M.S.Chauhan
M.S.Chauhan Dec 2, 2017

माँ की आशीर्वाद जग में चारो धाम से न्यारा है...

Audio - माँ की आशीर्वाद जग में चारो धाम से न्यारा है...

माँ का आशीर्वाद जग में चारो धाम से न्यारा है.. बहुत सुन्दर भजन है ।
एक बार जरूर सुनिये जी।
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कामेंट्स

M.S.Chauhan Dec 3, 2017
शुभ प्रभात जी सधन्यबाद जी

M.S.Chauhan Dec 3, 2017
शुभ प्रभात जी । जय माता रानी की । सादर नमन जी । बहुत धन्यबाद जी ।

M.S.Chauhan Dec 3, 2017
शुभ प्रभात जी । सादर नमन जी । सधन्यबाद जी ।

Sarvagya Shukla Sep 30, 2020

"मौन की महत्ता" एक बोध कथा ~ एक मछलीमार कांटा डाले तालाब के किनारे बैठा था। काफी समय बाद भी कोई मछली कांटे में नहीं फँसी, ना ही कोई हलचल हुई तो वह सोचने लगा... कहीं ऐसा तो नहीं कि मैने कांटा गलत जगह डाला है, यहाँ कोई मछली ही न हो ! उसने तालाब में झाँका तो देखा कि उसके कांटे के आसपास तो बहुत-सी मछलियाँ थीं। उसे बहुत आश्चर्य हुआ कि इतनी मछलियाँ होने के बाद भी कोई मछली फँसी क्यों नहीं ! एक राहगीर ने जब यह नजारा देखा तो उससे कहा- "लगता है भैया, यहाँ पर मछली मारने बहुत दिनों बाद आए हो! अब इस तालाब की मछलियाँ कांटे में नहीं फँसती।" मछलीमार ने हैरत से पूछा- "क्यों, ऐसा क्या है यहाँ ? राहगीर बोला- "पिछले दिनों तालाब के किनारे एक बहुत बड़े संत ठहरे थे। उन्होने यहाँ मौन की महत्ता पर प्रवचन दिया था। उनकी वाणी में इतना तेज था कि जब वे प्रवचन देते तो सारी मछलियाँ भी बड़े ध्यान से सुनतीं। यह उनके प्रवचनों का ही असर है कि उसके बाद जब भी कोई इन्हें फँसाने के लिए कांटा डालकर बैठता है तो ये मौन धारण कर लेती हैं। जब मछली मुँह खोलेगी ही नहीं तो कांटे में फँसेगी कैसे ? इसलिए बेहतर यहीं होगा कि आप कहीं और जाकर कांटा डालो।" परमात्मा ने हर इंसान को दो आँख, दो कान, दो नासिका, हर इन्द्रिय दो ही प्रदान किया है। पर जिह्वा एक ही दी.. क्या कारण रहा होगा ? क्योंकि यह एक ही अनेकों भयंकर परिस्थितियाँ पैदा करने के लिये पर्याप्त है। संत ने कितनी सही बात कही कि जब मुँह खोलोगे ही नहीं तो फँसोगे कैसे ? अगर इन्द्रिय पर संयम करना चाहते हैं तो.. इस जिह्वा पर नियंत्रण कर लेवें बाकी सब इन्द्रियां स्वयं नियंत्रित रहेंगी। यह बात हमें भी अपने जीवन में उतार लेनी चाहिए। "एक चुप सौ सुख"😊🙏

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Shakti Sep 30, 2020

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Shakti Sep 28, 2020

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🙏जय श्री हरि विष्णु जी 🙏 🌹सुप्रभात वंदन 🌹आपका दिन शुभ हो 🌹 🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻 एक पुरानी कहानी है कि एक पण्डित जी ने अपनी पत्नी की आदत बना दी थी कि घर में रोटी खाने से पहले कहना है कि "विष्णु अर्पण" अगर पानी पीना हो तो पहले कहना है कि"विष्णु अर्पण" उस औरत की इतनी आदत पक्की हो गई की जो भी काम करती पहले मन में यह कहती की "विष्णु अर्पण" "विष्णुअर्पण" फिर वह काम करती एक दिन उसने घर का कूड़ा इक्कठा किया और फेंकते हुए कहा की "विष्णु अर्पण""विष्णु अर्पण" वहीँ पास से नारद मुनि जा रहे थे ,नारद मुनि ने जब यह सुना तो उस औरत को थप्पड़ मारा की विष्णु जी को कूड़ा अर्पण कर रही है फैक कूड़ा रही है और कह रही है कि "विष्णु अर्पण" वह औरत विष्णु जी के प्रेम में रंगी हुई थी कहने लगी नारद मुनि तुमने जो थप्पड़ मारा है वो थप्पड़ भी "विष्णु अर्पण" अब नारद जी ने दुसरे गाल पर थप्पड़ मारते हुए कहा कि बेकूफ़ औरत तू थप्पड़ को भी विष्णु अर्पण कह रही है । लेकिन उस औरत फिर यही कहा आपका मार यह थप्पड़ भी "विष्णु अर्पण" " जब नारद मुनि विष्णु पूरी में गए तो क्या देखते है कि विष्णु जी के दोनों गालों पर उँगलियों के निशान बने हुए थे " , नारद पूछने लगे कि"भगवन यह क्या हो गया" ? आप जी के चेहरे पर यह निशान कैसे पड़े", विष्णु जी कहने लगे कि "नारद मुनि थप्पड़ मारे भी तू और पूछे भी तू" , नारद जी कहने लगे की "मैं आप को थप्पड़ कैसे मार सकता हूँ"?, विष्णु जी कहने लगे, "नारद मुनि जिस औरत ने कूड़ा फेंकते हुए यह कहा था की विष्णु अर्पण और तुने उस को थप्पड़ मारा था तो वह थप्पड़ सीधे मेरे को ही लगा था , क्योकि वह मुझे अर्पण था"...

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Amar jeet mishra Oct 1, 2020

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NEha sharma 💞💕 Sep 30, 2020

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Sunil Kumar Saini Sep 30, 2020

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