Shyam Yadav
Shyam Yadav Feb 26, 2021

🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞 🌹👣🌹 || गुरुभक्तियोग कथा अमृत || 🙏 26/02/2021 *◆तीस्य की बात सुन बुद्ध प्रसन्न हुये व दूसरी ओर सारे शिष्य रो पड़े… क्यों सुने…◆* नम्रतापूर्वक, स्वेच्छापूर्वक , संशयरहित होकर बाह्य आडंबर के बिना द्वेषरहित बनकर असीम प्रेम से अपने गुरु की सेवा करो। पृथ्वीपर के साक्षात ईश्वरस्वरूप गुरु के चरणकमलों में आत्मसमर्पण करोगे तो वे भय स्थानों से आपका रक्षण करेंगे। आपकी साधना में आपको प्रेरणा देंगे तथा अंतिम ध्येय तक आपके पथप्रदर्शक बनेंगे। संध्या की बेला थी। सूर्यास्त को जा रहे थे। अभी 3 दिन पहले ही तो वैशाली के आम्रवन में बुद्ध ने अपने सभी भिक्षुकों और अनुयायियों की सभा बुलाई थी। उसमें अपने अस्तागमन के संकेत दिये थे। प्रवचन करते-करते वे सहसा कह बैठे कि "मेरे प्रज्वलित दीपों! सावधान! आज से ठीक 4 माह बाद मैं महानिर्वाण के शून्य में लीन हो जाऊंगा। अपनी यह देह त्याग दूंगा। इसलिए अब समय की थोड़ी बहुत बालू ही तुम्हारी मुट्ठी में बची है। इसलिए जो करने योग्य है वह करलो, जो लेना-देना है वह निपटालो।" इतना कहकर वह उठे थे और अपनी कुटीर की ओर बढ़ गये थे। बस तभी से संघ में शाम ढल आई। सभी को घोर अमावस की मानो रात्रि ने घेर लिया। गुरुवर अब नहीं आयेंगे…? हम उपदेश देते हुए अब उन्हें नहीं सुन सकेंगे…? ऐसे कई प्रश्न उठने लगे। क्या उन्हें चलते-फिरते, कहते-सुनते, हंसते-मुस्कुराते हम नहीं देख पायेंगे…? उनकी प्यारी-सी मीठी मुस्कान, उनकी दिव्य वाणी, उनका ओजस्वी और प्यारे से भी प्यारा मुखमंडल…क्या सच में…यह सब नहीं होगा? उनके युगलचरण जिन पर मस्तक तक रखकर वैकुंठ की चाह भी नहीं रहती थी, जिनके चरणरज में लोटने की आदत हमको पड़ चुकी है… क्या वे अब…? और जो कृपाहस्त जो आशीर्वाद देने के लिए उठते हैं तो संघ झूम उठता है, हजारों झोलियां पसर जाती है… क्या वे भी…? आज गुरुवर हल्का सा भी मुस्कुरा देते हैं तो सभी भक्तों की कलियां मुस्कुराकर फूल बन जाती है। वे गंभीर हो जाते हैं तो हमारी धड़कनें बढ़ने लगती हैं, हम अपने कर्मों को टटोलने लगते हैं की हमने क्या कर्म किये की गुरुदेव गंभीर हो गये। वे गति से चलने लगते हैं तो हमारे हौसले हवा से बातें करने लगती हैं; परन्तु क्या अब हमारा यह सारा संसार खो जायेगा…? सचमें एक सच्चे शिष्य के लिए गुरु ही उसके समस्त संसार होते हैं। *हम जाने गुरुवर, या तुम जानो,* *हमें तुमसे है कितना प्यार!* *तुमही जिगर में, तुमही नजर में,* *तुमही मेरा संसार!* सोचो जिनसे जीवन की हर आशा बंध चुकी हो, हर श्वास की तार जुड़ गई हो, जिनका दर्शन करने का आँखों को चस्का लग बैठा हो और आँखों की पलकें भी मुड़ती इसी खुशी में हो कि स्वप्न में आज गुरुवर आयेंगे और वहीं गुरुदेव अपने अलौकिक रूप को सदा-सदा के लिए छिपाने की बात कहें… बुद्ध के शिष्य भी साँसों में यहीं खींच महसूस कर रहे थे। हालांकि दर्द सबका साझा था, सबकी एक जैसी नब्ज दुख रही थी, मगर कराहट बड़ी अलग-अलग उठी। कोई तो रो- रोकर अधमरा-सा हो रहा था। तब तक रोता जबतक जमीन पकड़कर न गिर जाता। कुछ अनुयायी सिर जोड़कर झुंड बनाकर बैठ जाते, फिर आंसू बहाते। कई सयाने शिष्य तो राजनैतिक चिंताये भी उन्हें कचोटने लगती थी। यह की अब आश्रम और संघ की बागडौर कौन संभालेगा? बुद्ध के पदपर कौन बैठेगा? अवश्य ही बुद्ध के नामपर भव्य मंदिर या स्मारक बनने चाहिए। अभी से चंदा इकठ्ठा कर लेना चाहिए। शिष्यों का एक वर्ग और भी था बड़ा ही अद्भुत! बुद्ध की अलौकिक देह अब हमारे बीच नहीं होगी। यहीं सोचकर वे बावरे से हो गये। खड़ाऊ, चोले, भोजनपात्र, कुश आसन के लिए आपाधापी मचा दी। जिस-जिस वस्तु को गुरुवर ने स्पर्श किया था, वे खींचातानी करके उसे बटौरने में लगे, यादगार, निशानियों के तौर पर। बुद्ध अपने शिष्यों की यह रंगारंग लीला देख रहे थे। उनकी पारदर्शी आंखे हृदय के कोने-कोने में झांक रही थी। परन्तु इनकी भीड़भाड़ के बीच एक हृदय और भी था, जिससे वे आशा बंधी दृष्टि से निहार रहे थे। यह हृदय था उनके शिष्य तीस्य स्थविर का। तीस्य नितांत मौन था। उसके होंठ सील चुके थे। आँखों से एक भी आंसू ना टपका था। ना हँसता था, ना रोता था, तल्लीन खोया-खोया सा। सभी ने सोचा कि उसे गहरा सदमा लगा है। दो महीनों का सफर तय हो चुका था। अचानक एक दिन गुरुदेव ने फिर एक महासभा बुलाई। जिसमें शामिल होने के लिए शिष्यों का पूरा हुजूम दौड़ पड़ा। बुद्ध आम्रवृक्ष के घनी छाया के तले बैठे। ऊपर शाखाओं पर कच्चे, अधपके और पके हर तरह के आम झूल रहे थे। नीचे महात्मा बुद्ध के सामने भी हर अवस्था के अनुयायी बैठे थे। बुद्ध ने इस विशाल शिष्यसमूह पर दृष्टि घुमाई। गुरु की दृष्टि बहुत गहरी होती है। पारलौकिक दृष्टि होती है। मानो गहराई तक हृदय का मंथन कर रही थी। आखिरकार बुद्ध बोले की मैंने तुमसे कहा था कि जो करनेयोग्य है वो करो। कहो तुम सब क्या-क्या कर रहे हो? एक दल झट खड़ा हुआ। बोला– "गुरुदेव! हम सब विषाद की खाइयों में खो गये हैं। झुंड बनाकर रो रहे हैं, आप के प्यार में खूब आंसू बटौर रहे हैं।" बुद्ध की दृष्टि दूसरे दल पर गई। शिष्यों ने कहा– "प्यारे गुरुवर! हम सब चिंता की सिंधु में डूब गये हैं। झुंड बनाकर आश्रम की सुचारू व्यवस्था के बारे में सोचते हैं। फिर आपके ऐतिहासिक स्वर्णजड़ित स्मारक भी तो बनवाने हैं। इसलिए हम चिंता और चंदा दोनों बटोर रहे हैं।" बुद्ध ने तीसरे दल की ओर निहारा। वे तो अपनी झोलियों में अपनी उपलब्धियां लिये बैठे थे। किसीने बुद्ध को उनका ही करमण्डल उठाकर दिखा दिया। किसी ने जीवर,किसी ने खड़ाऊ। वो बोले देखे गुरुदेव! हम कितने जतन से आपकी पवित्रतम चीजों को इकट्ठा कर रहे हैं। अंत में बुद्ध की सर्वव्यापक दृष्टि ने तीस्य का स्पर्श किया। "बोलो वत्स! तुम क्या बटोर रहे हो?" यह पूछते हुये बुद्ध की आंखों में आशाएँ झिलमिला उठी। प्रश्न सुनकर तीस्य उठा। बुद्ध के श्रीचरणों में अपना मस्तक रख दिया कुछ देर उन्हीमें लीन रहा फिर हाथ जोड़कर सीधा खड़ा होकर कहा, "गुरुदेव! मैं खुद को खो रहा हूँ और आपको बटौरने की कोशिश कर रहा हूँ।" यह सुनते ही सभा के कान खड़े हो गये। बुद्ध ने कहा- "तीस्य! अपनी भावदशा को शब्दों का सहारा दो।" यह सभी समझना चाहते हैं। तीस्य ने आगे कहा कि "गुरुदेव! जब आपसे सुना कि आप चार माह बाद समाधिस्थ हो जायेंगे। उसी दिन मैंने अपने अंदर झाँका। अपने को बिल्कुल कंगाल पाया। मैं बाहर ही नहीं भीतर भी भिक्षुक ही था। वहाँ आप तो कहीं थे ही नहीं। मेरी ही मान्यतायें थी। मेरी आत्मा धिक्कार उठी कि तेरे गुरुदेव जानेवाले हैं और तूने अबतक गुरु को पाया ही नहीं। बस तभी से मैंने अपना सारा चिंतन आपके एक-एक आदर्श को चुनने और गुनने में लगा दिया। अपना सारा ध्यान आपकी प्यारी मूरत में बसा दिया। अपने सारे भावों के धागे आपके चरणों में बांध दिये। हर श्वास की माला में आपके सुमिरन के मोती गूथ दिये यहीं व्रत लिया की अब ज्यादा हिलू-डुलूँगा नहीं, बोलूंगा नहीं। सारा बल आपको बटोरने में लगा दूंगा। हे दयानिधि! कृपा करो मेरा व्रत पूरा हो। आपके देहत्याग के पहले यह तीस्य विदा हो जाये। उसकी देह में आप समा जाये। बस आप ही आप रह जाये।" तीस्य कि आखिरी पंक्ति के साथ ही आम्रवृक्ष से एक पका हुआ आम नीचे गिरा। बुद्ध उसे देखकर मुस्कुराये और बोल उठे,"यह आम पक चुका है। इसने सार को अपने में समेट लिया है। सूर्य के अस्त होने के बाद भी यह आम मीठे रस से भरा ही रहेगा। तीस्य के लिए मैं जाकर भी नहीं जाऊँगा। तीस्य के लिए मैं सदैव उसके पास रहूंगा।" अबतक महासभा आंसूओं से भीग चुकी थी, लज्जा से लाल थी। उनकी दशा देखकर डालियों पर झूलती कच्ची अंबियों ने मानो बुद्ध से पूछा कि "हे भुवनभास्कर! हे ब्रम्हांड के सूर्य आप अपनी किरणों को समेट रहे हैं, परन्तु हम तो कच्ची ही रह गई। अब हमारा क्या होगा?" बुद्ध फिर मुस्कुराये और बोले, "अगले दिन मैं प्रभात लेकर फिर आऊँगा एक अलग रूप में ताकि तुम्हें सींककर मीठे रस से भर पाऊं। तुम्हें सीखा सकूं कि गुरु के रहते-रहते क्या बटोरना चाहिए…" 🌿🙏👣🙏🌿🌿🙏👣🙏🌿🙏

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           || गुरुभक्तियोग कथा अमृत ||
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26/02/2021

*◆तीस्य की बात सुन बुद्ध प्रसन्न हुये व दूसरी ओर सारे  शिष्य रो पड़े… क्यों सुने…◆*



 नम्रतापूर्वक, स्वेच्छापूर्वक , संशयरहित होकर बाह्य आडंबर के बिना द्वेषरहित बनकर असीम प्रेम से अपने गुरु की सेवा करो। पृथ्वीपर के साक्षात ईश्वरस्वरूप गुरु के चरणकमलों में आत्मसमर्पण करोगे तो वे भय स्थानों से आपका रक्षण करेंगे। आपकी साधना में आपको प्रेरणा देंगे तथा अंतिम ध्येय तक आपके पथप्रदर्शक बनेंगे।

संध्या की बेला थी। सूर्यास्त को जा रहे थे। अभी 3 दिन पहले ही तो वैशाली के आम्रवन में बुद्ध ने अपने सभी भिक्षुकों और अनुयायियों की सभा बुलाई थी। उसमें अपने अस्तागमन के संकेत दिये थे। प्रवचन करते-करते वे सहसा कह बैठे कि "मेरे प्रज्वलित दीपों! सावधान! आज से ठीक 4 माह बाद मैं महानिर्वाण के शून्य में लीन हो जाऊंगा। अपनी यह देह त्याग दूंगा। इसलिए अब समय की थोड़ी बहुत बालू ही तुम्हारी मुट्ठी में बची है। इसलिए जो करने योग्य है वह करलो, जो लेना-देना है वह निपटालो।" 

इतना कहकर वह उठे थे और अपनी कुटीर की ओर बढ़ गये थे। बस तभी से संघ में शाम ढल आई। सभी को घोर अमावस की मानो रात्रि ने घेर लिया। गुरुवर अब नहीं आयेंगे…? हम उपदेश देते हुए अब उन्हें नहीं सुन सकेंगे…? ऐसे कई प्रश्न उठने लगे। क्या उन्हें चलते-फिरते, कहते-सुनते, हंसते-मुस्कुराते हम नहीं देख पायेंगे…? उनकी प्यारी-सी मीठी मुस्कान, उनकी दिव्य वाणी, उनका ओजस्वी और प्यारे से भी प्यारा मुखमंडल…क्या सच में…यह सब नहीं होगा? उनके युगलचरण जिन पर मस्तक तक रखकर वैकुंठ की चाह भी नहीं रहती थी, जिनके चरणरज में लोटने की आदत हमको पड़ चुकी है… क्या वे अब…? और जो कृपाहस्त जो आशीर्वाद देने के लिए उठते हैं तो संघ झूम उठता है, हजारों झोलियां पसर जाती है… क्या वे भी…? आज गुरुवर हल्का सा भी मुस्कुरा देते हैं तो सभी भक्तों की कलियां मुस्कुराकर फूल बन जाती है। वे गंभीर हो जाते हैं तो हमारी धड़कनें बढ़ने लगती हैं, हम अपने कर्मों को टटोलने लगते हैं की हमने क्या कर्म किये की गुरुदेव गंभीर हो गये। वे गति से चलने लगते हैं तो हमारे हौसले हवा से बातें करने लगती हैं; परन्तु क्या अब हमारा यह सारा संसार खो जायेगा…?
 
सचमें एक सच्चे शिष्य के लिए गुरु ही उसके समस्त संसार होते हैं। 

*हम जाने गुरुवर, या तुम जानो,*
*हमें तुमसे है कितना प्यार!*
*तुमही जिगर में, तुमही नजर में,*
*तुमही मेरा संसार!*

सोचो जिनसे जीवन की हर आशा बंध चुकी हो, हर श्वास की तार जुड़ गई हो, जिनका दर्शन करने का आँखों को चस्का लग बैठा हो और आँखों की पलकें भी मुड़ती इसी खुशी में हो कि स्वप्न में आज गुरुवर आयेंगे और वहीं गुरुदेव अपने अलौकिक रूप को सदा-सदा के लिए छिपाने की बात कहें…

बुद्ध के शिष्य भी साँसों में यहीं खींच महसूस कर रहे थे। हालांकि दर्द सबका साझा था, सबकी एक जैसी नब्ज दुख रही थी, मगर कराहट बड़ी अलग-अलग उठी। कोई तो रो- रोकर अधमरा-सा हो रहा था। तब तक रोता जबतक जमीन पकड़कर न गिर जाता। कुछ अनुयायी सिर जोड़कर झुंड बनाकर बैठ जाते, फिर आंसू बहाते। कई सयाने शिष्य तो राजनैतिक चिंताये भी उन्हें कचोटने लगती थी। यह की अब आश्रम और संघ की बागडौर कौन संभालेगा? बुद्ध के पदपर कौन बैठेगा? अवश्य ही बुद्ध के नामपर भव्य मंदिर या स्मारक बनने चाहिए। अभी से चंदा इकठ्ठा कर लेना चाहिए।

शिष्यों का एक वर्ग और भी था बड़ा ही अद्भुत! बुद्ध की अलौकिक देह अब हमारे बीच नहीं होगी। यहीं सोचकर वे बावरे से हो गये। खड़ाऊ, चोले, भोजनपात्र, कुश आसन के लिए आपाधापी मचा दी। जिस-जिस वस्तु को गुरुवर ने स्पर्श किया था, वे खींचातानी करके उसे बटौरने में लगे, यादगार, निशानियों के तौर पर।

बुद्ध अपने शिष्यों की यह रंगारंग लीला देख रहे थे। उनकी पारदर्शी आंखे हृदय के कोने-कोने में झांक रही थी। परन्तु इनकी भीड़भाड़ के बीच एक हृदय और भी था, जिससे वे आशा बंधी दृष्टि से निहार रहे थे। यह हृदय था उनके शिष्य तीस्य स्थविर का। तीस्य नितांत मौन था। उसके होंठ सील चुके थे। आँखों से एक भी आंसू ना टपका था। ना हँसता था, ना रोता था, तल्लीन खोया-खोया सा। सभी ने सोचा कि उसे गहरा सदमा लगा है। 

दो महीनों का सफर तय हो चुका था। अचानक एक दिन गुरुदेव ने फिर एक महासभा बुलाई। जिसमें शामिल होने के लिए शिष्यों का पूरा हुजूम दौड़ पड़ा। बुद्ध आम्रवृक्ष के घनी छाया के तले बैठे। ऊपर शाखाओं पर कच्चे, अधपके और पके हर तरह के आम झूल रहे थे। नीचे महात्मा बुद्ध के सामने भी हर अवस्था के अनुयायी बैठे थे। बुद्ध ने इस विशाल शिष्यसमूह पर दृष्टि घुमाई। गुरु की दृष्टि बहुत गहरी होती है। पारलौकिक दृष्टि होती है। मानो गहराई तक हृदय का मंथन कर रही थी। आखिरकार बुद्ध बोले की मैंने तुमसे कहा था कि जो करनेयोग्य है वो करो। कहो तुम सब क्या-क्या कर रहे हो?

एक दल झट खड़ा हुआ। बोला– "गुरुदेव! हम सब विषाद की खाइयों में खो गये हैं। झुंड बनाकर रो रहे हैं, आप के प्यार में खूब आंसू बटौर रहे हैं।"

बुद्ध की दृष्टि दूसरे दल पर गई। शिष्यों ने कहा– "प्यारे गुरुवर! हम सब चिंता की सिंधु में डूब गये हैं। झुंड बनाकर आश्रम की सुचारू व्यवस्था के बारे में सोचते हैं। फिर आपके ऐतिहासिक स्वर्णजड़ित स्मारक भी तो बनवाने हैं। इसलिए हम चिंता और चंदा दोनों बटोर रहे हैं।"

बुद्ध ने तीसरे दल की ओर निहारा। वे तो अपनी झोलियों में अपनी उपलब्धियां लिये बैठे थे। किसीने बुद्ध को उनका ही करमण्डल उठाकर दिखा दिया। किसी ने जीवर,किसी ने खड़ाऊ। वो बोले देखे गुरुदेव! हम कितने जतन से आपकी पवित्रतम चीजों को इकट्ठा कर रहे हैं।

अंत में बुद्ध की सर्वव्यापक दृष्टि ने तीस्य का स्पर्श किया। "बोलो वत्स! तुम क्या बटोर रहे हो?" यह पूछते हुये बुद्ध की आंखों में आशाएँ झिलमिला उठी।

प्रश्न सुनकर तीस्य उठा। बुद्ध के श्रीचरणों में अपना मस्तक रख दिया कुछ देर उन्हीमें लीन रहा फिर हाथ जोड़कर सीधा खड़ा होकर कहा, "गुरुदेव! मैं खुद को खो रहा हूँ और आपको बटौरने की कोशिश कर रहा हूँ।" यह सुनते ही सभा के कान खड़े हो गये। 

बुद्ध ने कहा- "तीस्य! अपनी भावदशा को शब्दों का सहारा दो।" यह सभी समझना चाहते हैं।

 तीस्य ने आगे कहा कि "गुरुदेव! जब आपसे सुना कि आप चार माह बाद समाधिस्थ हो जायेंगे। उसी दिन मैंने अपने अंदर झाँका। अपने को बिल्कुल कंगाल पाया। मैं बाहर ही नहीं भीतर भी भिक्षुक ही था। वहाँ आप तो कहीं थे ही नहीं। मेरी ही मान्यतायें थी। मेरी आत्मा धिक्कार उठी कि तेरे गुरुदेव जानेवाले हैं और तूने अबतक गुरु को पाया ही नहीं। बस तभी से मैंने अपना सारा चिंतन आपके एक-एक आदर्श को चुनने और गुनने में लगा दिया। अपना सारा ध्यान आपकी प्यारी मूरत में बसा दिया। अपने सारे भावों के धागे आपके चरणों में बांध दिये। हर श्वास की माला में आपके सुमिरन के मोती गूथ दिये यहीं व्रत लिया की अब ज्यादा हिलू-डुलूँगा नहीं, बोलूंगा नहीं। सारा बल आपको बटोरने में लगा दूंगा। हे दयानिधि! कृपा करो मेरा व्रत पूरा हो। आपके देहत्याग के पहले यह तीस्य विदा हो जाये। उसकी देह में आप समा जाये। बस आप ही आप रह जाये।"

तीस्य कि आखिरी पंक्ति के साथ ही आम्रवृक्ष से एक पका हुआ आम नीचे गिरा। बुद्ध उसे देखकर मुस्कुराये और बोल उठे,"यह आम पक चुका है। इसने सार को अपने में समेट लिया है। सूर्य के अस्त होने के बाद भी यह आम मीठे रस से भरा ही रहेगा। तीस्य के लिए मैं जाकर भी नहीं जाऊँगा। तीस्य के लिए मैं सदैव उसके पास रहूंगा।"

अबतक महासभा आंसूओं से भीग चुकी थी, लज्जा से लाल थी। उनकी दशा देखकर डालियों पर झूलती कच्ची अंबियों ने मानो बुद्ध से पूछा कि "हे भुवनभास्कर! हे ब्रम्हांड के सूर्य आप अपनी किरणों को समेट रहे हैं, परन्तु हम तो कच्ची ही रह गई। अब हमारा क्या होगा?" 

बुद्ध फिर मुस्कुराये और बोले, "अगले दिन मैं प्रभात लेकर फिर आऊँगा एक अलग रूप में ताकि तुम्हें सींककर मीठे रस से भर पाऊं। तुम्हें सीखा सकूं कि गुरु के रहते-रहते क्या बटोरना चाहिए…"

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Shyam Yadav Apr 11, 2021

🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞 🌹👣🌹 || *गुरुभक्तियोग कथा अमृत* || 🙏 10/04/2021 🌷 *आचार्य शंकर और कपालियो का प्रसंग....(भाग- 2)* 🌷 गुरूभक्तियोगामृत परमसुख, मुक्ति, संपूर्णता, शाश्वत आनंद और चिरंतन शांति प्रदान करता है। गुरुभक्तियोग का अभ्यास सांसारिक पदार्थों के प्रति निष्क्रियता और वैराग्य उत्पन्न करता है तथा तृष्णा का छेदन करता है एवं कैवल्य मोक्ष देता है। गुरुभक्तियोग का अभ्यास भावनाओं एवं तृष्णाओं पर विजय पाने में शिष्य को सहायरूप बनता है। प्रलोभनों के साथ टक्कर लेने में तथा मन को क्षुब्ध करनेवाले तत्वों का नाश करने में सहाय करता है। अंधकार को पार करके प्रकाश की ओर ले जाने वाली गुरुकृपा प्राप्त करने के लिए शिष्य को योग्य बनाता है । गुरुभक्तियोग का अभ्यास आपको भय, अज्ञान, निराशा, संशय, रोग चिंता आदि से मुक्त होने के लिए शक्तिमान बनाता है और मोक्ष, परम शांति और शाश्वत आनंद प्रदान करता है। गुरुभक्तियोग का अर्थ व व्यक्तिगत भावनाओं, इच्छाओं, समझ, बुद्धि एवं निश्चयात्मक बुद्धि के परिवर्तन द्वारा अहोभाव को अनंत चेतनास्वरूप में परिणित करना। गुरुभक्तियोग गुरुकृपा के द्वारा प्राप्त सचोट, सुंदर अनुशासन का मार्ग है। कर्मयोग, भक्तियोग, हठयोग, राजयोग आदि सब योगों की नींव गुरुभक्तियोग है। गुरुभक्तियोग का अभ्यास जीवन के परम ध्येय की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है। कल हमने सुना… राजा सुधनवा द्वारा अपमानित कपालिक क्रकच कुल्हाड़ी नचाते हुए बड़े जोरों से चिल्लाया कि, "हे दुष्टों! यदि तुम्हारे सिरों को काटकर छिन्न-भिन्न न कर दूं, तो मेरा नाम क्रकच नहीं!" इतना कहकर वह वहां से चला गया। थोड़ी ही देर बाद क्रकच ने यतिराज शंकर का विनाश करने के लिए एक विशाल वाहिनी भेजी। वे सब क्रोध में उन्मत्त थे। समुद्र की भांति गर्जन-तर्जन कर रहे थे और विविध प्रकार के हथियारों से लैश थे। उनके भैरवाकार रूप को देखकर आचार्य शंकर के सभी शिष्य और भक्त भयभीत हो गए। राजा सुधनवा कवच पहनकर रथ में सवार हुए। उन्होंने हाथ में धनुषबाण लेकर कपालिकों का संहार करना शुरू किया। यह संग्राम चल ही रहा था कि क्रकच ने एक विशाल वाहिनी पीछे की ओर से और भेज दी। क्रकच का मंतव्य था कि पीछे की ओर से आचार्य शंकर के शिष्यों और भक्तों को घेरकर मार डाला जाए। सामने की ओर राजा सुधनवा युद्ध कर रहे हैं और पीछे की ओर से अचानक आक्रमण हुआ कपालिकों द्वारा! शिष्य और भक्तगण अत्यधिक भयार्थ होकर अपने गुरुदेव आचार्य शंकर की शरण में पहुंचे। बड़ी ही विचित्र घटना है कि आचार्य शंकर एक यति हैं, संन्यासी हैं। ना ही उन्होंने कोई युद्ध कला सीखी है और ना ही उनके पास कोई आयुध है फिर भी समस्त शिष्यगण अपने गुरुदेव के पास आ गए, उनकी शरण में आ गए। ऐसे महापुरुष कभी-कभी तो स्वयं पर आए हुए आघातों को बड़ी ही प्रसन्नता से सह लेते हैं; परंतु शरणागतों पर किये हुए आघातों को यह महापुरुष कदापि सहन नहीं करते। कपालिक तलवार, तोमर, पट्टीश, त्रिशूल आदि से शंकर के भक्तों का संहार करने आए थे। वे बार-बार भीषण अट्टहास कर रहे थे। कपालिकों की सेना जो आचार्य के समक्ष खड़ी हुई थी। कहते हैं कि वह आचार्य के तेज से जलकर भस्म हो गई! परंतु यह शाब्दिक अर्थ है, शाब्दिक कहावत है। इसका अभिप्राय यह है कि आचार्य के ब्रह्मतेज में सभी के वैर वृत्तियां या वैरभाव नष्ट हो गए और वे सभी आचार्य की ओर एकटक निहारते ही रह गए। मानो दुर्भाव जलकर भस्म हो गया हो और उनका तन-मन शुद्ध हो गया। ऐसा ब्रह्मतेज! राजा सुधनवा ने भी स्वर्णपंख वाले तीक्ष्ण बाणों से अगणित कपालिकों के सिर काटे। यहां पर राजा सुधनवा के पास गुरुदेव का बल था। गुरुदेव का बल जिसके साथ होता है उसके समक्ष सब बल स्वयं को निर्बल महसूस करते हैं। इसलिए वेद मंत्र है *ब्रह्म बलं ही बलं!* उन्होंने विपक्षियों के सहस्त्र समुदाय मस्तकरूपी कमलों से रणभूमि को अलंकृत किया। फिर प्रसन्न मन से वे मुनींद्र शंकर के समक्ष उपस्थित हुए। अपने अनुयायियों को मृतक और कुछ अनुयायियों को आचार्य शंकर के समक्ष निष्क्रिय खड़ा देखकर और आचार्य शंकर के शिष्यों और भक्तों को सुरक्षित देखकर क्रकच क्रोध से आगबबूला हो गया! उसी अवस्था में वह यतिंद्र शंकर के समक्ष उपस्थित होकर कहने लगा कि "हे नास्तिक! अब मेरी शक्ति का प्रभाव देखो। तुमने जो दुष्कर्म किए हैं उनका फल भोगो। इतना कहकर वह हाथ में मनुष्य की खोपड़ी लेकर, आंख मूंदकर ध्यान मुद्रा में खड़ा हो गया। वह भैरवतंत्र का प्रकांड पंडित था ।उसकी इस क्रिया के प्रभाव से रिक्त खोपड़ी मदिरा से भर गई। उसने वह मदिरा आधी पी ली और वह पुनः ध्यान मुद्रा में स्थित हो गया। इतने ही में क्रकच के सन्मुख नरमुंडो की माला पहने, हाथ में त्रिशूल लिए, विकट अट्टहास और दर्शन करते हुए, आग की लपट के समान लाल-लाल जटाओं वाले भगवान भैरव प्रकट हो गए। क्रकच ने अपने इष्टदेव को देखकर प्रसन्न भाव से प्रार्थना किया कि " हे भगवन! आपके भक्तों से द्रोह रखनेवाले इस ढोंगी शंकर को अपनी दृष्टि मात्र से भस्म कर दीजिए!" क्रकच की प्रार्थना सुनकर भगवान भैरव ने उत्तर दिया,"अरे दुष्ट! शंकर तो मेरे ही अवतार हैं! मेरे ही निजरूप हैं! इनका वध करके क्या मैं अपना ही वध करूं? क्या तुम मेरे शरीर से द्रोह करते हो? ऐसा कहकर भगवान भैरव ने क्रोध से क्रकच का सिर अपने त्रिशूल से काट दिया।" कपालिकों के राजा की मृत्यु के बाद आचार्य शंकर ने बचे हुए कपालिकों के विषय में विचार किया। परंतु इन बचे हुए कपालिकों को स्वयं उपदेश नहीं दिया; क्योंकि कपालिकों की श्रद्धा अपने भगवान भैरव में थी, क्योंकि वही उनके आराध्य देव है। अतः शंकर ने समयानुकूल वातावरण समझकर भगवान भैरव से ही प्रार्थना किया कि "आप ही हमें और हमारे शिष्यों को कुछ अपने श्री वचनों से संबोधित कीजिए।" भगवान भैरव ने कहा,"हे शंकर! आप सदैव पूजनीय है! वेदों में समस्त रहस्यों के ज्ञाता है! धर्मविहीन, वेदविरोधी ब्राह्मणों को दंड देने के लिए आप भूमंडल पर अवतरित हुए हैं। जो आपका कार्य है, वही मेरा भी कार्य है। वास्तव में जो सद्गुरु का कार्य होता है, वही समष्टि में व्याप्त ईश्वरीय सत्ता का कार्य होता है। इन क्रूर कपालिकों को सनातन धर्म में निरत कीजिए। कलयुग के प्रभाव से इनकी बुद्धि धर्मविहीन हो गई है। मैं तो मंत्रबद्ध होकर यहां प्रकट हुआ हूं। धर्म के आचरण से प्रकट नहीं हुआ।" ऐसा कहकर भगवान भैरव अंतर्ध्यान हो गए। भगवान भैरव के वचन सुनकर शेष कपालिक अत्यंत भयभीत हो गए और उन्होंने आचार्य शंकर की शरण लेकर वेदविरुद्ध कपालिक मत का परित्याग कर दिया। यतिराज शंकर के आदेशानुसार वे सनातन धर्म में दीक्षित हो गए इस प्रकार आचार्य शंकर ने कपालिकों के विशालगढ़ को ध्वस्त कर वैदिक धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा की। 🌿🙏👣🙏🌿🌿🙏👣🙏🌿🙏

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