श्रीराधारमणाय समर्पणं ।।

श्रीराधारमणाय समर्पणं ।।

श्रीराधारमणाय समर्पणं ।।
.
श्रीजगन्नाथ पुरी से दस कोस दूर पीपलीचटी ग्राम में रघु केवट का घर था।
.
घर में स्त्री और बूढ़ी माता थी। प्रातः जाल लेकर रघु मछलियां पकड़ने जाता और पकड़ी हुई मछलियों को बेचकर परिवार का पालन करता।
.
रघु ने गुरु दीक्षा लेकर गले में तुलसी की कंठी बांध ली थी। प्रातः स्नान करके भगवन्नाम का जप करता था। अब तो उसे मछली पकड़ना भी अच्छा नहीं लगता था।
.
उसने इस काम को छोड़ दिया। कुछ दिन तो संचित अन्न से काम चला , फिर उपवास होने लगा।
.
पेट की ज्वाला तथा माता और स्त्री के तिरस्कार से व्याकुल होकर रघु को फिर जाल उठाना पड़ा।
.
जाल डालने पर एक बड़ी लाल मछली फंस गई और जल से निकालने पर तड़पने लगी।
.
रघु ने दोनों हाथों से मछली का मुख पकड़ा और उसे फाड़ने लगा।
.
सहसा मछली के भीतर से आवाज आई- ‘रक्षा कर, नारायण ! रक्षा कर।’
.
रघु चकित हो गया। उसका हृदय आनंद से भीग गया। मछली को लेकर वह वन की ओर भागा।
.
वहां पर्वत से बहुत से झरने गिरते थे। उन झरनों ने अनेक जलकुंड बना दिए थे। रघु ने एक कुंड में मछली डाल दी।
.
रघु अपनी मां और पत्नी की भूख को भूल गया। वह भरे कंठ से कहने लगा-
.
‘मछली के भीतर से मुझे तुमने ‘नारायण’ नाम सुनाया ? मैं तुम्हारा दर्शन पाए बिना अब यहां से उठूंगा नहीं।’
.
रघु को वहां बैठे-बैठे तीन दिन हो गए। वह ‘नारायण, नारायण’ की रट लगाए था। एक बूंद जल तक उसके मुख में नहीं गया।
.
भगवान एक वृद्ध ब्राह्मण के वेश में वहां आए और पूछने लगे- ‘अरे तपस्वी ! तू कौन है ?’ तू इस निर्जन वन में बैठा क्या कर रहा है?
.
रघु ने ब्राह्मण को प्रणाम करके कहा- ‘महाराज ! मैं कोई भी होऊं, आपको क्या ? बातें करने से मेरे काम में विघ्न पड़ता है। आप जाएं।’
.
ब्राह्मण ने तनिक हंसकर कहा- ‘मैं तो चला जाऊंगा, पर तू सोच कि मछली भी कहीं मनुष्य की बोली बोल सकती है।’
.
रघु ब्राह्मण की बात सुनकर चौंक उठा। उसने समझ लिया कि मछली की बात जानने वाले ये सर्वज्ञ मेरे प्रभु हैं। वह बोला-
.
‘भगवन ! सब जीवों में परमात्मा ही है, यह बात मैं जानता हूं। मैंने जीवों की हत्या की है। क्या इसलिए आप मेरी परीक्षा ले रहे हैं ?
.
आप नारायण हैं। मुझे दर्शन क्यों नहीं देते ? मुझे क्यों तरसा रहे हैं, नाथ।’
.
भक्त की प्रार्थना सुनकर प्रभु दिव्य चतुर्भुजरूप में प्रकट हो गए और वर मांगने को कहा।
.
रघु ने हाथ जोड़कर कहा- ‘प्रभो ! आपके दर्शन हो गए, फिर अब मांगने को क्या रहा, परंतु आपकी आज्ञा है, तो मैं एक छोटी सी वस्तु मांगता हूं।
.
जाति से धीवर हूं। मछली मारना मेरा पैतृक स्वभाव है। मैं यही वरदान मांगता हूं कि मेरा स्वभाव छूट जाए। .
पेट के लिए भी मैं कभी हिंसा न करूं। अंत समय में मेरी जीभ आपका नाम रटती रहे और आपका दर्शन करते हुए मेरे प्राण निकलें।’
.
भगवान ने रघु के मस्तक पर हाथ रख कर ‘तथास्तु’ कहा और अंतर्धान हो गए।
.
वह घर आया, तो गांव के लोगों ने उसे धिक्कारा कि माता और स्त्री को भूखा छोड़कर कहां गया था।
.
दयावश गांव के जमींदार ने उनके लिए अन्न का प्रबंध कर दिया था। इस प्रकार उसका तथा परिवार का पालन- पोषण होने लगा।
.
उसके मुख से जो निकल जाता, वही सत्य हो जाता। बाद में वह घर छोड़कर निर्जन वन में रहने लगा और चौबीसों घंटे प्रभु भजन में ही बिताने लगा।
.
एक दिन रघु को लगा कि मानो नीलांचलनाथ श्रीजगन्नाथ जी उनसे भोजन मांग रहे हैं।
.
भोजन-सामग्री लेकर रघु ने कुटिया का द्वार बंद कर लिया। भक्त के बुलाते ही भाव के भूखे श्रीजगन्नाथ जी प्रकट हो गए और रघु के हाथ से भोजन करने लगे।
.
उधर, उसी समय नीलांचल में श्रीजगन्नाथ जी के भोग-मंडप में पुजारी ने नाना प्रकार के पकवान सजाए।
.
भोग-मंडप में एक दर्पण लगा है, उस दर्पण में श्रीजगन्नाथ जी के श्री विग्रह का जो प्रतिबिंब पड़ता है, उसी को नैवेद्य चढ़ाया जाता है।
.
सब सामग्री आ जाने पर पुजारी जब भोग लगाने लगा, तब उसने देखा कि दर्पण में प्रति बिंब तो है ही नहीं, घबरा कर वह राजा के पास जाकर बोला-
.
‘महाराज ! नैवेद्य में कुछ दोष होना चाहिए। श्रीजगन्नाथ स्वामी उसे स्वीकार नहीं कर रहे हैं। अब क्या किया जाए।’
.
राजा ने भी देखा कि दर्पण में प्रभु का प्रतिबिंब नहीं पड़ रहा है। राजा को बड़ा दुख हुआ। वे कहने लगे मुझसे कोई अपराध हुआ हो, तो प्रायश्चित करने को मैं तैयार हूं।’
.
राजा प्रार्थना करते हुए दुखी होकर भगवान के गरुड़ध्वज के पास जाकर भूमि पर लेट गए। लेटते ही उन्हें नींद आ गई। उन्होंने स्वप्न में देखा कि प्रभु कह रहे हैं-
.
‘राजा ! तेरा कोई अपराध नहीं। तू दुखी मत हो। मैं नीलांचल में था ही नहीं, तो प्रतिबिंब कैसे पड़ता।
.
मैं तो इस समय पीपलीचटी ग्राम में अपने भक्त रघु केवट की झोपड़ी में बैठा उसके हाथ से भोजन कर रहा हूं।
.
वह जब तक नहीं छोड़ता, मैं यहां आकर तेरा नैवेद्य कैसे स्वीकार कर सकता हूं।
.
यदि तू मुझे यहां बुलाना चाहता है, तो मेरे उस भक्त को उसकी माता तथा स्त्री के साथ यहां ले आ। यहीं उनके रहने की व्यवस्था कर।’
.
राजा की तंद्रा भंग हुई, तो वे पीपलीचटी पहुंचे। पूछकर रघु केवट की झोपड़ी का पता लगाया।
.
जब कई बार पुकारने पर भी द्वार न खुला, तब द्वार बल लगाकर उन्होंने स्वयं खोला।
.
कुटिया का दृश्य देखकर वे मूर्तिवत् हो गए। रघु, के हाथ में अन्न का ग्रास दिखाई देता है, पर ग्रास लेने वाला मुख नहीं दिखता। सहसा प्रभु अंतर्धान हो गए।
.
तभी राजा को देख उसने उठकर राजा को प्रणाम किया। श्रीजगन्नाथ जी की आज्ञा सुन कर रघु ने नीलांचल चलना स्वीकार कर लिया। माता तथा पत्नी के साथ वे पुरी आए।
.
तब भोग मंडप के दर्पण में श्रीजगन्नाथ जी का प्रतिबिंब दिखाई पड़ा।
.
पुरी के राजा ने श्रीजगन्नाथ जी के मंदिर से दक्षिण ओर रघु के लिए घर की व्यवस्था कर दी।
.
रघु अपनी माता और स्त्री के साथ भजन करते हुए जीवन पर्यन्त वहीं रहे।

+154 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 100 शेयर

कामेंट्स

Sanjay Oct 24, 2020

+25 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 30 शेयर
Sonam didi Oct 24, 2020

* अहंकार, लोभ, लालच और अत्याचारी वृत्तियों को त्याग कर जीवन जीने की सीख देता हैं दशहरा पर्व    विजयादशमी (दशहरा) हमारा राष्ट्रीय पर्व है..., जिसे सभी भार‍तीय बड़े हर्षोल्लास एवं गर्व के साथ मनाते हैं। आश्विन मास में नवरात्रि का समापन होने के दूसरे दिन यानी दशमी तिथि को मनाया जाने वाला दशहरे का यह पर्व बहुत ही शुभ माना जाता है। इस दिन खास कर खरीददारी करना शुभ मानते है, जिसमें सोना, चांदी और वाहन की खरीदी बहुत ही महत्वपूर्ण है।    दशहरे पर पूरे दिन भर ही मुहूर्त होते है इसलिए सारे बड़े काम आसानी से संपन्न किए जा सकते हैं। यह एक ऐसा मुहूर्त वाला दिन है जिस दिन बिना मुहूर्त देखे आप किसी भी नए काम की शुरुआत कर सकते हैं। दशहरा_पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ... 🙏आप सभी भाईया बहनो को ।🙏

+7 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 4 शेयर
Sanjay Oct 24, 2020

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 1 शेयर

ढाई अक्षर प्रेम के पढ़ें सो पंडित होय,, ढाई अक्षर ढाई अक्षर का वक्र, और ढाई अक्षर का तुण्ड, ढाई अक्षर की रिद्धि, और ढाई अक्षर की सिद्धि, ढाई अक्षर का शम्भु, और ढाई अक्षर की सत्ती, ढाई अक्षर के ब्रह्मा और ढाई अक्षर की सृष्टि, ढाई अक्षर के विष्णु और ढाई अक्षर की लक्ष्मी, ढाई अक्षर के कृष्ण और ढाई अक्षर की कान्ता (राधा रानी का दूसरा नाम) ढाई अक्षर की दुर्गा और ढाई अक्षर की शक्ति, ढाई अक्षर की श्रद्धा और ढाई अक्षर की भक्ति, ढाई अक्षर का त्याग और ढाई अक्षर का ध्यान, ढाई अक्षर की तुष्टि और ढाई अक्षर की इच्छा, ढाई अक्षर का धर्म और ढाई अक्षर का कर्म, ढाई अक्षर का भाग्य और ढाई अक्षर की व्यथा, ढाई अक्षर का ग्रन्थ, और ढाई अक्षर का सन्त, ढाई अक्षर का शब्द और ढाई अक्षर का अर्थ, ढाई अक्षर का सत्य और ढाई अक्षर की मिथ्या, ढाई अक्षर की श्रुति और ढाई अक्षर की ध्वनि, ढाई अक्षर की अग्नि और ढाई अक्षर का कुण्ड, ढाई अक्षर का मन्त्र और ढाई अक्षर का यन्त्र, ढाई अक्षर की श्वांस और ढाई अक्षर के प्राण, ढाई अक्षर का जन्म ढाई अक्षर की मृत्यु, ढाई अक्षर की अस्थि और ढाई अक्षर की अर्थी, ढाई अक्षर का प्यार और ढाई अक्षर का युद्ध, ढाई अक्षर का मित्र और ढाई अक्षर का शत्रु, ढाई अक्षर का प्रेम और ढाई अक्षर की घृणा, जन्म से लेकर मृत्यु तक हम बंधे हैं ढाई अक्षर में, हैं ढाई अक्षर ही वक़्त में, और ढाई अक्षर ही अन्त में, समझ न पाया कोई भी है रहस्य क्या ढाई अक्षर में, ( अज्ञात ) हर हर महादेव जय शिव शंकर

+11 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 26 शेयर
isha Anshwal Oct 24, 2020

+34 प्रतिक्रिया 17 कॉमेंट्स • 43 शेयर
Satyendra Kumar Oct 24, 2020

+32 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 31 शेयर
Aryan Phulwani Oct 24, 2020

+10 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 18 शेयर
cash Oct 23, 2020

+18 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 23 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB