प्रेम भाव है, भावना नहीं। जो अन-कंडीशनल होता है, वह प्रेम है ।

प्रेम भाव है, भावना नहीं।  जो अन-कंडीशनल होता है, वह प्रेम है ।

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प्रेम भाव है, भावना नहीं।

जो अन-कंडीशनल होता है, वह प्रेम है ।

प्रेम श्रद्धा है सौदा नहीं।

इसलिये श्रद्धा हमेशा दिल से होती है और

सौदा हमेशा दिमाग से होता है ।

संसार का प्रेम आता जाता है, वह टिकने

वाला नहीं है, और परमात्मा का प्रेम स्थाई है।
"जगत का प्रेम टिकता नहीं

भगवान का प्रेम मिटता नहीं । । "

प्रेम परमात्मा का नाम है -

प्रेम अगर पाप है तो पुण्य किसका नाम है,

प्रेम अगर अधर्म है तो धर्म किसका नाम है,

प्रेम अगर कुकर्म है तो सुकर्म किसका नाम है,

पर प्रेम के पापियों से ही प्रेम बदनाम है,
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मैं तुम्हें कैसे बताऊँ कि

प्रेम तो सीता राम है, प्रेम तो राधे- श्याम है ।
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"शरीर" कभी पूरा पवित्र नहीं हो सकता,
फिर भी सभी इसकी पवित्रता की कोशिश करते है।
"मन" पवित्र हो सकता है,
परंतु अफ़सोस कोई कोशिश ही नहीं करता....
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कामेंट्स

🙏❤💗💜💖 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः🙏 नमः🙏🙏💖💗💖💖💖 🙏🙏❤💗💖 ओम नामे भगवते वासुदेवया यह एक प्रसिद्ध हिन्दू मंत्र है।🙏💖❤💗❤ यह मंत्र भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण दोनों का मंत्र है।🙏💖 इसमें दो परंपराएं हैं-तांत्रिक और पुराणिक। तांत्रिक पंरपराये में ऋषि प्रजापति आते है और पुराणिक पंरपरा में ऋषि नारदा जी आते है। हालांकि, दोनों कहते हैं कि यह सर्वोच्च विष्णु मंत्र है। 🙏💜💖❤💗शारदा तिलक तन्त्रम कहते है कि ‘देवदर्शन महामंत्र् प्राधन वैष्णवगाम’ बारह वैष्णव मंत्रों में यह मत्रं प्रमुख हैं।🙏 इसी प्रकार ‘श्रीमद् भगवतम्’ के 12 अध्याय को इस मंत्र के 12 अक्षर के विस्तार के रूप में लिए गए है। इस मंत्र को मुक्ति का मंत्र कहा जाता है और मोक्ष प्राप्त करने के लिए एक आध्यात्मिक सूत्र के रूप में माना जाता है। 🙏 मंत्र ‘श्रीमद् भगवतम्’ का प्रमुख मंत्र है इस मंत्र का वर्णन विष्णु पुराण में भी मिलता है।🙏🙏🙏❤🙏 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः मंत्र का अर्थ:🙏❤💗💜💖 ओम - ओम यह ब्रंह्माडीय व लौकीक ध्वनि है। नमो - अभिवादन व नमस्कार।🙏❤💗💖💜 भगवते - शक्तिशाली, दयालु व जो दिव्य है।🙏 वासुदेवयः - वासु का अर्थ हैः सभी प्राणियों में जीवन और 🙏देवयः 🙏❤का अर्थ हैः ईश्वर। इसका मतलब है कि भगवान (जीवन/प्रकाश) जो सभी प्राणियों का जीवन है।🙏❤💗💖 वासुदेव भगवान! अर्थात् जो वासुदेव भगवान नर में से नारायण बने, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ। 🙏🙏🙏🙏 जय हिंद, जय भारत 🙏🙏🌹🌹

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Anilkumar Tailor Nov 27, 2020

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संकल्प Nov 26, 2020

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🌺🌺🌺🌺​*तुलसी कौन थी?*🌺🌺🌺🌺 तुलसी(पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था, राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी.बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी.जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था. वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी. एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा – स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठ कर आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प नही छोडूगी। जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी, उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये। सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता । फिर देवता बोले – भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है। भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए,जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है? उन्होंने पूँछा – आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये। सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्रार्थना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गयी। उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे। और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है.देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है ! 🙏🏼🙏🏼इस कथा को कम से कम दो लोगों को अवश्य सुनाए आप को पुण्य अवश्य मिलेगा। या चार ग्रुप मे प्रेषित करें। 🙏🏼🙏🏼

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देवउठनी एकादशी पर तुलसी जी के बस 8 नाम जपें, अक्षय पुण्य लाभ पाएं हम सबके घर में विराजित मां तुलसी के 8 नामों का मंत्र या सीधे 8 नाम देवउठनी एकादशी के दिन बोलने से भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी भी प्रसन्न होती है। मंत्र : वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी। पुष्पसारा नन्दनीच तुलसी कृष्ण जीवनी।। एतभामांष्टक चैव स्रोतं नामर्थं संयुक्तम। य: पठेत तां च सम्पूज् सौऽश्रमेघ फललंमेता।। तुलसी के आठ नाम – पुष्पसारा, नन्दिनी, वृंदा, वृंदावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, तुलसी और कृष्ण जीवनी। तुलसी की पूजा में ये चीजें जरूरी हैं तुलसी पूजा के लिए घी दीपक, धूप, सिंदूर, चंदन, नैवद्य और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। रोजाना पूजन करने से घर का वातावरण पूरी तरह पवित्र रहेगा। इस पौधे में कर्इ ऐसे तत्व भी होते हैं जिनसे कीटाणु पास नहीं फटकते। देवउठनी एकादशी पर 20 बातों का रखें ध्यान देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह और विष्णु पूजन का विशेष महत्व है। आइए जानें कैसे करें तुलसी पूजन, पढ़ें विशेष मंत्र : 1 -तुलसी के पौधे के चारों तरफ स्तंभ बनाएं। 2 -फिर उस पर तोरण सजाएं। 3 -रंगोली से अष्टदल कमल बनाएं। 4 -शंख,चक्र और गाय के पैर बनाएं। 5 -तुलसी के साथ आंवले का गमला लगाएं। 6 -तुलसी का पंचोपचार सर्वांग पूजा करें। 7 -दशाक्षरी मंत्र से तुलसी का आवाहन करें। 8 -तुलसी का दशाक्षरी मंत्र-श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वृन्दावन्यै स्वाहा। 9 -घी का दीप और धूप दिखाएं। 10-सिंदूर,रोली,चंदन और नैवेद्य चढ़ाएं। 11-तुलसी को वस्त्र अंलकार से सुशोभित करें। 12 -फिर लक्ष्मी अष्टोत्र या दामोदर अष्टोत्र पढ़ें। 13 -तुलसी के चारों ओर दीपदान करें। 14-एकादशी के दिन श्रीहरि को तुलसी चढ़ाने का फल दस हज़ार गोदान के बराबर है। 15 -जिन दंपत्तियों के यहां संतान न हो वो तुलसी नामाष्टक पढ़ें 16 -तुलसी नामाष्टक के पाठ से न सिर्फ शीघ्र विवाह होता है बल्कि बिछुड़े संबंधी भी करीब आते हैं। 17-नए घर में तुलसी का पौधा, श्रीहरि नारायण का चित्र या प्रतिमा और जल भरा कलश लेकर प्रवेश करने से नए घर में संपत्ति की कमी नहीं होती। 18 -नौकरी पाने, कारोबार बढ़ाने के लिये गुरुवार को श्यामा तुलसी का पौधा पीले कपड़े में बांधकर, ऑफिस या दुकान में रखें। ऐसा करने से कारोबार बढ़ेगा और नौकरी में प्रमोशन होगा। 19 - दिव्य तुलसी मंत्र : देवी त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरैः । नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये ।। ॐ श्री तुलस्यै विद्महे। विष्णु प्रियायै धीमहि। तन्नो वृन्दा प्रचोदयात्।। तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी। धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमन: प्रिया।। लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत्। तुलसी भूर्महालक्ष्मी: पद्मिनी श्रीर्हरप्रिया।। 20 - 11 बार तुलसी जी की परिक्रमा करें।देवउठनी एकादशी पर तुलसी जी के बस 8 नाम जपें, अक्षय पुण्य लाभ पाएं हम सबके घर में विराजित मां तुलसी के 8 नामों का मंत्र या सीधे 8 नाम देवउठनी एकादशी के दिन बोलने से भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी भी प्रसन्न होती है। मंत्र : वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी। पुष्पसारा नन्दनीच तुलसी कृष्ण जीवनी।। एतभामांष्टक चैव स्रोतं नामर्थं संयुक्तम। य: पठेत तां च सम्पूज् सौऽश्रमेघ फललंमेता।। तुलसी के आठ नाम – पुष्पसारा, नन्दिनी, वृंदा, वृंदावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, तुलसी और कृष्ण जीवनी। तुलसी की पूजा में ये चीजें जरूरी हैं तुलसी पूजा के लिए घी दीपक, धूप, सिंदूर, चंदन, नैवद्य और पुष्प अर्पित किए जाते हैं। रोजाना पूजन करने से घर का वातावरण पूरी तरह पवित्र रहेगा। इस पौधे में कर्इ ऐसे तत्व भी होते हैं जिनसे कीटाणु पास नहीं फटकते। देवउठनी एकादशी पर 20 बातों का रखें ध्यान देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह और विष्णु पूजन का विशेष महत्व है। आइए जानें कैसे करें तुलसी पूजन, पढ़ें विशेष मंत्र : 1 -तुलसी के पौधे के चारों तरफ स्तंभ बनाएं। 2 -फिर उस पर तोरण सजाएं। 3 -रंगोली से अष्टदल कमल बनाएं। 4 -शंख,चक्र और गाय के पैर बनाएं। 5 -तुलसी के साथ आंवले का गमला लगाएं। 6 -तुलसी का पंचोपचार सर्वांग पूजा करें। 7 -दशाक्षरी मंत्र से तुलसी का आवाहन करें। 8 -तुलसी का दशाक्षरी मंत्र-श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वृन्दावन्यै स्वाहा। 9 -घी का दीप और धूप दिखाएं। 10-सिंदूर,रोली,चंदन और नैवेद्य चढ़ाएं। 11-तुलसी को वस्त्र अंलकार से सुशोभित करें। 12 -फिर लक्ष्मी अष्टोत्र या दामोदर अष्टोत्र पढ़ें। 13 -तुलसी के चारों ओर दीपदान करें। 14-एकादशी के दिन श्रीहरि को तुलसी चढ़ाने का फल दस हज़ार गोदान के बराबर है। 15 -जिन दंपत्तियों के यहां संतान न हो वो तुलसी नामाष्टक पढ़ें 16 -तुलसी नामाष्टक के पाठ से न सिर्फ शीघ्र विवाह होता है बल्कि बिछुड़े संबंधी भी करीब आते हैं। 17-नए घर में तुलसी का पौधा, श्रीहरि नारायण का चित्र या प्रतिमा और जल भरा कलश लेकर प्रवेश करने से नए घर में संपत्ति की कमी नहीं होती। 18 -नौकरी पाने, कारोबार बढ़ाने के लिये गुरुवार को श्यामा तुलसी का पौधा पीले कपड़े में बांधकर, ऑफिस या दुकान में रखें। ऐसा करने से कारोबार बढ़ेगा और नौकरी में प्रमोशन होगा। 19 - दिव्य तुलसी मंत्र : देवी त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरैः । नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये ।। ॐ श्री तुलस्यै विद्महे। विष्णु प्रियायै धीमहि। तन्नो वृन्दा प्रचोदयात्।। तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी। धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमन: प्रिया।। लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत्। तुलसी भूर्महालक्ष्मी: पद्मिनी श्रीर्हरप्रिया।। 20 - 11 बार तुलसी जी की परिक्रमा करें।🙏

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Shakti Nov 26, 2020

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!! जय श्री राम !! हनुमान जी को हजारों साल तक अमर रहने का वरदान क्यों मिला था ? जानिए धर्म की रक्षा के लिए भगवानों ने धरती पर अनके रूप लिए है. उन रूपों में एक रूप है हनुमान जी का. हनुमान जी ने त्रेतायुग में भगवान श्रीराम की रक्षा के लिए और दुष्टों का नाश करने के लिए अवतार लिया था. हनुमान जी का अवतार भगवान श्री शंकर के सबसे श्रेष्ठ अवतार माने जाते है. महाभारत हो या रामायण दोनों में हनुमान जी ने अहम भूमिका निभाई है. रामायण में तो हनुमान जी श्री राम के प्रिय भक्त थे और महाभारत में भी अर्जुन के रथ से लेकर भीम की परीक्षा तक, कई जगह हनुमान के दर्शन हुए हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रामायण या महाभारत के सभी पात्रों का समापन होने के बाबजूद भी हनुमान जी हजारों-लाखों सालों तक क्यों जीवित है. आखिर क्या है हनुमान जी के जीवित होने का राज ? आज हम आपको इस सवाल का जबाव बताने जा रहे है कि हनुमान जी हजारों-लाखों सालों के बाद भी क्यों जीवित है तो देर किस बात जानते है पूरा मामला. हनुमान के जीवित होने का राज –............... वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण की लंका में सीता माता को खोजने के बाद जब लाख कोशिशों के बाद हताश हो गए तो वे सीता माता को मृत समझ बैठे लेकिन हनुमान जी को श्री राम का स्मरण हुआ फिर वे पुनः जोश में खोजने के लिए शिव वाटिका पहुँच गए. और सीता माता को उन्होंने खोज निकाला. इससे प्रसन्न होकर सीता माता ने हनुमान को अमरता का वरदान दिया. इसीलिए हनुमान जी भगवान श्री राम के सभी भक्तों की रक्षा करते है. हनुमान चालीसा की एक चौपाई में भी लिखा है- अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन्ह जानकी माता। अर्थात – ‘आपको माता श्री जानकी से ऐसा वरदान मिला हुआ है जिससे आप किसी को भी आठों सिद्धियां और नौ निधियां दे सकते हैं. हनुमान ने सीता माता को क्यों वरदान वापस लेने को कहा ? ‘हे माता आपने मुझे अमरता का वरदान तो दे दिया लेकिन मैं मेरे भगवान श्री राम के बिना धरती पर क्या करूँगा तो आप अपना दिया हुआ वरदान वापस ले लीजिए’. इस बात को लेकर हनुमान जी सीता माता के सामने जिद पर अड़ जाते है और उस दौरान सीता श्री राम का स्मरण करती कुछ देर वहां पर श्री राम प्रकट हो जाते है. तब श्री राम हनुमान जी को यह समझाते है कि ‘देखो हनुमान धरती पर आने वाला हर प्राणी, चाहे वह संत है या देवता कोई भी अमर नहीं है. तुमको तो वरदान है हनुमान, एक समय ऐसा भी आएगा की की धरती पर कोई भी देवी देवता नहीं रहेगा तब धरती पर पापियों का नाश और राम के भक्तों का उद्धार तुम्हे ही करना पड़ेगा, इसलिए तुम्हे अमरता का वरदान दिया गया है. तब हनुमान अपने अमरता के वरदान को समझते हैं और राम की आज्ञा समझकर आज भी धरती पर विराजमान हैं. !! जय श्री राम !! निकला मित्र सवेरा घंटिया धन-धन बाजी सुना राम के गीत रामधन मन में साजी !! जय श्री राम !! ☕☕👈🙋‍♀️🙋‍♀️🙏🌹

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एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई। वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों ही करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फंस गए। दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था। थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है? बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं। गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारी उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है? उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फंस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी ही है। गाय ने मुस्कुराते हुए कहा,.... बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा? थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था। *गाय ----समर्पित ह्रदय का प्रतीक है।* *बाघ ----अहंकारी मन है।* और *मालिक---- ईश्वर का प्रतीक है।* *कीचड़---- यह संसार है।* और *यह संघर्ष---- अस्तित्व की लड़ाई है।* *किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है,* *लेकिन मैं ही सब कुछ हूं, मुझे किसी के सहयोग की आवश्यकता नहीं है* *यही अहंकार है, और यहीं से विनाश का बीजारोपण हो जाता है।* *ईश्वर से बड़ा इस दुनिया में सच्चा हितैषी कोई नहीं होता, क्यौंकि वही अनेक रूपों में हमारी रक्षा करता है. Radhey Radhey jai shri krishna

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संकल्प Nov 26, 2020

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संकल्प Nov 26, 2020

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