भगवत सिंह मेहता उत्तराखंड बागेश्वर रीमा रोड बिनाडी

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अनमोल विचार

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Swami Lokeshanand Apr 23, 2019

भरतजी कौशल्याजी के महल के दरवाजे पर आ तो पहुँचे, पर भीतर जाने की हिम्मत नहीं हो रही, बाहर ही खड़े रह गए। माँ खिड़की पर बैठी हैं, सामने पेड़ पर एक कौआ काँव काँव कर रहा है, आँसुओं की धारा बह चली। कौन आएगा? क्या पिताजी के जाने का समाचार राम को अयोध्या खींच ला सकता है? मेरा हृदय पत्थर का बना है, तभी तो राम को जाते देखकर भी यह फट नहीं गया, प्रेम तो महाराज ने ही निभाया है, मैं तो क्रुर काल के हाथों ठगी गई । यदि राम एकबार आ गए, तो मैं उनके चरणों से लिपट जाऊँगी, फिर जाने नहीं दूंगी। पर क्या वे आएँगे? अ कौए! अगर राम आ गए, तो तेरी चोंच सोने से मंढवा दूंगी, तुझे रोज मालपुआ बना बनाकर खिलाऊँगी। हाए! हाए! न मालूम वो इस समय कहाँ होंगे, किस हाल में होंगे? वर्षा ऋतु है, भीगने से बचने के लिए तीनों किसी वृक्ष के नीचे खड़े होंगे? क्या विधाता ने ये महल मेरे लिए ही बनाए हैं? वे वन में ठोकरें खा रहे हैं, मैं महलों में ही पड़ी हूँ। सत्य है, मूल के लिए ब्याज छोड़ दिया, पर अब तो मूल भी चला गया, सब कुछ लुट गया! बड़बड़ाना बंद हुआ तो ध्यान दिया, बाहर किसी के सिसकने की आवाज आ रही है। छोटे छोटे कदम धरती हैं, पाँच ही दिन में माँ पर बुढ़ापा उतर आया है। इधर भरतजी ने आहट सुनी, पहचान गए, माँ आ रही हैं। हाथों से चेहरा ढक लिया। राममाता पूछती हैं, कौन हो? चेहरा क्यों नहीं दिखाते? क्या तुम राम हो? भरतलालजी का बाँध टूट गया, ऐसी दहाड़ माँ के कानों में पहली बार पड़ी है। भरभराती आवाज आई "भरत हूँ माँ!" भरत! मेरा भरत बेटा आ गया। मेरा भरत! चेहरा तो दिखा दो बेटा, दिखाते क्यों नहीं? माँ! मेरा चेहरा मत देखो, इतना पाप चढ़ गया है मुझपर, मेरा चेहरा देखनेवाले को भी पाप लग जाएगा। कौशल्याजी भरतजी की छाती से जा लगीं। बस! आज इतना ही!! अब विडियो देखें- कौशल्या https://youtu.be/paC3Z6Pl7no

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Vijay Yadav Apr 23, 2019

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Ritesh Apr 23, 2019

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जाति ना पूंछो साधु की सीख लिजिये ज्ञान, , मोल करो तलवार का पड़ा रहन दो म्यान,,, मैं जो कल था आज नहीं एक बौद्ध धर्मगुरु थे। उनके दर्शनों के लिए लोग अक्सर आश्रम में आते थे। स्वामीजी बड़ी उदारता से सबसे मिलते-बात करते और उनकी समस्याओं का समाधान करते। रोज स्वामीजी के पास दर्शनार्थी की भीड़ लगी रहती थी।  स्वामीजी की प्रशंसा सुनकर एक साधारण ग्रामीण बहुत प्रभावित हुआ। वह भी स्वामीजी के दर्शानार्थ आश्रम पहुंचा। स्वामी जी की अलौकिक छबि की ओर देखते हुए उसने एक प्रश्न पूछा। स्वामीजी ने उसे उस समस्या का निराकरण बताया।  घर पहुंचकर व्यक्ति के मन में कई तरह की शंकाएं उत्पन्न होने लगीं। उन शंकाओं के निवारण के लिए वह व्यक्ति फिर से दूसरे दिन उन्हीं स्वामीजी के पास पहुंचा। इस बार भी स्वामीजी ने शांत भाव से उस व्यक्ति को एक समाधान बताया।  वह व्यक्ति हैरान था कि यह समाधान पहले दिन के समाधान से बिल्कुल विपरीत था। इस बात को लेकर वह व्यक्ति बहुत क्रोधित हुआ। स्वामीजी कल तो आप कुछ और ही उपाय बता रहे थे कि आज कुछ और।  आप लोगों को बेवकूफ बनाते हैं। इस पर स्वामीजी ने शांत भाव से मुस्कुराए और कहा कि, 'जो मैं कल था आज मैं वह नहीं हूं। कल वाला मैं तो कल के साथ ही समाप्त हो गया, आज मै आज का नया व्यक्ति हूं।'  कल परिस्थितियां कुछ ओर थीं। आज और कुछ हैं। जब आज मैं नया हूं तो कल की समस्या का समाधान, कल की ही तरह क्यों करूंगा। इसलिए अगर तुम इस युक्ति को अपनाते हो तो तुम्हारी समस्या का समाधान जल्द से जल्द हो जाएगा।  हर हर महादेव जय शिव शंकर

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