🙏🔯 प्रेरणादायक श्लोक 🙏🔯

🙏🔯 प्रेरणादायक श्लोक 🙏🔯

+234 प्रतिक्रिया 41 कॉमेंट्स • 159 शेयर

कामेंट्स

RAJ RATHOD Feb 24, 2021
🙏Jai shri Ganesh 🙏 Good Night... Sweet dreams 🌷🌷

sanjay choudhary Feb 24, 2021
🙏🙏 जय श्री राम 🙏🙏 ।।। जय श्री कृष्णा ।।। आपकी रात्रि शुभ रहे।।।🙏🙏

pramod singh Feb 24, 2021
जय श्री राधे कृष्णा जी

Surender Verma Feb 25, 2021
🙏राधे राधे राधे राधे 🙏जय श्री श्याम🙏

घनश्याम गुप्ता Feb 25, 2021
घनश्याम गुप्ता :सुन्दर प्रस्तुति ।उत्तम मार्गदर्शक एंव प्रेरणादायी ।

#मूर्ख_व्यक्ति_के_सात_लक्षण 🙅 विदुर नीति में मुर्ख व्यक्ति को पहचानने के 7 लक्षण बताए गए हैं, 1- जो व्यक्ति बिना ज्ञान के ही हमेशा घमंड में चूर रहता है और बिना परिश्रम किए धनवान बनने की इच्छा रखता है. ऐसे व्यक्ति को मूर्ख कहा जाता है. 2- जो व्यक्ति अपना काम छोड़ दूसरों के कर्तव्य पालन में लगा रहता है और मित्रों के साथ संलग्र रह हमेशा गलत काम करता है ऐसा व्यक्ति मुर्ख होता है. 3- जो मनुष्य अपनी जरूरत से ज्यादा इच्छा करता है और अपने से शक्तिशाली लोगों से दुश्मनी मोल लेता है. उस व्यक्ति को मुर्ख माना जाता है. 4- जो मनुष्य अपने शत्रु को मित्र बना लेता है और अपने मित्रों को छोड़ गलत संगत अपना लेता है, ऐसा व्यक्ति मूर्ख कहलाता है. 5- जो मनुष्य बिना बुलाए ही किसी स्थान पर पहुंच जाता है और अपने आप को ऊंचा दिखाने की कोशिश करता है उसे मुर्ख कहते हैं. 6- जो मनुष्य स्वयं गलती कर दूसरों पर आरोप लगा देता है और हमेशा अपनी गलतियों को छुपाता है अपनाता नहीं है ऐसा व्यक्ति मूर्ख कहलाता है. 7- जो मनुष्य पितरों का श्राद्ध नहीं करता तथा अज्ञानी लोगों के प्रति श्रद्धा रखता है. ऐसा व्यक्ति मूर्ख कहलाता है.

+12 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 56 शेयर
Anita Sharma Apr 16, 2021

((((( संगति, परिवेश और भाव ))))) . एक राजा अपनी प्रजा का भरपूर ख्याल रखता था. राज्य में अचानक चोरी की शिकायतें बहुत आने लगीं. कोशिश करने से भी चोर पकड़ा नहीं गया. . हारकर राजा ने ढींढोरा पिटवा दिया कि जो चोरी करते पकडा जाएगा उसे मृत्युदंड दिया जाएगा. सभी स्थानों पर सैनिक तैनात कर दिए गए. घोषणा के बाद तीन-चार दिनों तक चोरी की कोई शिकायत नही आई. . उस राज्य में एक चोर था जिसे चोरी के सिवा कोई काम आता ही नहीं था. उसने सोचा मेरा तो काम ही चोरी करना है. मैं अगर ऐसे डरता रहा तो भूखा मर जाउंगा. चोरी करते पकडा गया तो भी मरुंगा, भूखे मरने से बेहतर है चोरी की जाए. . वह उस रात को एक घर में चोरी करने घुसा. घर के लोग जाग गए. शोर मचाने लगे तो चोर भागा. पहरे पर तैनात सैनिकों ने उसका पीछा किया. चोर जान बचाने के लिए नगर के बाहर भागा. . उसने मुडके देखा तो पाया कि कई सैनिक उसका पीछा कर रहे हैं. उन सबको चमका देकर भाग पाना संभव नहीं होगा. भागने से तो जान नहीं बचने वाली, युक्ति सोचनी होगी. . चोर नगर से बाहर एक तालाब किनारे पहुंचा. सारे कपडे उतारकर तालाब मे फेंक दिया और अंधेरे का फायदा उठाकर एक बरगद के पेड के नीचे पहुंचा. . बरगद पर बगुलों का वास था. बरगद की जड़ों के पास बगुलों की बीट पड़ी थी. चोर ने बीट उठाकर उसका तिलक लगा लिया ओर आंख मूंदकर ऐसे स्वांग करने बैठा जैसे साधना में लीन हो. . खोजते-खोजते थोडी देर मे सैनिक भी वहां पहुंच गए पर उनको चोर कहीं नजर नहीं आ रहा था. खोजते खोजते उजाला हो रहा था ओर उनकी नजर बाबा बने चोर पर पडी. . सैनिकों ने पूछा- बाबा इधर किसी को आते देखा है. पर ढोंगी बाबा तो समाधि लगाए बैठा था. वह जानता था कि बोलूंगा तो पकडा जाउंगा सो मौनी बाबा बन गया और समाधि का स्वांग करता रहा. . सैनिकों को कुछ शंका तो हुई पर क्या करें. कही सही में कोई संत निकला तो ? आखिरकार उन्होंने छुपकर उसपर नजर रखना जारी रखा. यह बात चोर भांप गया. जान बचाने के लिए वह भी चुपचाप बैठा रहा. . एक दिन, दो दिन, तीन दिन बीत गए बाबा बैठा रहा. नगर में चर्चा शुरू हो गई की कोई सिद्ध संत पता नही कितने समय से बिना खाए-पीए समाधि लगाए बैठै हैं. सैनिकों को तो उनके अचानक दर्शऩ हुए हैं. . नगर से लोग उस बाबा के दर्शन को पहुंचने लगे. भक्तों की अच्छी खासी भीड़ जमा होने लगी. राजा तक यह बात पहुंच गई. राजा स्वयं दर्शन करने पहुंचे. राजा ने विनती की आप नगर मे पधारें और हमें सेवा का सौभाग्य दें. . चोर ने सोचा बचने का यही मौका है. वह राजकीय अतिथि बनने को तैयार हो गया. सब लोग जयघोष करते हुए नगर में लेजा कर उसकी सेवा सत्कार करने लगे. . लोगों का प्रेम और श्रद्धा भाव देखकर ढोंगी का मन परिवर्तित हुआ. उसे आभास हुआ कि यदि नकली में इतना मान-संम्मान है तो सही में संत होने पर कितना सम्मान होगा. उसका मन पूरी तरह परिवर्तित हो गया और चोरी त्यागकर संन्यासी हो गया. . संगति, परिवेश और भाव इंसान में अभूतपूर्व बदलाव ला सकता है. रत्नाकर डाकू को गुरू मिल गए तो प्रेरणा मिली और वह आदिकवि हो गए. असंत भी संत बन सकता है, यदि उसे राह दिखाने वाला मिल जाए. . अपनी संगति को शुद्ध रखिए, विकारों का स्वतः पलायन आरंभ हो जाएगा.

+32 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 10 शेयर
Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 156*✳️✳️ ✳️✳️*निन्दक के प्रति भी सम्मान के भाव*✳️✳️ *क्षमा शस्त्रं करे यस्य दुर्जनः किं करिष्यति। *अतृणे पतितो वहिनः स्वयमेवोपशाम्यति॥ *महात्मा दादू दयाल जी ने निन्दा करने वाले को अपना पीर-गुरु बताकर उसकी खूब स्तुति की। जिन पाठशालाओ में परीक्षक होते हैं और वे सदा परीक्षा ही लेते रहते हैं, उसी प्रकार इन निन्दकों को भी समझना चाहिये। परीक्षक उन्हीं छात्रों की परीक्षा करते हैं, जो विद्वान बनने की इच्छा से पाठशाला में निमित्त प्रवेश करते हैं। जो बालक पढ़ता ही नहीं, जो जानवरों की तरह पैदा होते ही खाने-पीने की चिन्ता में लग जाता है उसकी परीक्षक परीक्षा ही क्या करेगा? वह तो निरक्षरता की परीक्षा में पहले ही उत्तीर्ण हो चुका है। इसी प्रकार निन्दक लोग उसी की निन्दा करते हैं तो इहलौकिक तथा पारलौकिक उन्नति करना चाहते हैं, जो श्रेष्ठ बनने की इच्छा से उन्नति की पाठशाला में प्रवेश करते हैं। जिसके जीवन में कोई विशेषता ही नहीं, जो आहार, निद्रा, भय और मैथुनादि धर्मों में अन्य प्राणियों के समान व्यवहार करता है उसकी निन्दा स्तुति दोनों समान हैं। *इहलौकिक उन्नति में निन्दा चाहे कुछ विघ्न भी कर सके, किन्तु पारलौकिक उन्नति में तो निन्दा सहायता ही करती हैं। निन्दा के दो भेद हैं- एक तो अपवाद, दूसरा प्रवाद। बुरे काम करने पर जो निन्दा होती है उसे अपवाद कहते हैं। उससे बचने की सभी को जी जान से कोशिश करनी चाहिये, किंतु कोई निन्दित कर्म किया तो है नहीं और वैसे ही लोग डाह से, द्वेष से या भ्रम से निन्दा करने लगे हैं उसे प्रवाद कहते हैं। उन्नति के पथ की ओर अग्रसर होने वाले व्यक्ति को प्रवाद की परवा न करनी चाहिये। प्रवाद ही उन्नति के कण्टकाकीर्ण शिखर पर चढ़ाने के लिये सहारे की लाठी का काम देता है। जो लोकरंजन के लिये प्रवाद की परवा करके उसकी असथार्थता लोगों पर प्रकट करते हैं वे तो ईश्वर हैं। ईश्वरों के तो वचनों को ही सत्य मानना चाहिये, उनके आचरणों की सर्वत्र नकल न करनी चाहिये। धोबी के प्रवाद पर निष्कलंक और पतिपरायणा सती-साध्वी जगन्माता सीता जी को श्री रामचन्द्र जी ने त्याग दिया। लोगों के दोष लगाने पर भगवान स्यमन्तकमणि को ढूँढते-ढूँढते परेशान हो गये। ये कार्य उन्हीं अवतारी पुरुषों को शोभा देते हैं हम साधारण कोटि के जीव यदि इस प्रकार के प्रवादों की परवा करें तब तो हम लोगों को पैर रखने की जगह भी न मिलेगी, क्योंकि जगत प्रवाद प्रिय है, इसे दूसरों की झूठी निन्दा करने में मजा मिलता है। ऐसे ही एक निन्दक महाशय स्वामी रामचन्द्रपुरी प्रभु के समीप कुछ काल रहे थे, उनका वृत्तान्त सुनिये। *भगवान माधवेन्द्रपुरी श्रीशंकराचार्य के दस नामी संन्यासियों में होने पर भी भक्तिभाव के उपासक थे। वे व्रजविहारी को ही सविशेष, निर्विशेष, साकार-निराकार तथा देशकाल और कार्यकारण से पृथक सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म समझते थे। वे निर्विशेष ब्रह्म की निन्दा करते थे। उनका कथन था- ‘भाई ! जिन्हें निर्गुण निर्विशेष ब्रह्म के ध्यान में आनन्द आता हो, वे भले ही ध्यान और अभ्यास के द्वारा उस निराकार ब्रह्म का ध्यान करें, किन्तु हमारा मन तो उस यमुना के पुलिनों पर गौओं के पीछे दौड़ने वाले किसी श्सामरंग के छोकरे ने हर लिया है। हमारी आँखों में तो वही गड़ गया है। उसके सिवा हमें दूसरा रूप भाता ही नहीं, विश्व हमें नीला-ही-नीला दीखता है। *ये रामचन्द्रपुरी जी भी उन्हीं भगवान माधवेन्द्रपुरी के शिष्य थे। उनके शिष्यों में परमानन्दपुरी, रंगपुरी, रामचन्द्रपुरी और ईश्वरपुरी आदि के नाम मिलते हैं। इन सबमें शिवपुरी ही अपने गुरु में अत्यधिक श्रद्धा रखते थे और उनकी छोटी-से-छोटी सेवा अपने ही हाथों से करते थे, इसीलिये इन पर गुरु महाराज का प्रसाद सबसे अधिक हुआ और उसी के फलस्वरूप इन्हें गौरांग महाप्रभु के मंत्र दीक्षा गुरु होने का लोकविख्यात पद प्राप्त हो सका। ये रामचन्द्रपुरी महाशय पहले से ही सूखी तबीयत के और गुरु निन्दक थे। *जब भगवान माधवेन्द्रपुरी का अन्तिम समय आया और वे इस नश्वर शरीर को परित्याग करके गोलोक को गमन करने लगे तब श्रीकृष्ण विरह में छटपटाते हुए रुदन करने लगे। *रोते-रोते वे विकलता के साथ साँस भर भर कर वेदना के स्वर में कहते- ‘हा नाथ ! तुम्हें कब देख सकूँगा, मथुरा में जाकर आपके दर्शन न कर सका। हे मेरे मनमोहन ! इस अधम को भी उबारो, मैं आपके विरहजन्य दुःख से जला जा रहा हूँ !’ *उनकी इस पीड़ा को, विकलता को, कातरता और अधीरता को कोई सच्चा भगवत रसिक ही समझ सकता था। शुष्क तबीयत के; अखण्ड प्रकृति से, ज्ञानाभ्यासी रामचन्द्रपुरी इस व्यथा का मर्म क्या जानें। उन्होंने वे ही सुनी हुई ज्ञान की बातें छाँटनी शुरू कर दीं। उन शिक्षकमानी महात्मा को यह भी ध्यान नहीं रहा कि जिन महापुरुष से हमने दीक्षा ली है वे भी इन बातों को जानते होंगे। *वे गुरु जी को उपदेश करने लगे- ‘महाराज ! आप ये कैसी मोह की सी भूली-भूली बातें कर रहे हैं, यह हृदय ही मथुरा है, आप ही ब्रह्म हैं, जगत त्रिकाल में भी नहीं हुआ। आप इस शोक को दूर कीजिये और अपने को ही ब्रह्म अनुभव कीजिये।’ *धीरे से क्षीण स्वर में महाराज ने अपने प्रिय शिष्य ईश्वरपुरी महाराज को बुलाया और उन्हें आज्ञा दी कि रामचन्द्र को मेरे सामने से हटा दो। रामचन्द्रपुरी गुरु की असन्तुष्टता को लिये हुए ही बाहर हुए। भगवान माधवेन्द्रपुरी ने श्रीकृष्ण-श्रीकृष्ण कहते हुए और अन्तिम समय में इस श्लोक का उच्चारण करते हुए इस पांच भौतिक नश्वर शरीर को त्याग दिया- *अयि दीनदयार्द्र नाथ हे मथुरानाथ कदावलोक्य से। *हृदयं त्वदलोककातरं दयित! भ्राम्यति किं करोम्यहम्॥ *पुरी महाराज के निधन के अनन्तर ईश्वरपुरी महाराज तो गौड़-देश की ओर चले गये और रामचन्द्रपुरी तीर्थों में भ्रमण करते रहे। भ्रमण करते-करते ये प्रभु की कीर्ति और प्रशंसा सुनकर पुरी में आये। आकर उन्होंने अपने ज्युष्ठ गुरुभ्राता परमानन्द जी पुरी के चरणों में प्रणाम किया और फिर प्रभु से मिलने के लिये गये। प्रभु इनका परिचय पाकर उठकर खड़े हो गये और इनके चरणों में गुरुभाव से श्रद्धा के साथ प्रणाम किया और भी प्रभु के साथी बहुत से विरक्त भक्त वहाँ आ गये, सभी ने गुरुभाव से पुरी को प्रण्धाम किया और बहुत देर तक भगवत्सम्बन्धी बातें होती रहीं। *प्रभु के पास आये हुए अतिथियों का भार इन्हीं सब विरक्त वैष्णवों पर था। वे लोग भिक्षा करके लाते थे और उसी से आगत अतिथियों का स्वागत सत्कार करते रहे। महाप्रभु की भिक्षा का कोई नियम नहीं था, जो भी भक्त निमन्त्रण करके प्रसाद दे जाय उसे ही प्रभु पा लेते थे। सार्वभौम भट्टाचार्य आदि गृहस्थी भक्त प्रभु को अपने घर पर भी बुलाकर भिक्षा कराते थे और विरक्त भक्त भी बारी-बारी से प्रभु को भिक्षा करा दिया करते थे। सामान्यतया प्रभु की भिक्षा में चार आने का खर्च था। चार आने के प्रसाद में प्रभु की भिक्षा का काम चल जाता और सब तो इधर उधर से भिक्षा कर लाते थे। केवल श्री ईश्वापुरी के शिष्य काशीश्वर और सेवक गोविन्द ये दो प्रभु के ही समीप भिक्षा पाते थे। इन चार आनों के प्रसाद में तीनों का ही काम चल जाता था। इसके अतिरिक्त प्रेम के कारण कोई और भी अधिक मिष्टान्न आदि पदार्थ ले आवे तो प्रभु उसकी भी अवहेलना नहीं करते थे। प्रसाद में उनकी भेद बुद्धि नहीं थी। *भक्त प्रेमपूर्वक प्रभु का आग्रह कर करके खूब खचिालाते थे और प्रभु भी उनके आग्रह को मानकर इच्छा न होने पर भी थोड़ा खा लेते थे। उस दिन नवागत रामचन्द्रपुरी का निमन्त्रण जगदानन्द जी ने किया। मन्दिर से प्रसाद लाकर उन्होंने प्रेमपूर्वक उन्हें भिक्षा करायी। वे तो प्रेमी थे, प्रभु को जिस प्रकार प्रेम पूर्वक आग्रह के साथ भिक्षा कराते थे, उसी प्रकार आग्रह कर करके उन्हें भी खूब खिलाया। *वे महाशय आग्रह करने से खा तो बहुत गये; किन्तु जाते ही उन्होंने जगदानन्द पण्डित की निन्दा करनी आरम्भ कर दी। कहने लगे- ‘सचमुच हमने जो सुना था कि श्रीकृष्ण-चैतन्य के सभी भक्त पेटू हैं, यह बात ठीक ही निकली। भला, साधु होकर जो इतना अन्न खायेगा, वह भजन पूजन कैसे कर सकेगा?’ इस प्रकार की बहुत सी बातें वे लोगों से कहते। स्वयं त्याग के अभिमान के कारण भिक्षा करके खाते। जहाँ तहाँ एकान्त स्थानों और पेड़ों के नीचे पड़े रहते और महाप्रभु के आचरण की लोगों में खूब निन्दा करते। वे अपने स्वभाव से विवश थे, प्रभु का इतना भारी प्रभाव उन्हें अखरता था। उनमें ही क्या विशेषता है कि लोग उन्हीे की पूजा करते हैं। वे संन्यासी होकर भी गृहस्थियों के घर में रहते हैं। हम विरक्तों की भाँति एकान्त स्थानों में निवास काते हैं। वे रोज बढ़िया-बढ़िया पदार्थ संन्यासी धर्म के विरुद्ध अनेकों बार खाते हैं। हम यतिधर्म का पालन करते हुए रूखी-सूखी भिक्षा पर ही निर्वाह करते हैं। वे सदा लोगों से घिरे रहते हैं। हम लोगों से एकदम पृथक रहते हैं। फिर भी मूर्ख लोग हमारा सत्कार न करके डनहीं का सबसे अधिक सत्कार करते हैं। मालूम होता है लोग यतिधर्म से अनभिज्ञ हैं, हम उन्हें समझाकर उनके भ्रम को दूर कर देंगे। यह सोचकर वे प्रभु के आचरणों की निन्दा करने लगे और यतिधर्म के व्याज से अपनी प्रशंसा करने लगे। *भक्तों ने जाकर यह बात प्रभु से कही। प्रभु तो किसी के सम्बन्ध का निन्दावाक्य सुनना ही नहीं चाहते थे, इसीलिये उन्होंने इस बात की एकदम उपेक्षा ही कर दी। रामचन्द्र जी अपने स्वभावानुसार प्रभु की तथा उनके भक्तों की सदा कड़ी आलोचना करते रहते थे। *एक दिन वे प्रातःकाल प्रभु के पास पहुँचे। उस समय प्रभु समुद्रस्नान करके बैठे हुए भगवन्नामों का जप कर रहे थे। एक ओर सुन्दर कमण्डलु रखा था, दूसरी ओर श्रीमद्भागवत की पुस्तक रखी थी। रात्रि की प्रसादी मालाएँ भी वहाँ टँग रही थीं। पुरी को देखते ही प्रभु ने उन्हें उठकर सादर प्रणाम किया और बैठने के लिये आसन दिया। जिस प्रकार मीठा और विष्ठा पास पास रहने पर मक्खी की दृष्टि विष्ठा पर ही जाती है और वह मीठे को छोडकर विष्ठा पर ही बैइती है उसी प्रकार छिद्रान्वेषण स्वभाव वाले रामचन्द्रपुरी की दृष्टि सामने दीवार पर चढ़ती हुई चींटियों के ऊपर पड़ी। दीवाल पर चींटियों का चढ़ना कोई नयी बात नहीं थी, किन्तु वे तो छिद्रान्वेषण के ही निमित्त आये थे। इसलिये बोले-‘क्यों जी ! हम समझते हैं, तुम मीठा बहुत खाते हो, तभी तो तुम्हारे यहाँ इतनी चींटी हैं।’ *प्रभु इसे अस्वीकार न कर सके। उन्होंने सरलता के साथ कहा- ‘भगवन ! भगवान के प्रसाद में मैं मीठे खट्टे का विचार नहीं करता।’ *पुरी ने अपना गुरुत्व जताते हुए कहा- ‘यह बात ठीक नहीं है, ऐसा आचरण यतिधर्म के विरुद्ध है। संन्यासी को स्वादिष्ट पदार्थ तो कभी खाने ही न चाहिये। भिक्षा में जो भी कुछ रूखा सूखा मिल गया उसी से उदरपूर्ती कर लेनी चाहिये। साधु को स्वाद से क्या प्रयोजन? तुम्हारे सभी भक्त खूब खाते हैं आर तान दुपट्टा सोते हैं, भला इतना अधिक खाने पर भजन कैसे हो सकता है ! सुना है, तुम भी बहुत खाते हो।’ *प्रभु ने अत्यन्त ही दीनता के साथ कहा-‘अब आप जैसा उपदेश करेंगे, वैसा ही करूँगा।’ *पुरी ने कुछ गर्व के स्वर में कहा- हम क्या उपदेश करेंगे तुम स्वयं समझदार हो। *संन्यासी होकर संन्यासियों का सा आचरण करो, इस दुकानदारी को छोड़ो। लोगों का मनोरंजन करने से क्या लाभ? संन्यासी का जीवन तो घोर तितिक्षामय होना चाहिये। यह सुनकर प्रभु चुप हो गये और रातचन्द्रपुरी उठकर चले गये। तब प्रभु ने गोविन्द को बुलाकर कहा- ‘गोविन्द ! आज से मेरे लिये एक ‘चोठि’ भात और पाँच पीठा के व्यंजन, बस यही भिक्षा में लिया करना। इससे अधिक मेरे लिये किसी से भिक्षा ली तो मैं बहुत असन्तुष्ट होऊँगा।’ जगन्नाथ जी का प्रसाद सदा मिट्टी की हाँडियों में बनता है। एक हाँडी के चौथाई भाग को ‘एक चोठि’ या एक चौथाई बोलते हैं। मालूम पड़ता है, उन दिनों मोल लेने पर एक हाँडी भात दो-तीन पैसे में मिलता होगा और एक दो पैसे में दूसरे व्यंजन। चार पैसे के प्रसाद में चार-पाँच आदमियों की भली-भाँति तृप्ति हो जाती होगी। अब प्रभु ने केवल एक पैसे का ही भोग लेना स्वीकार किया। *काशीश्वर और गोविन्द से कह दिया- ‘तुम लोग अन्यत्र जाकर भिक्षा ले आया करो।’ गोविन्द उदास मन से लौट गया। वह प्रभु की इस कठोर आज्ञा का कुछ भी अभिप्राय न समझ सका। गोविन्द प्रभु का अत्यन्त ही अन्तरंग भक्त था, उसका प्रभु के प्रति मातृवत स्नेह था। प्रभु की सेवा में उसे परमानन्द सुख का अनुभव होता था। उसे पता था कि प्रभु जिस बात का निश्चय कर लेते हैं, फिर उसे सहसा जल्दी नहीं छोड़ते। इसलिये उसने प्रभु के आज्ञा पालन में आनाकानी नहीं की। उस दिन एक ब्राह्मण ने प्रभु को निमन्त्रण किया था। वह बहुत सा सामान प्रभु की भिक्षा के निमित्त लाया था, किन्तु उसने उतना ही प्रसाद उसमें से लिया जितने की प्रभु ने आज्ञा दी थी, शेष सभी लौटा दिया। इस बात से ब्राह्मण को अपार दुःख हुआ, किन्तु प्रभु ने अधिक लेने की स्वीकृति ही नहीं दी। *भक्तों को इस बात का पता चला। सभी रामचन्द्रपुरी को खोटी-खरी सुनाने लगे। सभी प्रभु के समीप आ आकर प्रार्थना करने लगे।, किन्तु प्रभु ने इससे अधिक भिक्षा स्वीकार नहीं की। यह बात रामचन्द्रपुरी को भी मालूम हुई। वह भी प्रभु के भावों को ताड़ने के निमित्त प्रभु के समीप आये। प्रभु ने पूर्ववत ही उठकर उन्हें प्रेमपूर्वक प्रणाम किया और बैठने के लिये अपने से ऊँचा आसन दिया। आसन पर बैठते हुए गुरुत्व के भाव से पुरी कहने लगे- ‘हमने सुना है, तुमने हमारे कहने से अपना आहार घटा दिया है, यह बात ठीक नहीं है। हमारे कहने का अभिप्राय यह था कि आहर-विहार युक्त रहना चाहिये! इतना अधिक भी न करना चाहिये कि भजन में बैठा ही न जाय और इतना कम भी न करना चाहिये कि शरीर कृश हो जाय। युक्तपूर्वक भोजन करना चाहिये। शरीर सुखाने से क्या लाभ? *प्रभु ने धीरे से नम्रता के साथ कहा- ‘मैं आपका बच्चा हूँ, आप गुरुजन जैसी आज्ञा करेंगे, वैसा ही मैं करूँगा।’ *उसी स्वर में पुरी कहने लगे- ‘हाँ, यह तो ठीक है, किन्तु भोजन पेट भर किया करो।’ इतना कहकर पुरी महाराज चले गये। किन्तु प्रभु ने अपने आहार उतना ही रखा; उसमें कुछ भी परिवर्तन नहीं किया। इससे भक्तों को तो बड़ा ही दुःख हुआ। वे सब परमानन्द जी पुरी के पास पहुँचे और उनसे प्रार्थना करने लगे कि वे प्रभु को समझा दें। भक्तों के कहने पर परमानन्द जी प्रभु के पास गये और अत्यन्त ही क्षीण देखकर कहने लगे- ‘आप इतने कृश क्यों हो गये हैं, सुना है आपने अपना आहार भी अति सूक्ष्म कर दिया है, इसका कारण क्या है?’ *प्रभु ने सरलता पूर्वक उत्तर दिया- ‘श्रीपाद रामचन्द्र जी पुरी ने मुझे ऐसी आज्ञा दी थी कि संन्यासी को कम आहार करना चाहिये।’ *कुछ रोष के स्वर मे परमानन्द जी ने कहा- ‘आपने भी किसकी बात मानी? उसे आप नहीं जानते, उसका तो स्वभाव ही दूसरों की निन्दा करना है, ऐसे निन्दकों के उपदेश पर चलने लगें तो सभी रसातल में पहुँच जायँ। आपकी तो बात ही क्या है, वह तो महामहिम श्री गुरुचरणों की निन्दा किये बिना नहीं रहता था। उसके कहने से आप शरीर को सुखा रहे हैं, इससे हमें बड़ा कष्ट होता है। आप हमारे आग्रह से भर पेट भोजन किया कीजिये।’ *प्रभु ने सरलता के साथ कहा- ‘आप भी गुरु हैं, वे भी मान्य हैं। आपकी आज्ञा को भी टाल नहीं सकता, आज से कुछ अधिक खाया करूँगा।’ प्रभु के ऐसा विश्वास दिलाने पर पुरी उठकर अपने आसन पर चले गये। उस दिन से प्रभु ने आहार कुछ बढ़ाया तो अवश्य, किन्तु पहले के बराबर उनका आहार फिर कभी हुआ ही नहीं। सभी भक्त मन ही मन रामचन्द्रपुरी को कोसने लगे ओर भगवान से प्रार्थना करने लगे कि जल्दी ही इनके श्वेत पैर पुरी की पावन भमि को परित्याग करके कहीं अन्यत्र चले जायँ। भक्तों की प्रार्थना भगवान ने सुन ली और थोड़े दिनों बाद रामचन्द्रपुरी महाशय अपने आप ही पुरी छोड़कर किसी अन्य स्थान के लिये चले गये। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

+95 प्रतिक्रिया 16 कॉमेंट्स • 404 शेयर
Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 155*✳️✳️ ✳️✳️*महाप्रभु की अलौकिक क्षमा*✳️✳️ *क्षमा बलमशक्तानां शक्तानां भूषणं क्षमा। *क्षमा वशीकृतिर्लो के क्षमया किं न सिद्ध्यति॥ *महापुरुषों के पास भिन्न भिन्न प्रकृति के भक्त होते हैं। बहुत से तो ऐसे होते हैं, जो उनके गुण अवगुण को समझते ही नहीं, उनके लिये वे जो भी कुछ करते हैं सब अच्छा ही करते हैं। महापुरुषों के कार्यों में उन्हें अनौचित्य दीखता ही नहीं। बहुत से ऐसे होते हैं, जो गुण दोषो का विवेचन तो कर लेते हैं, किन्तु महापुरुषों के दोषों के ऊपर ध्यान नहीं देते, वे अवगुणो की उपेक्षा करके गुणों को ही ग्रहण करते हैं। कुछ ऐसे होते हैं, हृदय से उनके गुणों के प्रति तो श्रद्धा के भाव रखते हैं, किन्तु जहाँ उन्हें कोई मर्यादा के विरुद्ध कार्य करते देखते हैं वहाँ उनकी आलोचना भी करते हैं और उन्हें उस दोष से पृथक रखने के लिये प्रयत्नशील भी होते हैं। कुछ ऐसे भी भक्त या कुभक्त होते हैं जो महापुरुषों के प्रभाव को देखकर मन ही मन डाह करते हैं और उनके कामों में सदा छिद्रान्वेषण ही करते रहते हैं। उपर्युक्त तीन प्रकार के भक्त तो महापुरुषों से यथाशक्ति लाभ उठाते हैं, किन्तु ये चौथे निन्दक महाशय अपना नाश करके महापुरुष का कल्याण करते हैं, अपनी नीचता के द्वारा महापुरुषों की सदवृत्तियों को उभाड़कर उन्हें लोगों के सम्मुख रखते हैं। उनके बराबर परोपकारी संसार में कौन हो सकता है, जो अपना सर्वस्व नाश करके लोक कल्याण के निमित्त महापुरुषों के द्वारा क्षमा और सहनशीलता का आदर्श उपस्थित कराते हैं। *महाप्रभु के दरबार में पहले और दूसरे प्रकार के भक्तो की संख्या ही अधिक थी। प्रायः उनके सभी भक्त उन्हें ‘सचल जगन्नाथ’ ‘संन्यास वेषधारी पुरुषोत्तम’ मानकर भगवदबुद्धि से उनकी सेवा पूजा किया करते थे, किन्तु आलोचक और निन्दकों का एकदम अभाव ही हो, सो बात नहीं थी। उनके बहुत से आलोचक भी थे, किन्तु प्रभु उनकी बातें ही नहीं सुनते थे। कोई भूल में आकर उनसे कह भी देता, तो वे उसे उस बात के सुनाने से एकदम रोक देते थे। यह तो बाहर के लोगों की बात रही, उनके अंतरंग भक्तों तथा साथियों में भी ऐसे थे, जो खरी कहने के लिये प्रभु के सामने भी नहीं चूकते थे, किंतु उनका भाव शुद्ध था। एक त्यागाभिमानी रामचन्द्रपुरी नाम के उनके घोर निन्दक संन्यासी भी थे, किन्तु प्रभु की अलौकिक क्षमा के सामने उन्हें अन्त में पुरी को ही छोड़कर जाना पड़ा। पहले दामोदर पण्डित की आलोचना की एक घटना सुनिये। *महाप्रभु श्री मन्दिर के समीप ही रहते थे। वहीं कहीं पास में ही एक उड़िया ब्राह्मणी का घर था। वह ब्राह्मणी विधवा थी, उसका एक तेरह-चौदह वर्ष का लड़का प्रभु के पास आया करता था। उस लड़के का सौन्दर्य अपूर्व ही था। उसके शरीर का रंग तप्त कांचन के समान बड़ा ही सुन्दर था, अंग प्रत्यंग सभी सुडौल-सुन्दर थे। शरीर में स्वाभाविक बालचापल्य था। अपनी दोनों बड़ी बड़ी सुहावनी आँखें से वह जिस पुरुष की भी ओर देख लेता वही उसे प्यार करने लगता। वह प्रभु को प्रणाम करने के लिये नित्य प्रति आता। प्रभु उससे अत्यधिक स्नेह करने लगे। उसे पास में बिठाकर उससें प्रेम की मीठी मीठी बातें पूछते, कभी कभी उसे प्रसाद भी दे देते। बच्चों का हृदय तो बड़ा ही सरल और सरस होता है, उनसे जो भी प्रेम से बोले वे उसी के हो जाते हैं। प्रभु के प्रेम के कारण उस बच्चे का ऐसा हाल हो गया कि उसे प्रभु के दर्शनों के बिना चैन ही नहीं पड़ता था। दिन में दो दो, तीन तीन बार वह प्रभु के पास आने लगा। दामोदर पण्डित प्रभु के पास ही रहते थे। उन्हें उस अद्वितीय रूप लावण्ययुक्त अल्पवयस्क बच्चे का प्रभु के पास इस प्रकार से आना बहुत ही बुरा लगने लगा। वे एकान्त में बच्चे को डाँट भी देते और उसे यहाँ आने का निषेध भी कर देते, किन्तु हृदय का सच्चा प्रेम किसकी परवा करता है। अत्यन्त प्रेम मनुष्यों को ढीक बना देता है। *पण्डित के मना करने पर भी वह लड़का बिना किसी की बात सुने निर्भय होकर प्रभु के पास चला जाता और घंटों उनके पास बैठा रहता। प्रभु बाल भाव में उससे भाँति-भाँति की बातें किया करते। मनुष्य के स्वभाव में एक प्रकार की क्रूरता होती है। जब हम किसी पर अपना पूर्ण अधिकार समझने वाला कोई दूसरा पुरुष भी हो जाता है तो हम मन ही मन उससे डाह करने लगते हैं, फिर चाहे वह कितना भी सर्वगुणसम्पन्न क्यों न हो, हमें वह राक्षस सा प्रतीत होता है। दामोदर पण्डित का भी यही हाल था। उन्हें उस विधवा के सुन्दर पुत्र की सूरत से घृणा थी, उसके नाम से चिढ़ थी, उसे देखते ही वे जल उठते। एक दिन उन्होंने उस लडत्रके को प्रभु के पास बैठा देचाा। प्रभु उससे हँस-हँस कर बातें कर रहे थे। उस समय तो उन्होंने प्रभु से कुछ नहीं कहा। जब वह लड़का उठकर चला गया तो उन्होंने कुछ प्रेम पूर्वक रोष के स्वर में कहा- ‘प्रभो ! आप दूसरों को ही उपदेश देने के लिये हैं, अपने लिये नहीं सोचते कि हमारे आचरण को देखकर कोई क्या समझेगा? *प्रभु ने सम्भ्रम के साथ कहा- ‘क्यों, क्यों, पण्डित जी ! मैंने ऐसा कौन सा पापकर्म कर डाला?’ *उसी प्रकार रोष के साथ दामोदर पण्डित ने कहा- ‘मुझे इस लड़के का आपके पास इस प्रकार निस्संकोच भाव से आना अच्छा प्रतीत नहीं होता। आपको पता नहीं, लोग क्या मन में सोचेंगे? संसारी लोग विचित्र होते हैं, अभी तो सब गुसाईं-गुसाईं कहते हैं। आपके इस आचरण से सभी आपकी निन्दा करने लगेंगे और तब सब ईश्वरपना भूल जायँगे।’ *प्रभु ने सरलता पूर्वक कहा- ‘दामोदर ! इस लड़के में तो मुझे कोई भी दोष नहीं दीखता; बड़ा सरल, भोला-भाला और गौ के बछड़े के समान सीधा है।’ *दामोदर पण्डित ने कहा- ‘आपको पता नहीं यह विधवा का पुत्र है, इसकी माता अभी युवती है, वैसे वह बड़ी तपस्विनी, सदाचारिणी तथा भगवत्परायणा है, फिर भी उसमें तीन दोष हैं। वह युवती है, अत्यधिक सुन्दरी है और विधवा है तथा अपने घर में अकेली ही है, आप अभी युवक हैं, अद्वितीय रूप लावण्ययुक्त हैं। हम तो आपके मनोभावों को समझते हैं, किन्तु लोक किसी को नहीं छोड़ता। वह जरा सा छिद्र पाते ही निन्दा करने लगता है। लोगों के मुखों को हम थोड़े पकड़ लेंगे। इतने दिन की जमी हुई प्रतिष्ठा सभी धूल में मिल जायगी।’ *दामोदर पण्डित की बातों से प्रभु को हृदय में सन्तोष हुआ कि इन्हें मेंरी पवित्रता का इतना अधिक ध्यान रहता है, किन्तु उनके भोलेपन पर उन्हें हँसी भी आयी। उस समय तो उन्होंने उनसे कुछ भी नहीं कहा। दूसरे दिन एकान्त मे बुलाकर कहने लगे- ‘दामोदर पण्डित ! मैं समझता हूँ, तुम्हारा नवद्वीप में ही रहना ठीक होगा, वहाँ तुम्हारे भय से भक्तवृन्द मर्यादा के विरुद्ध आचरण न कर सकेंगे और तुम माता जी की भी देख-रेख करते रहोगे। वहीं जाकर माता के समीप रहो और बीच में मुझे देखने के लिये यहाँ आ जाया करना। माता जी के चरणों में मेरा प्रणाम कहना और उन्हें समझा देना कि मैं सदा उनके बनाये हुए व्यंजनों को खाने के लिये नवद्वीप में आता हूँ और प्रत्यक्षरीति से भगवान के भोग लगाये हुए नैवेद्य को पाता हूँ।’ *इतना कहकर और जगन्नाथ जी का प्रसाद देकर उन्हें नवद्वीप को विदा किया। वे नवद्वीप में आकर शचीमाता के समीप रहने लगे, उनके भय से नवद्वीप के भक्त कोई भी मर्यादा के विरुद्ध कार्य नहीं करते थे। इनकी आलोचना बड़ी ही खरी तथा तीव्र होती थी। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

+58 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 136 शेयर
Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 150*✳️✳️ ✳️✳️*छोटे हरिदास को स्त्री-दर्शन का दण्ड*✳️✳️ *निष्किंचनस्य भगवद्भजनोन्मुखस्य *पारं परं जिगमिषोर्भवसागरस्य। *संदर्शनं विषयिणामथ योषितांच हा *हन्त ! हन्त ! विषभक्षणतोऽप्यसाधु॥ *सचमुच संसार के आदि से सभी महापुरुष एक स्वर से निष्किंचन, भगवद्भक्त अथवा ज्ञाननिष्ठ वैरागी के लिये कामिनी और कांचन- इन दोनों वस्तुओं को विष बताते आये हैं। उन महापुरुषों ने संसार के सभी प्रिय लगने वाले पदार्थों का वर्गीकरण करके समस्त विषय-सुखों का समावेश इन दो ही शब्दों में कर दिया है। जो इन दोनों से बच गया वह इस अगाध समुद्र के परले पार पहुँच गया और जो इनमें फंस गया वह मंझधार में डुबकियां खाता बिलबिलाता रहा। कबीर दास ने क्या सुन्दर कहा है- *चलन चलन सब कोइ कहे, बिरला पहुँचे कोय। *एक 'कनक' अरु 'कामिनी' घाटी दुरलभ दोय॥ *यथार्थ में इन दो घाटियों का पार करना अत्यन्त ही कठिन हैं, इसीलिये महापुरुष स्वयं इनसे पृथक रहकर अपने अनुयायियों को कहकर, लिखकर, प्रसन्न होकर, नाराज होकर तथा भाँति-भाँति से घुमा-फिराकर इन्हीं दो वस्तुओं से पृथक रहने का उपदेश देते हैं। त्याग और वैराग्य के साकार स्वरूप चैतन्य महाप्रभुदेव जी भी अपने विरक्त भक्तों को सदा इनसे बचे रहने का उपदेश करते और स्वयं भी उन पर कड़ी दृष्टि रखते। तभी तो आज त्यागिशिरोमणि श्रीगौर का यश सौरभ दिशा-विदिशाओं में व्याप्त हो रहा है। व्रजभूमि में असंख्यों स्थान महाप्रभु के अनुयायिकों के त्याग-वैराग्य का अभी तक स्मरण दिला रहे हैं। *पाठक महात्मा हरिदास जी के नाम से तो परिचित ही होंगे। हरिदास जी वयोवृद्ध थे और सदा नाम-जप ही किया करते थे। इनके अतिरिक्त एक-दूसरे कीर्तनिया हरिदास और थे। वे हरिदास जी से अवस्था में बहुत छोटे थे, गृहत्यागी थे और महाप्रभु को सदा अपने सुमधुर स्वर से संकीर्तन सुनाया करते थे। भक्तों में वे 'छोटे हरिदास' के नाम से प्रसिद्ध थे। वे पुरी में ही प्रभु के पास रहकर भजन-संकीर्तन किया करते थे। *प्रभु के समीप बहुत-से विरक्त भक्त पृथक-पृथक स्थानों में रहते थे। वे सभी भक्ति के कारण कभी-कभी प्रभु को अपने स्थान पर बुलाकर भिक्षा कराया करते थे। भक्तवत्सल गौर उनकी प्रसन्नता के निमित्त उनके यहाँ चले आते थे और उनके भोजन की प्रशंसा करते हुए भिक्षा भी पा लेते थे। वहीं पर भगवानाचार्य नाम के एक विरक्त पण्डित निवास करते थे, उनके पिता सतानन्द खां घोर संसारी पुरुष थे, उनके छोटे भाई का नाम थो गोपाल भट्टाचार्य। गोपाल श्री काशी जी से वेदान्त पढ़कर आया था, उसकी बहुत इच्छा थी कि मैं प्रभु को अपना पढ़ा हुआ शारीरकभाष्य सुनाऊं, किन्तु वहाँ तो सब श्री कृष्ण कथा के श्रोता थे। जिसे जगत प्रपंच समझना हो और जीव-ब्रह्म की एकता का निर्णय करना हो, वह वेदान्तभाष्य सुन अथवा पढ़े। जहाँ श्री कृष्ण प्रेम को ही जीवन का एकमात्र ध्येय मानने वाले पुरुष हैं, जहाँ भेदाभेद को अचिन्त्य बताकर उससे उदासीन रहकर श्रीकृष्ण कथा की ही प्रधानता दी जाती है, वहाँ पदार्थों की सिद्धि के प्रसंग को सुनना कोई क्यों पसंद करेगा। अत: स्वरूप गोस्वामी के कहने से वे भट्टाचार्य महाशय अपने वेदान्त ज्ञान को ज्यों-का-त्यों ही लेकर अपने निवास स्थान को लौट गये। आचार्य भगवान जी वहीं पुरी में रह गये। उनकी स्वरूप दामोदर जी से बड़ी घनिष्ठता थी। वे बीच-बीच में कभी-कभी प्रभु का निमन्त्रण करके उन्हें भिक्षा कराया करते थे। जगन्नाथ जी में बने-बनाये पदार्थों का भोग लगता है और भगवान के महाप्रसाद को दुकानदार बेचते भी हैं। किन्तु जो चावल बिना सिद्ध किये कच्चे ही भगवान को अर्पण किये जाते हैं, उन्हें 'प्रसादी' या 'अमानी' अन्न कहते हैं, उस का घर पर ही लोग भात बना लेते हैं। भगवान जी ने घर पर ही प्रभु के लिये भात बनाने का निश्चय किया। *पाठकों को सम्भवत: शिखि माहिती का स्मरण होगा, वे श्री जगन्नाथ जी के मन्दिर में हिसाब-किताब लिखने का काम करते थे, उनके मुरारी नाम का एक छोटा भाई और माधवी नाम की एक बहिन थी। दक्षिण की यात्रा से लौटने पर सार्वभौम भट्टाचार्य ने इन तीनों भाई-बहिनों का प्रभु से परिचय कराया था। ये तीनों ही श्रीकृष्ण भक्त थे और परस्पर बड़ा ही स्नेह रखते थे। माधवी दासी परम तपस्विनी और सदाचारिणी थी। इन तीनों का ही महाप्रभु के चरणों में दृढ़ अनुराग था। महाप्रभु माधवी दासी का गणना राधा जी के गणों में करते थे। उन दिनों राधा जी के गणों में साढ़े तीन पात्रों की गणना थी- (1) स्वरूप दामोदर, (2) राय रामानन्द, (3) शिखि माहिती और आधे पात्र में माधवी देवी की गणना थी। इन तीनों का महाप्रभु के प्रति अत्यन्त ही मधुर श्रीमती जी का-सा सरस भाव था। *भगवानाचार्य जी ने प्रभु के निमन्त्रण के लिये बहुत बढ़िया महीन शुक्ल चावल लाने के लिये छोटे हरिदास से कहा। छोटे हरिदास जी माधवी दासी के घर में भीतर चले गये और भीतर जाकर उनसे चावल मांगकर ले आये। आचार्य ने विधिपूर्वक चावल बनाये। कई प्रकार के शाक, दाल, पना तथा और भी कई प्रकार की चीजें उन्होंने प्रभु के निमित्त बनायीं। नियत समय पर प्रभु स्वयं आ गये। आचार्य ने इनके पैर धोये और सुन्दर स्वच्छ आसन पर बैठाकर उनके सामने भिक्षा परोसी। सुगन्धि युक्त बढ़िया चावलों को देखकर प्रभु ने पूछा- 'भगवन ! ये ऐसे सुन्दर चावल कहाँ से मंगाये?' *सरलता के साथ भगवान जी ने कहा- 'प्रभो ! माधवी देवी के यहाँ से मंगाये हैं। 'सुनते ही महाप्रभु के भाव में एक प्रकार का विचित्र परिवर्तन-सा हो गया। उन्होंने गम्भीरता के साथ पूछा- 'माधवी के यहाँ से लेने कौन गया था? 'उसी प्रकार उन्होंने उत्तर दिया- 'प्रभो ! छोटे हरिदास गये थे।' *यह सुनकर महाप्रभु चुप हो गये और मन-ही-मन कुछ सोचने लगे। पता नहीं वे हरिदास जी की किस बात से पहले से ही असन्तुष्ट थे। उनका नाम सुनते ही वे भिक्षा से उदासीन-से हो गये। फिर कुछ सोचकर उन्होंने भगवान के प्रसाद को प्रणाम किया और अनिच्छापूर्वक कुछ थोड़ा-बहुत प्रसाद पा लिया। आज वे प्रसाद पाते समय सदा की भाँति प्रसन्न नहीं दीखते थे, उनके हृदय में किसी गहन विषय पर द्वन्द्व-युद्ध हो रहा था। भिक्षा पाकर वे सीधे अपने स्थान पर आ गये। आते ही उन्होंने अपने निजी सेवक गोविन्द को बुलाया। हाथ जोड़े हुए गोविन्द प्रभु के सम्मुख उपस्थित हुआ। *उसे देखते ही प्रभु रोष के स्वर में कुछ दृढ़ता के साथ बोले- 'देखना, आज से छोटा हरिदास हमारे यहाँ कभी न आने पावेगा। यदि उसने भूल में हमारे दरवाजे में प्रवेश किया तो फिर हम बहुत अधिक असन्तुष्ट होंगे। मेरी इस बात का ध्यान रखना और दृढ़ता के साथ इसका पालन करना।' *गोविन्द सुनते ही सन्न रह गया। वह प्रभु की इस आज्ञा का कुछ भी अर्थ न समझ सका। धीरे-धीरे वह प्रभु के पास से उठकर स्वरूपगोस्वामी के पास चला गया। उसने सभी वृतान्त उनसे कह सुनाया। सभी प्रभु की इस भीषण आज्ञा को सुनकर चकित हो गये। प्रभु तो ऐसी आज्ञा कभी नहीं देते थे। वे तो पतितों से भी प्रेम करते थे, आज यह बात क्या हुई। *वे लोग दौड़े-दौड़े हरिदास के पास गये और उसे सब सुनाकर पूछने लगे- 'तुमने ऐसा कोई अपराध तो नहीं कर डाला जिससे प्रभु इतने क्रुद्ध हो गये? 'इस बात के सुनते ही छोटे हरिदास का मुख सफेद पड़ गया। उसके होश-हवास उड़ गये। *अत्यन्त ही दु:ख और पश्चात्ताप के स्वर में उसने कहा- 'और तो मैंने कोई अपराध किया नहीं, हाँ, भगवानाचार्य के कहने से माधवी दासी के घर से मैं थोड़े-से चावलों की भिक्षा अवश्य माँग लाया था।' *सभी भक्त समझ गये कि इस बात के अंदर अवश्य ही कोई गुप्त रहस्य है। प्रभु इसी के द्वारा भक्तों को त्याग-वैराग्य की कठोरता समझाना चाहते हैं। सभी मिलकर प्रभु के पास गये और प्रभु के पैर पकड़कर प्रार्थना करने लगे- 'प्रभो ! हरिदास अपने अपराध के लिये हृदय से अत्यन्त ही दु:खी हैं। उन्हें क्षमा मिलनी चाहिये। भविष्य में उनसे ऐसी भूल कभी न होगी। उन्हें दर्शनों से वंचित न रखिये।' *प्रभु ने उसी प्रकार कठोरता के स्वर में कहा- 'तुम लोग अब इस सम्बन्ध में मुझसे कुछ भी न कहो। मैं ऐसे आदमी का मुख देखना नहीं चाहता जो वैरागी वेष बनाकर स्त्रियों से सम्भाषण करता है।' अत्यन्त ही दीनता के साथ स्वरूपगोस्वामी ने कहा- 'प्रभो ! उनसे भूल हो गयी, फिर माधवी देवी तो परम साध्वी भगवदभक्ति परायणा देवी हैं, उनके दर्शनों के अपराध के ऊपर इतना कठोर दण्ड न देना चाहिये।' *प्रभु ने दृढ़ता के साथ कहा- 'चाहे कोई भी क्यों न हो ! स्त्रियों से बात करने की आदत पड़ना ही विरक्त साधु के लिये ठीक नहीं। शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा है कि अपनी सगी माता, बहिन और युवती लड़की से भी एकान्त में बातें न करनी चाहिये। ये इन्द्रियाँ इतनी प्रबल होती हैं कि अच्छे-अच्छे विद्वानों का मन भी अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं।' प्रभु का ऐसा दृढ़ निश्चय देखकर और उनके स्वर में दृढ़ता देखकर फिर किसी को कुछ कहने का साहस नहीं हुआ। *हरिदास जी ने जब सुना कि प्रभु किसी भी तरह क्षमा करने के लिये राजी नहीं हैं, तब तो उन्होंने अन्न-जल बिलकुल छोड़ दिया। उन्हें तीन दिन बिना अन्न-जल के हो गये, किन्तु प्रभु अपने निश्चय से तिलभर भी न डिगे। तब तो स्वरूपगोस्वामी जी को बड़ी चिन्ता हुई। प्रभु के पास रहने वाले सभी विरक्त भक्त डरने लगे। उन्होंने नेत्रों से तो क्या मन से भी स्त्रियों का चिन्तन करना त्याग दिया। कुछ विरक्त स्त्रियों से भिक्षा ले आते थे, उन्होंने उनसे भिक्षा लाना ही बन्द कर दिया। स्वरूप गोस्वामी डरते-डरते एकान्त में प्रभु के पास गये। उस समय प्रभु स्वस्थ होकर कुछ सोच रहे थे। स्वरूप जी प्रणाम करके बैठ गये। प्रभु प्रसन्नता पूर्वक उनसे बातें करने लगे। प्रभु को प्रसन्न देखकर धीरे-धीरे स्वरूपगोस्वामी कहने लगे- 'प्रभो ! छोटे हरिदास ने तीन दिन से कुछ नहीं खाया है। उसके ऊपर इतनी अप्रसन्नता क्यों? उसे अपने किये का बहुत दण्ड मिल गया, अब तो उसे क्षमा मिलनी चाहिये।' *प्रभु ने अत्यन्त ही स्नेह के साथ विवशता के स्वर में कहा- 'स्वरूप जी ! मैं क्या करूं? मैं स्वयं अपने को समझाने में असमर्थ हूँ। जो पुरुष साधु होकर प्रकृति संसर्ग रखता है और उनसे सम्भाषण करता है, मैं उससे बातें नहीं करना चाहता। देखो, मैं तुम्हें एक अत्यन्त ही रहस्यपूर्ण बात बताता हूँ इसे ध्यानपूर्वक सुनो और सुनकर हृदय में धारण करो, वह यह है - *श्रृणु हृदयरहस्यं यत्प्रशस्तं मुनीनां *न खलु न खलु योषित्सन्निधि: संनिधेय:। *हरति हि हरिणाक्षी क्षिप्रमक्षिक्षुरप्रै: *पिहितशमतनुत्रं चित्तमप्युत्तमानाम्॥ *मैं तुमसे हृदय के रहस्य को बतलाता हूँ जिसकी ऋषि-मुनियों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है, उसे सुनो; (विरक्त पुरुषों को) स्त्रियों की सन्निधि में नहीं रहना चाहिये, नहीं रहना चाहिये, क्योंकि हरिणी के समान सुन्दर नेत्रों वाली कामिनी अपने तीक्ष्ण कटाक्ष-बाणों से बड़े-बड़े महापुरुषों के चित्त को भी, जो शान्ति के कवच से ढँका हुआ है, शीघ्र ही अपनी ओर खींच लेती है। इसलिये भैया ! मेरे जाने, वह भूखों मर ही क्यों न जाय अब मैं जो निश्चय कर चुका उससे हटूँगा नहीं। 'स्वरूप जी उदास मन से लौट गये। *उन्होंने सोचा- 'प्रभु परमानन्दपुरी महाराज का बहुत आदर करते हैं, यदि पुरी उनसे आग्रह करें तो सम्भवतया वे मान भी जाये। 'यह सोचकर वे पुरी महाराज के पास गये। सभी भक्तों के आग्रह करने पर पुरी महाराज प्रभु से जाकर कहने के लिये राजी हो गये। वे अपनी कुटिया में से निकलकर प्रभु के शयन स्थान में गये। पुरी को अपने यहाँ आते देखकर प्रभु उठकर खड़े हो गये और उनकी यथा विधि अभ्यर्चना करके उन्हें बैठने के लिये आसन दिया। बातों-ही-बातों में पुरी जी ने हरिदास का प्रसंग छेड़ दिया और कहने लगे- 'प्रभो ! इन अल्प शक्ति वाले जीवों के साथ ऐसी कड़ाई ठीक नहीं है। बस, बहुत हो गया, अब सबको पता चल गया, अब कोई भूल से भी ऐसा व्यवहार न करेगा। अब आप उसे क्षमा कर दीजिये और अपने पास बुलाकर उसे अन्न-जल ग्रहण करने की आज्ञा दे दीजिये।' *पता नहीं प्रभु ने उसका और भी पहले कोई ऐसा निन्द्य आचरण देखा था या उसके बहाने सभी भक्तों को घोर वैराग्य की शिक्षा देना चाहते थे। हमारी समझ में आ ही क्या सकता है ! महाप्रभु पुरी के कहने पर भी राजी नहीं हुए। उन्होंने उसी प्रकार दृढ़ता के स्वर में कहा- 'भगवान ! आप मेरे पूज्य हैं, आपकी उचित-अनुचित सभी प्रकार की आज्ञाओं का पालन करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ, किन्तु न जाने क्यों, इस बात को मेरा हृदय स्वीकार नहीं करता। आप इस सम्बन्ध में मुझसे कुछ भी न कहें।' *पुरी महाराज ने अपने वृद्धपने के सरल भाव से अपना अधिकार-सा दिखाते हुए कहा- 'प्रभो ! ऐसा हठ ठीक नहीं होता, जो हो गया सो हो गया उसके लिये इतनी ग्लानि का क्या काम? सभी अपने स्वभाव से मजबूर हैं।' *प्रभु ने कुछ उत्तेजना के साथ निश्चयात्मक स्वर में कहा- 'श्रीपाद ! इसे मैं भी जानता हूँ कि सभी अपने स्वभाव से मजबूर हैं। फिर मैं ही ही इससे कैसे बच सकता हूँ। मैं भी तो ऐसा करने के लिये मजबूर ही हूँ। इसका एक ही उपाय है, आप यहाँ सभी भक्तों को साथ लेकर रहें, मैं अकेला अलालनाथ में जाकर रहूँगा। बस, ऊपर के कामों के निमित्त गोविन्द मेरे साथ वहाँ रहेगा। 'यह कहकर प्रभु ने गोविन्द को जोरों से आवाज दी और आप अपनी चद्दर को उठाकर अलालनाथ की ओर चलने लगे। जल्दी से उठकर पुरी महाराज ने प्रभु को पकड़ा और कहने लगे- 'आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, आपकी माया जानी नहीं जाती। पता नहीं क्या कराना चाहते हैं। अच्छी बात है, जो आपको अच्छा लगे वही कीजिये। मेरा ही यहाँ क्या रखा है? केवल आपके ही कारण मैं यहाँ ठहरा हुआ हूँ। आपके बिना मैं यहाँ रहने ही क्यों लगा? यदि आपने ऐसा निश्चय कर लिया है तो ठीक है। अब मैं इस सम्बन्ध में कभी कुछ न कहूँगा।' यह कहकर पुरी महाराज अपनी कुटिया में चले गये, प्रभु फिर वहीं लेट गये। *जब स्वरूपगोस्वामी ने समझ लिया कि प्रभु अब किसी की भी न सुनेंगे तो वे जगदानन्द, भगवानाचार्य, गदाधर गोस्वामी आदि दस-पांच भक्तों के साथ छोटे हरिदास के पास गये और उसे समझाने लगे- 'उपवास करके प्राण गँवाने से क्या लाभ? जीओगे तो भगवन्नाम-जाप करोगे, स्थान पर जाकर न सही, जब प्रभु जगन्नाथ जी के दर्शनों को जाया करें तब दूरसे दर्शन कर लिया करो। उनके होकर उनके दरबार में पड़े रहोगे तो कभी-न-कभी वे प्रसन्न हो ही जायँगे।' *कीर्तनिया हरिदास जी की समझ में यह बात आ गयी, उसने भक्तों के आग्रह से अन्न-जल ग्रहण कर लिया। वह नित्यप्रति दर्शनों को मन्दिर जाते समय दूर से दर्शन कर लेता और अपने को अभागा समझता हुआ कैदी की तरह जीवन बिताने लगा। उसे खाना-पीना कुछ भी अच्छा नहीं लगता था, किसी से मिलने की इच्छा नहीं होती थी, गाना-बजाना उसने एकदम छोड़ दिया। सदा वह अपने असद व्यवहार के विषय में ही सोचता रहता। होते-होते उसे संसार से एकदम वैराग्य हो गया। ऐसा प्रभुकृपाशून्य जीवन बीताना उसे भार-सा प्रतीत होने लगा। अब उसे भक्तों के सामने मुख दिखाने में भी लज्जा होने लगी। इसलिये उसने इस जीवन का अन्त करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

+75 प्रतिक्रिया 5 कॉमेंट्स • 209 शेयर
Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 151*✳️✳️ ✳️✳️*धन मांगने वाले भृत्य को दण्ड*✳️✳️ *धनमपि परदत्तं दु:खमौचित्यभाजां *भवति हृदि तदेवानन्दकारीतरेषाम्। *मलयजरसविन्दुर्बाधते नेत्रमन्त- *र्जनयति च स एवाह्लादमन्यत्र गात्रे॥ *प्रेमरूपी धन की प्राप्ति में ही सदा यत्नशील रहते हैं, वे उदरपूर्ति के लिये अन्न और अंग रक्षा के लिये साधारण वस्त्रों के अतिरिक्त किसी प्रकार के धन का संग्रह नहीं करते। धन का स्वभाव है लोभ उत्पन्न करना और लोभ से द्वेष की प्रगाढ़ मित्रता है। जहाँ लोभ रहेगा वहाँ दूसरों के प्रति द्वेष अवश्य विद्यमान रहेगा। द्वेष से घृणा होती है और पुरुषों के प्रति घृणा करना यही नाश का कारण है। इन्हीं सब बातों को सोचकर तो त्यागी महापुरुष द्रव्य का स्पर्श नहीं करते। वे जहाँ तक हो सकता है, द्रव्य से दूर ही रहते हैं। गृहस्थियों का तो द्रव्य के बिना काम चलना ही कठिन है, उन्हें तो गृहस्थी चलाने के लिये द्रव्य रखना ही होगा, किन्तु उन्हें भी अधर्म से या अनुचित उपायों से धनार्जन करने की प्रवृत्ति को एकदम त्याग देना चाहिये। धर्म पूर्वक न्यायोचित रीति से प्राप्त किया हुआ धन ही फलीभूत होता है और वही उन्हें संसारी बन्धनों से छुड़ाकर धीरे-धीरे परमार्थ की ओर ले जाता है। जो संखिया वैसे ही बिना सोचे-विचारे खा लिया जाये तो वह मृत्यु का कारण होता है और उसे ही वैद्य के कथनानुसार शोधकर खाया जाय तो वह रसायन का काम करता है, उससे शरीर नीरोग होकर सम्पूर्ण अंग पुष्ट होते हैं। इसलिये वैद्य रूपी शास्त्र की बतायी हुई धर्मरूपी विधि से सेवन किये जाने वाला विषरूपी धन भी अमरता प्रदान करने वाला होता है। *महाप्रभु चैतन्यदेव जिस प्रकार स्त्री संगियों से डरते थे, उसी प्रकार धनलोलुपों से भी वे सदा सतर्क रहते थे। जो स्त्री सेवन अविधिपूर्वक कामना वासना की पूर्ति के लिये किया जाता है, शास्त्रों में उसी की निन्दा और उसी कामिनी को नरक का द्वार बताया है। जिसका पाणिग्रहण शास्त्र मर्यादा के साथ विधि पूर्वक किया गया है, वह तो कामिनी नहीं, धर्म पत्नि है। उसका उपयोग कामवासनातृप्ति न होकर धार्मिक कृत्यों में सहायता प्रदान करना है। ऐसी स्त्रियों का संग तो प्रवृत्ति मार्ग वाले गृहस्थियों के लिये परम धर्म है। इसी प्रकार धर्म पूर्वक विधियुक्त, विनय और पात्रता के साथ उपार्जन किया हुआ धन धर्म तथा सुख का प्रधान कारण होता है। उस धन को कोई अन्यान से अपनाना चाहता है तो वह विषयी है, ऐसे विषयी लोगों का साथ कभी भी न करना चाहिये। श्री अद्वैताचार्य गृहस्थी थे, इस बात को तो पाठक जानते ही होंगे। उनके दो स्त्रियां थीं, छ: पुत्र थे, दो-चार दासी-दास भी थे, बड़े पुत्र अच्युतानन्द को छोड़कर सभी घर-गृहस्थी वाले थे। सारांश कि उनका परिवार बहुत बड़ा था। इतना बड़ा परिवार होने पर भी वे भक्त थे। *भक्तों को बहुधा लोग बावला कहा करते हैं। एक कहावत भी है- *भक्त बावले ज्ञानी अल्हड़, योगी बडे निखट्टू। *कर्मकांडी ऐसे डोलें, ज्यों भाड़े के टट्टू॥ *अस्तु, बावले भक्तों के यहाँ 'यह मेरा है, यह तेरा है 'का तो हिसाब ही नहीं। जो भी आओ खूब खाओ। जिसे जिस चीज की आवश्यकता हो, ले जाओ। सबके लिये उनका दरवाजा खुला रहता है। वास्तव में उदारता इसी का नाम है। जिसके यहाँ मित्र, अतिथि, स्वजन और अन्य जन बिना संकोच के घर की भाँति रोज भोजन करते हैं, जिसका हाथ सदा खुला रहता है, वही सच्चा उदार है, वही श्री कृष्ण प्रेम का अधिकारी भी होता है। जिसे पैसों से प्रेम है, जो द्रव्य का लोभी है, वह भगवान से प्रेम कर ही कैसे सकता है? वैष्णवों के लिये अद्वैताचार्य जी का घर धर्मशाला ही नहीं किंतु नि:शुल्क भोजनालय भी था ! जो भी आवे जब तक रहना चाहे आचार्य के घर पड़ा रहे। आचार्य सत्कारपूर्वक उसे खिलाते-पिलाते थे। इस उदार वृत्ति के कारण आचार्य पर कुछ कर्ज भी हो गया था। "उनके यहाँ बाउल विश्वास नाम का एक भृत्य था। आचार्य के चरणों में उनकी अनन्य श्रद्धा थी और वह उनके परिवार की सदा तन-मन से सेवा किया करता था। वह आचार्य के साथ-साथ पुरी भी जाया करता था। आचार्य को द्रव्य का संकोच होता है, इससे उसे मानसिक दु:ख होता था। उनके ऊपर कुछ ऋण भी हो गया, इसका उसे स्वयं ही सोच था ! पुरी में उसने प्रभु का इतना अधिक प्रभाव देखा। महाराज प्रतापरुद्र जी प्रभु को ईश्वर तुल्य मानते थे और गुरु भाव से उनकी प्रत्येक आज्ञा का पालने करने के लिये तत्पर रहते थे। *विश्वास ने सोचा- 'महाराज से ही आचार्य के ऋण परिशोध के लिये क्यों न कहा जाय? यदि महाराज के कानों तक यह बात पहुँच गयी तो सदा के लिये इनके व्यय का सुदृढ़ प्रबन्ध हो जायेगा। 'यह सोचकर उसने आचार्य से छिपकर स्वयं जाकर महाराज प्रतापरुद्र जी को एक प्रार्थना-पत्र दिया। 'उसमें उसने आचार्य को साक्षात ईश्वर का अवतार बताकर उनके ऋणपरिशोध और व्यय का स्थायी प्रबन्ध कर देने की प्रार्थना की। *महाराज ने वह पत्र प्रभु के पास पहुँचा दिया। पत्र को पढ़ते ही प्रभु आश्चर्य चकित हो गये। उनके प्रभाव का इस प्रकार दुरुपयोग किया जाता है, यह सोचकर उन्हें विश्वास के ऊपर रोष आया। उसी समय गोविन्द को बुलाकर प्रभु ने कठोरता के साथ आज्ञा दी- 'गोविन्द ! देखना आज से बाउल विश्वास हमारे यहाँ न आने पावे। वह हमारे और आचार्य के नाम को बदनाम करने वाला है। 'गोविन्द सिर नीचा किये हुए चुपचाप लौट गया। उसने नीचे जाकर ठहरे हुए भक्तों से कहा। भक्तों के द्वारा आचार्य को इस बात का पता लगा। वे जल्दी से प्रभु के पास दौड़े आये और उनके पैर पकड़कर गद्गद कण्ठ से कहने लगे- 'प्रभो ! यह अपराध तो मेरा है। बाउल ने जो भी कुछ किया है, मेरे ही लिये किया है। इसके लिये उसे दण्ड न देकर मुझे दण्ड दीजिये। अपराध के मूल कारण तो हमी हैं। 'महाप्रभु आचार्य की प्रार्थना की उपेक्षा न कर सके। आचार्य के अवतारी होने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी। किन्तु अवतारी होकर क्षुद्र पैसों के लिये विषयी पुरुषों से प्रार्थना की जाय यह अवतारी पुरुषों के लिये महान कलंक की बात है। आवश्यकता पड़ने पर याचना करना पाप नहीं है, किन्तु अवतारप ने की आड़ में द्रव्य मांगना महापाप है, बेचारा बावला बाउल क्या जाने, उस अशिक्षित नौकर को इतनी समझ कहाँ, उसने तो अपनी तरफ से अच्छा ही समझकर यह काम किया था। प्रभु ने अज्ञान में किये हुए उसके अपराध को क्षमा कर दिया और भविष्य में फिर ऐसा कभी न करने के लिये उसे समझा दिया। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

+47 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 66 शेयर
Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 154*✳️✳️ ✳️✳️*पुरीदास या कवि कर्णपूर*✳️✳️ *जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धा: कवीश्वरा:। *नास्ति तेषां यश:काये जरामरणजं भयम्॥ *कविता एक भगवद्दत्त वस्तु है। जिसके हृदय में कमनीय कविता करने की कला विद्यमान है उसके लिये फिर राज्य सुख की क्या अपेक्षा। इन्द्रासन उसके लिये तुच्छ है। कविता गणित की तरह अभ्यास करने से नहीं आती, वह तो अलौकिक प्रतिभा है, किसी भाग्यवान पुरुष को ही पूर्वजन्मों के पुण्यों के फलस्वरूप प्राप्त हो सकती है। कवि क्या नहीं कर सकता? जिसे चाहे अमर बना सकता है। जिसे चाहे पाताल पहुँचा सकता है। भोज, विक्रम जैसे अरबों-खरबों नहीं असंख्यों राजा हो गये, उनका कोई नाम क्यों नहीं जानता-इसलिये कि वे कालिदास जैसे कवि कुलचूडामणि महापुरुष के श्रद्धाभाजन नहीं बन सके। थोड़ी देर के लिये भगवान राम-कृष्ण के अवतारीपने की बात को छोड दीजिये। सामान्य दृष्टि से वक केवल अपने प्रचण्ड दोर्दण्डबल के कारण नहीं बन सके। वाल्मीकि और व्यास ने उन्हें बली और वीर बनाया। तभी तो मैं कहता हूँ, कवि ईश्वर है, अचतुर्भज विष्णु है, एक मुख वाला ब्रह्मा है और दो नेत्रों वाला शिव है। कवि वन्द्य है, पूज्य है, आदरणीय और सम्माननीय है। *कवि के चरणों की वन्दना करना ईश्वर की वन्दना के समान है। कविता रूप से श्रीहरि ही उसके मुख से भाषण करते हैं, जिसे सुनकर सुकृति और भाग्यवान पुरुषों का मन मयूर पंख फैलाकर नृत्य करने लगता है और नृत्य करते-करते अश्रुविमोचन करता है। उन अश्रुओं को बुद्धिरूपी मयूरी पान करती है और उन्हीं अश्रुओं से आह्लादरूपी गर्भ को धारण करती है, जिससे आनन्दरूपी पुत्र की उत्पत्ति होती है। वे पिता धन्य हैं जिनके घर में प्रतिभाशाली कवि उत्पन्न होते हैं। ऐसा सौभाग्य श्री शिवानन्द सेन-जैसे सुकृति, साधुसेवी और भगवद्भक्त पुरुषों को ही प्राप्त हो सकता है, जिनके कवि कर्णपूर-जैसे नैसर्गिक प्रतिभा सम्पन्न कवि पुत्र उत्पन्न हुए कविता का कोई निश्चय नहीं, वह कब परिस्फुट हो उठे। किसी किसी में तो जन्म से ही वह शक्ति विद्यमान रहती है, जहाँ वे बोलने लगते हैं वहीं उनकी प्रतिभा फूटने लगती है। कवि कर्णपूर ऐसे ही स्वाभाविक कवि थे। *महाप्रभु जब संन्यास ग्रहण करके पुरी में विराजमान थे, तब बहुत से भक्तों की स्त्रियाँ भी अपने पतियों के साथ प्रभु दर्शनों की लालसा से पुरी जाया करती थीं। एक बार जब शिवानन्द सेन जी अपनी पत्नी के साथ भक्तों को लेकर पुरी पधारे तब श्रीमती सेन गर्भवती थीं। प्रभु ने आज्ञा दी कि अबके जो पुत्र हो, उसका नाम पुरी गोस्वामी के नाम पर रखना। प्रभु भक्त सेन महाशय ने ऐसा ही किया, जब उनके पुत्र हुआ तो उसका नाम रखा परमानन्ददास। परमानन्ददास जब बड़े हुए तब वे प्रभु दर्शनोें के लिये अपनी उत्कण्ठा प्रकट करने लगे। इनकी प्रभु परायण माता ने बाल्यकाल से ही इन्हेें गौर-चरित्र रटा दिये थे और सभी गौर भक्तों के नाम कण्ठस्थ करा दिये थे। इनके पिता प्रतिवर्ष हजारों रुपये अपने पास से खर्च करके भक्तों को पुरी ले जाया करते थे और मार्ग में उनकी सभी प्रकार की व्यवस्था स्वयं करते थे। इनका घर भर श्रीचैतन्य चरणों का सेवक था। इनके तीन पुत्र थे-बड़े चैतन्यदास, मँझले रामदास और सबसे छोटे ये परमानन्ददास, पुरीदास या कर्णपूर थे। परमानन्ददास बालक पन से ही होनहार, मेधावी प्रत्युत्पन्नमति और सरस हृदय के थे। इनके बहुत आग्रह पर वे इन्हें इनकी माता के सहित प्रभु के पास ले गये। वैसे तो प्रभु ने इन्हें देख लिया था, किन्तु सेन इन्हें एकान्त में प्रभु के पैरों में डालना चाहते थे। *एक दिन जब महाप्रभु स्वरूप गोस्वामी आदि दो-चार अन्तरंग भक्तों के सहित एकान्त में बैठे श्रीकृष्ण कथा कह रहे थे तभी सेन महाशय अपने पुत्र परमानन्दपुरी को प्रभु के पास लेकर पहुँच गये। सेन ने इन्हें प्रभु के पैरों में लिटा दिया, ये प्रभु के पैरों में लेटे ही लेटे उनके अँगूठे को चूसने लगे, मानो वे प्रभुपादपद्मों की मधुरिमा को पी रहे हों। प्रभु इन्हें देखकर अत्यन्त ही प्रसन्न हुए। उन्होंने पूछा- ‘इसका नाम क्या रखा है?’ *धीरे से महाशय ने कहा- ‘परमानन्ददास !’ *प्रभु ने कहा- यह तो बड़ा लम्बा नाम हो गया, किसी से लिया भी कठिनता में जायेगा। इसलिये पुरीदास ठीक है। ‘यह कहकर वे बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए प्रेम से कहने लगे- ‘क्यों रे पुरीदास ! ठीक है न तेरा नाम? तू पुरीदास ही है न? बस, उस दिन से ये परमानन्ददास की जगह पुरीदास हो गये।’ *एक बार सेन इन्हें फिर लेकर प्रभु के दर्शनों का आये। तब प्रभु ने इन्हें पुचकारकर कहा- ‘बेटा पूरीदास ! अच्छा, कृष्ण-कृष्ण कहो।’ किन्तु पुरीदास ने कुछ नहीं कहा। तब तो प्रभु बहुत आश्चर्य में रह गये। पिता भी कह कहकर हार गये। प्रभु ने भी पुचकारकर, पुचकारकर कई बार कहा, किन्तु इन्होंने कृष्ण-कृष्ण ही न कहा। तब तो पिता को इस बात से बड़ा दुःख हुआ कि हमारा यह पुत्र अभक्त होगा क्या, अभक्त पुत्र से तो बिना पुत्र के ही रहना अच्छा। प्रभु भी आश्चर्य करने लगे कि हमने जगत से श्रीकृष्ण नाम लिवाया, इस छोटे से बालक से श्रीकृष्ण नहीं कहला सके। इस पर स्वरूप गोस्वामी ने कहा- ‘यह बालक बड़ा ही बुद्धिमान है, इसने समझा है कि प्रभु ने हमें मन्त्र प्रदान किया है। इसलिये अपने इष्ट मन्त्र को मन ही मन जप रहा है। मन्त्र किसी के सामने प्रकट थोड़े ही किया जाता है।’ इस बात से सभी को सन्तोष हुआ। *एक दिन जब इसकी अवस्था केवल सात वर्ष की थी तब सेन महाशय इन्हें प्रभु के समीप ले गये। प्रभु ने पूछा- ‘कुछ पढ़ता भी है यह?’ *सेन ने धीरे से कहा- ‘अभी क्या पढ़ने लायक है, ऐसे ही थोड़ा-बहुत खेल करता रहता है।’ *प्रभु ने कहा- ‘पुरीदास ! अच्छा बेटा ! कुछ सुनाओ तो सही।’ इतना सुनते ही सात वर्ष का बालक स्वयं ही इस स्वरचित श्लोक को बोलने लगा- *श्रवसोः कुवलयमक्ष्णारंजनमुरसो महेन्द्रमणिदाम। *वृन्दावनरमणीनां मण्डलनमखिलं हरिर्जयति॥ *सात वर्ष के बालक के मुख से ऐसा भावपूर्ण श्लोक सुनकर सभी उपस्थित भक्तों को परमाश्चर्य हुआ। इसे सभी ने प्रभु की पूर्ण कृपा का फल ही समझा। तब प्रभु ने कहा- ‘तैंने सबसे पहले अपने श्लोक में व्रजांगनाओं के कानों के आभूषण का वर्णन किया है, अतः तू कवि होगा और ‘कर्णपूर’ के नाम से तेरी ख्याति होगी।’ तभी से ये ‘कवि कर्णपूर’ हुए। *ये महाप्रभु के भावों को भलीभाँति समझते थे। सच्चे सुकवि से भला किसके मनोभाव छिपे रह सकते हैं? ये सुकवि थे। इन्होंने अपनी अधिकांश कविता श्री चैतन्य देव के ही सम्बन्ध में की हैं। इनके बनाये हुए आनन्द-वृन्दावन (चम्पू), अलंकारकौस्तुभ (अलंकार), श्री चैतन्य-चरित (काव्य), श्री चैतन्य चन्द्रोदय (नाटक) और ‘गौरगनोद्देशदीपिका’ प्रभृति ग्रन्थ मिलते हैं। इनका चैतन्य चरित महाकाव्य बड़ा ही सुन्दर है। चैतन्य चन्द्रोदय नाटक की भी खूब ख्याति है। ‘गौरगनोद्देश दीपिका’ में इन्होंने श्रीकृष्ण की लीला और श्री चैतन्य की लीलाओं को समान मानते हुए यह बताया है कि गौर-भक्तों में से कौन-कौन भक्त श्रीकृष्ण लीला की किस-किस सखी के अवतार थे। इनमें रूप, सनातन, रघुदास आदि सभी गौर भक्तों को भिन्न-भिन्न सखियों का अवतार बताया गया है। *बड़ी विशाल कल्पना है, कवि प्रतिभा ही जो ठहरी, जिस ओर लग गयी उसी ओर कमाल करके दिखा दिया। अपने पिता के सम्बन्ध में ये लिखते हैं- *पुरा वृन्दावने वीरा दूतो सर्वाश्च गोपिकाः। *निनाय कृष्णनिकटं सेदानीं जन को मम॥ अर्थात ‘पहले श्रीकृष्णलीला में वीरा नाम की दूती जो सभी गोपिकाओं को श्रीकृष्ण के पास ले जाया करती थी। उसी वीरा दूती के अवतार मेरे पिता (श्री शिवानन्द सेन) हैं।' *इसी प्रकार सभी के सम्बन्ध की इन्होंने बड़ी सुन्दर कल्पनाएँ की हैं। धन्य हैं ऐसे कवि को और धन्य है उनके कमनीय काव्यामृत को, जिसका मान करके आज भी गौर-भक्त उसी चैतन्यरूपी आनन्द सागर में किलोलें करते हुए परमानन्दसुख का अनुभव करते हैं। अक्षरों को जोड़ने वाले कवि तो बहुत हैं, किन्तु सत्कवि वही है, जिसकी सभी लोग प्रशंसा करें। सभी जिसके काव्यामृत को पान करके लटटू हो जायँ। एक कवि ने कवि के सम्बन्ध में एक बड़ी ही सुन्दर बात कही है- *सत्यं सन्ति गृहे गृहेऽपि कवयो येषा वचश्चातुरी *स्वे हर्म्ये कुलकन्यकेव लभते स्वल्पैर्गुणैगौंरवम्। *दुष्प्रापः स तु कोपऽति कोविन्मतिर्यद्वाग्रसग्राहिणां *पण्यस्त्रीव कलाकलापकुशला चेतांसि हर्तु क्षमा॥ ‘वैसे तो बोलने चालने और बातें बनाने में जो औरों की अपेक्षा कुछ व्युत्पन्नमति के होते हैं ऐसे कवि कहलाने वाले महानुभाव घर घर मौजूद हैं। अपने परिवार में जो लड़की थोड़ी सुन्दरी और गुणवती होती है, उसी की कुल वाले बहुत प्रशंसा करने लगते हैं। क्योंकि उसके लिये उतना बड़ा परिवार ही संसार है। ऐसे अपने ही घर में कवि कहलाने वाले सज्जनों की गणना सुकवियों में थोड़े ही हो सकती है। सच्चा सुकवि तो वही है जिसकी कमनीय कविता अज्ञात कुल गोत्र वाले कलाकोविदों के मन को भी हठात अपनी ओर आकर्षित कर ले। उनकी वाणी सुनते ही उनके मुखों से वाह वाह निकल पड़े। जैसे कला कलाप में कुशल वारांगना के कुल गोत्र को न जानने वाले पुरुष भी उसके गायन और कला से मुग्ध होकर ही स्वयं उसकी ओर खिंच से जाते हैं।’ ऐसे सुकवियों के चरणों में हमारा कोटि-कोटि प्रणाम है। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

+51 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 54 शेयर
Gopal Jalan Apr 15, 2021

+8 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 50 शेयर
Gopal Jalan Apr 15, 2021

+23 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 91 शेयर
Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 152*✳️✳️ ✳️✳️*गोपीनाथ पट्टनायक सूली से बचे*✳️✳️ *अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:। *तीव्रेण भक्ति योगेन यजेत पुरुषं परम्॥ *पाठकवृन्द राय रामानन्द जी के पिता राजा भवानन्द जी को तो भूले ही न होंगे। उनके राय रामानन्द, गोपीनाथ पट्टनायक और वाणीनाथ आदि पाँच पुत्र थे, जिन्हें प्रभु पाँच पाण्डवों की उपमा दिया करते थे और भवानन्द जी का पाण्डु कहकर सम्मान और सत्कार किया करते थे। वाणीनाथ तो सदा प्रभु की सेवा में रहते थे। राय रामानन्द पहले विद्यानगर के शासक थे, पीछे से उस काम को छोड़कर वे सदा पुरी में ही प्रभु के पादपद्मों के सन्निकट निवास किया करते थे और महाप्रभु को निरन्तर श्रीकृष्ण-कथा-श्रवण कराते रहते। उनके छोटे भाई गोपीनाथ पट्टनायक ‘माल जाठ्या दण्डपाट’ नामक उड़ीसा राज्यान्तर्गत एक प्रान्त के शासक थे। ये बडत्रे शौकीन थे, इनका रहन सहन, ठाट बाट, सब राजसी ढंग का ही था। धन पारक जिस प्रकार प्रायः लोग विषयी बन जाते हैं, उसी प्रकार के ये विषयी बने हुए थे। विषयी लोगों की इच्छा सर्वभुक अग्नि के समान होती है, उसमें धनरूपी ईंधन कितना भी क्यों न डाल दिया जाय उसकरी तृप्ति नहीं होती। तभी तो विषयी पुरुषों को शास्त्रकारों ने अविश्वासी कहा है। विषयी लोगों के वचनों का कभी विश्वास न करना चाहिये। उनके पास कोई धरोहर की चीज रखकर फिर उसे प्राप्त करने की आशा व्यर्थ है। विषय होता ही तब है जब हृदय में अविवेक होता है और अविवेक में अपने-पराये या हानि-लाभ का ध्यान नहीं रहता। इसलिये विषयी पुरुष अपने को तो आपत्ति के जाल में फंसाता ही है, साथ ही अपने संसर्गियों को भी सदा क्लेश पहुँचाता रहता है। विषयियों का संसर्ग होने से किसे क्लेश नहीं हुआ है। इसीलिये नीतिकारों ने कहा है- *दुर्वतसंगातिरनर्थपरम्पाराया हेतू: *सतां भावति किं वचनीयमत्र। *लंकेश्वरो हरति दाशरथे: कलत्रं *प्राप्नोति बंधनमसौ किल सिंधुराज:॥ *‘इसमें विशेष कहने सुनने की बात ही क्या है ? यह तो सनातन की रीति चली आयी है कि विषयी पुरुषों से संसर्ग रचाने से अच्छे पुरुषों को भी क्लेश होता ही है। देखो, उस विषयी रावण ने तो जनकनन्दिनी सीता जी का हरण किया और बन्धन में पड़ा बेचारा समुद्र।’ *साथियों के दुःख सुख का उपभोग सभी को करना होता है। वह सम्बन्धी नहीं जो सुख में सम्मिलित रहता है और दुःख में दूर हो जाता है। किन्तु एक बात है, यदि खोटे पुरुषों का सौभाग्यवश किसी महापुरुष से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध हो जाता है तो उसके इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर जाते हैं। *साधु पुरुष तो सदा विषयी पुरुषों से दूर ही रहते हैं, किन्तु विषयी किसी भी प्रकार से उनके शरणापन्न हो जाय, तो फिर उसका बेड़ा पार ही समझना चाहिये। महापुरुषों को यदि किसी के दुःख को देखकर दुःख भी होता है तो फिर वह उस दुःख से छूट ही जाता है, जब संसारी दुःख महापुरुषों की तनिक सी इच्छा से छूट जाते हैं, तब शुद्ध हृदय से और श्रद्धाभक्ति पूर्वक जो उसकी शरण में जाता है उसका कल्याण तो होगा ही- इसमें कहना ही क्या? राजा भवानन्द जी शुद्ध हृदय से प्रभु के भक्त थे। उनके पुत्र गोपीनाथ पट्टनायक महान विषयी थे। पिता का महाप्रभु के साथ सम्बन्ध था। इसी सम्बंध से उनका प्रभु के साथ थोड़ा-बहुत सम्बन्ध था। इस सम्बन्धी के सम्बन्ध संसर्ग के ही कारण वे सूली पर चढ़े हुए भी बच गये। महापुरुषों की महिमा ऐसी ही है। *गोपीनाथ एक प्रदेश के शासक थे। सम्पूर्ण प्रान्त की आय उन्हीं के पास आती थी। वे उसमें से अपना नियत वेतन रखकर शेष रुपयों को राजदरबार में भेज देते थे। किन्तु विषयियों में इतना संयम कहाँ कि वे दूसरे के द्रव्य की परवा करें। हम बता ही चुके हैं कि अविवेक के कारण विषयी पुरुषों को बपने पराये का ज्ञान नहीं रहता। गोपीनाथ पट्टनायक भी राजकोष में भेजने वाले द्रव्य को अपने ही खर्च में व्यय कर देते। इस प्रकार उड़ीसा के महाराज के दो लाख रूपये उनकी ओर हो गये। महाराज ने इनसे अपने रुपये माँगे, किन्तु इनके पास रुपये कहाँ? उन्हें तो वेश्या और कलारों ने अपना बना लिया। गोपीनाथ ने महाराज से प्रार्थना की कि ‘मेरे पास नकद रूपये तो हैं नहीं। मेरे पास दस बीस घोड़े हैं कुछ और भी सामान है, इसे जितने में समझें ले लें, शेष रुपये मैं धीरे-धीेरे देता रहूँगा।’ महाराज ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और घोड़ों की कीमत निश्चय करने के निमित्त अपने एक लड़के को भेजा। *वह राजकुमार बड़ा बुद्धिमान था, उसे घोड़ों की खूब परख थी, वह अपने दस-बीस नौकरों के साथ घोड़े की कीमत निश्चय करने वहाँ गया। राजकुमार का स्वभाव था कि वह ऊपर को सिर करके बार-बार इधर-उधर मुँह फिरा फिराकर बातें किया करता था। राजपुत्र था, उसे अपने राजपाट और अधिकार का अभिमान था, इसलिये कोई उसके सामने बोलता तक नहीं था। उसने चारों ओर घोड़ों को देख-भालकर मूल्य निश्चय करना आरम्भ किया। जिन्हें गोपीनाथ दो चार हजार के मूल्य का समझते थे, उनका उसने बहुत ही थोड़ा मूल्य बताया। महाराज गोपीनाथ को भवानन्द जी के सम्बन्ध से पुत्र की भाँति मानते थे, इसलिये वे बड़े ढ़ीठ हो गये थे। राजपुत्रों को वे कुछ समझते ही नहीं थे। जब राजपुत्र ने दो चार घोड़ों का ही इतना कम मूल्य लगाया तब गोपीनाथ से न रहा गया। उन्होंने कहा- ‘श्रीमान ! यह तो आप बहुत ही कम मूल्य लगा रहे हैं।’ *राजपुत्र ने कुछ रोष के साथ कहा- ‘तुम क्या चाहते हो, दो लाख रुपये इन घोड़ों में ही बेबाक कर दें? जितने के होंगे उतने ही तो लगावेंगे।’ गोपीनाथ ने अपने रोष को रोकते हुए कहा- ‘श्रीमान ! घोड़े बहुत बढि़या नस्ल के हैं। इनता मूल्य तो इनके लिये बहुत ही कम है।’ *इस बात पर कुपित होकर राजपुत्र ने कहा- ‘दुनिया भर के रद्दी घोड़े इकट्ठे कर रखे हैं और चाहते हैं इन्हें ही देकर दो लाख रूपयों से बेबाक हो जायँ। यह नहीं होने का। घोड़े जितने के होंगे, उतने के ही लगाये जायँगे।’ *राजप्रसाद प्राप्त मानी गोपीनाथ अपने इस अपमान को सहन नहीं कर सके। उन्होंने राजपुत्र की उपेक्षा करते हुए धीरे से व्यंग्य के स्वर में कहा- ‘कम से कम मेरे ये घोड़े तुम्हारी तरह ऊपर मुँह उठाकर इधर उधर तो नहीं देखते।’ *उनका भाव था कि तुम्हारी अपेक्षा घोड़ों का मूल्य अधिक है। आत्मसम्मानी राजपुत्र इस अपमान को सहन नहीं कर सका। वह क्रोध के कारण जलने लगा। उस समय तो उसने कुछ नहीं कहा। उसने सोचा कि यहाँ हम कुछ कहें तो बात बढ़ जाय और महाराज न जाने उसका क्या अर्थ लगावें। शासन में अभी हम स्वतन्त्र नहीं हैं, यही सोचकर वह वहाँ से चुपचाप महाराज के पास चला गया। *वहाँ जाकर उसने गोपीनाथ की बहुत सी शिकायतें करते हुए कहा- ‘पिताजी ! वह तो महाविषयी है, एक भी पैदा देना नहीं चाहता। उलटे उसने मेरा घोर अपमान किया है। उसने मेरे लिये ऐसी बुरी बात कही है, जिसे आपके सामने कहने में मुझे लज्जा आती है। सब लोगों के सामने वह मेरी एक सी निन्दा कर जाय? नौकर होकर उसका ऐसा भारी साहस? यह सब आपकी ही ढील का कारण है। उसे जब तक चाँग पर न चढ़ाया जायेगा तब तक रुपये वसूल नहीं होंगे, आप निश्चय समझिये।’ *महाराज ने सोचा- ‘हमें तो रुपये मिलने चाहिये। सचमुच जब तक उसे भारी भय न दिखाया जायगा, तब तक वह रुपये नहीं देने का। एक बार उसे चाँग पर चढ़ाने की आज्ञा दे दें। सम्भव है इस भय से रुपये दे दे। नहीं तो पीछे उसे अपनी विशेष आज्ञा से छोड़ देंगे। भवानन्द के पुत्र को भला हम दो लाख रुपयों के पीछे चाँग पर थोड़े ही चढ़वा सकते हैं। अभी कह दें, इससे राजकुमार का क्रोध भी शान्त हो जायगा और रुपये भी सम्भवतया मिल ही जायँगे। यह सोचकर महाराज ने कह दिया- ‘अच्छा भाई, वही काम करो, जिससे उससे रुपये मिलें। चढ़वा दो उसे चाँग पर।’ *बस, फिर क्या था। राजपुत्र ने फौरन आज्ञा दी कि गोपीनाथ को यहाँ बाँधकर लाया जाय। क्षण भर में उसकी आज्ञा पालन की गयी। गोपीनाथ बाँधकर चाँग के समीप खड़े किये गये। अब पाठकों को चाँग का परिचय दें कि यह चाँग क्या बला है। असल में चाँग एक प्रकार से सूली का ही नाम है। सूली में और चाँग में इतना ही अन्तर है कि सूली गुदा में होकर डाली जाती है और सिर में होकर पार निकाल ली जाती है। इससे जल्दी प्राण नहीं निकलते- बहुत देर में तड़प तड़प कर प्राण निकलते हैं। चाँग उससे कुछ सुखकर प्राण नाशक क्रिया है। एक बड़ा सा मंच होता है। उस मंच के नीचे भाग में तीक्ष्ण धार वाला एक बहुत बड़ा खड्ग लगा रहता है। उस मंच पर से अपराधी को इस ढंग से फेंकते हैं कि जिससे उस पर गिरते ही उसके प्राणों का अन्त हो जाये। इसी का नाम ‘चाँग चढ़ाना’ है। बड़े बड़े अपराधियों को ही चाँग पर चढ़ाया जाता है। *‘गोपीनाथ पट्टनायक चाँग पर चढ़ाये जायँगे’ -इस बात का हल्ला चारों ओर फैल गया। सभी लोगों को इस बात से महान आश्चर्य हुआ। महाराज जिन राजा भवानन्द को अपने पिता के समान मानते थे, उनके पुत्र को वे चाँग पर चढ़ा देंगे, सचमुच इन राजाओं के चित्त की बात समझी नहीं जाती, ये क्षण भर में प्रसन्न हो सकते हैं और पल भर में क्रुद्ध। इनका कोई अपना नहीं। ये सब कुछ कर सकते हैं। इस प्रकार भाँति-भाँति की बातें कहते हुए सैंकड़ों पुरुष महाप्रभु के शरणापन्न हुए और सभी हाल सुनाकर प्रभु से उनके अपराध क्षमा करा देने की प्रार्थना करने लगे। *प्रभु ने कहा- ‘भाई ! मैं कर ही क्या सकता हूँ, राजा की आज्ञा को टाल ही कौन सकता है? ठीक ही है, विषयी लोगों को ऐसा ही दण्ड मिलना चाहिये। जब वह राद्रव्य को भी अपने विषय-भोग में उड़ा देता है तो राजा को उससे क्या लाभ? दो लाख रुपये कुछ कम तो होते ही नहीं। जैसा उसने किया, उसका फल भोगा। मैं क्या करूँ?’ *भवानन्द जी के सगे-सम्बन्धी और स्नेही प्रभु से भाँति-भाँति की अनुनय-विनय करने लगे। प्रभु ने कहा- ‘भाई ! मैं तो भिक्षुक हूँ, यदि मेरे पास दो लाख रुपये होते तो देकर उसे छुड़ा लाता, किन्तु मेरे पास तो दो कौड़ी भी नहीं। मैं उसे छुड़ाऊँ कैसे? तुम लोग जगन्नाथ जी से जाकर प्रार्थना करो, वे दीनानाथ हैं, सबकी प्रार्थना पर अवश्य ही ध्यान देंगे।’ *इतने में ही बहुत से पुरुष प्रभु के समीप और भागते हुए आये। उन्होंने संवाद किया कि- ‘भवानन्द, वाणीनाथ आदि सभी परिवार के लोगों को राजकर्मचारी बाँधकर लिये जा रहे हैं।’ *सभी लोगों को आश्चर्य हुआ। भवानन्द जी के बन्धन का समाचार सुनकर तो प्रभु के सभी विरक्त और अंतरंग भक्त तिलमिला उठे। स्वरूप दामोदर जी ने अधीरता के साथ कहा- ‘प्रभु ! भवानन्द तो सपरिवार आपके चरणों के सेवक हैं। उनको इतना दुःख क्यों? आपके कृपापात्र होते हुए भी वे वृद्धावस्था में इतना क्लेश सहें, यह उचित प्रतीत नहीं होता। इससे आपकी भक्त वत्सलता की निन्दा होगी।’ *महाप्रभु ने प्रेम युक्त रोष के स्वर में कहा- ‘स्वरूप ! तुम इतने समझदार होकर भी ऐसी बच्चों की सी बातें कर रहे हो? तुम्हारी इच्छा है कि मैं राजदरबार में जाकर भवानन्द के लिये राजा से प्रार्थना करूँ कि वे इन्हें मुक्त कर दें? अच्छा, मान लो मैं जाऊँ भी और कहूँ भी और राजा ने कह दिया कि आप ही दो लाख रुपये दे जाइये तब मैं क्या उत्तर दूँगा? राजदरबार में साधु ब्राह्मणों को तो कोई घास फूस की तरह भी नहीं पूछता।’ *स्वरूपगोस्वामी ने कहा- ‘आपसे राजदरबार में जाने के लिये कहता ही कौन है? आप तो अपनी इच्छा मात्र से ही इस विश्व ब्रह्माण्ड को उलट-पुलट कर सकते हैं। फिर भवानन्द को सपरिवार इस दुःख से बचाना तो साधारण-सी बात है। आपको बचाना ही पड़ेगा, न बचावें तो आपकी भक्त वत्सलता ही झूठी हो जायगी, वह झूठी है नहीं। भवानन्द आपके भक्त हैं और आप भक्तवत्सल हैं, इस बात में किसी को सन्देह ही नहीं।’ *राजदरबार में चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है। सभी के मुखों पर गोपीनाथ के चाँग पर चढ़ने की बात थी। सभी इस असम्भव और अद्भुत घटना के कारण भयभीत-से प्रतीत होते थे। समाचार पाकर महाराज के प्रधान मन्त्री चन्दनेश्वर महापात्र महाराज के समीप पहुँचे और अत्यन्त ही विस्मय प्रकट करते हुए कहने लगे- ‘श्रीमन ! यह आपने कैसी आज्ञा दे दी ? भवानन्द के पुत्र गोपीनाथ पट्टनायक तो आपके भाई के समान हैं। उन्हें आप प्राणदण्ड दिला रहे हैं, सो भी दो लाख रुपयों के ऊपर? वे यदि देने से इन्कार करें तो भी वैसा करना उचित था? किन्तु वे तो देने को तैयार हैं। उनके घोड़े आदि उचित मूल्य पर ले लिये जायँ, जो शेष रहेगा, उसे वे धीरे धीरे देते रहेंगे।’ *महाराज की स्वयं की इच्छा नहीं थी। महामन्त्री की बात सुनकर उन्होंने कहा- ‘अच्छी बात है। मुझे इस बात का क्या पता? यदि वे रुपये देना चाहते हैं, तो उन्हें छोड़ दो। मुझे तो रुपयों से काम है उनके प्राण लेने से मुझे क्या लाभ?’ *महाराज की ऐसी आज्ञा मिलते ही उन्होंने दरबार मे जाकर गोपीनाथ जी को सपरिवार मुक्त करने की आज्ञा लोंगों को सुना दी। इस आज्ञा को सुनते ही लोगों के हर्ष का ठिकाना नहीं रहा। क्षणभर में बहुत से मनुष्य इस सुखद संवाद को सुनाने के निमित्त प्रभु के पास पहुँचे और सभी एक स्वर में कहने लगे- ‘प्रभु ने गोपीनाथ को चाँग से उतरवा दिया।’ *प्रभु ने कहा- ‘यह सब उनके पिता की भक्ति का ही फल है। जगन्नाथ जी ने ही उन्हें इस विपत्ति से बचाया है।’ *लोगों ने कहा- ‘भवानन्द जी तो आपको ही सर्वस्व समझते हैं और वे ही कह भी रहे हैं कि महाप्रभु की ही कृपा से हम इस विपत्ति से बच सके हैं।’ *प्रभु ने लोगों से पूछा- ‘चाँग के समीप खड़े हुए भवानन्द जी का उस समय क्या हाल था?’ *लोगों ने कहा- ‘प्रभो ! उनकी बात कुछ न पूछिये। अपने पुत्र को चाँग पर चढ़े देखकर भी न उन्हें हर्ष था न विषाद। वे आनन्द के सहित प्रेम में गद्गद होकर- *हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। *हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ *इस मन्त्र का जप कर रहे थे। दोनों हाथों की उँगलियों के पोरों से वे इस मन्त्र की संख्या को गिनते जाते थे। उन्हें आपके ऊपर दृढ़ विश्वास था।’ *प्रभु ने कहा- ‘सब पुरुषोत्तम भगवान की कृपा है। उनकी भगवत-भक्ति का ही फल है कि इतनी भयंकर विपत्ति से सहज में ही छुटकारा मिल गया, नहीं तो राजाओं का क्रोध कभी निष्फल नहीं जाता।’ *इतने में ही भवानन्द जी अपने पाँचों पुत्रों को साथ लिये हुए प्रभु के दर्शनों के लिये आ पहुँचे। उन्होंने पुत्रों के सहित प्रभु के पापद्मों में साष्टांग प्रणाम किया अैर गद्गद कण्ठ से दीनता के साथ वे कहने लगे- ‘हे दयालो ! हे भक्तवत्सल !! आपने ही हमारा इस भयंकर विपत्ति से उद्धार किया है। प्रभो ! आपकी असीम कृपा के बिना ऐसा असम्भव कार्य कभी नहीं हो सकता कि चाँग पर चढ़ा हुआ मनुष्य फिर जीवित ही उतर आवे !' *प्रभु उनकी भगवद्भक्ति की प्रशंसा करते हुए कहने लगे- ‘इसे समझा दो, अब कभी ऐसा काम न करे। राजा के पैसे को कभी भी अपने खर्च में न लावे।’ *इस प्रकार समझा बुझाकर प्रभु नेे उन सब पिता-पुत्रों को विदा किया। उसी समय काशी मिश्र भी आ पहुँचे। *प्रभु को प्रणाम करके उन्होंने कहा- ‘प्रभो आज आपकी कृपा से ये पिता पुत्र तो खूब विपत्ति से बचे।’ प्रभु ने कुछ खिन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘मिश्र जी क्या बताऊँ? मैं तो इन विषयी लोगों के संसर्ग से बड़ा दुखी हूँ। मैं चाहता हूँ, इनकी कोई बात मेरे कानों में न पड़े। किन्तु जब यहाँ रहता हूँ, तब लोग मुझसे आकर कह ही देते हैं। सुनकर मुझे क्लेश होता ही है, इसलिये पुरी छोड़कर अब मैं अलालनाथ मेे जाकर रहूँगा। वहाँ न इन विषयी लोगों का संसर्ग होगा और न ये बातें सुनने में आवेंगी।’ *मिश्र जी ने कहा- ‘आपको इन बातों से क्या? यह तो संसार है। इसमें तो ऐसी बातें होती ही रहती हैं। आप किस-किसका शोक करेंगे? आपसे क्या, कोई कुछ भी करे ! आपके भक्त तो सभी विषयत्यागी वैरागी हैं। रघुनाथदास जी को देखिये सब कुद छोड़ छाड़कर क्षेत्र के टुकड़ों पर निर्वाह करते हैं। रामानन्द तो पूरे संन्यासी हैं ही।’ *प्रभु ने कहा- ‘चाहे कैसा भी क्यों न हो, अपना कुछ सम्बन्ध रहने से दुःख सुख प्रतीत होता ही है। ये विषयी ठहरे, बिना रुपया चुराये मानेंगे नहीं, महाराज कफर इन्हें चाँग पर चढ़ावेंगे। आज बच गये तो एक न एक दिन फिर यही होना है।’ *मिश्र जी ने कहा- ‘नहीं, ऐसा नहीं होगा। महाराज भवानन्द जी को बहुत प्यार करते हैं।’ इसके अनन्तर और भी बहुत-सी बातें होती रहीं। अन्त में काशी मिश्र प्रभु की आज्ञा लेकर चले गये। महाराज प्रतापरुद्र जी अपने कुलगुरु श्री काशी मिश्र के अनन्य भक्त थे। पुरी में जब भी वे रहते, तभी रोज उनके घर आकर पैर दबाते थे। मिश्र जी भी उनसे अत्यधिक स्नेह मानते थे। एक दिन रात्रि में महाराज आकर मिश्र जी के पैर दबाने लगे। बातों ही बातों में मिश्र जी ने प्रसंग छेड़ दिया कि महाप्रभु तो पुरी छोड़कर अब अलालनाथ जाना चाहते हैं। *पैरों को पकड़े हुए सम्भ्रम के साथ महाराज ने कहा- ‘क्यों, क्यों ! उन्हें यहाँ क्या कष्ट है? जो भी कोई कष्ट हो उसे दूर कीजिये। ! मैं आपका सेवक सब प्रकार से स्वयं उनकी सेवा करने को उपस्थित हूँ।’ *मिश्र जी ने कहा- ‘उन्हें गोपीनाथ वाली घटना से बड़ा कष्ट हुआ है। वे कहते हैं, विषयियों के संसर्ग में रहना ठीक नहीं है।’ *महाराज ने कहा- ‘श्रीमहाराज ! मैंने तो तुम्हें धमकाने के लिये ऐसा किया था। वैसे भवानन्द जी के प्रति मेरी बड़ी श्रद्धा है। इस छोटी सी बात के पीछे प्रभु पुरी को क्यों परित्याग कर रहे हैं। दो लाख रुपयों की कौन सी बात है? मैं रुपयों को छोड़ दूँगा। आप जैसे भी बने तैसे प्रभु को यहीं रखिये।’ *मिश्र जी ने कहा- ‘रुपये छोड़ने को वे नहीं कहते। रुपयों की बात सुनकर तो उन्हें और अधिक दुःख होगा। वैसे ही वे इस झंझट से दूर रहना चाहते हैं। कहते हैं- रोज रोज यही झगड़ा चला रहेगा। गोपीनाथ फिर ऐसा ही करेगा।’ *महाराज ने कहा- ‘आप उन्हें रुपयो की बात कहें ही नहीं। गोपीनाथ तो अपनी ही आदमी है। अब झगड़ा क्यों होगा? मैं उसे समझा दूँगा, आप महाप्रभु को जाने न दें। जैसे भी रख सकें अनुनय-विनय और प्रार्थना करके उन्हें यहीं रखें।’ *महाराज के चले जाने पर दूसरे दिन मिश्र जी ने सभी बातें आकर प्रभु से कहीं ! सब बातों को सुनकर प्रभु कहने लगे- ‘यह आपने क्या किया? यह तो दो लाख रुपये आपने मुझे ही दिलवा दिये। इस राज प्रतिग्रह को लेकर मैं उलटा पाप का भागी बना।’ मिश्र जी ने सभी बातें प्रभु को समझा दीं। महाराज के शील, स्वभाव, नम्रता और सदगुणों की प्रशंसा की। प्रभु उनके भक्ति भाव की बातें सुनकर सन्तुष्ट हुए और उन्होंने अलालनाथ जाने का विचार परित्याग कर दिया। *इधर महाराज ने आकर गोपीनाथ जी को बुलाया और उन्हें पुत्र की भाँति समझाते हुए कहने लगे- ‘देखो इस प्रकार व्यर्थ व्यय नहीं करना चाहिये। तुमने बिना पूछे इतने रुपये खर्च कर दिये इसलिये हमें क्रोध आ गया। जाओ, वे रुपये माफ किये। अब फिर ऐसा काम कभी भी न करना। यदि इतने वेतन से तुम्हारा कान नहीं चलता है तो हमसे कहना चाहिये था। तब तक तुमने यह बात हमसे कभी नहीं कही। आज से हमने तुम्हारा वेतन भी दुगुना कर दिया।’ *इस प्रकार दो लाख रुपये माफ हो जाने पर और वेतन भी दुगुना हो जाने से गोपीनाथ जी को परम प्रसन्नता हुई। उसी समय वे आकर प्रभु के पैरों में पड़ गये और रोते-रोते कहने लगे- ‘प्रभो ! मुझे अब अपने चरणों की शरण में लीजिये, अब मुझे इस विषय जंजाल से छुड़ाइये।' *प्रभु ने उन्हें प्रेमपूर्वक आलिंगन किया और फिर कभी ऐसा काम न करने के लिये कहकर विदा किया। *जब महापुरुषों की तनिक सी कृपा होने पर गोपीनाथ सपरिवार सूली से बच गये, दो लाख रुपये माफ हो गये, वेतन दुगुना हो गया और पहले से भी अधिक राजा के प्रीतिभाजन बन गये, तब जो अनन्यभाव से महापुरुषों के चरणों ही सेवा करते हैं और उनके ऊपर जो महापुरुषों की कृपा होती है, उस कृपा के फल का तो कहना ही क्या? उस कृपा से तो फिर मनुष्य का इस संसार से ही सम्बन्ध छूट जाता है। वह तो फिर सर्वतोभावेन प्रभु का ही हो जाता है। धन्य है ऐसी कृपालुता को ! *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- -

+29 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 35 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB