। विश्वामित्र बिगड़ गये। उन्होंने कहा- जब सारा राज्य तुमने दान में दे दिया है तब राजकोष तुम्हारा कैसे रहा? यह तो हमारा हो गया। उसमे से दक्षिणा देने का अधिकार तुम्हे कहाँ रहा? महाराजा हरिश्चन्द्र सोचने लगे। विश्वामित्र की बात में सच्चाई थी किन्तु उन्हें दक्षिणा देना भी आवश्यक था। वे यह सोच ही रहे थे कि विश्वामित्र बोल पड़े- "तुम हमारा समय व्यर्थ ही नष्ट कर रहे हो। तुम्हे यदि दक्षिणा नहीं देनी है तो साफ-साफ कह दो, मैं दक्षिणा नहीं दे सकता। दान देकर दक्षिणा देने में आनाकानी करते हो। मैं तुम्हे शाप दे दूंगा।" हरिश्चन्द्र विश्वामित्र की बातें सुनकर दुखी हो गये। वे अधर्म से डरते थे। वे बोले- "भगवन! मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ? आप जैसे महर्षि को दान देकर दक्षिणा कैसे रोकी जा सकती है? राजमहल कोष सब आपका हो गया। आप मुझे थोड़ा समय दीजिये ताकि मैं आपकी दक्षिणा का प्रबंध कर सकूँ।" विश्वामित्र ने समय तो दे दिया किन्तु चेतावनी भी दी कि यदि समय पर दक्षिणा न मिली तो वे शाप देकर भस्म कर देंगे। राजा को भस्म होने का भय तो नहीं था किन्तु समय से दक्षिणा न चुका पाने पर अपने अपयश का भय अवश्य था। उनके पास अब एक मात्र उपाय था कि वे स्वयं को बेचकर दक्षिणा चुका दे। उन दिनों मनुष्यों को पशुओ की भांति बेचा-ख़रीदा जाता था। राजा ने स्वयं को काशी में बेचने का निश्चय किया। वे अपना राज्य विश्वामित्र को सौंप कर अपनी पत्नी व पुत्र को लेकर काशी चले आये। काशी में राजा हरिश्चन्द्र ने कई स्थलों पर स्वयं को बेचने का प्रयत्न किया पर सफलता न मिली। सायंकाल तक राजा को शमशान घाट के मालिक डोम ने ख़रीदा। राजा अपनी रानी व पुत्र से अलग हो गये। रानी तारामती को एक साहूकार के यहाँ घरेलु काम-काज करने को मिला और राजा को मरघट की रखवाली का काम। इस प्रकार राजा ने प्राप्त धन से विश्वामित्र की दक्षिणा चुका दी। तारामती जो पहले महारानी थी, जिसके पास सैकड़ो दास-दासियाँ थी, अब बर्तन माजने और चौका लगाने का कम करने लगी। स्वर्ण सिंहासन पर बैठने वाले राजा हरिश्चन्द्र शमशान पर पहरा देने लगे। जो लोग शव जलाने मरघट पर आते थे, उनसे कर वसूलने का कार्य राजा को दिया गया। अपने मालिक की डांट-फटकार सहते हुए भी नियम व ईमानदारी से अपना कार्य करते रहे। उन्होंने अपने कार्य में कभी भी कोई त्रुटी नहीं होने दी। इधर रानी के साथ एक ह्रदय विदारक घटना घटी। उनके साथ पुत्र रोहिताश्व भी रहता था। एक दिन खेलते-खेलते उसे साँप ने डंस लिया और उसकी मृत्यु हो गयी। वह यह भी नहीं जानती थी कि उसके पति कहाँ रहते है। पहले से ही विपत्ति झेलती हुई तारामती पर यह दुःख वज्र की भांति आ गिरा। उनके पास कफ़न तक के लिए पैसे नहीं थे। वह रोटी-बिलखती किसी प्रकार अपने पुत्र के शव को गोद में उठा कर अंतिम संस्कार के लिए शमशान ले गयी। रात का समय था। सारा श्मशान सन्नाटे में डूबा था। एक दो शव जल रहे थे। इसी समय पुत्र का शव लिए रानी भी शमशान पर पहुंची। हरिश्चन्द्र ने तारामती से श्मशान का कर माँगा। उनके अनुनय-विनय करने पर तथा उनकी बातों से वे रानी तथा अपने पुत्र को तो पहचान गये, किन्तु उन्होंने उन्हे श्मशान के नियमो में ढील नहीं दी। उन्होंने अपने मालिक की आज्ञा के विरुद्ध कुछ भी नहीं किया. उन्होंने तारामती से कहा- "शमशान का कर तो तुम्हे देना ही होगा। उससे कोई मुक्त नहीं हो सकता। अगर मैं किसी को छोड़ दूँ तो यह अपने मालिक के प्रति विश्वासघात होगा।" उन्होंने तारामती से कहा- "अगर तुम्हारे पास और कुछ नहीं है तो अपनी साड़ी का आधा भाग फाड़ कर दे दो, मैं उसे ही कर में ले लूँगा।" तारामती विवश थी। उसने ज्यो ही साड़ी को फाड़ना आरम्भ किया, आकाश में गंभीर गर्जना हुई। विश्वामित्र प्रकट हो गये। उन्होंने रोहिताश्व को भी जीवित कर दिया। विश्वामित्र ने हरिश्चन्द्र को आशीर्वाद देते हुए कहा- "तुम्हारी परीक्षा हो रही थी कि तुम किस सीमा तक सत्य एवं धर्म का पालन कर सकते हो।" यह कहते हुए विश्वामित्र ने उन्हें उनका राज्य ज्यो का त्यों लौटा दिया। महाराज हरिश्चन्द्र ने स्वयं को बेचकर भी सत्यव्रत का पालन किया। यह सत्य एवं धर्म के पालन का एक बेमिसाल उदाहरण है। आज भी महाराजा हरिश्चन्द्र का नाम श्रद्धा और आदर के साथ लिया जाता है। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,

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नारदजी का अभिमान-भंग और माया का प्रभाव। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ एक बार नारदजी हिमालय पर तपस्या कर रहे थे। सहस्त्रों वर्ष बीत गए पर उनकी समाधि भंग न हुई। यह देखकर इन्द्र को बड़ा भय हुआ अत: इन्द्र ने कामदेव और बसंत को बुलाकर नारदजी की तपस्या भंग करने भेजा। कामदेव ने सभी कलाओं का प्रयोग कर लिया पर नारदजी पर उसकी एक न चली क्योंकि यह वही स्थान था जहां भगवान शंकर ने कामदेव को जलाया था। अत: इस स्थान पर कामदेव के वाणों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। विवश होकर कामदेव इन्द्र के पास लौट आया और कहा–’नारदजी में न काम ही है न क्रोध ही। क्योंकि उन्होंने मेरा मधुर वचनों से आतिथ्य किया।’ यह सुनकर सब दंग रह गए। तपस्या पूरी होने पर ‘कामदेव पर मेरी विजय हुई है’ ऐसा मानकर नारदजी के मन में व्यर्थ ही गर्व हो गया। वे यह नहीं समझ सके कि कामदेव के पराजित होने में भगवान शंकर का प्रभाव ही कारण है। नारदजी अपना काम-विजय सम्बन्धी वृतान्त बताने के लिए भगवान शंकर के पास कैलास पर्वत पर गए और अपनी कथा सुनाई। शंकरजी ने कहा आप अपनी यह बात कभी किसी से न कहना। यह सिद्धि सम्बन्धी बात गुप्त रखने योग्य है। यह बात भगवान विष्णु को बिल्कुल न बताइयेगा। नारदजी को यह बात अच्छी नहीं लगी और वे वीणा लेकर वैकुण्ठ को चल दिए और वहां जाकर भगवान विष्णु को अपना काम-विजय प्रसंग सुनाने लगे। भगवान ने सोचा–’इनके हृदय में समस्त शोक का कारण अहंकार का अंकुर उत्पन्न हो रहा है, सो इसे झट से उखाड़ डालना चाहिए।’ विष्णुलोक से जब नारदजी पृथ्वी पर आए तो उन्हें वैकुण्ठ से भी सुन्दर एक बड़ा मनोहर नगर दिखाई दिया। भगवान की माया की बात वे समझ न सके। लोगों से पूछने पर पता चला कि इस नगर का राजा शीलनिधि अपनी पुत्री ‘श्रीमती’ का स्वयंवर कर रहा है जिसमें देश-विदेश से राजा आये हैं। नारदजी भी राजा के यहां पहुँच गए। राजा और उसकी पुत्री ने नारदजी को प्रणाम किया। इसके बाद राजा ने अपनी पुत्री के भाग्य के बारे में नारदजी से पूछा। नारदजी उसके लक्षण देखकर चकित रह गए। नारदजी ने राजा को बताया–’आपकी यह पुत्री अपने महान भाग्य के कारण धन्य है और साक्षात् लक्ष्मी की भांति समस्त गुणों से सम्पन्न है। इसका भावी पति निश्चय ही भगवान शंकर के समान वैभवशाली, सर्वेश्वर, किसी से पराजित न होने वाला, वीर, कामविजयी तथा सम्पूर्ण देवताओं में श्रेष्ठ होगा।’ अब नारदजी स्वयं काम के वशीभूत होकर उस राजकुमारी से विवाह करना चाहते थे। उन्होंने विष्णु भगवान से प्रार्थना की। प्रभु प्रकट हो गए। नारदजी बोले–’नाथ ! मेरा हित करो। मैं आपका प्रिय सेवक हूँ। राजा शीलनिधि ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए स्वयंवर रचाया है। आप अपना स्वरूप मुझे दे दीजिए। आपकी कृपा के बिना राजकुमारी को प्राप्त करने का कोई उपाय नहीं है।’ भगवान ने कहा– ‘वैद्य जिस प्रकार रोगी की औषधि करके उसका कल्याण करता है, उसी प्रकार मैं तुम्हारा हित अवश्य करूंगा।’ यद्यपि भगवान का कथन स्पष्ट था किन्तु काम से व्याकुल नारदजी को कुछ समझ नहीं आया। और वे यह समझकर कि ‘भगवान ने मुझे अपना रूप दे दिया’ स्वयंवर-सभा में जा विराजे। भगवान ने उनका मुख हरि (हरि भगवान का एक नाम है और बंदर को भी हरि कहते हैं) जैसा बना दिया और शेष अंग अपने जैसे बना दिए थे। अब राजकुमारी जयमाल लेकर सभा में आई तो नारदजी का बंदर का मुख देखकर कुपित हो गई और उसने वहां सभा में बैठे विष्णु भगवान को जयमाला पहना दी। भगवान राजकुमारी को लेकर चले गए। नारदजी बड़े दुखी हुए। वहां उपस्थित शिवजी के गणों ने नारदजी को अपना मुंह दर्पण में देखने के लिए कहा। दर्पण तो था नहीं, जब नारदजी ने पानी में अपना मुंह देखा तो वानरमुख देखकर उन्हें बहुत क्रोध आया। और वे विष्णुलोक के लिए चल दिए। रास्ते में ही उन्हें भगवान विष्णु राजकुमारी के साथ मिल गए। नारदजी क्रोध में बोले– ‘मैं तो जानता था कि तुम भले व्यक्ति हो परन्तु तुम सर्वथा विपरीत निकले। समुद्र-मंथन के समय तुमने असुरों को मद्य पिला दिया और स्वयं कौस्तुभादि चार रत्न और लक्ष्मी को ले गए। शंकरजी को बहलाकर विष दे दिया। यदि उन कृपालु ने उस समय हलाहल को न पी लिया होता तो तुम्हारी सारी माया नष्ट हो जाती और आज हमारे साथ यह कौतुक न होता। तुमने मेरी अभीष्ट कन्या छीनी, अतएव तुम भी स्त्री के विरह में मेरे जैसे ही विकल होओगे। तुमने जिन वानरों के समान मेरा मुंह बनाया था, वे ही उस समय तुम्हारे सहायक होंगे।’ भगवान ने अपनी माया खींच ली। अब नारदजी देखते हैं तो न वहां राजकुमारी है और न ही लक्ष्मीजी। वे बड़ा पश्चात्ताप करने लगे और ‘त्राहि त्राहि’ कहकर प्रभु के चरणों पर गिर पड़े। भगवान ने भी उन्हें सान्त्वना दी और आशीर्वाद दिया कि अब माया तुम्हारे पास न फटकेगी। श्रीनारदजी ही एकमात्र ऐसे संत हैं, जिनका सभी देवता और दैत्यगण समान रूप से सम्मान एवं विश्वास करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने नारदजी के सम्बन्ध में कहा है– ‘मैं दिव्यदृष्टि सम्पन्न श्रीनारदजी की स्तुति करता हूँ। जिनके मन में अहंकार नहीं है, जिनका शास्त्रज्ञान और चरित्र किसी से छिपा नहीं है, उन देवर्षि नारद को मैं नमस्कार करता हूँ। जो कामना अथवा लोभवश झूठी बात मुँह से नहीं निकालते और सभी प्राणी जिनकी उपासना करते हैं, उन नारदजी को मैं नमस्कार करता हूँ 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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धेनुक के पूर्वजन्म का परिचय, बलि-पुत्र साहसिक तथा तिलोत्तमा का स्वच्छन्द विहार, दुर्वासा का शाप और वर, साहसिक का गदहे की योनि में जन्म लेना तथा तिलोत्तमा का बाणपुत्री ‘उषा’ होना---------------------------------------- नारद जी ने पूछा– भगवन! किस पाप से बलि-पुत्र साहसिक को गदहे की योनि प्राप्त हुई? दुर्वासा जी ने किस अपराध से दानवराज को शाप दिया? नाथ! फिर किस पुण्य से दानवेश्वर ने सहसा महाबली श्रीहरि का धाम एवं उनके साथ एकत्व (सायुज्य) मोक्ष प्राप्त कर लिया? . संदेह-भंजन करने वाले महर्षे! इन सब बातों को आप विस्तारपूर्वक बताइये। अहो! कवि के मुख में काव्य पद-पद पर नया-नया प्रतीत होता है। भगवान श्रीनारायण ने कहा– वत्स! नारद! सुनो। मैं इस विषय में प्राचीन इतिहास कहूँगा। मैंने इसे पिता धर्म (देवता) के मुख से गन्धमादन पर्वत पर सुना था। यह विचित्र एवं अत्यन्त मनोहर वृत्तान्त पाद्म-कल्प का है और श्री नारायण देव की कथा से युक्त होने के कारण कानों के लिये उत्तम अमृत है। जिस कल्प की यह कथा है, उसमें तुम उपबर्हण नामक गन्धर्व के रूप में थे। तुम्हारी आयु एक कल्प की थी। तुम शोभायमान, सुन्दर और सुस्थिर यौवन से सम्पन्न थे। पचास कामिनियों के पति होकर सदा श्रृंगार में ही तत्पर रहते थे। ब्रह्मा जी के वरदान से तुम्हें सुमधुर कण्ठ प्राप्त हुआ था और तुम सम्पूर्ण गायकों के राजा समझे जाते थे। उन्हीं दिनों दैववश ब्रह्मा का शाप प्राप्त हुआ था और तुम दासीपुत्र हुए और वैष्णवों के अवशिष्ट भोजन जनित पुण्य से इस समय साक्षात ब्रह्मा जी के पुत्र हो। अब तो तुम असंख्य कल्पों तक जीवित रहने वाले महान वैष्णवशिरोमणि हो। ज्ञानमयी दृष्टि से सब कुछ देखते और जानते हो तथा महादेव जी के प्रिय शिष्य हो। मुने! उस पाद्म-कल्प का वृत्तान्त मुझसे सुनो। दैत्य के इस सुधा-तुल्य मधुर वृत्तान्त को मैं तुम्हें सुना रहा हूँ। एक दिन की बात है। बलि का बलवान पुत्र साहसिक अपने तेज से देवताओं को परास्त करके गन्धमादन की ओर प्रस्थित हुआ। उसके सम्पूर्ण अंग चन्दन से चर्चित थे। वह रत्नमय आभूषणों से विभूषित हो रत्न के ही सिंहासन पर विराजमान था। उसके साथ बहुत बड़ी सेना थी। इसी समय स्वर्ग की परम सुन्दरी अप्सरा तिलोत्तमा उस मार्ग से आ निकली। उसने साहसिक को देखा और साहसिक ने उसको। पुंश्चली स्त्रियों का आचरण दोषपूर्ण होता ही है। वहीं दोनों एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हो गये। चन्द्रमा के समीप जाती हुई तिलोत्तमा वहाँ बीच में ही ठहर गयी। कुलटा स्त्रियाँ कैसी दुष्टहृदया होती हैं और वे किसी भी पाप का विचार न करके सदा पापरत ही रहा करती हैं– यह सब बतलाकर भी तिलोत्तमा ने अपने बाह्य रूप-सौन्दर्य से साहसिक को मोहित कर लिया। तदनन्तर वे दोनों गन्धमादन के एकान्त रमणीय स्थान में जाकर यथेच्छ विहार करने लगे। वहीं मुनिवर दुर्वासा योगासन से विराजमान होकर श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों का चिन्तन कर रहे थे। तिलोत्तमा और साहसिक उस समय कामवश चेतनाशून्य थे। उन्होंने अत्यन्त निकट ध्यान लगाये बैठे हुए मुनि को नहीं देखा। उनके उच्छृंखल अभिसार से मुनि का ध्यान सहसा भंग हो गया। उन्होंने उन दोनों की कुत्सिक चेष्टाएँ देख क्रोध में भरकर कहा। दुर्वासा बोले– ओ गदहे के समान आकार वाले निर्लज्ज नराधम! भक्तशिरोमणि बलि का पुत्र होकर भी तू इस तरह पशुवत आचरण कर रहा है। देवता, मनुष्य, दैत्य, गन्धर्व तथा राक्षस –ये सभी सदा अपनी जाति में लज्जा का अनुभव करते हैं। पशुओं के सिवा सभी मैथुन-कर्म में लज्जा करते हैं। विशेषतः गदहे की जाति ज्ञान तथा लज्जा से हीन होती है; अतः दानवश्रेष्ठ! अब तू गदहे की योनि में जा। तिलोत्तमे! पुंश्चली स्त्री तो निर्लज्ज होती ही है। दैत्य के प्रति तेरी ऐसी आसक्ति है तो अब तू दानव योनि में ही जन्म ग्रहण कर। ऐसा कहकर रोष से जलते हुए दुर्वासा मुनि वहाँ चुप हो गये। फिर वे दोनों लज्जित और भयभीत होकर उठे तथा मुनि की स्तुति करने लगे। साहसिक बोला– मुने! आप ब्रह्मा, विष्णु और साक्षात महेश्वर हैं। अग्नि और सूर्य हैं। आप संसार की सृष्टि, पालन तथा संहार करने में समर्थ हैं। भगवन! मेरे अपराध को क्षमा करें। कृपानिधे! कृपा करें। जो सदा मूढ़ों के अपराध को क्षमा करे, वही संत-महात्मा एवं ईश्वर है। यों कहकर वह दैत्यराज मुनि के आगे उच्चस्वर से फूट-फूटकर रोने लगा और दाँतों में तिनके दबाकर उनके चरणकमलों में गिर पड़ा। तिलोत्तमा बोली– हे नाथ! हे करुणासिन्धो! हे दीनबन्धो! मुझ पर कृपा कीजिये। विधाता की सृष्टि में सबसे अधिक मूढ़ स्त्रीजाति ही है। सामान्य स्त्री की अपेक्षा अधिक मतवाली एवं मूढ़ कुलटा होती है, जो सदा अत्यन्त कामातुर रहती है। प्रभो! कामुक प्राणी में लज्जा, भय और चेतना नहीं रह जाती है। नारद! ऐसा कहकर तिलोत्तमा रोती हुई दुर्वासा जी की शरण में गयी। भूतल पर विपत्ति में पड़े बिना भला किन्हें ज्ञान होता है? उन दोनों की व्याकुलता देखकर मुनि को दया आ गयी। उस समय उन मुनिवर ने उन्हें अभय देकर कहा। दुर्वासा बोले– दानव! तू विष्णुभक्त बलि का पुत्र है। उत्तम कुल में तेरा जन्म हुआ है। तू पैतृक परम्परा से विष्णुभक्त है। मैं तुझे निश्चितरूप से जानता हूँ। पिता का स्वभाव पुत्र में अवश्य रहता है। जैसे कालिय के सिर पर अंकित हुआ श्रीकृष्ण का चरणचिह्न उसके वंश में उत्पन्न हुए सभी सर्पों के मस्तक पर रहता है। वत्स! एक बार गदहे की योनि में जन्म लेकर तू निर्वाण (मोक्ष)– को प्राप्त हो , सत्पुरुषों द्वारा पहले जो चिरकाल तक श्रीकृष्ण की आराधना की गयी होती है, इसके पुण्य-प्रभाव का कभी लोप नहीं होता। अब तू शीघ्र ही व्रज के निकट वृन्दावन के ताल-वन में जा। वहाँ श्रीहरि के चक्र से प्राणों का परित्याग करके तू निश्चय ही मोक्ष प्राप्त कर लेगा। तिलोत्तमे! तू भारतवर्ष में बाणासुर की पुत्री होगी; फिर श्रीकृष्ण-पौत्र अनिरुद्ध का आलिंगन प्राप्त करके शुद्ध हो जायेगी। महामुने! यों कहकर दुर्वासा मुनि चुप हो गये। तत्पश्चात वे दोनों भी उन मुनिश्रेष्ठ को प्रणाम करके यथास्थान चले गये। इस प्रकार दैत्य साहसिक के गदर्भ-योनि में जन्म लेने का सारा वृत्तान्त मैंने कह सुनाया। तिलोत्तमा बाणासुर की पुत्री उषा होकर अनिरुद्ध की पत्नी हुई।

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ऐतिहासिक कथाएँ 〰️〰️🔸〰️〰️ सिकंदर को हराने वाली कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका के बारे में जानिये सच। राजकुमारी कार्विका सिंधु नदी के उत्तर में कठगणराज्य की राज्य की राजकुमारी थी । राजकुमारी कार्विका बहुत ही कुशल योद्धा थी। रणनीति और दुश्मनों के युद्ध चक्रव्यूह को तोड़ने में पारंगत थी। राजकुमारी कार्विका ने अपने बचपन की सहेलियों के साथ फ़ौज बनाई थी। इनका बचपन के खेल में भी शत्रुओं से देश को मुक्त करवाना और फिर शत्रुओं को दण्ड प्रदान करना यही सब होते थे। राजकुमारी में वीरता और देशभक्ति बचपन से ही थी। जिस उम्र में लड़कियाँ गुड्डे गुड्डी का शादी रचना इत्यादि खेल खेलते थे उस उम्र में कार्विका राजकुमारी को शत्रु सेना का दमन कर के देश को मुक्त करवाना शिकार करना इत्यादि ऐसे खेल खेलना पसंद थे। राजकुमारी धनुर्विद्या के सारे कलाओं में निपुर्ण थी , तलवारबाजी जब करने उतरती थी दोनों हाथो में तलवार लिये लड़ती थी और एक तलवार कमर पे लटकी हुई रहती थी। अपने गुरु से जीत कर राजकुमारी कार्विका ने सबसे सुरवीर शिष्यों में अपना नामदर्ज करवा लिया था। दोनों हाथो में तलवार लिए जब अभ्यास करने उतरती थी साक्षात् माँ काली का स्वरुप लगती थी। भाला फेकने में अचूक निसाँचि थी , राजकुमारी कार्विका गुरुकुल शिक्षा पूर्ण कर के एक निर्भीक और शूरवीरों के शूरवीर बन कर लौटी अपने राज्य में। कुछ साल बीतने के साथ साथ यह ख़बर मिला राजदरबार से सिकंदर लूटपाट करते हुए कठगणराज्य की और बढ़ रहा हैं भयंकर तबाही मचाते हुए सिकंदर की सेना नारियों के साथ दुष्कर्म करते हुए हर राज्य को लूटते हुए आगे बढ़ रही थी, इसी खबर के साथ वह अपनी महिला सेना जिसका नाम राजकुमारी कार्विका ने चंडी सेना रखी थी जो कि ८००० से ८५०० नारियों की सेना थी। कठगणराज्य की यह इतिहास की पहली सेना रही जिसमे महज ८००० से ८५०० विदुषी नारियाँ थी। कठगणराज्य जो की एक छोटी सा राज्य था। इसलिए अत्यधिक सैन्यबल की इस राज्य को कभी आवस्यकता ही नहीं पड़ी थी। ३२५(इ.पूर्व) में सिकन्दर के अचानक आक्रमण से राज्य को थोडा बहुत नुक्सान हुआ पर राजकुमारी कार्विका पहली योद्धा थी जिन्होंने सिकंदर से युद्ध किया था। सिकन्दर की सेना लगभग १,५०,००० थी और कठगणराज्य की राजकुमारी कार्विका के साथ आठ हज़ार वीरांगनाओं की सेना थी यह एक ऐतिहासिक लड़ाई थी जिसमे कोई पुरुष नहीं था सेना में सिर्फ विदुषी वीरांगनाएँ थी। राजकुमारी और उनकी सेना अदम्य वीरता का परिचय देते हुए सिकंदर की सेना पर टूट पड़ी, युद्धनीति बनाने में जो कुशल होता हैं युद्ध में जीत उसी की होती हैं रण कौशल का परिचय देते हुए राजकुमारी ने सिकंदर से युद्ध की थी। सिकंदर ने पहले सोचा "सिर्फ नारी की फ़ौज है मुट्ठीभर सैनिक काफी होंगे” पहले २५००० की सेना का दस्ता भेजा गया उनमे से एक भी ज़िन्दा वापस नहीं आ पाया , और राजकुमारी कार्विका की सेना को मानो स्वयं माँ भवानी का वरदान प्राप्त हुआ हो बिना रुके देखते ही देखते सिकंदर की २५,००० सेना दस्ता को गाजर मूली की तरह काटती चली गयी। राजकुमारी की सेना में ५० से भी कम वीरांगनाएँ घायल हुई थी पर मृत्यु किसी को छु भी नहीं पायी थी। सिकंदर की सेना में शायद ही कोई ज़िन्दा वापस लौट पाया थे। दूसरी युद्धनीति के अनुसार अब सिकंदर ने ४०,००० का दूसरा दस्ता भेजा उत्तर पूरब पश्चिम तीनों और से घेराबन्दी बना दिया परंतु राजकुमारी सिकंदर जैसा कायर नहीं थी खुद सैन्यसंचालन कर रही थी उनके निर्देशानुसार सेना तीन भागो में बंट कर लड़ाई किया राजकुमारी के हाथों बुरी तरह से पस्त हो गयी सिकंदर की सेना। तीसरी और अंतिम ८५,०००० दस्ताँ का मोर्चा लिए खुद सिकंदर आया सिकंदर के सेना में मार काट मचा दिया नंगी तलवार लिये राजकुमारी कार्विका ने अपनी सेना के साथ सिकंदर को अपनी सेना लेकर सिंध के पार भागने पर मजबूर कर दिया इतनी भयंकर तवाही से पूरी तरह से डर कर सैन्य के साथ पीछे हटने पर सिकंदर मजबूर होगया। इस महाप्रलयंकारी अंतिम युद्ध में कठगणराज्य के ८,५०० में से २७५० साहसी वीरांगनाओं ने भारत माता को अपना रक्ताभिषेक चढ़ा कर वीरगति को प्राप्त कर लिया जिसमे से नाम कुछ ही मिलते हैं। इतिहास के दस्ताबेजों में गरिण्या, मृदुला, सौरायमिनि, जया यह कुछ नाम मिलते हैं। इस युद्ध में जिन्होंने प्राणों की बलिदानी देकर सिकंदर को सिंध के पार खदेड़ दिया था। सिकंदर की १,५०,००० की सेना में से २५,००० के लगभग सेना शेष बची थी , हार मान कर प्राणों की भीख मांग लिया और कठगणराज्य में दोबारा आक्रमण नहीं करने का लिखित संधी पत्र दिया राजकुमारी कार्विका को । संदर्व-: १) कुछ दस्ताबेज से लिया गया हैं पुराणी लेख नामक दस्ताबेज २) राय चौधरी- 'पोलिटिकल हिस्ट्री आव एशेंट इंडिया'- पृ. 220) ३) ग्रीस के दस्ताबेज मसेडोनिया का इतिहास , Hellenistic Babylon नामक दस्ताबेज में इस युद्ध की जिक्र किया गया हैं। राजकुमारी कार्विका की समूल इतिहास को नष्ठ कर दिया गया था। इस वीरांगना के इतिहास को बहुत ढूंढने पर केवल दो ही जगह पर दो ही पन्नों में ही खत्म कर दिया गया था। यह पहली योद्धा थी जिन्होंने सिकंदर को परास्त किया था ३२५(ई.पूर्व) में। समय के साथ साथ इन इतिहासों को नष्ठ कर दिया गया था और भारत का इतिहास वामपंथी और इक्कसवीं सदी के नवीनतम इतिहासकार जैसे रोमिला थाप्पर और भी बहुत सारे इतिहासकार ने भारतीय वीरांगनाओं के नाम कोई दस्तावेज़ नहीं लिखा था। यह भी कह सकते हैं भारतीय नारियों को राजनीति से दूर करने के लिए सनातन धर्म में नारियों को हमेशा घूँघट धारी और अबला दिखाया हैं। इतिहासकारों ने भारत को ऋषिमुनि का एवं सनातन धर्म को पुरुषप्रधान एवं नारी विरोधी संकुचित विचारधारा वाला धर्म साबित करने के लिये इन इतिहासो को मिटा दिया था। इन वामपंथी और खान्ग्रेस्सी इतिहासकारो का बस चलता तो रानी लक्ष्मीबाई का भी इतिहास गायब करवा देते पर ऐसा नहीं कर पाये क्यों की १८५७ की ऐतिहासिक लड़ाई को हर कोई जानता हैं । लव जिहाद तब रुकेगा जब इतिहासकार ग़ुलामी और धर्मनिरपेक्षता का चादर फ़ेंक कर असली इतिहास रखेंगे। जकुमारी कार्विका जैसी वीरांगनाओं ने सिर्फ सनातन धर्म में ही जन्म लिए हैं। ऐसी वीरांगनाओं का जन्म केवल सनातन धर्म में ही संभव हैं। जिस सदी में इन वीरांगनाओं ने देश पर राज करना शुरू किया था उस समय शायद ही किसी दूसरे मजहब या रिलिजन में नारियों को इतनी स्वतंत्रता होगी । सनातन धर्म का सर है नारी और धड़ पुरुष हैं। जिस प्रकार सर के बिना धड़ बेकार हैं उसी प्रकार सनातन धर्म नारी के बिना अपूर्ण है। जितना भी हो पाया इस वीरांगना का खोया हुआ इतिहास आप सबके सामने प्रस्तुत है। भारत सरकार से अनुरोध है महामान्य प्रधानमंत्री महोदय जी से की सच सामने लाने की अनुमति दें इंडियन कॉउंसिल ऑफ़ हिस्टोरिकल रिसर्च को । वन्देमातरम् जय माँ भवानी। 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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नारदजी की जन्म कथा 🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹 देवर्षि नारद पहले गन्धर्व थे। एक बार ब्रह्मा जी की सभा में सभी देवता और गन्धर्व भगवन्नाम का संकीर्तन करने के लिए आए। नारद जी भी अपनी स्त्रियों के साथ उस सभा में गए। भगवान के संकीर्तन में विनोद करते हुए देखकर ब्रह्मा जी ने इन्हें शाप दे दिया। जन्म लेने के बाद ही इनके पिता की मृत्यु हो गई। इनकी माता दासी का कार्य करके इनका भरण-पोषण करने लगीं। एक दिन गांव में कुछ महात्मा आए और चातुर्मास्य बिताने के लिए वहीं ठहर गए। नारद जी बचपन से ही अत्यंत सुशील थे। वह खेलकूद छोड़ कर उन साधुओं के पास ही बैठे रहते थे और उनकी छोटी-से-छोटी सेवा भी बड़े मन से करते थे। संत-सभा में जब भगवत्कथा होती थी तो यह तन्मय होकर सुना करते थे। संत लोग इन्हें अपना बचा हुआ भोजन खाने के लिए दे देते थे। साधुसेवा और सत्संग अमोघ फल प्रदान करने वाला होता है। उसके प्रभाव से नारद जी का हृदय पवित्र हो गया और इनके समस्त पाप धुल गए। जाते समय महात्माओं ने प्रसन्न होकर इन्हें भगवन्नाम का जप एवं भगवान के स्वरूप के ध्यान का उपदेश दिया। एक दिन सांप के काटने से उनकी माता जी भी इस संसार से चल बसीं। अब नारद जी इस संसार में अकेले रह गए। उस समय इनकी अवस्था मात्र पांच वर्ष की थी। माता के वियोग को भी भगवान का परम अनुग्रह मानकर ये अनाथों के नाथ दीनानाथ का भजन करने के लिए चल पड़े। एक दिन जब नारद जी वन में बैठकर भगवान के स्वरूप का ध्यान कर रहे थे, अचानक इनके हृदय में भगवान प्रकट हो गए और थोड़ी देर तक अपने दिव्य स्वरूप की झलक दिखाकर अन्तर्धान हो गए। भगवान का दोबारा दर्शन करने के लिए नारद जी के मन में परम व्याकुलता पैदा हो गई। वह बार-बार अपने मन को समेट कर भगवान के ध्यान का प्रयास करने लगे, किंतु सफल नहीं हुए। उसी समय आकाशावाणी हुई, ‘‘अब इस जन्म में फिर तुम्हें मेरा दर्शन नहीं होगा। अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद रूप में मुझे पुन: प्राप्त करोगे।’’ समय आने पर नारद जी का पांच भौतिक शरीर छूट गया और कल्प के अंत में वह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुए। देवर्षि नारद भगवान के भक्तों में सर्वश्रेष्ठ हैं। यह भगवान की भक्ति और महात्म्य के विस्तार के लिए अपनी वीणा की मधुर तान पर भगवद् गुणों का गान करते हुए निरंतर विचरण किया करते हैं। इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इनके द्वारा प्रणीत भक्ति सूत्र में भक्ति की बड़ी ही सुंदर व्याख्या है। अब भी यह अप्रत्यक्ष रूप से भक्तों की सहायता करते रहते हैं। भक्त प्रह्लाद, भक्त अम्बरीष, ध्रुव आदि भक्तों को उपदेश देकर इन्होंने ही उन्हें भक्ति मार्ग में प्रवृत्त किया। इनकी समस्त लोकों में अबाधित गति है। इनका मंगलमय जीवन संसार के मंगल के लिए ही है। यह ज्ञान के स्वरूप, विद्या के भंडार, आनंद के सागर तथा सब भूतों के अकारण प्रेमी और विश्व के सहज हितकारी हैं। अविरल भक्ति के प्रतीक और ब्रह्मा के मानस पुत्र माने जाने वाले देवर्षि नारद का मुख्य उद्देश्य प्रत्येक भक्त की पुकार भगवान तक पहुंचाना है। वह विष्णु के महानतम भक्तों में माने जाते हैं और इन्हें अमर होने का वरदान प्राप्त है। भगवान विष्णु की कृपा से यह सभी युगों और तीनों लोगों में कहीं भी प्रकट हो सकते हैं। ।। नारायण नारायण ।। 🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔹

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