. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 152 गोपीनाथ पट्टनायक सूली से बचे अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:। तीव्रेण भक्ति योगेन यजेत पुरुषं परम्॥ पाठकवृन्द राय रामानन्द जी के पिता राजा भवानन्द जी को तो भूले ही न होंगे। उनके राय रामानन्द, गोपीनाथ पट्टनायक और वाणीनाथ आदि पाँच पुत्र थे, जिन्हें प्रभु पाँच पाण्डवों की उपमा दिया करते थे और भवानन्द जी का पाण्डु कहकर सम्मान और सत्कार किया करते थे। वाणीनाथ तो सदा प्रभु की सेवा में रहते थे। राय रामानन्द पहले विद्यानगर के शासक थे, पीछे से उस काम को छोड़कर वे सदा पुरी में ही प्रभु के पादपद्मों के सन्निकट निवास किया करते थे और महाप्रभु को निरन्तर श्रीकृष्ण-कथा-श्रवण कराते रहते। उनके छोटे भाई गोपीनाथ पट्टनायक ‘माल जाठ्या दण्डपाट’ नामक उड़ीसा राज्यान्तर्गत एक प्रान्त के शासक थे। ये बडत्रे शौकीन थे, इनका रहन सहन, ठाट बाट, सब राजसी ढंग का ही था। धन पारक जिस प्रकार प्रायः लोग विषयी बन जाते हैं, उसी प्रकार के ये विषयी बने हुए थे। विषयी लोगों की इच्छा सर्वभुक अग्नि के समान होती है, उसमें धनरूपी ईंधन कितना भी क्यों न डाल दिया जाय उसकरी तृप्ति नहीं होती। तभी तो विषयी पुरुषों को शास्त्रकारों ने अविश्वासी कहा है। विषयी लोगों के वचनों का कभी विश्वास न करना चाहिये। उनके पास कोई धरोहर की चीज रखकर फिर उसे प्राप्त करने की आशा व्यर्थ है। विषय होता ही तब है जब हृदय में अविवेक होता है और अविवेक में अपने-पराये या हानि-लाभ का ध्यान नहीं रहता। इसलिये विषयी पुरुष अपने को तो आपत्ति के जाल में फंसाता ही है, साथ ही अपने संसर्गियों को भी सदा क्लेश पहुँचाता रहता है। विषयियों का संसर्ग होने से किसे क्लेश नहीं हुआ है। इसीलिये नीतिकारों ने कहा है- दुर्वतसंगातिरनर्थपरम्पाराया हेतू: सतां भावति किं वचनीयमत्र। लंकेश्वरो हरति दाशरथे: कलत्रं प्राप्नोति बंधनमसौ किल सिंधुराज:॥ ‘इसमें विशेष कहने सुनने की बात ही क्या है ? यह तो सनातन की रीति चली आयी है कि विषयी पुरुषों से संसर्ग रचाने से अच्छे पुरुषों को भी क्लेश होता ही है। देखो, उस विषयी रावण ने तो जनकनन्दिनी सीता जी का हरण किया और बन्धन में पड़ा बेचारा समुद्र।’ साथियों के दुःख सुख का उपभोग सभी को करना होता है। वह सम्बन्धी नहीं जो सुख में सम्मिलित रहता है और दुःख में दूर हो जाता है। किन्तु एक बात है, यदि खोटे पुरुषों का सौभाग्यवश किसी महापुरुष से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध हो जाता है तो उसके इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर जाते हैं। साधु पुरुष तो सदा विषयी पुरुषों से दूर ही रहते हैं, किन्तु विषयी किसी भी प्रकार से उनके शरणापन्न हो जाय, तो फिर उसका बेड़ा पार ही समझना चाहिये। महापुरुषों को यदि किसी के दुःख को देखकर दुःख भी होता है तो फिर वह उस दुःख से छूट ही जाता है, जब संसारी दुःख महापुरुषों की तनिक सी इच्छा से छूट जाते हैं, तब शुद्ध हृदय से और श्रद्धाभक्ति पूर्वक जो उसकी शरण में जाता है उसका कल्याण तो होगा ही- इसमें कहना ही क्या? राजा भवानन्द जी शुद्ध हृदय से प्रभु के भक्त थे। उनके पुत्र गोपीनाथ पट्टनायक महान विषयी थे। पिता का महाप्रभु के साथ सम्बन्ध था। इसी सम्बंध से उनका प्रभु के साथ थोड़ा-बहुत सम्बन्ध था। इस सम्बन्धी के सम्बन्ध संसर्ग के ही कारण वे सूली पर चढ़े हुए भी बच गये। महापुरुषों की महिमा ऐसी ही है। गोपीनाथ एक प्रदेश के शासक थे। सम्पूर्ण प्रान्त की आय उन्हीं के पास आती थी। वे उसमें से अपना नियत वेतन रखकर शेष रुपयों को राजदरबार में भेज देते थे। किन्तु विषयियों में इतना संयम कहाँ कि वे दूसरे के द्रव्य की परवा करें। हम बता ही चुके हैं कि अविवेक के कारण विषयी पुरुषों को बपने पराये का ज्ञान नहीं रहता। गोपीनाथ पट्टनायक भी राजकोष में भेजने वाले द्रव्य को अपने ही खर्च में व्यय कर देते। इस प्रकार उड़ीसा के महाराज के दो लाख रूपये उनकी ओर हो गये। महाराज ने इनसे अपने रुपये माँगे, किन्तु इनके पास रुपये कहाँ? उन्हें तो वेश्या और कलारों ने अपना बना लिया। गोपीनाथ ने महाराज से प्रार्थना की कि ‘मेरे पास नकद रूपये तो हैं नहीं। मेरे पास दस बीस घोड़े हैं कुछ और भी सामान है, इसे जितने में समझें ले लें, शेष रुपये मैं धीरे-धीेरे देता रहूँगा।’ महाराज ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और घोड़ों की कीमत निश्चय करने के निमित्त अपने एक लड़के को भेजा। वह राजकुमार बड़ा बुद्धिमान था, उसे घोड़ों की खूब परख थी, वह अपने दस-बीस नौकरों के साथ घोड़े की कीमत निश्चय करने वहाँ गया। राजकुमार का स्वभाव था कि वह ऊपर को सिर करके बार-बार इधर-उधर मुँह फिरा फिराकर बातें किया करता था। राजपुत्र था, उसे अपने राजपाट और अधिकार का अभिमान था, इसलिये कोई उसके सामने बोलता तक नहीं था। उसने चारों ओर घोड़ों को देख-भालकर मूल्य निश्चय करना आरम्भ किया। जिन्हें गोपीनाथ दो चार हजार के मूल्य का समझते थे, उनका उसने बहुत ही थोड़ा मूल्य बताया। महाराज गोपीनाथ को भवानन्द जी के सम्बन्ध से पुत्र की भाँति मानते थे, इसलिये वे बड़े ढ़ीठ हो गये थे। राजपुत्रों को वे कुछ समझते ही नहीं थे। जब राजपुत्र ने दो चार घोड़ों का ही इतना कम मूल्य लगाया तब गोपीनाथ से न रहा गया। उन्होंने कहा- ‘श्रीमान ! यह तो आप बहुत ही कम मूल्य लगा रहे हैं।’ राजपुत्र ने कुछ रोष के साथ कहा- ‘तुम क्या चाहते हो, दो लाख रुपये इन घोड़ों में ही बेबाक कर दें? जितने के होंगे उतने ही तो लगावेंगे।’ गोपीनाथ ने अपने रोष को रोकते हुए कहा- ‘श्रीमान ! घोड़े बहुत बढि़या नस्ल के हैं। इनता मूल्य तो इनके लिये बहुत ही कम है।’ इस बात पर कुपित होकर राजपुत्र ने कहा- ‘दुनिया भर के रद्दी घोड़े इकट्ठे कर रखे हैं और चाहते हैं इन्हें ही देकर दो लाख रूपयों से बेबाक हो जायँ। यह नहीं होने का। घोड़े जितने के होंगे, उतने के ही लगाये जायँगे।’ राजप्रसाद प्राप्त मानी गोपीनाथ अपने इस अपमान को सहन नहीं कर सके। उन्होंने राजपुत्र की उपेक्षा करते हुए धीरे से व्यंग्य के स्वर में कहा- ‘कम से कम मेरे ये घोड़े तुम्हारी तरह ऊपर मुँह उठाकर इधर उधर तो नहीं देखते।’ उनका भाव था कि तुम्हारी अपेक्षा घोड़ों का मूल्य अधिक है। आत्मसम्मानी राजपुत्र इस अपमान को सहन नहीं कर सका। वह क्रोध के कारण जलने लगा। उस समय तो उसने कुछ नहीं कहा। उसने सोचा कि यहाँ हम कुछ कहें तो बात बढ़ जाय और महाराज न जाने उसका क्या अर्थ लगावें। शासन में अभी हम स्वतन्त्र नहीं हैं, यही सोचकर वह वहाँ से चुपचाप महाराज के पास चला गया। वहाँ जाकर उसने गोपीनाथ की बहुत सी शिकायतें करते हुए कहा- ‘पिताजी ! वह तो महाविषयी है, एक भी पैदा देना नहीं चाहता। उलटे उसने मेरा घोर अपमान किया है। उसने मेरे लिये ऐसी बुरी बात कही है, जिसे आपके सामने कहने में मुझे लज्जा आती है। सब लोगों के सामने वह मेरी एक सी निन्दा कर जाय? नौकर होकर उसका ऐसा भारी साहस? यह सब आपकी ही ढील का कारण है। उसे जब तक चाँग पर न चढ़ाया जायेगा तब तक रुपये वसूल नहीं होंगे, आप निश्चय समझिये।’ महाराज ने सोचा- ‘हमें तो रुपये मिलने चाहिये। सचमुच जब तक उसे भारी भय न दिखाया जायगा, तब तक वह रुपये नहीं देने का। एक बार उसे चाँग पर चढ़ाने की आज्ञा दे दें। सम्भव है इस भय से रुपये दे दे। नहीं तो पीछे उसे अपनी विशेष आज्ञा से छोड़ देंगे। भवानन्द के पुत्र को भला हम दो लाख रुपयों के पीछे चाँग पर थोड़े ही चढ़वा सकते हैं। अभी कह दें, इससे राजकुमार का क्रोध भी शान्त हो जायगा और रुपये भी सम्भवतया मिल ही जायँगे। यह सोचकर महाराज ने कह दिया- ‘अच्छा भाई, वही काम करो, जिससे उससे रुपये मिलें। चढ़वा दो उसे चाँग पर।’ बस, फिर क्या था। राजपुत्र ने फौरन आज्ञा दी कि गोपीनाथ को यहाँ बाँधकर लाया जाय। क्षण भर में उसकी आज्ञा पालन की गयी। गोपीनाथ बाँधकर चाँग के समीप खड़े किये गये। अब पाठकों को चाँग का परिचय दें कि यह चाँग क्या बला है। असल में चाँग एक प्रकार से सूली का ही नाम है। सूली में और चाँग में इतना ही अन्तर है कि सूली गुदा में होकर डाली जाती है और सिर में होकर पार निकाल ली जाती है। इससे जल्दी प्राण नहीं निकलते- बहुत देर में तड़प तड़प कर प्राण निकलते हैं। चाँग उससे कुछ सुखकर प्राण नाशक क्रिया है। एक बड़ा सा मंच होता है। उस मंच के नीचे भाग में तीक्ष्ण धार वाला एक बहुत बड़ा खड्ग लगा रहता है। उस मंच पर से अपराधी को इस ढंग से फेंकते हैं कि जिससे उस पर गिरते ही उसके प्राणों का अन्त हो जाये। इसी का नाम ‘चाँग चढ़ाना’ है। बड़े बड़े अपराधियों को ही चाँग पर चढ़ाया जाता है। ‘गोपीनाथ पट्टनायक चाँग पर चढ़ाये जायँगे’ -इस बात का हल्ला चारों ओर फैल गया। सभी लोगों को इस बात से महान आश्चर्य हुआ। महाराज जिन राजा भवानन्द को अपने पिता के समान मानते थे, उनके पुत्र को वे चाँग पर चढ़ा देंगे, सचमुच इन राजाओं के चित्त की बात समझी नहीं जाती, ये क्षण भर में प्रसन्न हो सकते हैं और पल भर में क्रुद्ध। इनका कोई अपना नहीं। ये सब कुछ कर सकते हैं। इस प्रकार भाँति-भाँति की बातें कहते हुए सैंकड़ों पुरुष महाप्रभु के शरणापन्न हुए और सभी हाल सुनाकर प्रभु से उनके अपराध क्षमा करा देने की प्रार्थना करने लगे। प्रभु ने कहा- ‘भाई ! मैं कर ही क्या सकता हूँ, राजा की आज्ञा को टाल ही कौन सकता है? ठीक ही है, विषयी लोगों को ऐसा ही दण्ड मिलना चाहिये। जब वह राद्रव्य को भी अपने विषय-भोग में उड़ा देता है तो राजा को उससे क्या लाभ? दो लाख रुपये कुछ कम तो होते ही नहीं। जैसा उसने किया, उसका फल भोगा। मैं क्या करूँ?’ भवानन्द जी के सगे-सम्बन्धी और स्नेही प्रभु से भाँति-भाँति की अनुनय-विनय करने लगे। प्रभु ने कहा- ‘भाई ! मैं तो भिक्षुक हूँ, यदि मेरे पास दो लाख रुपये होते तो देकर उसे छुड़ा लाता, किन्तु मेरे पास तो दो कौड़ी भी नहीं। मैं उसे छुड़ाऊँ कैसे? तुम लोग जगन्नाथ जी से जाकर प्रार्थना करो, वे दीनानाथ हैं, सबकी प्रार्थना पर अवश्य ही ध्यान देंगे।’ इतने में ही बहुत से पुरुष प्रभु के समीप और भागते हुए आये। उन्होंने संवाद किया कि- ‘भवानन्द, वाणीनाथ आदि सभी परिवार के लोगों को राजकर्मचारी बाँधकर लिये जा रहे हैं।’ सभी लोगों को आश्चर्य हुआ। भवानन्द जी के बन्धन का समाचार सुनकर तो प्रभु के सभी विरक्त और अंतरंग भक्त तिलमिला उठे। स्वरूप दामोदर जी ने अधीरता के साथ कहा- ‘प्रभु ! भवानन्द तो सपरिवार आपके चरणों के सेवक हैं। उनको इतना दुःख क्यों? आपके कृपापात्र होते हुए भी वे वृद्धावस्था में इतना क्लेश सहें, यह उचित प्रतीत नहीं होता। इससे आपकी भक्त वत्सलता की निन्दा होगी।’ महाप्रभु ने प्रेम युक्त रोष के स्वर में कहा- ‘स्वरूप ! तुम इतने समझदार होकर भी ऐसी बच्चों की सी बातें कर रहे हो? तुम्हारी इच्छा है कि मैं राजदरबार में जाकर भवानन्द के लिये राजा से प्रार्थना करूँ कि वे इन्हें मुक्त कर दें? अच्छा, मान लो मैं जाऊँ भी और कहूँ भी और राजा ने कह दिया कि आप ही दो लाख रुपये दे जाइये तब मैं क्या उत्तर दूँगा? राजदरबार में साधु ब्राह्मणों को तो कोई घास फूस की तरह भी नहीं पूछता।’ स्वरूपगोस्वामी ने कहा- ‘आपसे राजदरबार में जाने के लिये कहता ही कौन है? आप तो अपनी इच्छा मात्र से ही इस विश्व ब्रह्माण्ड को उलट-पुलट कर सकते हैं। फिर भवानन्द को सपरिवार इस दुःख से बचाना तो साधारण-सी बात है। आपको बचाना ही पड़ेगा, न बचावें तो आपकी भक्त वत्सलता ही झूठी हो जायगी, वह झूठी है नहीं। भवानन्द आपके भक्त हैं और आप भक्तवत्सल हैं, इस बात में किसी को सन्देह ही नहीं।’ राजदरबार में चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है। सभी के मुखों पर गोपीनाथ के चाँग पर चढ़ने की बात थी। सभी इस असम्भव और अद्भुत घटना के कारण भयभीत-से प्रतीत होते थे। समाचार पाकर महाराज के प्रधान मन्त्री चन्दनेश्वर महापात्र महाराज के समीप पहुँचे और अत्यन्त ही विस्मय प्रकट करते हुए कहने लगे- ‘श्रीमन ! यह आपने कैसी आज्ञा दे दी ? भवानन्द के पुत्र गोपीनाथ पट्टनायक तो आपके भाई के समान हैं। उन्हें आप प्राणदण्ड दिला रहे हैं, सो भी दो लाख रुपयों के ऊपर? वे यदि देने से इन्कार करें तो भी वैसा करना उचित था? किन्तु वे तो देने को तैयार हैं। उनके घोड़े आदि उचित मूल्य पर ले लिये जायँ, जो शेष रहेगा, उसे वे धीरे धीरे देते रहेंगे।’ महाराज की स्वयं की इच्छा नहीं थी। महामन्त्री की बात सुनकर उन्होंने कहा- ‘अच्छी बात है। मुझे इस बात का क्या पता? यदि वे रुपये देना चाहते हैं, तो उन्हें छोड़ दो। मुझे तो रुपयों से काम है उनके प्राण लेने से मुझे क्या लाभ?’ महाराज की ऐसी आज्ञा मिलते ही उन्होंने दरबार मे जाकर गोपीनाथ जी को सपरिवार मुक्त करने की आज्ञा लोंगों को सुना दी। इस आज्ञा को सुनते ही लोगों के हर्ष का ठिकाना नहीं रहा। क्षणभर में बहुत से मनुष्य इस सुखद संवाद को सुनाने के निमित्त प्रभु के पास पहुँचे और सभी एक स्वर में कहने लगे- ‘प्रभु ने गोपीनाथ को चाँग से उतरवा दिया।’ प्रभु ने कहा- ‘यह सब उनके पिता की भक्ति का ही फल है। जगन्नाथ जी ने ही उन्हें इस विपत्ति से बचाया है।’ लोगों ने कहा- ‘भवानन्द जी तो आपको ही सर्वस्व समझते हैं और वे ही कह भी रहे हैं कि महाप्रभु की ही कृपा से हम इस विपत्ति से बच सके हैं।’ प्रभु ने लोगों से पूछा- ‘चाँग के समीप खड़े हुए भवानन्द जी का उस समय क्या हाल था?’ लोगों ने कहा- ‘प्रभो ! उनकी बात कुछ न पूछिये। अपने पुत्र को चाँग पर चढ़े देखकर भी न उन्हें हर्ष था न विषाद। वे आनन्द के सहित प्रेम में गद्गद होकर- हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ -इस मन्त्र का जप कर रहे थे। दोनों हाथों की उँगलियों के पोरों से वे इस मन्त्र की संख्या को गिनते जाते थे। उन्हें आपके ऊपर दृढ़ विश्वास था।’ प्रभु ने कहा- ‘सब पुरुषोत्तम भगवान की कृपा है। उनकी भगवत-भक्ति का ही फल है कि इतनी भयंकर विपत्ति से सहज में ही छुटकारा मिल गया, नहीं तो राजाओं का क्रोध कभी निष्फल नहीं जाता।’ इतने में ही भवानन्द जी अपने पाँचों पुत्रों को साथ लिये हुए प्रभु के दर्शनों के लिये आ पहुँचे। उन्होंने पुत्रों के सहित प्रभु के पापद्मों में साष्टांग प्रणाम किया अैर गद्गद कण्ठ से दीनता के साथ वे कहने लगे- ‘हे दयालो ! हे भक्तवत्सल !! आपने ही हमारा इस भयंकर विपत्ति से उद्धार किया है। प्रभो ! आपकी असीम कृपा के बिना ऐसा असम्भव कार्य कभी नहीं हो सकता कि चाँग पर चढ़ा हुआ मनुष्य फिर जीवित ही उतर आवे !' प्रभु उनकी भगवद्भक्ति की प्रशंसा करते हुए कहने लगे- ‘इसे समझा दो, अब कभी ऐसा काम न करे। राजा के पैसे को कभी भी अपने खर्च में न लावे।’ इस प्रकार समझा बुझाकर प्रभु नेे उन सब पिता-पुत्रों को विदा किया। उसी समय काशी मिश्र भी आ पहुँचे। प्रभु को प्रणाम करके उन्होंने कहा- ‘प्रभो आज आपकी कृपा से ये पिता पुत्र तो खूब विपत्ति से बचे।’ प्रभु ने कुछ खिन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘मिश्र जी क्या बताऊँ? मैं तो इन विषयी लोगों के संसर्ग से बड़ा दुखी हूँ। मैं चाहता हूँ, इनकी कोई बात मेरे कानों में न पड़े। किन्तु जब यहाँ रहता हूँ, तब लोग मुझसे आकर कह ही देते हैं। सुनकर मुझे क्लेश होता ही है, इसलिये पुरी छोड़कर अब मैं अलालनाथ मेे जाकर रहूँगा। वहाँ न इन विषयी लोगों का संसर्ग होगा और न ये बातें सुनने में आवेंगी।’ मिश्र जी ने कहा- ‘आपको इन बातों से क्या? यह तो संसार है। इसमें तो ऐसी बातें होती ही रहती हैं। आप किस-किसका शोक करेंगे? आपसे क्या, कोई कुछ भी करे ! आपके भक्त तो सभी विषयत्यागी वैरागी हैं। रघुनाथदास जी को देखिये सब कुद छोड़ छाड़कर क्षेत्र के टुकड़ों पर निर्वाह करते हैं। रामानन्द तो पूरे संन्यासी हैं ही।’ प्रभु ने कहा- ‘चाहे कैसा भी क्यों न हो, अपना कुछ सम्बन्ध रहने से दुःख सुख प्रतीत होता ही है। ये विषयी ठहरे, बिना रुपया चुराये मानेंगे नहीं, महाराज कफर इन्हें चाँग पर चढ़ावेंगे। आज बच गये तो एक न एक दिन फिर यही होना है।’ मिश्र जी ने कहा- ‘नहीं, ऐसा नहीं होगा। महाराज भवानन्द जी को बहुत प्यार करते हैं।’ इसके अनन्तर और भी बहुत-सी बातें होती रहीं। अन्त में काशी मिश्र प्रभु की आज्ञा लेकर चले गये। महाराज प्रतापरुद्र जी अपने कुलगुरु श्री काशी मिश्र के अनन्य भक्त थे। पुरी में जब भी वे रहते, तभी रोज उनके घर आकर पैर दबाते थे। मिश्र जी भी उनसे अत्यधिक स्नेह मानते थे। एक दिन रात्रि में महाराज आकर मिश्र जी के पैर दबाने लगे। बातों ही बातों में मिश्र जी ने प्रसंग छेड़ दिया कि महाप्रभु तो पुरी छोड़कर अब अलालनाथ जाना चाहते हैं। पैरों को पकड़े हुए सम्भ्रम के साथ महाराज ने कहा- ‘क्यों, क्यों ! उन्हें यहाँ क्या कष्ट है? जो भी कोई कष्ट हो उसे दूर कीजिये। ! मैं आपका सेवक सब प्रकार से स्वयं उनकी सेवा करने को उपस्थित हूँ।’ मिश्र जी ने कहा- ‘उन्हें गोपीनाथ वाली घटना से बड़ा कष्ट हुआ है। वे कहते हैं, विषयियों के संसर्ग में रहना ठीक नहीं है।’ महाराज ने कहा- ‘श्रीमहाराज ! मैंने तो तुम्हें धमकाने के लिये ऐसा किया था। वैसे भवानन्द जी के प्रति मेरी बड़ी श्रद्धा है। इस छोटी सी बात के पीछे प्रभु पुरी को क्यों परित्याग कर रहे हैं। दो लाख रुपयों की कौन सी बात है? मैं रुपयों को छोड़ दूँगा। आप जैसे भी बने तैसे प्रभु को यहीं रखिये।’ मिश्र जी ने कहा- ‘रुपये छोड़ने को वे नहीं कहते। रुपयों की बात सुनकर तो उन्हें और अधिक दुःख होगा। वैसे ही वे इस झंझट से दूर रहना चाहते हैं। कहते हैं- रोज रोज यही झगड़ा चला रहेगा। गोपीनाथ फिर ऐसा ही करेगा।’ महाराज ने कहा- ‘आप उन्हें रुपयो की बात कहें ही नहीं। गोपीनाथ तो अपनी ही आदमी है। अब झगड़ा क्यों होगा? मैं उसे समझा दूँगा, आप महाप्रभु को जाने न दें। जैसे भी रख सकें अनुनय-विनय और प्रार्थना करके उन्हें यहीं रखें।’ महाराज के चले जाने पर दूसरे दिन मिश्र जी ने सभी बातें आकर प्रभु से कहीं ! सब बातों को सुनकर प्रभु कहने लगे- ‘यह आपने क्या किया? यह तो दो लाख रुपये आपने मुझे ही दिलवा दिये। इस राज प्रतिग्रह को लेकर मैं उलटा पाप का भागी बना।’ मिश्र जी ने सभी बातें प्रभु को समझा दीं। महाराज के शील, स्वभाव, नम्रता और सदगुणों की प्रशंसा की। प्रभु उनके भक्ति भाव की बातें सुनकर सन्तुष्ट हुए और उन्होंने अलालनाथ जाने का विचार परित्याग कर दिया। इधर महाराज ने आकर गोपीनाथ जी को बुलाया और उन्हें पुत्र की भाँति समझाते हुए कहने लगे- ‘देखो इस प्रकार व्यर्थ व्यय नहीं करना चाहिये। तुमने बिना पूछे इतने रुपये खर्च कर दिये इसलिये हमें क्रोध आ गया। जाओ, वे रुपये माफ किये। अब फिर ऐसा काम कभी भी न करना। यदि इतने वेतन से तुम्हारा कान नहीं चलता है तो हमसे कहना चाहिये था। तब तक तुमने यह बात हमसे कभी नहीं कही। आज से हमने तुम्हारा वेतन भी दुगुना कर दिया।’ इस प्रकार दो लाख रुपये माफ हो जाने पर और वेतन भी दुगुना हो जाने से गोपीनाथ जी को परम प्रसन्नता हुई। उसी समय वे आकर प्रभु के पैरों में पड़ गये और रोते-रोते कहने लगे- ‘प्रभो ! मुझे अब अपने चरणों की शरण में लीजिये, अब मुझे इस विषय जंजाल से छुड़ाइये।' प्रभु ने उन्हें प्रेमपूर्वक आलिंगन किया और फिर कभी ऐसा काम न करने के लिये कहकर विदा किया। जब महापुरुषों की तनिक सी कृपा होने पर गोपीनाथ सपरिवार सूली से बच गये, दो लाख रुपये माफ हो गये, वेतन दुगुना हो गया और पहले से भी अधिक राजा के प्रीतिभाजन बन गये, तब जो अनन्यभाव से महापुरुषों के चरणों ही सेवा करते हैं और उनके ऊपर जो महापुरुषों की कृपा होती है, उस कृपा के फल का तो कहना ही क्या? उस कृपा से तो फिर मनुष्य का इस संसार से ही सम्बन्ध छूट जाता है। वह तो फिर सर्वतोभावेन प्रभु का ही हो जाता है। धन्य है ऐसी कृपालुता को ! श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- - प्रभुदत्त ब्रह्मचारी श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली (123) गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

.                      श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली
                               पोस्ट - 152

                  गोपीनाथ पट्टनायक सूली से बचे

          अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:।
          तीव्रेण  भक्ति  योगेन  यजेत  पुरुषं  परम्॥

          पाठकवृन्द राय रामानन्द जी के पिता राजा भवानन्द जी को तो भूले ही न होंगे। उनके राय रामानन्द, गोपीनाथ पट्टनायक और वाणीनाथ आदि पाँच पुत्र थे, जिन्हें प्रभु पाँच पाण्डवों की उपमा दिया करते थे और भवानन्द जी का पाण्डु कहकर सम्मान और सत्कार किया करते थे। वाणीनाथ तो सदा प्रभु की सेवा में रहते थे। राय रामानन्द पहले विद्यानगर के शासक थे, पीछे से उस काम को छोड़कर वे सदा पुरी में ही प्रभु के पादपद्मों के सन्निकट निवास किया करते थे और महाप्रभु को निरन्तर श्रीकृष्ण-कथा-श्रवण कराते रहते। उनके छोटे भाई गोपीनाथ पट्टनायक ‘माल जाठ्या दण्डपाट’ नामक उड़ीसा राज्यान्तर्गत एक प्रान्त के शासक थे। ये बडत्रे शौकीन थे, इनका रहन सहन, ठाट बाट, सब राजसी ढंग का ही था। धन पारक जिस प्रकार प्रायः लोग विषयी बन जाते हैं, उसी प्रकार के ये विषयी बने हुए थे। विषयी लोगों की इच्छा सर्वभुक अग्नि के समान होती है, उसमें धनरूपी ईंधन कितना भी क्यों न डाल दिया जाय उसकरी तृप्ति नहीं होती। तभी तो विषयी पुरुषों को शास्त्रकारों ने अविश्वासी कहा है। विषयी लोगों के वचनों का कभी विश्वास न करना चाहिये। उनके पास कोई धरोहर की चीज रखकर फिर उसे प्राप्त करने की आशा व्यर्थ है। विषय होता ही तब है जब हृदय में अविवेक होता है और अविवेक में अपने-पराये या हानि-लाभ का ध्यान नहीं रहता। इसलिये विषयी पुरुष अपने को तो आपत्ति के जाल में फंसाता ही है, साथ ही अपने संसर्गियों को भी सदा क्लेश पहुँचाता रहता है। विषयियों का संसर्ग होने से किसे क्लेश नहीं हुआ है। इसीलिये नीतिकारों ने कहा है- 

                 दुर्वतसंगातिरनर्थपरम्पाराया     हेतू:   
                 सतां    भावति    किं    वचनीयमत्र। 
                 लंकेश्वरो   हरति    दाशरथे:   कलत्रं   
                 प्राप्नोति बंधनमसौ किल सिंधुराज:॥

          ‘इसमें विशेष कहने सुनने की बात ही क्या है ? यह तो सनातन की रीति चली आयी है कि विषयी पुरुषों से संसर्ग रचाने से अच्छे पुरुषों को भी क्लेश होता ही है। देखो, उस विषयी रावण ने तो जनकनन्दिनी सीता जी का हरण किया और बन्धन में पड़ा बेचारा समुद्र।’ 
          साथियों के दुःख सुख का उपभोग सभी को करना होता है। वह सम्बन्धी नहीं जो सुख में सम्मिलित रहता है और दुःख में दूर हो जाता है। किन्तु एक बात है, यदि खोटे पुरुषों का सौभाग्यवश किसी महापुरुष से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध हो जाता है तो उसके इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर जाते हैं।
          साधु पुरुष तो सदा विषयी पुरुषों से दूर ही रहते हैं, किन्तु विषयी किसी भी प्रकार से उनके शरणापन्न हो जाय, तो फिर उसका बेड़ा पार ही समझना चाहिये। महापुरुषों को यदि किसी के दुःख को देखकर दुःख भी होता है तो फिर वह उस दुःख से छूट ही जाता है, जब संसारी दुःख महापुरुषों की तनिक सी इच्छा से छूट जाते हैं, तब शुद्ध हृदय से और श्रद्धाभक्ति पूर्वक जो उसकी शरण में जाता है उसका कल्याण तो होगा ही- इसमें कहना ही क्या? राजा भवानन्द जी शुद्ध हृदय से प्रभु के भक्त थे। उनके पुत्र गोपीनाथ पट्टनायक महान विषयी थे। पिता का महाप्रभु के साथ सम्बन्ध था। इसी सम्बंध से उनका प्रभु के साथ थोड़ा-बहुत सम्बन्ध था। इस सम्बन्धी के सम्बन्ध संसर्ग के ही कारण वे सूली पर चढ़े हुए भी बच गये। महापुरुषों की महिमा ऐसी ही है।
          गोपीनाथ एक प्रदेश के शासक थे। सम्पूर्ण प्रान्त की आय उन्हीं के पास आती थी। वे उसमें से अपना नियत वेतन रखकर शेष रुपयों को राजदरबार में भेज देते थे। किन्तु विषयियों में इतना संयम कहाँ कि वे दूसरे के द्रव्य की परवा करें। हम बता ही चुके हैं कि अविवेक के कारण विषयी पुरुषों को बपने पराये का ज्ञान नहीं रहता। गोपीनाथ पट्टनायक भी राजकोष में भेजने वाले द्रव्य को अपने ही खर्च में व्यय कर देते। इस प्रकार उड़ीसा के महाराज के दो लाख रूपये उनकी ओर हो गये। महाराज ने इनसे अपने रुपये माँगे, किन्तु इनके पास रुपये कहाँ? उन्हें तो वेश्या और कलारों ने अपना बना लिया। गोपीनाथ ने महाराज से प्रार्थना की कि ‘मेरे पास नकद रूपये तो हैं नहीं। मेरे पास दस बीस घोड़े हैं कुछ और भी सामान है, इसे जितने में समझें ले लें, शेष रुपये मैं धीरे-धीेरे देता रहूँगा।’ महाराज ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और घोड़ों की कीमत निश्चय करने के निमित्त अपने एक लड़के को भेजा।
          वह राजकुमार बड़ा बुद्धिमान था, उसे घोड़ों की खूब परख थी, वह अपने दस-बीस नौकरों के साथ घोड़े की कीमत निश्चय करने वहाँ गया। राजकुमार का स्वभाव था कि वह ऊपर को सिर करके बार-बार इधर-उधर मुँह फिरा फिराकर बातें किया करता था। राजपुत्र था, उसे अपने राजपाट और अधिकार का अभिमान था, इसलिये कोई उसके सामने बोलता तक नहीं था। उसने चारों ओर घोड़ों को देख-भालकर मूल्य निश्चय करना आरम्भ किया। जिन्हें गोपीनाथ दो चार हजार के मूल्य का समझते थे, उनका उसने बहुत ही थोड़ा मूल्य बताया। महाराज गोपीनाथ को भवानन्द जी के सम्बन्ध से पुत्र की भाँति मानते थे, इसलिये वे बड़े ढ़ीठ हो गये थे। राजपुत्रों को वे कुछ समझते ही नहीं थे। जब राजपुत्र ने दो चार घोड़ों का ही इतना कम मूल्य लगाया तब गोपीनाथ से न रहा गया। उन्होंने कहा- ‘श्रीमान ! यह तो आप बहुत ही कम मूल्य लगा रहे हैं।’
          राजपुत्र ने कुछ रोष के साथ कहा- ‘तुम क्या चाहते हो, दो लाख रुपये इन घोड़ों में ही बेबाक कर दें? जितने के होंगे उतने ही तो लगावेंगे।’ गोपीनाथ ने अपने रोष को रोकते हुए कहा- ‘श्रीमान ! घोड़े बहुत बढि़या नस्ल के हैं। इनता मूल्य तो इनके लिये बहुत ही कम है।’ 
          इस बात पर कुपित होकर राजपुत्र ने कहा- ‘दुनिया भर के रद्दी घोड़े इकट्ठे कर रखे हैं और चाहते हैं इन्हें ही देकर दो लाख रूपयों से बेबाक हो जायँ। यह नहीं होने का। घोड़े जितने के होंगे, उतने के ही लगाये जायँगे।’ 
          राजप्रसाद प्राप्त मानी गोपीनाथ अपने इस अपमान को सहन नहीं कर सके। उन्होंने राजपुत्र की उपेक्षा करते हुए धीरे से व्यंग्य के स्वर में कहा- ‘कम से कम मेरे ये घोड़े तुम्हारी तरह ऊपर मुँह उठाकर इधर उधर तो नहीं देखते।’ 
          उनका भाव था कि तुम्हारी अपेक्षा घोड़ों का मूल्य अधिक है। आत्मसम्मानी राजपुत्र इस अपमान को सहन नहीं कर सका। वह क्रोध के कारण जलने लगा। उस समय तो उसने कुछ नहीं कहा। उसने सोचा कि यहाँ हम कुछ कहें तो बात बढ़ जाय और महाराज न जाने उसका क्या अर्थ लगावें। शासन में अभी हम स्वतन्त्र नहीं हैं, यही सोचकर वह वहाँ से चुपचाप महाराज के पास चला गया। 
          वहाँ जाकर उसने गोपीनाथ की बहुत सी शिकायतें करते हुए कहा- ‘पिताजी ! वह तो महाविषयी है, एक भी पैदा देना नहीं चाहता। उलटे उसने मेरा घोर अपमान किया है। उसने मेरे लिये ऐसी बुरी बात कही है, जिसे आपके सामने कहने में मुझे लज्जा आती है। सब लोगों के सामने वह मेरी एक सी निन्दा कर जाय? नौकर होकर उसका ऐसा भारी साहस? यह सब आपकी ही ढील का कारण है। उसे जब तक चाँग पर न चढ़ाया जायेगा तब तक रुपये वसूल नहीं होंगे, आप निश्चय समझिये।’
          महाराज ने सोचा- ‘हमें तो रुपये मिलने चाहिये। सचमुच जब तक उसे भारी भय न दिखाया जायगा, तब तक वह रुपये नहीं देने का। एक बार उसे चाँग पर चढ़ाने की आज्ञा दे दें। सम्भव है इस भय से रुपये दे दे। नहीं तो पीछे उसे अपनी विशेष आज्ञा से छोड़ देंगे। भवानन्द के पुत्र को भला हम दो लाख रुपयों के पीछे चाँग पर थोड़े ही चढ़वा सकते हैं। अभी कह दें, इससे राजकुमार का क्रोध भी शान्त हो जायगा और रुपये भी सम्भवतया मिल ही जायँगे। यह सोचकर महाराज ने कह दिया- ‘अच्छा भाई, वही काम करो, जिससे उससे रुपये मिलें। चढ़वा दो उसे चाँग पर।’ 
          बस, फिर क्या था। राजपुत्र ने फौरन आज्ञा दी कि गोपीनाथ को यहाँ बाँधकर लाया जाय। क्षण भर में उसकी आज्ञा पालन की गयी। गोपीनाथ बाँधकर चाँग के समीप खड़े किये गये। अब पाठकों को चाँग का परिचय दें कि यह चाँग क्या बला है। असल में चाँग एक प्रकार से सूली का ही नाम है। सूली में और चाँग में इतना ही अन्तर है कि सूली गुदा में होकर डाली जाती है और सिर में होकर पार निकाल ली जाती है। इससे जल्दी प्राण नहीं निकलते- बहुत देर में तड़प तड़प कर प्राण निकलते हैं। चाँग उससे कुछ सुखकर प्राण नाशक क्रिया है। एक बड़ा सा मंच होता है। उस मंच के नीचे भाग में तीक्ष्ण धार वाला एक बहुत बड़ा खड्ग लगा रहता है। उस मंच पर से अपराधी को इस ढंग से फेंकते हैं कि जिससे उस पर गिरते ही उसके प्राणों का अन्त हो जाये। इसी का नाम ‘चाँग चढ़ाना’ है। बड़े बड़े अपराधियों को ही चाँग पर चढ़ाया जाता है। 
          ‘गोपीनाथ पट्टनायक चाँग पर चढ़ाये जायँगे’ -इस बात का हल्ला चारों ओर फैल गया। सभी लोगों को इस बात से महान आश्चर्य हुआ। महाराज जिन राजा भवानन्द को अपने पिता के समान मानते थे, उनके पुत्र को वे चाँग पर चढ़ा देंगे, सचमुच इन राजाओं के चित्त की बात समझी नहीं जाती, ये क्षण भर में प्रसन्न हो सकते हैं और पल भर में क्रुद्ध। इनका कोई अपना नहीं। ये सब कुछ कर सकते हैं। इस प्रकार भाँति-भाँति की बातें कहते हुए सैंकड़ों पुरुष महाप्रभु के शरणापन्न हुए और सभी हाल सुनाकर प्रभु से उनके अपराध क्षमा करा देने की प्रार्थना करने लगे। 
          प्रभु ने कहा- ‘भाई ! मैं कर ही क्या सकता हूँ, राजा की आज्ञा को टाल ही कौन सकता है? ठीक ही है, विषयी लोगों को ऐसा ही दण्ड मिलना चाहिये। जब वह राद्रव्य को भी अपने विषय-भोग में उड़ा देता है तो राजा को उससे क्या लाभ? दो लाख रुपये कुछ कम तो होते ही नहीं। जैसा उसने किया, उसका फल भोगा। मैं क्या करूँ?’
          भवानन्द जी के सगे-सम्बन्धी और स्नेही प्रभु से भाँति-भाँति की अनुनय-विनय करने लगे। प्रभु ने कहा- ‘भाई ! मैं तो भिक्षुक हूँ, यदि मेरे पास दो लाख रुपये होते तो देकर उसे छुड़ा लाता, किन्तु मेरे पास तो दो कौड़ी भी नहीं। मैं उसे छुड़ाऊँ कैसे? तुम लोग जगन्नाथ जी से जाकर प्रार्थना करो, वे दीनानाथ हैं, सबकी प्रार्थना पर अवश्य ही ध्यान देंगे।’ 
          इतने में ही बहुत से पुरुष प्रभु के समीप और भागते हुए आये। उन्होंने संवाद किया कि- ‘भवानन्द, वाणीनाथ आदि सभी परिवार के लोगों को राजकर्मचारी बाँधकर लिये जा रहे हैं।’ 
          सभी लोगों को आश्चर्य हुआ। भवानन्द जी के बन्धन का समाचार सुनकर तो प्रभु के सभी विरक्त और अंतरंग भक्त तिलमिला उठे। स्वरूप दामोदर जी ने अधीरता के साथ कहा- ‘प्रभु ! भवानन्द तो सपरिवार आपके चरणों के सेवक हैं। उनको इतना दुःख क्यों? आपके कृपापात्र होते हुए भी वे वृद्धावस्था में इतना क्लेश सहें, यह उचित प्रतीत नहीं होता। इससे आपकी भक्त वत्सलता की निन्दा होगी।’ 
          महाप्रभु ने प्रेम युक्त रोष के स्वर में कहा- ‘स्वरूप ! तुम इतने समझदार होकर भी ऐसी बच्चों की सी बातें कर रहे हो? तुम्हारी इच्छा है कि मैं राजदरबार में जाकर भवानन्द के लिये राजा से प्रार्थना करूँ कि वे इन्हें मुक्त कर दें? अच्छा, मान लो मैं जाऊँ भी और कहूँ भी और राजा ने कह दिया कि आप ही दो लाख रुपये दे जाइये तब मैं क्या उत्तर दूँगा? राजदरबार में साधु ब्राह्मणों को तो कोई घास फूस की तरह भी नहीं पूछता।’ 
          स्वरूपगोस्वामी ने कहा- ‘आपसे राजदरबार में जाने के लिये कहता ही कौन है? आप तो अपनी इच्छा मात्र से ही इस विश्व ब्रह्माण्ड को उलट-पुलट कर सकते हैं। फिर भवानन्द को सपरिवार इस दुःख से बचाना तो साधारण-सी बात है। आपको बचाना ही पड़ेगा, न बचावें तो आपकी भक्त वत्सलता ही झूठी हो जायगी, वह झूठी है नहीं। भवानन्द आपके भक्त हैं और आप भक्तवत्सल हैं, इस बात में किसी को सन्देह ही नहीं।’
          राजदरबार में चारों ओर हाहाकार मचा हुआ है। सभी के मुखों पर गोपीनाथ के चाँग पर चढ़ने की बात थी। सभी इस असम्भव और अद्भुत घटना के कारण भयभीत-से प्रतीत होते थे। समाचार पाकर महाराज के प्रधान मन्त्री चन्दनेश्वर महापात्र महाराज के समीप पहुँचे और अत्यन्त ही विस्मय प्रकट करते हुए कहने लगे- ‘श्रीमन ! यह आपने कैसी आज्ञा दे दी ? भवानन्द के पुत्र गोपीनाथ पट्टनायक तो आपके भाई के समान हैं। उन्हें आप प्राणदण्ड दिला रहे हैं, सो भी दो लाख रुपयों के ऊपर? वे यदि देने से इन्कार करें तो भी वैसा करना उचित था? किन्तु वे तो देने को तैयार हैं। उनके घोड़े आदि उचित मूल्य पर ले लिये जायँ, जो शेष रहेगा, उसे वे धीरे धीरे देते रहेंगे।’ 
          महाराज की स्वयं की इच्छा नहीं थी। महामन्त्री की बात सुनकर उन्होंने कहा- ‘अच्छी बात है। मुझे इस बात का क्या पता? यदि वे रुपये देना चाहते हैं, तो उन्हें छोड़ दो। मुझे तो रुपयों से काम है उनके प्राण लेने से मुझे क्या लाभ?’ 
          महाराज की ऐसी आज्ञा मिलते ही उन्होंने दरबार मे जाकर गोपीनाथ जी को सपरिवार मुक्त करने की आज्ञा लोंगों को सुना दी। इस आज्ञा को सुनते ही लोगों के हर्ष का ठिकाना नहीं रहा। क्षणभर में बहुत से मनुष्य इस सुखद संवाद को सुनाने के निमित्त प्रभु के पास पहुँचे और सभी एक स्वर में कहने लगे- ‘प्रभु ने गोपीनाथ को चाँग से उतरवा दिया।’ 
          प्रभु ने कहा- ‘यह सब उनके पिता की भक्ति का ही फल है। जगन्नाथ जी ने ही उन्हें इस विपत्ति से बचाया है।’ 
          लोगों ने कहा- ‘भवानन्द जी तो आपको ही सर्वस्व समझते हैं और वे ही कह भी रहे हैं कि महाप्रभु की ही कृपा से हम इस विपत्ति से बच सके हैं।’ 
          प्रभु ने लोगों से पूछा- ‘चाँग के समीप खड़े हुए भवानन्द जी का उस समय क्या हाल था?’ 
          लोगों ने कहा- ‘प्रभो ! उनकी बात कुछ न पूछिये। अपने पुत्र को चाँग पर चढ़े देखकर भी न उन्हें हर्ष था न विषाद। वे आनन्द के सहित प्रेम में गद्गद होकर- 

          हरे  राम   हरे  राम   राम  राम  हरे  हरे। 
          हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ 

          -इस मन्त्र का जप कर रहे थे। दोनों हाथों की उँगलियों के पोरों से वे इस मन्त्र की संख्या को गिनते जाते थे। उन्हें आपके ऊपर दृढ़ विश्वास था।’ 
          प्रभु ने कहा- ‘सब पुरुषोत्तम भगवान की कृपा है। उनकी भगवत-भक्ति का ही फल है कि इतनी भयंकर विपत्ति से सहज में ही छुटकारा मिल गया, नहीं तो राजाओं का क्रोध कभी निष्फल नहीं जाता।’ 
          इतने में ही भवानन्द जी अपने पाँचों पुत्रों को साथ लिये हुए प्रभु के दर्शनों के लिये आ पहुँचे। उन्होंने पुत्रों के सहित प्रभु के पापद्मों में साष्टांग प्रणाम किया अैर गद्गद कण्ठ से दीनता के साथ वे कहने लगे- ‘हे दयालो ! हे भक्तवत्सल !! आपने ही हमारा इस भयंकर विपत्ति से उद्धार किया है। प्रभो ! आपकी असीम कृपा के बिना ऐसा असम्भव कार्य कभी नहीं हो सकता कि चाँग पर चढ़ा हुआ मनुष्य फिर जीवित ही उतर आवे !'
          प्रभु उनकी भगवद्भक्ति की प्रशंसा करते हुए कहने लगे- ‘इसे समझा दो, अब कभी ऐसा काम न करे। राजा के पैसे को कभी भी अपने खर्च में न लावे।’ 
          इस प्रकार समझा बुझाकर प्रभु नेे उन सब पिता-पुत्रों को विदा किया। उसी समय काशी मिश्र भी आ पहुँचे। 
          प्रभु को प्रणाम करके उन्होंने कहा- ‘प्रभो आज आपकी कृपा से ये पिता पुत्र तो खूब विपत्ति से बचे।’ 
          प्रभु ने कुछ खिन्नता प्रकट करते हुए कहा- ‘मिश्र जी क्या बताऊँ? मैं तो इन विषयी लोगों के संसर्ग से बड़ा दुखी हूँ। मैं चाहता हूँ, इनकी कोई बात मेरे कानों में न पड़े। किन्तु जब यहाँ रहता हूँ, तब लोग मुझसे आकर कह ही देते हैं। सुनकर मुझे क्लेश होता ही है, इसलिये पुरी छोड़कर अब मैं अलालनाथ मेे जाकर रहूँगा। वहाँ न इन विषयी लोगों का संसर्ग होगा और न ये बातें सुनने में आवेंगी।’ 
          मिश्र जी ने कहा- ‘आपको इन बातों से क्या? यह तो संसार है। इसमें तो ऐसी बातें होती ही रहती हैं। आप किस-किसका शोक करेंगे? आपसे क्या, कोई कुछ भी करे ! आपके भक्त तो सभी विषयत्यागी वैरागी हैं। रघुनाथदास जी को देखिये सब कुद छोड़ छाड़कर क्षेत्र के टुकड़ों पर निर्वाह करते हैं। रामानन्द तो पूरे संन्यासी हैं ही।’ 
          प्रभु ने कहा- ‘चाहे कैसा भी क्यों न हो, अपना कुछ सम्बन्ध रहने से दुःख सुख प्रतीत होता ही है। ये विषयी ठहरे, बिना रुपया चुराये मानेंगे नहीं, महाराज कफर इन्हें चाँग पर चढ़ावेंगे। आज बच गये तो एक न एक दिन फिर यही होना है।’ 
          मिश्र जी ने कहा- ‘नहीं, ऐसा नहीं होगा। महाराज भवानन्द जी को बहुत प्यार करते हैं।’ इसके अनन्तर और भी बहुत-सी बातें होती रहीं। अन्त में काशी मिश्र प्रभु की आज्ञा लेकर चले गये। महाराज प्रतापरुद्र जी अपने कुलगुरु श्री काशी मिश्र के अनन्य भक्त थे। पुरी में जब भी वे रहते, तभी रोज उनके घर आकर पैर दबाते थे। मिश्र जी भी उनसे अत्यधिक स्नेह मानते थे। एक दिन रात्रि में महाराज आकर मिश्र जी के पैर दबाने लगे। बातों ही बातों में मिश्र जी ने प्रसंग छेड़ दिया कि महाप्रभु तो पुरी छोड़कर अब अलालनाथ जाना चाहते हैं। 
          पैरों को पकड़े हुए सम्भ्रम के साथ महाराज ने कहा- ‘क्यों, क्यों ! उन्हें यहाँ क्या कष्ट है? जो भी कोई कष्ट हो उसे दूर कीजिये। ! मैं आपका सेवक सब प्रकार से स्वयं उनकी सेवा करने को उपस्थित हूँ।’
          मिश्र जी ने कहा- ‘उन्हें गोपीनाथ वाली घटना से बड़ा कष्ट हुआ है। वे कहते हैं, विषयियों के संसर्ग में रहना ठीक नहीं है।’
          महाराज ने कहा- ‘श्रीमहाराज ! मैंने तो तुम्हें धमकाने के लिये ऐसा किया था। वैसे भवानन्द जी के प्रति मेरी बड़ी श्रद्धा है। इस छोटी सी बात के पीछे प्रभु पुरी को क्यों परित्याग कर रहे हैं। दो लाख रुपयों की कौन सी बात है? मैं रुपयों को छोड़ दूँगा। आप जैसे भी बने तैसे प्रभु को यहीं रखिये।’
          मिश्र जी ने कहा- ‘रुपये छोड़ने को वे नहीं कहते। रुपयों की बात सुनकर तो उन्हें और अधिक दुःख होगा। वैसे ही वे इस झंझट से दूर रहना चाहते हैं। कहते हैं- रोज रोज यही झगड़ा चला रहेगा। गोपीनाथ फिर ऐसा ही करेगा।’
          महाराज ने कहा- ‘आप उन्हें रुपयो की बात कहें ही नहीं। गोपीनाथ तो अपनी ही आदमी है। अब झगड़ा क्यों होगा? मैं उसे समझा दूँगा, आप महाप्रभु को जाने न दें। जैसे भी रख सकें अनुनय-विनय और प्रार्थना करके उन्हें यहीं रखें।’
          महाराज के चले जाने पर दूसरे दिन मिश्र जी ने सभी बातें आकर प्रभु से कहीं ! सब बातों को सुनकर प्रभु कहने लगे- ‘यह आपने क्या किया? यह तो दो लाख रुपये आपने मुझे ही दिलवा दिये। इस राज प्रतिग्रह को लेकर मैं उलटा पाप का भागी बना।’
          मिश्र जी ने सभी बातें प्रभु को समझा दीं। महाराज के शील, स्वभाव, नम्रता और सदगुणों की प्रशंसा की। प्रभु उनके भक्ति भाव की बातें सुनकर सन्तुष्ट हुए और उन्होंने अलालनाथ जाने का विचार परित्याग कर दिया।
          इधर महाराज ने आकर गोपीनाथ जी को बुलाया और उन्हें पुत्र की भाँति समझाते हुए कहने लगे- ‘देखो इस प्रकार व्यर्थ व्यय नहीं करना चाहिये। तुमने बिना पूछे इतने रुपये खर्च कर दिये इसलिये हमें क्रोध आ गया। जाओ, वे रुपये माफ किये। अब फिर ऐसा काम कभी भी न करना। यदि इतने वेतन से तुम्हारा कान नहीं चलता है तो हमसे कहना चाहिये था। तब तक तुमने यह बात हमसे कभी नहीं कही। आज से हमने तुम्हारा वेतन भी दुगुना कर दिया।’ 
          इस प्रकार दो लाख रुपये माफ हो जाने पर और वेतन भी दुगुना हो जाने से गोपीनाथ जी को परम प्रसन्नता हुई। उसी समय वे आकर प्रभु के पैरों में पड़ गये और रोते-रोते कहने लगे- ‘प्रभो ! मुझे अब अपने चरणों की शरण में लीजिये, अब मुझे इस विषय जंजाल से छुड़ाइये।'
          प्रभु ने उन्हें प्रेमपूर्वक आलिंगन किया और फिर कभी ऐसा काम न करने के लिये कहकर विदा किया।
          जब महापुरुषों की तनिक सी कृपा होने पर गोपीनाथ सपरिवार सूली से बच गये, दो लाख रुपये माफ हो गये, वेतन दुगुना हो गया और पहले से भी अधिक राजा के प्रीतिभाजन बन गये, तब जो अनन्यभाव से महापुरुषों के चरणों ही सेवा करते हैं और उनके ऊपर जो महापुरुषों की कृपा होती है, उस कृपा के फल का तो कहना ही क्या? उस कृपा से तो फिर मनुष्य का इस संसार से ही सम्बन्ध छूट जाता है। वह तो फिर सर्वतोभावेन प्रभु का ही हो जाता है। धन्य है ऐसी कृपालुता को !
    श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव!
                      ----------:::×:::---------- 
                                                - प्रभुदत्त ब्रह्मचारी
                              श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली (123)
                                             गीताप्रेस (गोरखपुर)

                       "जय जय श्री राधे"
                    "कुमार रौनक कश्यप "
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Tanu May 11, 2021

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sukhadev awari May 11, 2021

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Mona Bhardwaj May 11, 2021

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sukhadev awari May 10, 2021

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🌹•°🍁°•🥀•°🌻°•🍂•°🎋°•🌻 🔔°•🔔•°🔔°•🔔°•🔔°•🔔•°🔔 ॐ हं हनुमते नमः ।। ॐ मंगलाय नमः,ॐ भूमि पुत्राय नमः ॐ ऋण हर्त्रे नमः,ॐ धन प्रदाय नमः, ॐ स्थिर आसनाय नमः, ॐ महा कायाय नमः, ॐ सर्व कामार्थ साधकाय नमः, ॐ लोहिताय नमः, ॐ लोहिताक्षाय नमः, ॐ साम गानाम कृपा करे नमः, ॐ धरात्मजाय नमः,ॐ भुजाय नमः ॐ भौमाय नमः,ॐ भुमिजाय नमः ॐ भूमि नन्दनाय नमः ॐ अंगारकाय नमः,ॐ यमाय नमः ॐ सर्व रोग प्रहाराकाय नमः ॐ वृष्टि कर्ते नमः,ॐ वृष्टि हराते नमः ॐ सर्व कामा फल प्रदाय नमः मृत्युंजयमहादेव त्राहिमां शरणागतम्। जन्ममृत्युजराव्याधिपीड़ितः कर्मबन्धनः। सुप्रभातम् ॐ श्रीगणेशाय नमः अथ् पंचांगम् दिनाँक 11-05-2021 मंगलवार, अक्षांश- 30°:36", रेखांश 76°:80" अम्बाला शहर हरियाणा, पिन कोड 134007 🙏°•🙏•°🙏°•🙏•°🙏 🍁•°🌹°•🍂•°🌷°•💐•°🥀°•🌹 ----°•- •°-•°°•- समाप्तिकाल ----°•-•°-- 📒 तिथि अमावस्या 24:31:16 ☄️ नक्षत्र भरणी 23:31:28 🏵️ करण : 🏵️ चतुष्पाद 11:13:43 🏵️ नाग 24:31:16 🔒 पक्ष कृष्ण 🏵️ योग सौभाग्य 22:40:44 🗝️ वार मंगलवार 🌄 सूर्योदय 05:31:52 🌙 चन्द्र राशि मेष 🦌 🌌 सूर्यास्त 19:07:00 🌑 चन्द्रास्त 18:47:00 💥 ऋतु ग्रीष्म 🏵️ शक सम्वत 1943 प्लव 🏵️ कलि सम्वत 5123 🏵️ दिन काल 13:35:07 🏵️ विक्रम सम्वत 2078 🏵️ मास अमांत चैत्र 🏵️ मास पूर्णिमांत वैशाख 📯 शुभ समय 🥁 अभिजित 11:52:16 - 12:46:36 🕳️ दुष्टमुहूर्त 08:14:54 - 09:09:14 🕳️ कंटक 06:26:13 - 07:20:33 🕳️ यमघण्ट 10:03:35 - 10:57:55 😈 राहु काल 15:43:13 - 17:25:06 🕳️ कुलिक 13:40:57 - 14:35:17 🕳️ कालवेला 08:14:54 - 09:09:14 🕳️ यमगण्ड 08:55:39 - 10:37:33 🕳️ गुलिक 12:19:26 - 14:01:19 🏵️ दिशा शूल उत्तर ☘️☘️होरा 🏵️मंगल 05:31:52 - 06:39:48 🏵️सूर्य 06:39:48 - 07:47:44 🏵️शुक्र 07:47:44 - 08:55:39 🏵️बुध 08:55:39 - 10:03:35 🏵️चन्द्रमा 10:03:35 - 11:11:30 🏵️शनि 11:11:30 - 12:19:26 🏵️बृहस्पति 12:19:26 - 13:27:22 🏵️मंगल 13:27:22 - 14:35:17 🏵️सूर्य 14:35:17 - 15:43:13 🏵️शुक्र 15:43:13 - 16:51:08 🏵️बुध 16:51:08 - 17:59:04 🏵️चन्द्रमा 17:59:04 - 19:07:00 🏵️शनि 19:07:00 - 19:59:00 🏵️बृहस्पति 19:59:00 - 20:51:01 🏵️मंगल 20:51:01 - 21:43:02 🚩🚩 चोघडिया ☘️रोग 05:31:52 - 07:13:46 🕳️उद्वेग 07:13:46 - 08:55:39 🛑चल 08:55:39 - 10:37:33 ⛩️लाभ 10:37:33 - 12:19:26 ⛩️अमृत 12:19:26 - 14:01:19 🕳️काल 14:01:19 - 15:43:13 😈शुभ 15:43:13 - 17:25:06 ☘️रोग 17:25:06 - 19:07:00 🕳️काल 19:07:00 - 20:25:01 ⛩️लाभ 20:25:01 - 21:43:02 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴 🍁 ग्रह गोचर 🍁 💥 सूर्य - मेष 🦌 🌙 चन्द्र - मेष 🦌 🌑 मंगल - मिथुन 👬🏼 🌑 बुध - वृष 🐂 🌑 बृहस्पति - कुम्भ ⚱️ 🌑 शुक्र - वृष 🐂 🌑 शनि - मकर 🐊 🌑 राहु - वृष 🐂 🌑 केतु - वृश्चिक 🦞 --------------------------------------------- व्रत-त्यौहार 14 मई तक 🎊🎊🎊🎊🎊🎊 🛑 11 मई- मंगल- वैशाख (भौमवती) अमावस तर्पण आदि हेतु पितृ कार्यों के लिए स्नान आदि का विशेष माहात्म्य होगा। मेला हरिद्वार प्रयागराज आदि तीर्थ स्नान का विशेष महत्व में होगा। 🥀सूर्य 💥कृतिका में 12: 33, मेला हरिद्वार प्रयागराज , तीर्थ स्थान -माहात्म्य कुंभ पर्व, मेला पिंजौर हरियाणा। 🛑 12 मई-बुधवार - वैशाख शुक्ल 🔓पक्ष प्रारंभ, शुक्र रोहिणी में 16:31 🏵️ 13 मई -गुरु -चंद्र दर्शन, मु. 45 श्रीशिवाजी जयंती। 🏵️ 14 मई - शुक्र - अक्षय तृतीया व्रत और श्री परशुराम जयंती मनाई जाएगी। यह तिथि तीर्थ स्नान,जप -तप, दान, देव पितृ तर्पण आदि कृत्यों के लिए विशेष पुण्य फल वाली होगी। इस दिन जब पाठ, दान होम आदि कर्मों का फल अनंत गुना होता है। सभी कर्म अक्षय हो जाते हैं। इस तिथि की गणना युग आदि तिथियों में होती है। इस स्थिति को नर- नारायण परशुराम एवं हयग्रीव अवतार हुए थे तथा इसी दिन त्रेतायुग का भी आरंभ हुआ था। अक्षय तृतीया स्वयं सिद्ध मुहूर्त है और सुख सौभाग्य देने वाली तिथि मानी जाती है। इसी दिन कुंभ महापर्व हरिद्वार में मुख्य स्नान भी होगा। स्नान कुंभ महापर्व (हरिद्वार) भगवान परशुराम जयंती, केदार - बद्री यात्रा प्रारंभ, 🏵️ 14 मई - शुक्रवार-🥀💥सूर्य 🐂वृष में 23 :24, ज्येष्ठ सक्रांति - शुक्रवार वैशाख शुक्ल द्वितीया मृगशिरा नक्षत्र कालीन रात्रि 11:14 पर धनु 🏹लग्न में प्रवेश करेगी ।30 मुहूर्ति इस सक्रांति का पुण्य काल तारीख 14 को मध्याह्न बाद से अगले दिन प्रातः 6:00 बजे तक होगा। वार अनुसार मिश्रा तथा नक्षत्र अनुसार मंदाकिनी नामक यह सक्रांति राजनेताओं एवम् पशुओं के लिए सुख कर रहेगी । लोक भविष्य- मंगल -शनि के मध्य षडाष्टक योग बना हुआ है । राजनीतिक वातावरण अशांत और असमंजस पूर्ण रहेगा। सत्तारूढ़ व विपक्षी दलों के नेताओं में परस्पर टकराव व खींचातानी बढ़ेगी। परस्पर तालमेल की कमी रहेगी। सोना चांदी आदि धातुओं सरसों क्रूड -आयल में विशेष तेजी बनेगी। 11 मई को वैशाख अमावस मंगलवासरी होने से इस दिन गंगा आदि तीर्थ पर स्नान दान आदि करने से एक हजार गोदान का फल मिलता है। हरिद्वार में कुंभ महापर्व की विशेष स्नान तिथि भी रहेगी । इस कारण भी इस तिथि पर स्नान दान आदि का माहात्म्य विशेष रूपेण रहेगा । राजनीतिक पक्ष से मंगलवारी अमावस का पल शुभ नहीं माना गया । राजनेताओं में विग्रह, किसी प्रमुख नेता के अपदस्थ कहीं छत्र भंग (सत्ता परिवर्तन) उपद्रव जन- धन संपदा की क्षति हो। अल्प वृष्टि अग्निकांड आदि प्राकृतिक आपदाएं बढ़ेंगी। सक्रांति राशिफल- यह सक्रांति मेष 🦌 मिथुन👬🏼 सिंह🦁 कन्या 👩🏻‍🦱तुला ⚖️धनु 🏹मकर 🐊कुंभ ⚱️मीन🐬 राशि वालों को शुभ रहेगी। बाजार 📉मंदा तेजी 📈 14मई तक 🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️ 🛑 11 मई को सूर्य 🌞कृतिका नक्षत्र ☄️में आएगा । घी रूई सोना चांदी अलसी एरण्ड गेहूं चना मूंग मोठ चावल राई सरसों खांड में तेजी बनेगी। 🛑 12 मई को शुक्र रोहिणी नक्षत्र ☄️में आकर बुध एवं राहु के साथ एक नक्षत्र संबंध बनाएगा। अकेला शुक्र यद्यपि यहां मंदी📉 करता है परंतु बुध राहु के योग से यहां तेजी📈 मालूम होती है। सोना चांदी आदि धातुओं अल्सी सरसों तेल गुड़ खाण्ड दाग छुहारा सुपारी नारियल ऊन में पहले मंदी 📉बन फिर तेजी 📈का रुख बन जाएगा। 🛑13 मई को गुरुवार के दिन चंद्र🌃 दर्शन होने से रुई तथा सूती रेशमी ऊनी वस्त्र सरसों तेल घी में तेजी 📈बनेगी। सोना चांदी खाण्ड में कुछ मंदीे 📉रहे। 🛑 14 मई को सूर्य 🌞वृष राशि 🐂में आकर बुध शुक्र और राहु के साथ मेल करेगा। सोना चांदी गुड़ खांड शक्कर कपास रूई सूत बादाम सुपारी नारियल तिल तेल सरसों आदि में विशेष तेजी बनेगी। जौं चना गेहूं मटर अरहर मूंग चावल आदि कुछ वस्तुओं में मंदी 📉बनेगी। 🚩 दैनिक राशिफल 🚩 🦌मेष नई योजना बनेगी। कार्यप्रणाली में सुधार होगा। सामजिक कार्य करने की इच्छा जागृत होगी। प्रतिष्ठा वृद्धि होगी। सुख के साधन जुटेंगे। नौकरी में वर्चस्व स्थापित होगा। आय के स्रोत बढ़ सकते हैं। व्यवसाय लाभप्रद रहेगा। निवेश शुभ रहेगा। घर-बाहर सहयोग व प्रसन्नता में वृद्धि होगी। 🐂वृष यात्रा सफल रहेगी। नेत्र पीड़ा हो सकती है। लेन-देन में सावधानी रखें। बगैर मांगे किसी को सलाह न दें। बकाया वसूली के प्रयास सफल रहेंगे। व्यावसायिक यात्रा मनोनुकूल रहेगी। धनार्जन होगा। जोखिम उठाने का साहस कर पाएंगे। अज्ञात भय व चिंता रहेंगे। 👫मिथुन अप्रत्याशित खर्च सामने आएंगे। व्यवस्था नहीं होने से परेशानी रहेगी। व्यवसाय में कमी होगी। नौकरी में नोकझोंक हो सकती है। पार्टनरों से मतभेद हो सकते हैं। थकान महसूस होगी। अपेक्षित कार्यों में विघ्न आएंगे। चिंता तथा तनाव रहेंगे। आय में निश्चितता रहेगी। 🦀कर्क जीवनसाथी से सहयोग मिलेगा। व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। अप्रत्याशित लाभ के योग हैं। भाग्य का साथ मिलेगा। व्यवसाय ठीक चलेगा। नौकरी में अधिकार बढ़ सकते हैं। जुए, सट्टे व लॉटरी के चक्कर में न पड़ें। निवेश शुभ रहेगा। प्रमाद न करें। उत्तेजना पर नियंत्रण रखें। 🦁सिंह पूजा-पाठ व सत्संग में मन लगेगा। आत्मशांति रहेगी। कोर्ट व कचहरी के कार्य अनुकूल रहेंगे। लाभ के अवसर हाथ आएंगे। प्रसन्नता का वातावरण रहेगा। मातहतों का सहयोग मिलेगा। किसी सामाजिक कार्यक्रम में भाग लेने का अवसर प्राप्त हो सकता है। दूसरे के काम में दखल न दें। 👩🏻‍🦱कन्या स्थायी संपत्ति की खरीद-फरोख्त से बड़ा लाभ हो सकता है। प्रतिद्वंद्विता रहेगी। पार्टनरों का सहयोग समय पर मिलने से प्रसन्नता रहेगी। नौकरी में मातहतों का सहयोग मिलेगा। व्यवसाय ठीक-ठीक चलेगा। आय में वृद्धि होगी। चोट व रोग से बाधा संभव है। दूसरों के काम में दखलंदाजी न करें। ⚖️तुला मन की चंचलता पर नियंत्रण रखें। कानूनी अड़चन दूर होकर स्थिति अनुकूल रहेगी। जीवनसाथी पर आपसी मेहरबानी रहेगी। जल्दबाजी में धनहानि हो सकती है। व्यवसाय में वृद्धि होगी। नौकरी में सुकून रहेगा। निवेश लाभप्रद रहेगा। कार्य बनेंगे। घर-बाहर सुख-शांति बने रहेंगे। 🦂वृश्चिक क्रोध व उत्तेजना पर नियंत्रण रखें। विवाद को बढ़ावा न दें। पुराना रोग बाधा का कारण रहेगा। स्वास्थ्य पर खर्च होगा। वाहन व मशीनरी के प्रयोग में लापरवाही न करें। छोटी सी गलती से समस्या बढ़ सकती है। व्यवसाय ठीक चलेगा। मित्र व संबंधी सहायता करेंगे। आय बनी रहेगी। जोखिम न लें। 🏹धनु पार्टी व पिकनिक की योजना बनेगी। मित्रों के साथ समय अच्‍छा व्यतीत होगा। स्वादिष्ट भोजन का आनंद मिलेगा। बौद्धिक कार्य सफल रहेंगे। किसी प्रबुद्ध व्यक्ति का मार्गदर्शन प्राप्त होगा। नौकरी में अनुकूलता रहेगी। वाणी पर नियंत्रण रखें। शत्रु सक्रिय रहेंगे। जीवनसाथी के स्वास्थ्य की चिंता रहेगी। 🐊मकर घर-बाहर अशांति रहेगी। कार्य में रुकावट होगी। आय में कमी तथा नौकरी में कार्यभार रहेगा। बेवजह लोगों से कहासुनी हो सकती है। दु:खद समाचार मिलने से नकारात्मकता बढ़ेगी। व्यवसाय से संतुष्टि नहीं रहेगी। पार्टनरों से मतभेद हो सकते हैं। जोखिम व जमानत के कार्य टालें। जल्दबाज न करें। ⚱️कुंभ दूर से शुभ समाचार प्राप्त होंगे। आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। नौकरी में सहकर्मी साथ देंगे। व्यवसाय में जल्दबाजी से काम न करें। चोट व दुर्घटना से बचें। लाभ के अवसर हाथ आएंगे। घर-बाहर स्थिति मनोनुकूल रहेगी। प्रसन्नता का वातावरण रहेगा। वस्तुएं संभालकर रखें। 🐟मीन प्रयास सफल रहेंगे। किसी बड़े कार्य की समस्याएं दूर होंगी। मित्रों का सहयोग कर पाएंगे। कर्ज में कमी होगी। संतुष्टि रहेगी। सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ेगी। व्यापार मनोनुकूल चलेगा। अपना प्रभाव बढ़ा पाएंगे। नौकरी में अनुकूलता रहेगी। निवेश शुभ रहेगा। जोखिम व जमानत के कार्य न करें। ACHARYA ANIL PARASHAR, VADIC,KP ASTROLOGER. 🏵️आपका दिन मंगलमय हो🏵️ 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

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. "मीरा चरित" (पोस्ट-016) विवाह के उत्सव घर में होने लगे- हर तरफ कोलाहल सुनाई देता था। मेड़ते में हर्ष समाता ही न था। मीरा तो जैसी थी, वैसी ही रही। विवाह की तैयारी में मीरा को पीठी (हल्दी) चढ़ी। उसके साथ ही दासियाँ गिरधरलाल को भी पीठी करने और गीत गाने लगी। मीरा को किसी भी बात का कोई उत्साह नहीं था। किसी भी रीति-रिवाज के लिए उसे श्याम कुन्ज से खींच कर लाना पड़ता था। जो करा लो, सो कर देती। न कराओ तो गिरधर लाल के वागे (पोशाकें), मुकुट, आभूषण संवारती, श्याम कुन्ज में अपने नित्य के कार्यक्रम में लगी रहती। खाना पीना, पहनना उसे कुछ भी नहीं सुहाता। श्याम कुन्ज अथवा अपने कक्ष का द्वार बंद करके वह पड़ी-पड़ी रोती रहती। मीरा का विरह बढ़ता जा रहा है। उसके विरह के पद जो भी सुनता, रोये बिना न रहता। किन्तु सुनने का, देखने का समय ही किसके पास है ? सब कह रहे है कि मेड़ता के तो भाग जगे हैं कि हिन्दुआ सूरज का युवराज इस द्वार पर तोरण वन्दन करने आयेगा। उसके स्वागत में ही सब बावले हुये जा रहे हैं। कौन देखे-सुने कि मीरा क्या कह रही है ? वह आत्महत्या की बात सोचती - ले कटारी कंठ चीरूँ कर लऊँ मैं अपघात। आवण आवण हो रह्या रे नहीं आवण की बात॥ किन्तु आशा मरने नहीं देती। जिया भी तो नहीं जाता, घड़ी भर भी चैन नहीं था। मीरा अपनी दासियों-सखियों से पूछती कि कोई संत प्रभु का संदेशा लेकर आये हैं ? उसकी आँखें सदा भरी-भरी रहतीं। मीरा का विरह बढ़ता जा रहा है। उसके विरह के पद जो भी सुनता, रोये बिना न रहता। कोई कहियो रे प्रभु आवन की,आवन की मनभावन की॥ आप न आवै लिख नहीं भेजे, बान पड़ी ललचावन की। ऐ दोऊ नैण कह्यो नहीं मानै,नदिया बहै जैसे सावन की॥ कहा करूँ कछु बस नहिं मेरो, पाँख नहीं उड़ जावन की। मीरा के प्रभु कबरे मिलोगे, चेरी भई तेरे दाँवन की॥ कोई कहियो रे प्रभु आवन की,आवन की मनभावन की॥ मीरा का विरह बढ़ता जा रहा था। इधर महल में, रनिवास में जो भी रीति रिवाज चल रहे थे, उन पर भी उसका कोई वश नहीं था। मीरा को एक घड़ी भी चैन नहीं था। ऐसे में न तो उसका ढंग से कुछ खाने को मन होता और न ही किसी ओर कार्य में रूचि। सारा दिन प्रतीक्षा में ही निकल जाता। शायद ठाकुर किसी संत को अपना संदेश दे भेजें या कोई संकेत कर मुझे कुछ आज्ञा दें, और रात्रि किसी घायल की तरह रो-रो कर निकलती। ऐसे में जो भी गीत मुखरित होता वह विरह के भाव से सिक्त होता। घड़ी एक नहीं आवड़े तुम दरसण बिन मोय। जो मैं ऐसी जाणती रे प्रीति कियाँ दुख होय। नगर ढिंढोरा फेरती रे प्रीति न कीजो कोय। पंथ निहारूँ डगर बुहारूँ ऊभी मारग जोय। मीरा के प्रभु कबरे मिलोगा तुम मिलियाँ सुख होय। (ऊभी अर्थात किसी स्थान पर रूक कर प्रतीक्षा करनी) कभी मीरा अन्तर्व्यथा से व्याकुल होकर अपने प्राणधन को पत्र लिखने बैठती। कौवे से कहती- "तू ले जायेगा मेरी पाती, ठहर मैं लिखती हूँ।" किन्तु एक अक्षर भी लिख नहीं पाती। आँखों से आँसुओं की झड़ी कागज को भिगो देती - पतियां मैं कैसे लिखूँ लिखी ही न जाई॥ कलम धरत मेरो कर काँपत हिय न धीर धराई॥ मुख सो मोहिं बात न आवै नैन रहे झराई॥ कौन विध चरण गहूँ मैं सबहिं अंग थिराई॥ मीरा के प्रभु आन मिलें तो सब ही दुख बिसराई॥ मीरा दिन पर दिन दुबली होती जा रही थी। देह का वर्ण फीका हो गया, मानों हिमदाह से मुरझाई कुमुदिनी हो। वीरकुवंरी जी ने पिता रतनसिंह को बताया तो उन्होंने वैद्य को भेजा। वैद्य जी ने निरीक्षण करके बताया - "बाईसा को कोई रोग नहीं, केवल दुर्बलता है।" वैद्य जी गये तो मीरा मन ही मन में कहने लगी - "यह वैद्य तो अनाड़ी है, इसको मेरे रोग का मर्म क्या समझ में आयेगा।" मीरा ने इकतारा लिया और अपने ह्रदय की सारी पीड़ा इस पद में उड़ेल दी - ऐ री मैं तो प्रेम दीवानी, मेरो दरद न जाणे कोय। सूली ऊपर सेज हमारी, सोवण किस विध होय। गगन मँडल पर सेज पिया की, किस विध मिलना होय॥ घायल की गति घायल जाणे, जो कोई घायल होय। जौहर की गति जौहरी जाणे, और न जाणे कोय॥ दरद की मारी बन बन डोलूँ, वैद मिल्या नहीं कोय। मीरा की प्रभु पीर मिटै जब, वैद साँवरिया होय॥ - पुस्तक- "मीरा चरित" लेखिका:- आदरणीय सौभाग्य कुँवरी राणावत ~~~०~~~ "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " *************************************************

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sukhadev awari May 10, 2021

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🌹•°🍁°•🥀•°🌻°•🍂•°🎋°•🌻 🔔°•🔔•°🔔°•🔔°•🔔°•🔔•°🔔 जय श्री महाकालेश्वर विश्वेश्वराय नरकार्णव तारणाय कर्णामृताय शशिशेखर धारणाय कर्पूरकान्ति धवलाय जटाधराय दारिद्र्यदुःख दहनाय नमश्शिवाय गौरीप्रियाय रजनीश कलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिप कङ्कणाय गङ्गाधराय गजराज विमर्धनाय दारिद्र्यदुःख दहनाय नम:शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ ऐं क्लीं सोमाय नमः । ॐ श्रां श्रीं श्रीं सः चन्द्राय नमः । सुप्रभातम् ॐ श्रीगणेशाय नमः अथ् पंचांगम् दिनाँक 10-05-2021 सोमवार अक्षांश- 30°:36", रेखांश 76°:80" अम्बाला शहर हरियाणा, पिन कोड- 134 007 ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ ॐ शिवाय नम:,ॐ सर्वात्मने नम: ॐ त्रिनेत्राय नम:,ॐ हराय नम: ॐ इन्द्र्मुखाय नम:ॐ श्रीकंठाय नम: ॐ स द्योजाताय नम:,ॐ वामदेवाय नम: ॐ अघोरह्र्द्याय नम:,ॐ तत्पुरुषाय नम: ॐ ईशानाय नम:,ॐ अनंतधर्माय नम: ॐ ज्ञानभूताय नम:, ॐ अनंतवैराग्यसिंघायनम:, ॐ प्रधानाय नम: ॐ व्योमात्मने नम:, ॐ युक्तकेशात्मरूपाय नम: ॐ महेश्वराए नमः, ॐ शूलपानायाय नमः, ॐ पिनाकपनाये नमः, ॐ पशुपति नमः । 🙏🙏🙏🙏🙏 🍁🍁•°🌹°•🍂•°🌷°•💐•°🥀 --------------समाप्तिकाल----------------- 📒 तिथि चतुर्दशी 21:57:39 ☄️ नक्षत्र अश्विनी 20:25:55 🏵️ करण : 🏵️विष्टि 08:43:48 🏵️शकुन 21:57:39 🔒 पक्ष कृष्ण 🏵️ योग आयुष्मान 21:38:01 🗝️ वार सोमवार 🌄 सूर्योदय 05:32:36 🌃चन्द्रोदय 29:17:00 🌙 चन्द्र राशि 🦌मेष 🌌 सूर्यास्त 19:06:20 🌑 चन्द्रास्त 17:52:59 💥 ऋतु ग्रीष्म 🏵️शक सम्वत 1943 प्लव 🏵️ कलि सम्वत 5123 🏵️ दिन काल 13:33:43 🏵️ विक्रम सम्वत 2078 🏵️ मास अमांत चैत्र 🏵️ मास पूर्णिमांत वैशाख 📯 शुभ समय 🥁 अभिजित 11:52:21 - 12:46:36 🕳️ दुष्टमुहूर्त : 🕳️ 12:46:36 - 13:40:51 🕳️ 15:29:21 - 16:23:36 🕳️ कंटक 08:15:21 - 09:09:36 🕳️ यमघण्ट 11:52:21 - 12:46:36 😈 राहु काल 07:14:20 - 08:56:02 🕳️ कुलिक 15:29:21 - 16:23:36 🕳️ कालवेला 10:03:51 - 10:58:06 🕳️ यमगण्ड 10:37:45 - 12:19:28 🕳️ गुलिक 14:01:11 - 15:42:54 🏵️दिशा शूल पूर्व 🚩🚩 होरा 🏵️चन्द्रमा 05:32:36 - 06:40:25 🏵️शनि 06:40:25 - 07:48:14 🏵️बृहस्पति 07:48:14 - 08:56:02 🏵️मंगल 08:56:02 - 10:03:51 🏵️सूर्य 10:03:51 - 11:11:40 🏵️शुक्र 11:11:40 - 12:19:29 🏵️बुध 12:19:29 - 13:27:17 🏵️चन्द्रमा 13:27:17 - 14:35:06 🏵️शनि 14:35:06 - 15:42:55 🏵️बृहस्पति 15:42:55 - 16:50:43 🏵️मंगल 16:50:43 - 17:58:32 🏵️सूर्य 17:58:32 - 19:06:20 🏵️शुक्र 19:06:20 - 19:58:28 🏵️बुध 19:58:28 - 20:50:36 🏵️चन्द्रमा 20:50:36 - 21:42:43 ☘️☘️चोघड़िया ⛩️अमृत 05:32:36 - 07:14:20 😈काल 07:14:20 - 08:56:02 ⛩️शुभ 08:56:02 - 10:37:45 ☘️रोग 10:37:45 - 12:19:28 🕳️उद्वेग 12:19:28 - 14:01:11 🛑चल 14:01:11 - 15:42:54 ⛩️लाभ 15:42:54 - 17:24:37 ⛩️अमृत 17:24:37 - 19:06:20 🛑चल 19:06:20 - 20:24:32 ☘️रोग 20:24:32 - 21:42:43 🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴 🍁 ग्रह गोचर 🍁 🌞 सूर्य - मेष 🦌 🌙 चन्द्र - मेष 🦌 🌑 मंगल - मिथुन 👬🏼 🌑 बुध - वृष 🐂 🌑 बृहस्पति - कुम्भ ⚱️ 🌑 शुक्र - वृष 🐂 🌑 शनि - मकर 🐊 🌑 राहु - वृष 🐂 🌑 केतु - वृश्चिक 🦞 --------------------------------------------- व्रत-त्यौहार 14 मई तक 🎊🎊🎊🎊🎊🎊 🛑10 मई -चंद्र -भद्रा 8:44 तक गण्डमूल 20 :25 तक। 🛑 11 मई- मंगल- वैशाख (भौमवती) अमावस तर्पण आदि हेतु पितृ कार्यों के लिए स्नान आदि का विशेष माहात्म्य होगा। मेला हरिद्वार प्रयागराज आदि तीर्थ स्नान का विशेष महत्व में होगा। 🥀सूर्य 💥कृतिका में 12: 33, मेला हरिद्वार प्रयागराज , तीर्थ स्थान -माहात्म्य कुंभ पर्व, मेला पिंजौर हरियाणा। 🛑 12 मई-बुधवार - वैशाख शुक्ल 🔓पक्ष प्रारंभ, शुक्र रोहिणी में 16:31 🏵️ 13 मई -गुरु -चंद्र दर्शन, मु. 45 श्रीशिवाजी जयंती। 🏵️ 14 मई - शुक्र - अक्षय तृतीया व्रत और श्री परशुराम जयंती मनाई जाएगी। यह तिथि तीर्थ स्नान,जप -तप, दान, देव पितृ तर्पण आदि कृत्यों के लिए विशेष पुण्य फल वाली होगी। इस दिन जब पाठ, दान होम आदि कर्मों का फल अनंत गुना होता है। सभी कर्म अक्षय हो जाते हैं। इस तिथि की गणना युग आदि तिथियों में होती है। इस स्थिति को नर- नारायण परशुराम एवं हयग्रीव अवतार हुए थे तथा इसी दिन त्रेतायुग का भी आरंभ हुआ था। अक्षय तृतीया स्वयं सिद्ध मुहूर्त है और सुख सौभाग्य देने वाली तिथि मानी जाती है। इसी दिन कुंभ महापर्व हरिद्वार में मुख्य स्नान भी होगा। स्नान कुंभ महापर्व (हरिद्वार) भगवान परशुराम जयंती, केदार - बद्री यात्रा प्रारंभ, 🏵️ 14 मई - शुक्रवार-🥀💥सूर्य 🐂वृष में 23 :24, ज्येष्ठ सक्रांति - शुक्रवार वैशाख शुक्ल द्वितीया मृगशिरा नक्षत्र कालीन रात्रि 11:14 पर धनु 🏹लग्न में प्रवेश करेगी ।30 मुहूर्ति इस सक्रांति का पुण्य काल तारीख 14 को मध्याह्न बाद से अगले दिन प्रातः 6:00 बजे तक होगा। वार अनुसार मिश्रा तथा नक्षत्र अनुसार मंदाकिनी नामक यह सक्रांति राजनेताओं एवम् पशुओं के लिए सुख कर रहेगी । लोक भविष्य- मंगल -शनि के मध्य षडाष्टक योग बना हुआ है । राजनीतिक वातावरण अशांत और असमंजस पूर्ण रहेगा। सत्तारूढ़ व विपक्षी दलों के नेताओं में परस्पर टकराव व खींचातानी बढ़ेगी। परस्पर तालमेल की कमी रहेगी। सोना चांदी आदि धातुओं सरसों क्रूड -आयल में विशेष तेजी बनेगी। 11 मई को वैशाख अमावस मंगलवासरी होने से इस दिन गंगा आदि तीर्थ पर स्नान दान आदि करने से एक हजार गोदान का फल मिलता है। हरिद्वार में कुंभ महापर्व की विशेष स्नान तिथि भी रहेगी । इस कारण भी इस तिथि पर स्नान दान आदि का माहात्म्य विशेष रूपेण रहेगा । राजनीतिक पक्ष से मंगलवारी अमावस का पल शुभ नहीं माना गया । राजनेताओं में विग्रह, किसी प्रमुख नेता के अपदस्थ कहीं छत्र भंग (सत्ता परिवर्तन) उपद्रव जन- धन संपदा की क्षति हो। अल्प वृष्टि अग्निकांड आदि प्राकृतिक आपदाएं बढ़ेंगी। सक्रांति राशिफल- यह सक्रांति मेष 🦌 मिथुन👬🏼 सिंह🦁 कन्या 👩🏻‍🦱तुला ⚖️धनु 🏹मकर 🐊कुंभ ⚱️मीन🐬 राशि वालों को शुभ रहेगी। बाजार 📉मंदा तेजी 📈 14मई तक 🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️🏵️ 🛑 11 मई को सूर्य 🌞कृतिका नक्षत्र ☄️में आएगा । घी रूई सोना चांदी अलसी एरण्ड गेहूं चना मूंग मोठ चावल राई सरसों खांड में तेजी बनेगी। 🛑 12 मई को शुक्र रोहिणी नक्षत्र ☄️में आकर बुध एवं राहु के साथ एक नक्षत्र संबंध बनाएगा। अकेला शुक्र यद्यपि यहां मंदी📉 करता है परंतु बुध राहु के योग से यहां तेजी📈 मालूम होती है। सोना चांदी आदि धातुओं अल्सी सरसों तेल गुड़ खाण्ड दाग छुहारा सुपारी नारियल ऊन में पहले मंदी 📉बन फिर तेजी 📈का रुख बन जाएगा। 🛑13 मई को गुरुवार के दिन चंद्र🌃 दर्शन होने से रुई तथा सूती रेशमी ऊनी वस्त्र सरसों तेल घी में तेजी 📈बनेगी। सोना चांदी खाण्ड में कुछ मंदीे 📉रहे। 🛑 14 मई को सूर्य 🌞वृष राशि 🐂में आकर बुध शुक्र और राहु के साथ मेल करेगा। सोना चांदी गुड़ खांड शक्कर कपास रूई सूत बादाम सुपारी नारियल तिल तेल सरसों आदि में विशेष तेजी बनेगी। जौं चना गेहूं मटर अरहर मूंग चावल आदि कुछ वस्तुओं में मंदी 📉बनेगी। 🏵️🚩 दैनिक राशिफल 🚩🏵️ 🦌मेष धनार्जन सुगम होगा। विद्यार्थी वर्ग सफलता अर्जित करेगा। पठन-पाठन में मन लगेगा। दूर यात्रा की योजना बन सकती है। मनपसंद भोजन का आनंद प्राप्त होगा। वरिष्ठजनों का मार्गदर्शन प्राप्त होगा। जीवनसाथी के स्वास्थ्य की चिंता रहेगी। स्वास्थ्य कमजोर रहेगा। बेचैनी रहेगी। 🐂वृष वाणी पर नियंत्रण रखें। किसी के व्यवहार से क्लेश हो सकता है। पुराना रोग उभर सकता है। दु:खद समाचार मिल सकता है, धैर्य रखें। जोखिम व जमानत के कार्य टालें। प्रतिद्वंद्विता बढ़ेगी। पारिवारिक चिंता में वृद्धि होगी। आवश्यक वस्तु समय पर नहीं मिलेगी। तनाव रहेगा। 👫मिथुन शत्रु नतमस्तक होंगे। विवाद को बढ़ावा न दें। प्रयास सफल रहेंगे। सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। आय के स्रोतों में वृद्धि हो सकती है। व्यवसाय ठीक चलेगा। चोट व रोग से बाधा संभव है। फालतू खर्च होगा। मातहतों का सहयोग प्राप्त होगा। प्रसन्नता रहेगी। जल्दबाजी न करें। 🦀कर्क लेन-देन में सावधानी रखें। शारीरिक कष्ट संभव है। परिवार में तनाव रह सकता है। शुभ समाचार मिलेंगे। आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। जोखिम उठाने का साहस कर पाएंगे। भाइयों का सहयोग प्राप्त होगा। परिवार के साथ मनोरंजन का कार्यक्रम बन सकता है। व्यवसाय ठीक चलेगा। प्रमाद न करें। 🦁सिंह रोजगार प्राप्ति के प्रयास सफल रहेंगे। अप्रत्याशित लाभ हो सकता है। सट्टे व लॉटरी से दूर रहें। व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। कोई बड़ी समस्या से छुटकारा मिल सकता है। आय में वृद्धि होगी। प्रसन्नता में वृद्धि होगी। पारिवारिक चिंता बनी रहेगी। 👩🏻‍🦱कन्या अप्रत्याशित खर्च सामने आएंगे। कर्ज लेना पड़ सकता है। स्वास्थ्य का पाया कमजोर रहेगा। किसी विवाद में उलझ सकते हैं। चिंता तथा तनाव रहेंगे। जोखिम न उठाएं। घर-बाहर असहयोग मिलेगा। अपेक्षाकृत कार्यों में विलंब होगा। आय में कमी हो सकती है। ⚖️तुला बकाया वसूली के प्रयास सफल रहेंगे। व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। आय के नए स्रोत प्राप्त हो सकते हैं। व्यापार-व्यवसाय में लाभ होगा। प्रेम-प्रसंग में अनुकूलता रहेगी। कीमती वस्तुएं संभालकर रखें। बेचैनी रहेगी। थकान महसूस होगी। वरिष्ठजन सहयोग करेंगे। 🦂वृश्चिक नई आर्थिक नीति बनेगी। कार्यप्रणाली में सुधार होगा। सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। पार्टनरों का सहयोग मिलेगा। कारोबारी अनुबंधों में वृद्धि हो सकती है। समय का लाभ लें। व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। नेत्र पीड़ा हो सकती है। कानूनी बाधा आ सकती है। विवाद न करें। 🏹धनु बेचैनी रहेगी। चोट व रोग से बचें। काम का विरोध होगा। तनाव रहेगा। कोर्ट व कचहरी के काम अनुकूल होंगे। पूजा-पाठ में मन लगेगा। तीर्थयात्रा की योजना बनेगी। लाभ के अवसर हाथ आएंगे। व्यवसाय ठीक चलेगा। सुख के साधनों पर व्यय हो सकता है। पारिवारिक सहयोग मिलेगा। प्रमाद न करें। 🐊मकर स्वास्थ्य का पाया कमजोर रहेगा। विवाद से क्लेश संभव है। वाहन व मशीनरी के प्रयोग में लापरवाही न करें। अपेक्षित कार्यों में अप्रत्याशित बाधा आ सकती है। तनाव रहेगा। कीमती वस्तुएं संभालकर रखें। जोखिम व जमानत के कार्य टालें। दूसरों के झगड़ों में न पड़ें। राज्य के प्रतिनिधि सहयोग करेंगे। ⚱️कुंभ कष्ट, भय, चिता व बेचैनी का वातावरण बन सकता है। कोर्ट व कचहरी के काम मनोनुकूल रहेंगे। जीवनसाथी से सहयोग मिलेगा। प्रसन्नता रहेगी। मातहतों से संबंध सुधरेंगे। व्यवसाय ठीक चलेगा। जल्दबाजी न करें। कुबुद्धि हावी रहेगी। स्वास्थ्य कमजोर रहेगा। 🐟मीन धन प्राप्ति सुगम होगी। ऐश्वर्य के साधनों पर बड़ा खर्च हो सकता है। भूमि, भवन, दुकान व फैक्टरी आदि के खरीदने की योजना बनेगी। रोजगार में वृद्धि होगी। उन्नति के मार्ग प्रशस्त होंगे। अपरिचितों पर अतिविश्वास न करें। प्रमाद न करें। ACHARYA ANIL PARASHAR, VADIC,KP. ASTROLOGER. 🚩आपका दिन मंगलमय हो🚩 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

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Meena Dubey May 10, 2021

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