श्रीराधारमणाय समर्पणं ।।

श्रीराधारमणाय समर्पणं ।।

श्रीराधारमणाय समर्पणं ।।
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श्रीजगन्नाथ पुरी से दस कोस दूर पीपलीचटी ग्राम में रघु केवट का घर था।
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घर में स्त्री और बूढ़ी माता थी। प्रातः जाल लेकर रघु मछलियां पकड़ने जाता और पकड़ी हुई मछलियों को बेचकर परिवार का पालन करता।
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रघु ने गुरु दीक्षा लेकर गले में तुलसी की कंठी बांध ली थी। प्रातः स्नान करके भगवन्नाम का जप करता था। अब तो उसे मछली पकड़ना भी अच्छा नहीं लगता था।
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उसने इस काम को छोड़ दिया। कुछ दिन तो संचित अन्न से काम चला , फिर उपवास होने लगा।
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पेट की ज्वाला तथा माता और स्त्री के तिरस्कार से व्याकुल होकर रघु को फिर जाल उठाना पड़ा।
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जाल डालने पर एक बड़ी लाल मछली फंस गई और जल से निकालने पर तड़पने लगी।
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रघु ने दोनों हाथों से मछली का मुख पकड़ा और उसे फाड़ने लगा।
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सहसा मछली के भीतर से आवाज आई- ‘रक्षा कर, नारायण ! रक्षा कर।’
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रघु चकित हो गया। उसका हृदय आनंद से भीग गया। मछली को लेकर वह वन की ओर भागा।
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वहां पर्वत से बहुत से झरने गिरते थे। उन झरनों ने अनेक जलकुंड बना दिए थे। रघु ने एक कुंड में मछली डाल दी।
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रघु अपनी मां और पत्नी की भूख को भूल गया। वह भरे कंठ से कहने लगा-
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‘मछली के भीतर से मुझे तुमने ‘नारायण’ नाम सुनाया ? मैं तुम्हारा दर्शन पाए बिना अब यहां से उठूंगा नहीं।’
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रघु को वहां बैठे-बैठे तीन दिन हो गए। वह ‘नारायण, नारायण’ की रट लगाए था। एक बूंद जल तक उसके मुख में नहीं गया।
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भगवान एक वृद्ध ब्राह्मण के वेश में वहां आए और पूछने लगे- ‘अरे तपस्वी ! तू कौन है ?’ तू इस निर्जन वन में बैठा क्या कर रहा है?
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रघु ने ब्राह्मण को प्रणाम करके कहा- ‘महाराज ! मैं कोई भी होऊं, आपको क्या ? बातें करने से मेरे काम में विघ्न पड़ता है। आप जाएं।’
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ब्राह्मण ने तनिक हंसकर कहा- ‘मैं तो चला जाऊंगा, पर तू सोच कि मछली भी कहीं मनुष्य की बोली बोल सकती है।’
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रघु ब्राह्मण की बात सुनकर चौंक उठा। उसने समझ लिया कि मछली की बात जानने वाले ये सर्वज्ञ मेरे प्रभु हैं। वह बोला-
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‘भगवन ! सब जीवों में परमात्मा ही है, यह बात मैं जानता हूं। मैंने जीवों की हत्या की है। क्या इसलिए आप मेरी परीक्षा ले रहे हैं ?
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आप नारायण हैं। मुझे दर्शन क्यों नहीं देते ? मुझे क्यों तरसा रहे हैं, नाथ।’
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भक्त की प्रार्थना सुनकर प्रभु दिव्य चतुर्भुजरूप में प्रकट हो गए और वर मांगने को कहा।
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रघु ने हाथ जोड़कर कहा- ‘प्रभो ! आपके दर्शन हो गए, फिर अब मांगने को क्या रहा, परंतु आपकी आज्ञा है, तो मैं एक छोटी सी वस्तु मांगता हूं।
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जाति से धीवर हूं। मछली मारना मेरा पैतृक स्वभाव है। मैं यही वरदान मांगता हूं कि मेरा स्वभाव छूट जाए। .
पेट के लिए भी मैं कभी हिंसा न करूं। अंत समय में मेरी जीभ आपका नाम रटती रहे और आपका दर्शन करते हुए मेरे प्राण निकलें।’
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भगवान ने रघु के मस्तक पर हाथ रख कर ‘तथास्तु’ कहा और अंतर्धान हो गए।
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वह घर आया, तो गांव के लोगों ने उसे धिक्कारा कि माता और स्त्री को भूखा छोड़कर कहां गया था।
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दयावश गांव के जमींदार ने उनके लिए अन्न का प्रबंध कर दिया था। इस प्रकार उसका तथा परिवार का पालन- पोषण होने लगा।
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उसके मुख से जो निकल जाता, वही सत्य हो जाता। बाद में वह घर छोड़कर निर्जन वन में रहने लगा और चौबीसों घंटे प्रभु भजन में ही बिताने लगा।
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एक दिन रघु को लगा कि मानो नीलांचलनाथ श्रीजगन्नाथ जी उनसे भोजन मांग रहे हैं।
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भोजन-सामग्री लेकर रघु ने कुटिया का द्वार बंद कर लिया। भक्त के बुलाते ही भाव के भूखे श्रीजगन्नाथ जी प्रकट हो गए और रघु के हाथ से भोजन करने लगे।
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उधर, उसी समय नीलांचल में श्रीजगन्नाथ जी के भोग-मंडप में पुजारी ने नाना प्रकार के पकवान सजाए।
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भोग-मंडप में एक दर्पण लगा है, उस दर्पण में श्रीजगन्नाथ जी के श्री विग्रह का जो प्रतिबिंब पड़ता है, उसी को नैवेद्य चढ़ाया जाता है।
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सब सामग्री आ जाने पर पुजारी जब भोग लगाने लगा, तब उसने देखा कि दर्पण में प्रति बिंब तो है ही नहीं, घबरा कर वह राजा के पास जाकर बोला-
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‘महाराज ! नैवेद्य में कुछ दोष होना चाहिए। श्रीजगन्नाथ स्वामी उसे स्वीकार नहीं कर रहे हैं। अब क्या किया जाए।’
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राजा ने भी देखा कि दर्पण में प्रभु का प्रतिबिंब नहीं पड़ रहा है। राजा को बड़ा दुख हुआ। वे कहने लगे मुझसे कोई अपराध हुआ हो, तो प्रायश्चित करने को मैं तैयार हूं।’
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राजा प्रार्थना करते हुए दुखी होकर भगवान के गरुड़ध्वज के पास जाकर भूमि पर लेट गए। लेटते ही उन्हें नींद आ गई। उन्होंने स्वप्न में देखा कि प्रभु कह रहे हैं-
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‘राजा ! तेरा कोई अपराध नहीं। तू दुखी मत हो। मैं नीलांचल में था ही नहीं, तो प्रतिबिंब कैसे पड़ता।
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मैं तो इस समय पीपलीचटी ग्राम में अपने भक्त रघु केवट की झोपड़ी में बैठा उसके हाथ से भोजन कर रहा हूं।
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वह जब तक नहीं छोड़ता, मैं यहां आकर तेरा नैवेद्य कैसे स्वीकार कर सकता हूं।
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यदि तू मुझे यहां बुलाना चाहता है, तो मेरे उस भक्त को उसकी माता तथा स्त्री के साथ यहां ले आ। यहीं उनके रहने की व्यवस्था कर।’
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राजा की तंद्रा भंग हुई, तो वे पीपलीचटी पहुंचे। पूछकर रघु केवट की झोपड़ी का पता लगाया।
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जब कई बार पुकारने पर भी द्वार न खुला, तब द्वार बल लगाकर उन्होंने स्वयं खोला।
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कुटिया का दृश्य देखकर वे मूर्तिवत् हो गए। रघु, के हाथ में अन्न का ग्रास दिखाई देता है, पर ग्रास लेने वाला मुख नहीं दिखता। सहसा प्रभु अंतर्धान हो गए।
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तभी राजा को देख उसने उठकर राजा को प्रणाम किया। श्रीजगन्नाथ जी की आज्ञा सुन कर रघु ने नीलांचल चलना स्वीकार कर लिया। माता तथा पत्नी के साथ वे पुरी आए।
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तब भोग मंडप के दर्पण में श्रीजगन्नाथ जी का प्रतिबिंब दिखाई पड़ा।
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पुरी के राजा ने श्रीजगन्नाथ जी के मंदिर से दक्षिण ओर रघु के लिए घर की व्यवस्था कर दी।
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रघु अपनी माता और स्त्री के साथ भजन करते हुए जीवन पर्यन्त वहीं रहे।

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Anita Sharma May 14, 2021

एक बार नामदेव जी अपनी कुटिया के बाहर सोये हुए थे तभी अचानक उनकी कुटिया में आग लग गयी। नामदेव जी ने सोचा आज तो ठाकुर जी अग्नि के रूप में आये हैं तो उन्होंने जो भी सामान बाहर रखा हुआ था वो भी आग में ही डाल दिया,तब लोगों ने देखा और जैसे तैसे आग बुझा दी और चले गये। ठाकुर जी ने सोचा इसने तो मुझे सब कुछ अर्पण कर दिया है ठाकुर जी ने उनके लिए बहुत ही सुन्दर कुटिया बना दी,सुबह लोगों ने देखा कि वहाँ तो बहुत सुंदर कुटिया बनी हुई है ! उन्होंने नामदेव जी को कहा रात को तो आपकी कुटिया में आग लग गयी थी फिर ये इतनी सुंदर कुटिया कैसे बन गयी?हमे भी इसका तरीका बता दीजिए। नामदेव जी ने कहा सबसे पहले तो अपनी कुटिया में आग लगाओ फिर जो भी सामान बचा हो वो भी उसमे डाल दो। लोगो ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा और कहा अजीब पागल है। नामदेव जी ने कहा :-वो ठाकुर तो पागलों के ही घर बनाता है।

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Soni Mishra May 14, 2021

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Anshika May 14, 2021

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#अक्षय_तृतीया14_मई 🔥 अक्षय तृतीया का महत्व क्यों है ? जानिए कुछ महत्वपुर्ण जानकारी :- आज ही के दिन जैनों के प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव जी भगवान ने 13 महीने का कठीन निरंतर उपवास (बिना जल का तप) का पारणा (उपवास छोडना) इक्षु (गन्ने) के रस से किया था। और आज भी बहुत जैन भाई व बहने वही वर्षी तप करने के पश्चात आज उपवास छोड़ते है और नये उपवास लेते है। और भगवान को गन्ने के रस से अभिषेक किया जाता है।। आज ही के दिन माँ गंगा का अवतरण धरती पर हुआ था। महर्षी परशुराम का जन्म आज ही के दिन हुआ था। माँ अन्नपूर्णा का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था। -द्रोपदी को चीरहरण से कृष्ण ने आज ही के दिन बचाया था। - कृष्ण और सुदामा का मिलन आज ही के दिन हुआ था। - कुबेर को आज ही के दिन खजाना मिला था। -सतयुग और त्रेता युग का प्रारम्भ आज ही के दिन हुआ था। -ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का अवतरण भी आज ही के दिन हुआ था। - प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री बद्री नारायण जी का कपाट आज ही के दिन खोला जाता है। - बृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में साल में केवल आज ही के दिन श्री विग्रह चरण के दर्शन होते है। अन्यथा साल भर वो बस्त्र से ढके रहते है। - इसी दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था। - अक्षय तृतीया अपने आप में स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। कोई भी शुभ कार्य का प्रारम्भ किया जा सकता है।। आप सभी को अक्षयतृतीया की कोटिशः शुभकामनाएं...🙏 ( प्राप्त हुआ )

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Anita Sharma May 13, 2021

एक बार नारद जी के मन में एक विचित्र सा कौतूहल पैदा हुआ। वैसे नारदजी के साथ विचित्र घटनाएं होती ही रहती हैं। उन्हें यह जानने की धुन सवार हुई कि ब्रह्मांड में सबसे बड़ा और महान कौन है? नारद जी ने अपनी जिज्ञासा भगवान विष्णु के सामने ही रख दी। भगवान विष्णु मुस्कुराने लगे। फिर बोले-नारद जी सब पृथ्वी पर टिका है। इसलिए पृथ्वी को बड़ा कह सकते हैं। परंतु नारद जी यहां भी एक शंका है। स्वयं नारायण अपने उत्तर के साथ ही परंतु लगा रहे हैं। नारद जी का कौतूहल शांत होने की बजाय और बढ़ गया। नारद जी ने पूछा स्वयं आप सशंकित हैं फिर तो विषय गंभीर है। कैसी शंका है प्रभु? विष्णु जी बोले-समुद्र ने पृथ्वी को घेर रखा है। इसलिए समुद्र उससे भी बड़ा है। अब नारद जी बोले-प्रभु आप कहते हैं तो मान लेता हूं कि समुद्र सबसे बड़ा है। यह सुनकर विष्णु जी ने एक बात और छेड़ दी-परंतु नारद जी समुद्र को अगस्त्य मुनि ने पी लिया था। इसलिए समुद्र कैसे बड़ा हो सकता है? बड़े तो फिर अगस्त्य मुनि ही हुए। नारद जी के माथे पर बल पड़ गया। फिर भी उन्होंने कहा-प्रभु आप कहते हैं तो अब अगस्त्य मुनि को ही बड़ा मान लेता हूं। नारद जी अभी इस बात को स्वीकारने के लिए तैयार हुए ही थे कि विष्णु ने नई बात कहकर उनके मन को चंचल कर दिया। श्री विष्णु जी बोले-नारद जी पर ये भी तो सोचिए वह रहते कहां हैं। आकाशमंडल में एक सूई की नोक बराबर स्थान पर जुगनू की तरह दिखते हैं। फिर वह कैसे बड़े, बड़ा तो आकाश को होना चाहिए। नारद जी बोले-हां प्रभु आप यह बात तो सही कर रहे हैं। आकाश के सामने अगस्त्य ऋषि का तो अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। आकाश ने ही तो सारी सृष्टि को घेर आच्छादित कर रखा है। आकाश ही श्रेष्ठ और सबसे बड़ा है। भगवान विष्णु जी ने नारद जी को थोड़ा और भ्रमित करने की सोची। श्रीहरि बोल पड़े, पर नारदजी आप एक बात भूल रहे हैं। वामन अवतार ने इस आकाश को एक ही पग में नाप लिया था मैंने। फिर आकाश से विराट तो वामन हुए। नारदजी ने श्रीहरि के चरण पकड़ लिए और बोले भगवन आप ही तो वामन अवतार में थे। फिर अपने सोलह कलाएं भी धारण कीं और वामन से बड़े स्वरूप में भी आए। इसलिए यह तो निश्चय हो गया कि सबसे बड़े आप ही हैं। भगवान विष्णु ने कहा-नारद, मैं विराट स्वरूप धारण करने के उपरांत भी अपने भक्तों के छोटे हृदय में विराजमान हूं। वहीं निवास करता हूं। जहां मुझे स्थान मिल जाए वह स्थान सबसे बड़ा हुआ न। इसलिए सर्वोपरि और सबसे महान तो मेरे वे भक्त हैं जो शुद्ध हृदय से मेरी उपासना करके मुझे अपने हृदय में धारण कर लेते हैं। उनसे विस्तृत और कौन हो सकता है। तुम भी मेरे सच्चे भक्त हो इसलिए वास्तव में तुम सबसे बड़े और महान हो। श्रीहरि की बात सुनकर नारद जी के नेत्र भर आए। उन्हें संसार को नचाने वाले भगवान के हृदय की विशालता को देखकर आनंद भी हुआ और अपनी बुद्धि के लिए खेद भी। नारद जी ने कहा-प्रभु संसार को धारण करने वाले आप स्वयं खुद को भक्तों से छोटा मानते हैं। फिर भक्तगण क्यों यह छोटे-बड़े का भेद करते हैं। मुझे अपनी अज्ञानता पर दुख है। मैं आगे से कभी भी छोटे-बड़े के फेर में नहीं पड़ूंगा। इसीलिए तो कहते हैं भक्त के वश में हैं भगवान। भक्त अपनी निष्काम भक्ति से भगवान को वश में कर लेता है। तेरा तुझको सौंपते क्या लागे है मोरा इसी भाव में रहिए तो त्रिलोक के स्वामी आपके पास आकर बस जाने को लालायित रहेंगे।

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Anita Sharma May 12, 2021

. सन्त की दूरदर्शिता एक सन्त के पास 30 सेवक रहते थे। एक सेवक ने गुरुजी के आगे प्रार्थना की, 'महाराज जी! मेरी बहन की शादी है तो आज एक महीना रह गया है तो मैं दस दिन के लिए वहाँ जाऊँगा। कृपा करें ! आप भी साथ चले तो अच्छी बात है।' गुरु जी ने कहा– 'बेटा देखो टाइम बताएगा। नहीं तो तेरे को तो हम जानें ही देंगे।' उस सेवक ने बीच-बीच में इशारा गुरु जी की तरफ किया कि गुरुजी कुछ ना कुछ मेरी मदद कर दें। आखिर वह दिन नजदीक आ गया सेवक ने कहा, 'गुरु जी कल सुबह जाऊँगा मैं।' गुरु जी ने कहा, 'ठीक है बेटा!' सुबह हो गई जब सेवक जाने लगा तो गुरु जी ने उसे 5 किलो अनार दिए और कहा, 'ले जा बेटा भगवान तेरी बहन की शादी खूब धूमधाम से करें दुनिया याद करें कि ऐसी शादी तो हमने कभी देखी ही नहीं और साथ में दो सेवक भेज दिये जाओ तुम शादी पूरी करके आ जाना।' जब सेवक घर से निकले 100 किलोमीटर गए तो जिसकी बहन की शादी थी वह सेवक दूसरों से बोला, 'गुरु जी को पता ही था कि मेरी बहन की शादी है, और हमारे पास कुछ भी नहीं है, फिर भी गुरु जी ने मेरी मदद नहीं की।' दो-तीन दिन के बाद वह अपने घर पहुँच गया। उसका घर राजस्थान रेतीली इलाके में था वहाँ कोई फसल नहीं होती थी। वहाँ के राजा की लड़की बीमार हो गई तो वैद्यजी ने बताया कि, 'इस लड़की को अनार के साथ यह दवाई दी जाएगी तो यह लड़की ठीक हो जाएगी।' राजा ने मुनादी करवा रखी थी कि, 'अगर किसी के पास आनार है तो राजा उसे बहुत ही इनाम देंगे।' इधर मुनादी वाले ने आवाज लगाई, अगर किसी के पास अनार है तो जल्दी आ जाओ, राजा को अनारों की सख्त जरूरत है। जब यह आवाज उन सेवकों के कानों में पड़ी तो वह सेवक उस मुनादी वाले के पास गए और कहा कि हमारे पास अनार है, चलो राजा जी के पास। राजाजी को अनार दिए गए अनार का जूस निकाला गया और लड़की को दवाई दी गई तो लड़की ठीक-ठाक हो गई। राजा जी ने पूछा, 'तुम कहाँ से आए हो, तो उसने सारी हकीकत बता दी। राजा ने कहा, 'ठीक है तुम्हारी बहन की शादी मैं करूँगा।' राजा जी ने हुकुम दिया कि, 'ऐसी शादी होनी चाहिए जिसे देखकर लोग यह कहे कि यह राजा की लड़की की शादी है।' सब बारातियों को सोने चांदी गहने के उपहार दिए गए बारात की सेवा बहुत अच्छी हुई लड़की को बहुत सारा धन दिया गया। लड़की के मां-बाप को बहुत ही जमीन जायदाद व आलीशान मकान और बहुत सारे रुपए पैसे दिए गए। लड़की भी राजी खुशी विदा होकर चली गई। सेवक सोचने लगे कि, 'गुरु की महिमा गुरु ही जाने। हम ना जाने क्या-क्या सोच रहे थे गुरु जी के बारे में। गुरु जी के वचन थे जा बेटा तेरी बहन की शादी ऐसी होगी कि दुनिया देखेगी।' सन्त वचन हमेशा सच होते हैं। सन्तों के वचन के अन्दर ताकत होती है लेकिन हम नहीं समझते। जो भी वह वचन निकालते हैं वह सिद्ध हो जाता है। हमें सन्तों के वचनों के ऊपर अमल करना चाहिए और विश्वास करना चाहिए ना जाने सन्त मौज में आकर क्या दे दें और रंक से राजा बना दें।

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Amit Kumar May 13, 2021

अक्षय तृतीया का महत्व......!!! शास्त्रों में अक्षय तृतीया को स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना गया है। अक्षय तृतीया के दिन मांगलिक कार्य जैसे-विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार अथवा उद्योग का आरंभ करना अति शुभ फलदायक होता है। सही मायने में अक्षय तृतीया अपने नाम के अनुरूप शुभ फल प्रदान करती है। अक्षय तृतीया पर सूर्य व चंद्रमा अपनी उच्च राशि में रहते हैं। तो आइए जानें 25 बातों से अक्षय तृतीया का महत्व... 1.“न माधव समो मासो न कृतेन युगं समम्। न च वेद समं शास्त्रं न तीर्थ गंगयां समम्।।” वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सत्ययुग के समान कोई युग नहीं हैं, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है। उसी तरह अक्षय तृतीया के समान कोई तिथि नहीं है। 2 .अक्षय तृतीया के विषय में मान्यता है कि इस दिन जो भी काम किया जाता है उसमें बरकत होती है। यानी इस दिन जो भी अच्छा काम करेंगे उसका फल कभी समाप्त नहीं होगा अगर कोई बुरा काम करेंगे तो उस काम का परिणाम भी कई जन्मों तक पीछा नहीं छोड़ेगा। 3. धरती पर भगवान विष्णु ने 24 रूपों में अवतार लिया था। इनमें छठा अवतार भगवान परशुराम का था। पुराणों में उनका जन्म अक्षय तृतीया को हुआ था। 4. इस दिन धरती पर गंगा अवतरित हुई। सतयुग, द्वापर व त्रेतायुग के प्रारंभ की गणना इस दिन से होती है। 5.शास्त्रों की इस मान्यता को वर्तमान में व्यापारिक रूप दे दिया गया है जिसके कारण अक्षय तृतीया के मूल उद्देश्य से हटकर लोग खरीदारी में लगे रहते हैं। वास्तव में यह वस्तु खरीदने का दिन नहीं है। वस्तु की खरीदारी में आपका संचित धन खर्च होता है। 6. नया वाहन लेना या गृह प्रवेश करना, आभूषण खरीदना इत्यादि जैसे कार्यों के लिए तो लोग इस तिथि का विशेष उपयोग करते हैं। मान्यता है कि यह दिन सभी का जीवन में अच्छे भाग्य और सफलता को लाता है। इसलिए लोग जमीन जायदाद संबंधी कार्य, शेयर मार्केट में निवेश रीयल एस्टेट के सौदे या कोई नया बिजनेस शुरू करने जैसे काम भी लोग इसी दिन करने की चाह रखते हैं... 7. वैशाख मास की विशिष्टता इसमें आने वाली अक्षय तृतीया के कारण अक्षुण्ण हो जाती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाए जाने वाले इस पर्व का उल्लेख विष्णु धर्म सूत्र, मत्स्य पुराण, नारदीय पुराण तथा भविष्य पुराण आदि में मिलता है। 8.यह समय अपनी योग्यता को निखारने और अपनी क्षमता को बढ़ाने के लिए उत्तम है। 9. यह मुहूर्त अपने कर्मों को सही दिशा में प्रोत्साहित करने के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। शायद यही मुख्य कारण है कि इस काल को ‘दान’ इत्यादि के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। 10. ‘वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आखातीज के रुप में मनाया जाता है भारतीय जनमानस में यह अक्षय तीज के नाम से प्रसिद्ध है। 11.पुराणों के अनुसार इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान,दान,जप,स्वाध्याय आदि करना शुभ फलदायी माना जाता है इस तिथि में किए गए शुभ कर्म का फल क्षय नहीं होता है इसको सतयुग के आरंभ की तिथि भी माना जाता है इसलिए इसे’कृतयुगादि’ तिथि भी कहते हैं । 12.यदि इसी दिन रविवार हो तो वह सर्वाधिक शुभ और पुण्यदायी होने के साथ-साथ अक्षय प्रभाव रखने वाली भी हो जाती है। 13. मत्स्य पुराण के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन अक्षत पुष्प दीप आदि द्वारा भगवान विष्णु की आराधना करने से विष्णु भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है तथा संतान भी अक्षय बनी रहती है। 14.दीन दुखियों की सेवा करना, वस्त्रादि का दान करना ओर शुभ कर्म की ओर अग्रसर रहते हुए मन वचन व अपने कर्म से अपने मनुष्य धर्म का पालन करना ही अक्षय तृतीया पर्व की सार्थकता है। 15. कलियुग के नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए इस दिन भगवान विष्णु की उपासना करके दान अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से निश्चय ही अगले जन्म में समृद्धि, ऐश्वर्य व सुख की प्राप्ति होती है। 16. भविष्य पुराण के एक प्रसंग के अनुसार शाकल नगर रहने वाले एक वणिक नामक धर्मात्मा अक्षय तृतीया के दिन पूर्ण श्रद्धा भाव से स्नान ध्यान व दान कर्म किया करता था जबकि उसकी पत्नी उसको मना करती थी,मृत्यु बाद किए गए दान पुण्य के प्रभाव से वणिक द्वारकानगरी में सर्वसुख सम्पन्न राजा के रुप में अवतरित हुआ। 17. इस दिन पवित्र नदियों में स्नान कर सामर्थ्य अनुसार जल,अनाज,गन्ना,दही,सत्तू,फल,सुराही,हाथ से बने पंखे वस्त्रादि का दान करना विशेष फल प्रदान करने वाला माना गया है। 18. दान को वैज्ञानिक तर्कों में ऊर्जा के रूपांतरण से जोड़ कर देखा जा सकता है। दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिवर्तित करने के लिए यह दिवस सर्वश्रेष्ठ है। 19. यदि अक्षय तृतीया रोहिणी नक्षत्र को आए तो इस दिवस की महत्ता हजारों गुणा बढ़ जाती है, ऐसी मान्यता है। किसानों में यह लोक विश्वास है कि यदि इस तिथि को चंद्रमा के अस्त होते समय रोहिणी आगे होगी तो फसल के लिए अच्छा होगा और यदि पीछे होगी तो उपज अच्छी नहीं होगी। 20. इस दिन प्राप्त आशीर्वाद बेहद तीव्र फलदायक माने जाते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार इस तिथि की गणना युगादि तिथियों में होती है। सतयुग, त्रेता और कलयुग का आरंभ इसी तिथि को हुआ और इसी तिथि को द्वापर युग समाप्त हुआ था। 21.रेणुका के पुत्र परशुराम और ब्रह्मा के पुत्र अक्षय कुमार का प्राकट्य इसी दिन हुआ था। इस दिन श्वेत पुष्पों से पूजन कल्याणकारी माना जाता है। 22.धन और भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति तथा भौतिक उन्नति के लिए इस दिन का विशेष महत्व है। धन प्राप्ति के मंत्र, अनुष्ठान व उपासना बेहद प्रभावी होते हैं। स्वर्ण, रजत, आभूषण, वस्त्र, वाहन और संपत्ति के क्रय के लिए मान्यताओं ने इस दिन को विशेष बताया और बनाया है। बिना पंचांग देखे इस दिन को श्रेष्ठ मुहुर्तों में शुमार किया जाता है। 23.दान करने से जाने-अनजाने हुए पापों का बोझ हल्का होता है और पुण्य की पूंजी बढ़ती है। अक्षय तृतीया के विषय में कहा गया है कि इस दिन किया गया दान खर्च नहीं होता है, यानी आप जितना दान करते हैं उससे कई गुणा आपके अलौकिक कोष में जमा हो जाता है। 24. मृत्यु के बाद जब अन्य लोक में जाना पड़ता है तब उस धन से दिया गया दान विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है। पुनर्जन्म लेकर जब धरती पर आते हैं तब भी उस कोष में जमा धन के कारण धरती पर भौतिक सुख एवं वैभव प्राप्त होता है। इस दिन स्वर्ण, भूमि, पंखा, जल, सत्तू, जौ, छाता, वस्त्र कुछ भी दान कर सकते हैं। जौ दान करने से स्वर्ण दान का फल प्राप्त होता है। 25. इस तिथि को चारों धामों में से उल्लेखनीय एक धाम भगवान श्री बद्रीनारायण के पट खुलते हैं। अक्षय तृतीया को ही वृंदावन में श्रीबिहारीजी के चरणों के दर्शन वर्ष में एक बार ही होते हैं।

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