Sharad Trivedi
Sharad Trivedi Aug 5, 2017

Ramaayan jai

#श्रीराम #रामायण
। श्री सियावर रामचन्द्रजी की जय भक्तो ।
॥ #बालकाण्ड - 16 ( लक्ष्मणजी क्षोभ )

सुअवसर देख जनक जी ने श्रीसीताजी को बुला भेजा, सब चतुर सखियाँ उन्हें रंगभूमि लिवा चली । रूप और गुणों की खान जगजननी श्रीसीताजी की शोभा वर्णन नही हो सकती, उनके लिये सब उपमायें तुच्छ लगती है *"भगवान की स्वरूपाशक्ति श्रीजानकी जी अप्राकृत है उनकी उपमा उपहास पद है । जगत में ऐसी सुंदर स्त्री है ही कहाँ एक भी उपमा करी जा सके ।"*जनक किशोरी ने रंगभूमि (स्वम्बर सभा ) में पैर रखा, तब उनका रूप देख समस्त राजा गण और स्त्री-पुरुष मोहित हुए ।
देवताओ ने नगाड़े बजाये और पुष्प बरसाकर अप्सारए गाने लगी । श्रीसीताजी के हाथो में वरमाला ( जयमाला ) सुशोभित, ह्रदय में
चकितचित से श्रीरामजी को देखने लगी, तब सब राजा लोग मोह के वश् हो गये । श्रीसीताजी ने मुनि के पास बेठे दोनों भाइयो को देखा तो उनके नेत्र अपना खजना पा, वहीँ ( श्रीरामचन्द्रजी में ) जा लगे,परन्तु गुरुजनो और बड़े समाज को देख कर सकुचा गयी, अपने ह्रदय में धार कर अपनी सखियो को देखने लगी ।
राजा जनकजी ने भाटो को बुलाया, वे विरुदावलि ( वंश की कीर्ति गाते हुवे चले आये । राजा जनक ने कहा - जाकर मेरा प्रण सबसे कहो । भाटो ने श्रेष्ट वचन कहा- *" हे पृथ्वी की पालना करने वाले सब राजागण ! सुनिये जनक जी का प्रण हम आपको कहते है । शिव जी का धनुष राहु, कठोर और बहुत भारी है यह आप सब को विदित है । इस कठोर धनुष को जो भी तोड़ेगा, तीनो लोको की विजय के साथ ही श्रीजनक किशोरीजी ( जानकी ) बिना किसी विचार के हठ पुर्वक वर्ण करेगी ।"* सभी राजा गण बारी बारी अपने अपने इष्ट देवो को सिर नवा धनुष के पास जा तमक कर देखते और धनुष को पकड़ते, जब नही उठा पाते तो लज्जा कर वापस चले आते । राजा लोग हारकर श्रीहीन हो गये । राजाओ को असफल देख राजा जनक अकुला उठे वे ऐसे वचन बोले जो मानो क्रोध में सने हुए हो ।
*" मैंने जो प्रण किया था उसे सुन अनेक बलशाली राजा आये । देवता और दैत्य भी मनुष्य का भेष धारण कर के आये, परन्तु कोई भी धनुष को तोड़ कर मेरी मनोहर, अत्यंत सुंदर कीर्ति को पाने वाली के योग्य मानो ब्रह्माजी ने किसी को रचा ही नही ! कहिये यह भाव किसको अच्छा नही लगता । परन्तु किसी ने श्रीशंकरजी के धनुष को चाप नही चढ़या, अरे चढ़ाना और तोड़ना तो दूर रहा ; कोई तिल भर भी भूमि नही छोड़ा पाया, अब कोई वीरता का धनी नाराज न हो, मैंने जान लिया की पृथ्वी वीरो से खाली हो गयी । अब आशा छोड़ अपने अपने घर जाओ ; श्रीब्रह्माजी ने सीता के भाग्य में विवाह लिखा ही नही । यदिं मैं प्रण छोड़ता हूँ तो पुण्य जाता है ; इसलिये क्या करु कन्या कुँवारी ही रहे । यदि मैं जानता की पृथ्वी वीरो से सुनी है तो प्रण करके उपहास का पात्र नही बनता । "*
जनक के वचन सुन सभी स्त्री पुरुष जानकी जी की ओर देखकर दुःखी हुये ; परन्तु लक्ष्मणजी तम तमा उठे, क्रोध में लाल हो गए और ओठ फड़कने लगे । जब न रह सके ।
*श्री राम चन्द्र जी के चरणों में सिर नवाँ कर लक्ष्मणजी यथार्त वचन बोले - *" रघुवंशयों में कोई भी जहाँ होता है उस सभा में कोई भी ऐसे वचन नही बोलता है " हे सूर्यकमल के सूरज ! सुनिये मैं स्वभाव से ही कहता हूँ अभिमान से नही, यदि आपकी आज्ञा पाउँ तो ब्रह्माण्ड को गेंद की तरह उठा लू और उसे कच्चे घड़े की तरह तोड़ दुं ! आप के प्रताप की महिमा से यह पुराना धनुष तो कौन सी चीज है, अगर आज्ञा हो कुछ खेल करु, धनुष को कमल की डंडी के तरह चढ़ा कर सौ योजन तक दौड़ता चला जाऊ । प्रभु आपके चरणों की कसम अगर बरसाती छते की तरह न तोड़ दू तो तरकस को कभी हाथ नही लगाउँगा । ज्योही लक्ष्मणजी ने क्रोध भरे वचन बोले सारी पृथ्वी डग मगा उठी, सभी राजा और उपस्थित जन डर गये । "*

+54 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 12 शेयर

कामेंट्स

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 1 शेयर
p.sunil. Jan 25, 2020

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 1 शेयर
Rajkumar Agarwal Jan 25, 2020

+8 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 16 शेयर
Jyoti Pandey Jan 25, 2020

+53 प्रतिक्रिया 16 कॉमेंट्स • 11 शेयर

+18 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 22 शेयर
p.sunil. Jan 25, 2020

+7 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 3 शेयर
Ajay Kumar Jan 25, 2020

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 6 शेयर
sanjay agarwal Jan 24, 2020

+19 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 12 शेयर
Rajkumar Agarwal Jan 25, 2020

+2 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर
Rajkumar Agarwal Jan 25, 2020

+2 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB