T.K
T.K Oct 15, 2018

🍁good nyt frnds🍁

🍁good nyt frnds🍁

🍁 शुभरात्रि🍁

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कामेंट्स

Sangeeta Lal Oct 15, 2018
Very nice ji Jay shree Radhe Krishna ji good night ji sweet dreams ji

Anju Saini Oct 15, 2018
शुभ रात्रि राधे राधे

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Swami Lokeshanand Apr 22, 2019

अब बड़ी बारीक बात पर ध्यान दें, कर्मकाण्ड के अनुष्ठान से, भगवद् प्रेम को प्राप्त, भरत रूपी संत ने, कर्म रूपी कैकेयी से, ममत्व का बंधन त्याग, ज्ञान रूपी कौशल्या का आश्रय ग्रहण किया। यह ऐसा ही है जैसे कोई सीढ़ियों से ऊपर चढ़, छत की सीमारेखा को छूकर, सीढ़ियों का त्याग कर, छत पर चला जाए। या नाव से, नदी पार कर, दूसरे किनारे पर, नाव का त्याग कर, किनारे पर उतर जाए। यही है कि भक्ति रूपी सीता के अवलम्बन से, हृदय रूपी अयोध्या के राज सिंहासन पर, राम रूपी परमात्मा का, राज्याभिषेक हो जाने पर, सद्गुरु रूपी धोबी के कहने पर, भक्ति रूपी सीता का त्याग कर दिया गया। यही है जो रामकृष्ण, काली के मार्ग से, अन्त:करण को पवित्र कर, सद्गुरु तोतापुरी जी के निर्देश में, काली का त्याग कर, परमहंस हो गए। यही हुआ जब कन्हैया ने, कर्म रूपी यमुना में उतरी, गोपी (गो माने इन्द्रियाँ, पी माने सुखा डालना, लाख विषय इन्द्रियों के सामने से गुजरते हों, मन में वासना की रेखा मात्र भी न खिंचती हो, ऐसी अवस्था को प्राप्त साधक) रूपी परिपक्व साधक का, वस्त्र, पट, पर्दा, माया का आवरण चुराकर, हटाकर, उनके अपने नग्न स्वरूप, वास्तविक स्वरूप, आत्म स्वरूप को उद्घाटित कर दिया था। और कितने उदाहरण दें, समझदार को तो इशारा काफी है, मूढ़ लात खाकर भी नहीं ही समझता। भरतजी ने तो भगवान के आदेश का ही पालन किया है- "सबकी ममता ताग बटोरी। मम पद मनहिं बाँधि बर डोरी॥" गलत क्या किया? ऐसा तो एक दिन प्रत्येक मुमुक्षु को करना ही पड़ता है। सौभाग्यशाली हैं वे, जिनके जीवन में ऐसा क्षण आ गया। माया ने जिसकी बुद्धि पर जादू चला रखा है, वह इनके आध्यात्मिक संकेत न पकड़ कर, इन्हें लौकिक घटनाक्रम समझ कर, महापुरुषों के माथे पर कलंक का टीका लगा, स्वयं पाप का भागी ही बनता है। ध्यान दें, पक जाने पर जड़ फल भी स्वत: ही, डाली का आश्रय त्याग ही देता है, तब चैतन्य स्वरूप संतों की कौन कहे? अब विडियो देखें- कैकेयी को त्यागना https://youtu.be/Jrp2u6o5Xm8

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खुश रहो तुम सदा ये दुआ हैं मेरी,, , दूसरों के प्रति अच्छे नहीं सच्चे बनें जीवन में ऐसा सभी के साथ होता है कि हमारे नजदीकी मित्रों, रिश्तेदारों या परिचितों को किसी खास मौके पर पैसों की जरूरत होती है और वे हमसे आर्थिक मदद की उम्मीद करते हैं। उस वक्त हमारे पास उनकी मदद करने की क्षमता नहीं होती लेकिन हम उन्हें स्पष्ट मना नहीं कर पाते हैं। हम उन्हें कहते हैं, 'मैं एक-दो दिन में जवाब देता हूं।" जिस क्षण हमसे पूछा जाता है कि क्या हम उनकी मदद कर पाएंगे उसी क्षण हमें अपनी स्थिति के बारे में पता होता है लेकिन हमने अपने प्रियजनों को अंधेरे और उजाले के बीच छोड़ देते हैं। अगली बार जब वे संपर्क करते हैं तो हम बचने की कोशिश करने लगते हैं। कई बार बहाने बनाने लगते हैं। इस तरह हम खुद के लिए अनावश्यक तनाव पैदा करते हैं और दूसरे को भी झूठा भरोसा दिलाते हैं। इस पूरी दुविधा की वजह यही है कि हम दूसरों की नजर में अच्छे बने रहना चाहते हैं। दूसरों की नजर में अच्छे बने रहने के कारण हम सच नहीं बोलते और अपने लिए मुश्किल स्थितियां पैदा कर लेते हैं।  और यही से दरार पड़ जाती हैं, जो किसी भी मायने में अच्छा नहीं है,,, जय श्री राम जय जय श्री राम

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