M.S.Chauhan
M.S.Chauhan Dec 2, 2017

माँ की आशीर्वाद जग में चारो धाम से न्यारा है...

Audio - माँ की आशीर्वाद जग में चारो धाम से न्यारा है...

माँ का आशीर्वाद जग में चारो धाम से न्यारा है.. बहुत सुन्दर भजन है ।
एक बार जरूर सुनिये जी।
और यदि आपको अच्छा लगे तो
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कामेंट्स

M.S.Chauhan Dec 3, 2017
शुभ प्रभात जी सधन्यबाद जी

M.S.Chauhan Dec 3, 2017
शुभ प्रभात जी । जय माता रानी की । सादर नमन जी । बहुत धन्यबाद जी ।

M.S.Chauhan Dec 3, 2017
शुभ प्रभात जी । सादर नमन जी । सधन्यबाद जी ।

+21 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 74 शेयर
shiv bhakte Apr 18, 2021

+14 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 65 शेयर
Shobha Nakra Apr 18, 2021

+10 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 63 शेयर

*प्रभुकृपा* रात नौ बजे लगभग अचानक मुझे एलर्जी हो गई। घर पर दवाई नहीं, न ही इस समय मेरे अलावा घर में कोई और। श्रीमती जी बच्चों के पास दिल्ली और हम रह गए अकेले। ड्राईवर मित्र भी अपने घर जा चुका था। बाहर हल्की बारिश की बूंदे सावन महीने के कारण बरस रही थी। दवा की दुकान ज्यादा दूर नहीं थी पैदल भी जा सकता था लेकिन बारिश की वज़ह से मैंने रिक्शा लेना उचित समझा। बगल में राम मन्दिर बन रहा था। एक रिक्शा वाला भगवान की प्रार्थना कर रहा था। मैंने उससे पूछा, "चलोगे?", तो उसने सहमति में सर हिलाया और बैठ गए हम रिक्शा में! रिक्शा वाला काफी़ बीमार लग रहा था और उसकी आँखों में आँसू भी थे। मैंने पूछा, "क्या हुआ भैया! रो क्यूँ रहे हो और तुम्हारी तबियत भी ठीक नहीं लग रही।" उसने बताया, "बारिश की वजह से तीन दिन से सवारी नहीं मिली और वह भूखा है बदन दर्द भी कर रहा है, अभी भगवान से प्रार्थना कर रहा था क़ि आज मुझे भोजन दे दो, मेरे रिक्शे के लिए सवारी भेज दो"। मैं बिना कुछ बोले रिक्शा रुकवाकर दवा की दुकान पर चला गया। वहां खड़े खड़े सोच रहा था... "कहीं भगवान ने तो मुझे इसकी मदद के लिए नहीं भेजा। क्योंकि यदि यही एलर्जी आधे घण्टे पहले उठती तो मैं ड्राइवर से दवा मंगाता, रात को बाहर निकलने की मुझे कोई ज़रूरत भी नहीं थी, और पानी न बरसता तो रिक्शे में भी न बैठता।"मन ही मन भगवांन को याद किया और पूछ ही लिया भगवान से! मुझे बताइये क्या आपने रिक्शे वाले की मदद के लिए भेजा है?"मन में जवाब मिला... "हाँ"...। मैंने भगवान को धन्यवाद दिया, अपनी दवाई के साथ रिक्शेवाले के लिए भी दवा ली। बगल के रेस्तरां से छोले भटूरे पैक करवाए और रिक्शे पर आकर बैठ गया। जिस मन्दिर के पास से रिक्शा लिया था वहीँ पहुंचने पर मैंने रिक्शा रोकने को कहा। उसके हाथ में रिक्शे के 30 रुपये दिए, गर्म छोले भटूरे का पैकेट और दवा देकर बोला,"खाना खा कर यह दवा खा लेना, एक एक गोली ये दोनों अभीऔर एक एक कल सुबह नाश्ते के बाद,उसके बाद मुझे आकर फिर दिखा जाना। रोते हुए रिक्शेवाला बोला, "मैंने तो भगवान से दो रोटी मांगी थी मग़र भगवान ने तो मुझे छोले भटूरे दे दिए। कई महीनों से इसे खाने की इच्छा थी। आज भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली। और जो मन्दिर के पास उसका बन्दा रहता था उसको मेरी मदद के लिए भेज दिया।" कई बातें वह बोलता रहा और मैं स्तब्ध हो सुनता रहा। घर आकर सोचा क़ि उस रेस्तरां में बहुत सारी चीज़े थीं, मैं कुछ और भी ले सकता था, समोसा या खाने की थाली .. पर मैंने छोले भटूरे ही क्यों लिए? क्या सच में भगवान ने मुझे रात को अपने भक्त की मदद के लिए ही भेजा था..? हम जब किसी की मदद करने सही वक्त पर पहुँचते हैं तो इसका मतलब उस व्यक्ति की प्रार्थना भगवान ने सुन ली, और हमें अपना प्रतिनिधि बनाकर उसकी मदद के लिए भेज दिया। *हे प्रभु ऐसे ही सदा मुझे राह दिखाते रहो, यही आप से प्रार्थना है*

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Mamta Chauhan Apr 18, 2021

+169 प्रतिक्रिया 48 कॉमेंट्स • 118 शेयर
Radhe Krishna Apr 18, 2021

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+17 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 41 शेयर
Anita Sharma Apr 18, 2021

(((( श्री दास जी )))) . श्री दास जी महाराज नामक एक संतसेवी महात्मा हुए है। श्री दास जी संतो की सेवा को भगवान् की सेवा से बढ़कर मानते थे। . एक बार श्रीदास जी के यहा कई सन्त आये संध्या आरती हुई। रात्रि भोजन के बाद श्रीदास जी संतो की चरण सेवा में लग गये। . मंदिर में ठाकुर जी को शयन कराना भूल गये। . प्रात:काल मंगला के समय श्री दास जी जब मंदिर जाने लगे तो मंदिर के किवाड़ भीतर से बन्द मिले। प्रयत्न करने पर भी किवाड नहीं खुले। . तब श्रीदास जी बड़े असमंजस में पड़ गये। इतने में आकाश वाणी हुई, अब किवाड नहीं खुलेंगे, मेरी सेवा रहने दो, अब सन्तो की ही सेवा करो। . मैं रातभर सिंहासन पर खड़ा रहा हूँ तुमने मुझे शयन ही नहीं कराया। . यह सुनकर श्री दासजी ने सरल भाव से निवेदन किया, प्रभो ! सन्त-सेवा में लगे रहने के कारण यदि आपकी सेवा में चूक हुई तो आपके नाराज होने का भय मुझे बिलकुल भी नहीं है। . परंतु आपकी सेवा में लगा रहूँ और संत सेवा में भूल-चूक हो जाय, तब मुझे आपकी नाराजगी का भारी भय है.. भगवान् से अधिक महिमा तो भगवान् के भक्तो की है। . यह सुनते ही प्रभु प्रसन्न हो गये। किवाड़ खुल गये और भगवान् कहने लगे.. हम तुम पर बहुत प्रसन्न हैं, इस भाव् से संत सेवा करने वाले मुझे अपने वश में कर लेते हैं। . ऐसा कहकर भगवान ने श्रीदास जी को प्रत्यक्ष होकर दर्शन दिया और अनेक शुभाशीर्वाद दिए।

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