Neha Sharma
Neha Sharma Dec 14, 2019

*जय श्री राधेकृष्णा*🌹🌹🙏 *शुभ रात्रि वंदन*🌹🌹🙏

*जय श्री राधेकृष्णा*🌹🌹🙏
*शुभ रात्रि वंदन*🌹🌹🙏

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कामेंट्स

🙏🌹राजकुमार राठोड🌹🙏 Dec 14, 2019
🍒🌴‼ *श्रीकृष्ण* ‼🌴🍒 *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी,* *हे नाथ नारायण वासुदेवाय!!!* ꧁!! *Զเधॆ Զเधॆ !!*꧂ ‼ *जय श्री कृष्ण* ‼

Pinu Dhiman from Haryana Dec 14, 2019
Jai Shri krishna ji good night my dear sister ji 🙏🏵️🙏🏵️aap ki ratri shubh ho manglemay ho god bless u sister 🙏🙌🌲🌲

kamlesh goyal Dec 14, 2019
Jai shri Krishna ji Radhe Radhe good night my dear sister Aap sada kush rhe ji Radhe Radhe ji

Anilkumar marathe Dec 14, 2019
🌹 रिश्तो से बड़ी चाहत क्या होगी, दोस्ती से बड़ी इबादत क्या होगी, जिसे दोस्त मिल सके आप जैसा, उसे जिंदगी से शिकायत क्या होगी… 🙏 जय श्री कृष्ण 🌹 🌹शुभरात्रि 🌹

Ansouya Ansouya Dec 14, 2019
सच में बहना कान्हा जी है तो क्या कमी है शुभ रात्रि वनदन जी आप का हर पल मंगलमय हो 🙏🙏🙏

chandraparkash poranik Dec 14, 2019
शुभ रात्रि जय श्री कृष्ण जय श्री राधे

Rakesh Kumar Chandel Dec 14, 2019
Radhe Radhe Jai Shree Radhe Karishna Good night sweet dream sweet sleep.How r u dear Sister.God bless u nd your family.Always be happy nd healthy.Take care. Radhe Radhe

N. K. Mishra Dec 14, 2019
radhy radhy Krishna good night sahi kaha aap ne ji

🌼k l tiwari🌼 Dec 14, 2019
जय श्री कृष्णा बहन जय श्री माता की बहन, सादर चरण स्पर्श करता हूँ मेरी प्यारी बहन,श्रीमाता आपका हर पल खुशियों से भरा रखें बहन शुभरात्रि वन्दन बहन🌹🌹🙏🙏🙏🌹🌹

zala. Hanubha Dec 14, 2019
jay shree radhe krishna ji good night vandan ji🙏🙏

Neha Sharma Dec 22, 2019

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Neha Sharma Dec 21, 2019

*जय श्री राधेकृष्णा*🥀🥀🙏 *शुभ रात्रि वंदन*🥀🥀🙏 *महादेव के सेवक कालभैरव करते हैं इस शहर की रखवाली, लाखों विदेशी भी हैं यहां की जगहों के दीवाने* *सैर कर दुनिया की गाफिल जिंदगानी फिर कहां, जिंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहां। ख्वाजा मिर दर्द की ये लोकप्रिय शेर आपने जरूर सुनी होगी। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे शहर के बारे में बताने जा रहे हैं जहां जाने के लिए किसी खास उम्र की जरूरत नहीं होती। बच्चों से लेकर बुढ़े हर वर्ग के लोगों को यह शहर सूकून ही देता है। हम बात कर रहे हैं वाराणसी यानी बनारस की। इस शहर को महादेव की नगरी भी कहा जाता है। आइए जानते हैं इस शहर के लोकप्रिय जगहों के बारे में... *कालभैरव मंदिर*.....*भगवान शिव की पावन नगरी बनारस 'मोक्ष' का शहर कहलाता है। महादेव की इस नगरी को बाबा कालभैरव सुरक्षा देते हैं। बनारस में काशी विश्वनााथ के नाम से भगवान शिव का एक बहुत ही मशहूर मंदिर है। यह मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। मान्यताओं के अनुसार बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए आने वाले भक्तों को कालभैरव के दर्शन करना जरुरी होता है। बाबा कालभैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है। बाबा कालभैरव का मंदिर विश्वनाथ मंदिर के पास में ही है।* *गंगा स्नान*....*गंगा किनारे बसे वाराणसी को घाटों का शहर भी कहा जाता है। यहां यूं तो कुल 84 घाट हैं, लेकिन दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट और मणिकर्णिका घाट का ज्यादा महत्व है। श्रद्धालु यहां पवित्र नदी गंगा में डुबकी लगाकर मोक्ष की कामना करते हैं। गंगा घाटों पर मन को अलग ही शांति मिलती है। आपको ऐसा लगेगा जैसे आपकी चिंता दूर हो रही है। गंगा में बोट राइडिंग का भी अलग ही मजा है। काशी विश्वनाथ मंदिर के पास में ही दशाश्वमेध घाट है।* *गंगा आरती*.....*बनारस के कई घाटों पर गंगा आरती की जाती है। लेकिन दशाश्वमेध घाट पर हर दिन भव्य तरीके से गंगा आरती की जाती है। वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर होने वाली इस भव्य गंगा आरती की शुरुआत 1991 से हुई थी। यह आरती हरिद्वार में हो रही आरती का जीता जागता उदाहरण है। हरिद्वार की परंपरा को काशी ने पूरी तरह आत्मसात किया है। आरती के समय गंगा नदी में बहता जल पूरी तरह से रोशनी में सराबोर हो जाता है।* *लोकल बाजार में शॉपिंग*......*विश्वनाथ मंदिर वाली गली के साथ-साथ अगर आप पास की गलियों में खरीदारी नहीं की तो बहुत कुछ मिस कर सकते हैं। इन बाजारों में ऐसा कुछ भी नहीं है जो न मिल जाए।* *नया काशी विश्वनाथ मंदिर*.....*यह नया मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर से लगभग 7 किलोमीटर के दूरी पर स्थित है। भारत के मशहूर विश्वविद्यालय में से एक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में स्थित नया काशी विश्वनाथ मंदिर घूमने के हिसाब से बहुत ही अच्छी जगह है।*

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Neha Sharma Dec 21, 2019

*जय श्री राधेकृष्णा*🥀🥀🙏 *स्वस्थ जीवन पाएं कुंडलिनी जगाएं, जानें बॉडी में मौजूद 7 चक्रों के बारे में* *कुंडलिनी शब्द संस्कृत के कुंडल शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है घुमावदार। मान्यता है कि कुंडलिनी शक्ति प्रत्येक व्यक्ति के मूलाधार चक्र में सर्प के समान कुंडली मारकर सोयी रहती है, जिसे हठयोग साधनाओं से जगाना होता है। इसे जगाने में आप जितने सफल होते जाएंगे, आपका संपूर्ण स्वास्थ्य उतना बेहतर होता जाएगा।* *कुंडलिनी जागरण की कला को अच्छी तरह समझने के लिए सबसे पहले हमें हठयोग के विषय में संक्षिप्त जानकारी प्राप्त करनी होगी। हठयोग योग का एक प्रमुख प्रकार है। हठयोग में हठ शब्द ह और ठ दो वर्णों के योग से बना है, जिसमें पहले का अर्थ सूर्य और दूसरे का चन्द्र होता है। सूर्य और चन्द्र के ऐक्य को ही हठयोग कहा जाता है। हठयोग ग्रंथों के अनुसार हमारे शरीर में 7 चक्र, 72 हजार नाड़ियां और 10 प्रकार की वायु या प्राण होते हैं।* *शरीर में मूलत: सात मुख्य चक्र होते हैं, जो मेरुदंड के मध्य से गुजरने वाली सुषुम्ना नाड़ी में स्थित हैं। सुषुम्ना मूलाधार चक्र से आरम्भ होकर सिर के शीर्ष भाग तक जाती है। ये चक्र नाड़ियों से संबद्ध होते हैं। चक्रों को प्रतीकात्मक रूप से कमल के फूल के रूप में दिखाते हैं। *सप्त चक्रों का वर्णन* *मूलाधार चक्र*.....*यह पुरुष शरीर में जनने्द्रिरय और गुदा के बीच तथा स्त्री शरीर में गर्भाशय ग्रीवा में स्थित है। मूलाधार का अर्थ ही होता है हमारे अस्तित्व का आधार, इसीलिए इसे मूल केंद्र माना जाता है। मूलाधार चक्र पृथ्वी तत्व तथा हमारी घ्राणे्द्रिरय से संबद्ध है। इसका प्रतीक है चार दल वाला गहरा लाल कमल। इसका बीज मंत्र लं है। इसके केंद्र में पृथ्वी तत्व का यंत्र पीला वर्ग है। इसी वर्ग के केंद्र में एक लाल त्रिभुज है, जिसका शीर्ष नीचे की ओर है। वह शक्ति का प्रतीक है। त्रिभुज के भीतर एक लिंग है, जो सूक्ष्म शक्ति का प्रतीक है। हमारी कुंडलिनी शक्ति सुषुप्तावस्था में इसी लिंग के चारों ओर साढ़े तीन लपेट लिए हुए लेटी हुई है। यही कुंडलिनी शक्ति का निवास स्थान है। यही स्थान मनुष्य की समस्त शक्ति-, भावनात्मक, मानसिक, अती्द्रिरय या आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र है। हठयोग का उद्देश्य है आत्म शुद्धि, मानसिक एकाग्रता तथा क्रियाओं द्वारा इसी सुषुप्त कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर इसे विभिन्न चक्रों से होते हुए सहस्रार चक्र तक ले जाना, जिसे शिव स्थान भी कहते हैं।* *स्वाधिष्ठान चक्र*...... *मूलाधार चक्र से लगभग दो अंगुल ऊपर मेरुदंड में जनने्द्रिरय के ठीक पीछे स्वाधिष्ठान चक्र होता है। यह जल तत्व तथा रसे्द्रिरय से संबद्ध है। इस चक्र को सिंदूरी रंग के षट्दलीय कमल पुष्प के रूप से चित्रित किया जाता है। इसका बीज मंत्र वं है। यह चक्र इ्द्रिरय सुख भोग की अभिलाषा का प्रतीक है। स्वाधिष्ठान की मुख्य वायु ध्यान है तथा यह चक्र प्राणमय कोश का निवास स्थान है। इसकी शुद्धि से व्यक्ति पाशविक वृत्तियों से ऊपर उठ जाता है।* *मणिपुर चक्र*......*यह नाभि के ठीक पीछे मेरुदंड में स्थित है। यह अग्नि तत्व तथा दृष्टे्द्रिरय से संबद्ध है। इस चक्र को 10 दलों वाले कमल के रूप में चित्रित किया जाता है। कमल के मध्य में अग्नि तत्व का गहरे लाल रंग का त्रिभुज है। इसका बीज मंत्र ए है। इसका संबंध महत्वाकांक्षा, इच्छाशक्ति तथा शासन करने की क्षमता से है। हमारा पूरा पाचन तंत्र इसी चक्र से नियंत्रित होता है।* *अनाहत चक्र*......*वक्षस्थल के केन्द्र के पीछे मेरुदंड में अनाहत चक्र स्थित है। यह वायु और स्पर्श से संबद्ध है। कमल के केन्द्र में एक षट्कोणीय आकृति है। इसका बीज मंत्र यं है। यह नि:स्वार्थ पे्रम का प्रतीक है। इस स्तर पर भाईचारे एवं सहनशीलता की भावना विकसित होने लगती है तथा सभी जीवों के प्रति निष्काम प्रेम का भाव रहता है। जब कुंडलिनी जागृत होकर अनाहत चक्र का भेदन करती है, तो साधक दिव्य प्रेम से ओतप्रोत हो जाता है।* *विशुद्धि चक्र*......*यह गर्दन तथा कंठ कूप के पीछे मेरुदंड में स्थित है। यह शुद्धि का केंद्र है। इसे 16 दल वाले बैंगनी कमल द्वारा दर्शाया जाता है। कमल के केंद्र में सफेद वृत्त है, जो आकाश तत्व का यंत्र है। इसका बीज मंत्र हं है। विशुद्ध चक्र पर चेतना पहुंचने पर साधक में सही समझ तथा विवेक जागृत होता है। सत्य-असत्य में अंतर करने की क्षमता बढ़ जाती है। यह शब्द से संबद्ध है। इस चक्र के जागृत होने पर साधक में नेतृत्व क्षमता विकसित हो जाती है।* *आज्ञा चक्र*......*मध्य मस्तिष्क में, भूमध्य के पीछे मेरुदंड के शीर्ष पर आज्ञा चक्र स्थित है। इस चक्र को तीसरा नेत्र, शिव नेत्र, ज्ञान चक्षु, त्रिवेणी आदि नाम से भी जाना जाता है। आज्ञा चक्र को चांदी के रंग के दो पंखुड़ियों वाले कमल के रूप में दर्शाया जाता है। ये दो पंखुड़ियां सूर्य तथा चन्द्र या पिंगला एवं इड़ा का प्रतीक हैं। कमल के केंद्र में पवित्र बीज मंत्र ऊं अंकित है। जब आज्ञा चक्र जागृत होता है, तो मन स्थिर तथा शक्तिशाली हो जाता है और पांच तत्वों के ऊपर साधक का नियंत्रण हो जाता है। इसके अतिरिक्त साधक इस केंद्र से विचारों का संपे्रषण  एवं अधिग्रहण करने में सक्षम हो जाता है। इसके जागरण से बुद्धि, स्मृति एवं प्रबल एकाग्रता शक्ति प्राप्त हो जाती है।* *सहस्रार चक्र*......*यह सिर के शीर्ष भाग, जो नवजात शिशु के सिर का सबसे कोमल भाग होता है, में अवस्थित है। यह वस्तुत: चक्र नहीं है। यह चेतना या सर्वोच्च स्थान है। कुंडलिनी शक्ति को मूलाधार से जागृत कर सभी चक्रों को भेदकर यहां पर पहुंचना होता है। यही उसकी अंतिम गति है। सहस्रार को हजार दल वाले दीप्त कमल के रूप में दर्शाया जाता है। मूलाधार शक्ति प्रकृति या पार्वती का  स्थान है। सुषुप्त कुंडलिनी को जागृत कर सभी चक्रों को भेदते हुए सहस्रार चक्र, जिसे शिव, चेतना या परमात्मा का स्थान माना गया है, में स्थित होने को ही कुंडलिनी का पूर्ण जागरण या जीवात्मा और परमात्मा का मिलन या चेतना और पदार्थ का मिलन कहते हैं। यहां योगी परम गति को प्राप्त करता है, जन्म-मृत्यु के चक्र को पार कर जाता है।* *नाड़ियां*......*गोरक्ष संहिता के अनुसार नाभि के नीचे नाड़ियों का मूल स्थान है, उसमें से 72 हजार नाड़ियां निकली हैं, उनमें प्रमुख 72 हैं। उनमें से तीन प्रमुख नाड़ियां हैं- इड़ा, पिंगला तथा सुषुम्ना।* *इड़ा नाड़ी बायीं नासिका तथा पिंगला नाड़ी दायीं नासिका से संबद्ध है।  इड़ा नाड़ी मूलाधार के बाएं भाग से निकलकर प्रत्येक चक्र को पार करते हुए मेरुदंड में सर्पिल गति से ऊपर चढ़ती है और आज्ञा चक्र के बाएं भाग में इसका अंत होता है। पिंगला नाड़ी मूलाधार के दाएं भाग से निकलकर इड़ा की विपरीत दिशा में सर्पिल गति से ऊपर चढ़ती हुई आज्ञा चक्र के दाएं भाग में समाप्त होती है। इड़ा निष्क्रिय, अंतर्मुखी एवं नारी जातीय तथा चन्द्र नाड़ी का प्रतीक है। पिंगला को सूर्य नाड़ी भी कहते हैं। इन दोनों के बीच में सुषुम्ना नाड़ी है, जो मेरुदंड के केंद्र में स्थित आध्यात्मिक मार्ग है। इसका आरंभ मूलाधार चक्र तथा अंत सहस्रार में होता है। इसी सुषुम्ना नाड़ी के आरंभ बिंदु पर इसका मार्ग अवरुद्ध किए हुए कुंडलिनी शक्ति सोयी पड़ी है। इस शक्ति के जग जाने पर शक्ति सुषुम्ना, जिसे ब्रह्मरंध्र भी कहते हैं, में प्रवेश कर सभी चक्रों को भेदती हुई सहस्रार चक्र पर शिव से मिल जाती है।* *जब बायीं नासिका में श्वास का प्रवाह अधिक होता है, तो इड़ा नाड़ी, जो हमारी मानसिक शक्ति का प्रतीक है, की प्रधानता रहती है। इसके विपरीत  जब दायीं नासिका में श्वास का अधिक प्रवाह होता है, तो यह शारीरिक शक्ति का परिचायक है तथा यह शरीर में ताप, बहिर्मुखता को दर्शाता है। जब दोनों नासिकाओं में प्रवाह समान हो, तो सुषुम्ना का प्राधान्य रहता है। इड़ा एवं पिंगला में संतुलन लाने के लिए शरीर को पहले षटकर्म, आसन, प्राणायाम, बंध तथा मुद्रा द्वारा शुद्ध करना होता है। जब इड़ा एवं पिंगला नाड़ियां शुद्ध तथा संतुलित हो जाती हैं, तथा मन नियंत्रण में आ जाता है, सुषुम्ना नाड़ी प्रवाहित होने लगती है। योग में सफलता के लिए सुषुम्ना का प्रवाहित होना आवश्यक है। यदि पिंगला प्रवाहित हो रही है, तो शरीर अशांत तथा अति सक्रियता बनी रहेगी, यदि इड़ा प्रवाहित हो रही है, तो मन अति क्रियाशील और बेचैन रहता है। जब सुषुम्ना प्रवाहित होती है, तब कुंडलिनी जाग्रत होकर चक्रों को भेदती हुई ऊपर की ओर चढ़ती है।* *प्राण*.....*प्राण का अर्थ है जीवनी शक्ति। मनीषियों ने इस जीवनी शक्ति को स्थूल रूप में श्वास से संबद्ध माना है। श्वास के माध्यम से ही मनुष्य के शरीर में प्राण तथा जीवन का संचार होता है। मानव शरीर में 5 प्रकार की वायु या प्राण हैं-अपान, समान, प्राण, उदान और व्यान। अपान गुदा प्रदेश में स्थित है, समान नाभि प्रदेश में स्थित है, प्राण की स्थिति हृदय क्षेत्र में, उदान गले के क्षेत्र में स्थित है और व्यान पूरे शरीर में व्याप्त है।* *हठयोग ग्रंथों में प्राणायाम के अभ्यास की चर्चा की गई है। इनके अभ्यास से प्राण यानी ऊर्जा शक्ति पर नियंत्रण या नियमन संभव हो जाता है। प्राण वायु को अपान वायु में तथा अपान को प्राणवायु में हवन करने से भी कुंडलिनी शक्ति जागृत होकर सुषुम्ना के अंदर प्रवेश करती है और चक्रों का भेदन करती हुई सहस्रार चक्र में स्थित कराने में सहायक सिद्ध होती है।  कुंडलिनी जागृत करने हेतु मुख्य प्राणायाम हैं-सूर्यभेदी, उज्जायी, शीतली, भ्त्रिरका, भ्रामरी, मूर्च्छ, प्लाविनी, नाड़ीशोधन आदि।* *यौगिक अभ्यास के लिए उपयुक्त स्थान*.....*एकांत, शांत, साफ-सुथरा, समतल, हवादार, कीड़े-मच्छर आदि से रहित, अग्नि तथा पत्थर आदि से थोड़ा दूर ही योग का अभ्यास करना चाहिए। हठयोग प्रदीपिका के लेखक स्वामी स्वात्मारात ने उत्साह, साहस, धैर्य, तत्वज्ञान, दृढ़ निश्चय तथा एकांत में रहने को हठयोग में सफलता के लिए साधक तत्व के रूप में माना है।* *कैसा हो आहार*......*कटु, अम्ल (खट्टा), तीखा, नमकीन, गरम, हरी शाक, खट्टी सब्जी, खट्टे फल, तेल, तिल, मदिरा, मछली, बकरे आदि का मांस, दही-छाछ, हींग, लहसुन आदि को योग साधकों के लिए अपथ्यकारक कहा गया है। दुबारा गर्म किया हुआ खाना, अधिक नमक और खटाई वाला भोजन भी वर्जित है। मधुर, चिकनाई युक्त, रसयुक्त, सादा, पौष्टिक भोजन करें। जितना भोजन करने की जरूरत महसूस हो, उसका एक चौथाई हिस्सा कम ही खाएं।*

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Neha Sharma Dec 21, 2019

*जय श्री राधेकृष्णा*🥀🥀🙏 *शुभप्रभात् वंदन*🥀🥀🙏 *शुभ शनिवार*.🥀🥀🙏 *महाभारत के ये 6 योद्धा पिछले जन्म में इस देवी-देवता के थे अवतार, जानें द्रौपदी का पूर्वजन्म* *महाभारत की कहानियों से आज भी हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।न्याय और अन्याय के युद्ध में कई पात्र ऐसे थे, जिन्हें आज भी याद किया जाता है। महाभारत के कुछ पात्र पूर्वजन्म में देवी-देवता थे।आइए, जानते हैं उनके बारे में-  *भगवान श्रीकृष्ण*......*श्रीकृष्ण को 64 कलाओं और अष्ट सिद्धियों से परिपूर्ण माना जाता है। ऐसा माना गया है कि वे स्वयं भगवान विष्णु के अवतार थे।श्रीकृष्ण के इस अवतार के बाद ही कलियुग का आगमन हुआ था।* *बलराम*.......*श्रीकृष्ण के भाई बलराम शेषनाग के अवतार थे।कृष्ण के बड़े भाई होने की वजह से उन्हें ‘दाउजी’ के नाम से भी जाना जाता है। महाभारत के युद्ध के दौरान बलराम किसी के पक्ष में नहीं थे और तटस्थ होकर तीर्थयात्रा पर चले गए।* *भीष्म*......*श्रीकृष्ण के बाद अगर महाभारत का कोई सबसे प्रमुख और चर्चित पात्र रहा तो वो हैं ‘भीष्म’ पितामाह। पांच वसुओं में से एक ‘द्यु’ नामक वसु ने देवव्रत के रूप में जन्म लिया था।*  *द्रोणाचार्य*......*कौरवों और पांडवों के गुरु रहे द्रोणाचार्य अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी योद्धा थे। माना जाता है देवताओं के गुरु बृहस्पति देव ने ही द्रोणाचार्य के रूप में जन्म लिया था।* *द्रौपदी*......*महाभारत की सबसे जरूरी और शायद सबसे शक्तिशाली स्त्री पात्र रहीं द्रौपदी का जन्म इन्द्राणी के अवतार के रूप में हुआ था।* *अर्जुन*......*अर्जुन को पांडु पुत्र माना जाता है, लेकिन असल में वे इन्द्र और कुंती के पुत्र थे। दानवीर कर्ण को इन्द्र का अंश ही माना जाता है*

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Neha Sharma Dec 20, 2019

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S.G PANDA Dec 21, 2019

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