मायमंदिर फ़्री कुंडली
डाउनलोड करें
Dharmendra Paswan
Dharmendra Paswan Jun 18, 2019

https://www.facebook.com/100026251842586/posts/302309613987431/?sfnsn=mo

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
R K GABA Jul 15, 2019

+6 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 6 शेयर
jpshrivastava Jul 16, 2019

+32 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 0 शेयर

+2 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 4 शेयर
jai shri krishna Jul 15, 2019

🌹🍀🌹🍀.....#गुरु_की_अग्नि_परीक्षा...🌹🍀🌹 💜💜💜💜#गुरु_पूर्णिमा_विशेष💜💜💜💜 🌹🍀🌹🍀🌹🍀🌹🍀🌹🍀☘🍀🌹🍀🌹 संत स्वामी समर्थ रामदास एक दिन अपने शिष्यों के साथ यात्रा में निकले हुए थे। दोपहर के समय एक बड़े कुएं के निकट वृक्ष की छाया में आसन लगाकर वे विश्राम करने लगे। उन्होंने अपने प्रिय शिष्य अंबादास को निकट बुलाया। वृक्ष की एक शाखा कुएं के ऊपर थी। उसकी ओर संकेत करते हुए पूछा, क्या तुम इस शाखा को काट सकते हो? यदि आप आज्ञा दें गुरुदेव, तो जरूर काट दूंगा। अंबादास ने विनम्रता से कहा। 🌷🍀🌷🍀🌷🍀🌷🍀🌷🍀🌷🍀🌷🍀🌷🍀🌷🍀 समर्थ स्वामी बोले- कुल्हाड़ी लेकर वृक्ष पर चढ़ जाओ और उस शाखा को काट डालो। इस शाखा के पत्ते पतझड़ में गिरकर कुएं का पानी दूषित करते होंगे। शाखा को उसके मूल स्थान से ही काटना होगा। सभी शिष्य यह आज्ञा सुनकर कभी श्री समर्थ स्वामी के मुख की ओर निहारते, कभी अंबादास की ओर, तो कभी उस शाखा की ओर। वह शाखा जिस मोटी शाखा से निकली थी, वह सीधी ऊपर की ओर गई थी। वहां दूसरी कोई शाखा नहीं थी, जिस पर खड़े होकर कोई उस शाखा को काट सके। 🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻☘🌻🌹🌻🌹🌻 शाखा को मूल स्थान से काटने का मतलब था कि उसी शाखा पर खड़े होकर उसे काटा जाए। पैरों को टिकाने का कोई स्थान ही न था। निश्चय ही शाखा काटने वाला कुएं में जा गिरेगा और उसकी मृत्यु भी निश्चित थी। अंबादास ने भी यह सब देखा। लेकिन गुरु की आज्ञा पाते ही उसने अपनी धोती बांधी और कुल्हाड़ी लेकर वृक्ष पर चढ़ गया। उसी शाखा पर खड़े होकर उसने कुल्हाड़ी चलानी शुरू कर दी। 🌼🍀🌼🍀🌼🍀🌼🍀🌼🍀🌼🍀🌼🍀🌼🍀🌼🍀 अरे मूर्ख। ऐसे में तो तू कुएं में चला जाएगा। समर्थ ने ऊपर देखकर अंबादास को भयभीत करने के लिए कहा। गुरुदेव। आपकी महती कृपा मुझे संसार-सागर से पार उतारने में पूर्ण समर्थ है। अंबादास ने कहा। यह कूप किस गणना में है। मैं तो आपके आशीर्वाद से सदैव सुरक्षित रहा हूं। यदि इतनी श्रद्धा है, तो फिर अपना काम करो। श्री समर्थ ने आज्ञा प्रदान कर दी। 🌿🌹🌿🌹🌿🌹🌿🌹🌿🌹🌿🌹🌿🌹🌿🌹🌿🌹 शाखा आधी से कुछ ज्यादा ही कट पाई थी कि टूटकर अंबादास के साथ कुएं में जा गिरी।सभी शिष्य व्याकुल हो उठे।परंतु स्वामी समर्थ रामदास शांत बैठे रहे। उनमें जिसकी इतनी श्रद्धा है, उसका अमंगल संभव ही न था। 🌹☘🌹☘🌹☘🌹☘🌹☘🌹☘🌹☘🌹☘🌹☘ कहते हैं कि अंबादास को कुएं में अपने इष्टदेव भगवान राम का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ। शिष्यो के प्रयास से अंबादास को कुएं से निकाला गया, तो वह गुरुदेव के चरणों में लेट गया, 'आपने तो मेरा कल्याण कर दिया।' 'तेरा कल्याण तो तेरी श्रद्धा ने कर दिया। तू अब कल्याणरूप हो गया।' श्री समर्थ ने कहा। तभी से अंबादास का नाम कल्याण हो गया। 🌹🌻🍀🌹🌻🍀🌹🌻🍀🌹🌻🍀🌹🌻🍀🌹🌻🍀 🙏🙏🙏जय गुरुदेव 🙏🙏🙏 🚩🚩🚩🚩जय माता दी🚩🚩🚩🚩

+31 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 64 शेयर

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 1 शेयर
Human Singh Mangliya Jul 15, 2019

+6 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 3 शेयर
Ankush Singh Baghel Jul 13, 2019

*🕉friends enjoy your happy weekend🕉* *🌹हनुमान चालीसा में इस* *गणित से बताई है सूर्य और* *पृथ्वी के बीच की दूरी🌹* *🖊Surender Arora🖊* कलियुग में सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवताओं में से एक हैं हनुमानजी। इसी वजह से आज के दौर में इनके भक्तों की संख्या काफी अधिक है। हनुमानजी को प्रसन्न करने का सरल और श्रेष्ठ उपाय है हनुमान चालीसा का पाठ करना। हनुमान चालीसा सैकड़ों साल पहले गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रची गई थी और उसी समय उन्होंने इसमें यह बता दिया था कि सूर्य और पृथ्वी के बीच लगभग कितनी दूरी है। जबकि विज्ञान अब बता रहा है कि सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी 149,600,000 किलो मीटर है। यहां जानिए हनुमान चालीसा में किस प्रकार बताई गई है सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी… हनुमान चालीसा में एक दोहा है: जुग (युग) सहस्त्र जोजन (योजन) पर भानु। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। इस दोहे का सरल अर्थ यह है कि हनुमानजी ने एक युग सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित भानु यानी सूर्य को मीठा फल समझकर खा लिया था। हनुमानजी ने एक युग सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित भानु यानी सूर्य को मीठा फल समझकर खा लिया था। एक युग= 12000 वर्ष एक सहस्त्र= 1000 एक योजन= 8 मील युग x सहस्त्र x योजन= पर भानु 12000 x 1000 x 8 मील = 96000000 मील एक मील = 1.6 किमी 96000000 x 1.6 = 153600000 किमी इस गणित के आधार गोस्वामी तुलसीदास ने प्राचीन समय में ही बता दिया था कि सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी लगभग 15 करोड़ किलोमीटर है। शास्त्रों के अनुसार एक युग में होते हैं कुल 12000 दिव्य वर्ष शास्त्रों के अनुसार एक लौकिक युग चार भागों में बंटा हुआ है। ये चार भाग हैं सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। इसी लौकिक युग के आधार पर मन्वंतर और कल्प की गणना ग्रंथों में की गई है। इस गणना के अनुसार चारों युगों का संध्या काल (युग प्रारंभ होने के पहले का समय) और संध्यांश (युग समाप्त होने के बाद का समय) के साथ 12000 दिव्य वर्ष माने गए हैं। चार युगों के दिव्य वर्षों की संख्या इस प्रकार है- सतयुग- 4000 दिव्य वर्ष त्रेतायुग- 3000 दिव्य वर्ष द्वापरयुग- 2000 दिव्य वर्ष कलियुग- 1000 दिव्य वर्ष इस प्रकार चारों युग के दिव्य वर्षों की संख्या है 10000 दिव्य वर्ष। चारों युगों के संध्या काल के दिव्य वर्ष हैं 400 + 300 + 200 + 100 = 1000 दिव्य वर्ष और संध्यांश के भी 1000 दिव्य वर्ष हैं। चारों युग के दिव्य वर्ष + संध्या काल के दिव्य वर्ष + संध्यांश के दिव्य वर्ष = कुल दिव्य वर्ष इस प्रकार 10000 + 1000 + 1000 = 12000 दिव्य वर्ष। एक दिव्य वर्ष में मनुष्यों के 360 वर्ष माने गए हैं। अत: चारों युग में 12000 x 360 = 4320000 मनुष्य वर्ष हैं। अत: सतयुग 1728000 मनुष्य वर्षों का माना गया है। त्रेतायुग 1296000 मनुष्य वर्षों का माना गया है। द्वापरयुग 864000 मनुष्य वर्षों का माना गया है। कलियुग 432000 मनुष्य वर्षों का है, जिसमें से अभी करीब पांच हजार साल व्यतीत हो चुके हैं। कलियुग के अभी भी करीब 427000 मनुष्य वर्ष शेष हैं। शास्त्रों के अनुसार हनुमानजी भगवान शंकर के ही अवतार हैं और वे बालपन में बड़े ही नटखट थे। जन्म से ही उन्हें कई दिव्य शक्तियां प्राप्त थीं, इस वजह से वे और भी अधिक लीलाएं करते थे। इन बाल लीलाओं के कारण वन क्षेत्र में रहने वाले सभी ऋषि-मुनि और अन्य प्राणियों को परेशानियां भी होती थीं। हनुमान चालीसा के अनुसार एक समय जब बाल हनुमान खेल रहे थे तब उन्हें सूर्य ऐसे दिखाई दिया जैसे वह कोई मीठा फल हो। वे तुरंत ही सूर्य तक उड़कर पहुंच गए। हनुमानजी ने स्वयं का आकार भी इतना विशाल बना लिया कि उन्होंने सूर्य को ही खा लिया। हनुमानजी के मुख में सूर्य के जाते ही पूरी सृष्टि में अंधकार फैल गया। सभी देवी-देवता भयभीत हो गए। जब देवराज इंद्र को यह मालूम हुआ कि किसी वानर बालक ने सूर्य को खा लिया है तब वे क्रोधित हो गए। क्रोधित इंद्र हनुमानजी के पास पहुंचे और उन्होंने बाल हनुमान की ठोड़ी पर वज्र से प्रहार कर दिया। इस प्रहार से केसरी नंदन की ठोड़ी कट गई और इसी वजह से वे हनुमान कहलाए। संस्कृत में ठोड़ी को हनु कहा जाता है। हनुमान का एक अर्थ है निरहंकारी या अभिमानरहित। हनु का मतलब हनन करना और मान का मतलब अहंकार। अर्थात जिसने अपने अहंकार का हनन कर लिया हो। यह सभी को पता है कि हनुमानजी को कोई अभिमान नहीं था। *🙏🏻Dr.S.S.Arora 9592812585🙏🏻* *🏞Good morning friends have a nice weekend🌅* 🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞 -- Get Good Morning, Good Night, Shayari etc. messages on IndiaChat App https://wn78r.app.goo.gl/G6VmH

+5 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Ashok pandita Jul 15, 2019

+1 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB