बडे भाग्य मानुष्य तन पावा,,,,,,,,

भाग्य

मनुष्य एक चौराहा है,

जहां से सब दिशाओं में मार्ग जाते हैं। यही उसकी विशिष्टता है। अनंत संभावनाएं मनुष्य के लिए अपना द्वार खोले खड़ी हैं।

मनुष्य जो भी होना चाहे हो सकता है। पशुओं का भाग्य होता है, मनुष्य का कोई भाग्य नहीं। कुत्ता कुत्ते की तरह ही पैदा होगा, कुत्ते की तरह ही जीएगा, कुत्ते की तरह ही मरेगा। इससे अन्यथा होने का कोई उपाय नहीं।

मनुष्य कोरे कागज की भांति पैदा होता है, जिस पर कोई भी लिखावट नहीं है, फिर जो लिखता है स्वयं, वही उसका भाग्य बन जाता है। मनुष्य अपना भाग्य-निर्माता है, अपना स्रष्टा है।

अगर हाथी-घोड़े-गधे ज्योतिषियों के पास जाएं तो समझ में आता है। मनुष्य जाए तो बात बिलकुल समझ में नहीं आती।

मनुष्य का कोई भाग्य नहीं है जिसे पढ़ा जा सके। मनुष्य तो केवल एक अनंत संभावनाओं, अनंत बीजों की भांति पैदा होता है। फिर जिस बीज को बोएगा, जिस बीज पर श्रम करेगा, वे ही फूल उसमें खिल जाएंगे।

कोई विधाता नहीं है।

हम प्रतिपल अपने प्रत्येक विचार, अपने प्रत्येक कृत्य से स्वयं का निर्माण कर रहे हैं।

इसलिए एक-एक कदम सूझ-बूझ कर उठाना और एक-एक पल सुमिरन से जीना। ईश्वर के ध्यान के बगैर कोई में जो जी रहा है, वह मनुष्य ही नहीं है।
क्यो कि ईश्वर के बगैर जिसका भी आप ध्यान कर रहे है वो ध्यान आपके अन्तिम अवस्था में आवश्य ही शरीर को त्यागते समय दस्तक देगा तब आप अनायास ही उस मति से अग्रीम जीवन की गति को प्राप्त होगे /

बेटे को अन्तिम समय ध्यान आनै पर अगला जन्म सुअर का जन्म मिलेगा
धन की याद पर सर्प
मकान व जमीन पर भूत
स्त्री पर वैश्या
ईश्वर की याद पर ईश्वर में ही मिलेगा /
अन्त मती सो गति को प्राप्त होगे
गीता के अनुसार
निरन्तर होने वाले सुमिरण के साथ जीवन अभ्यस्थ हो जाये

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kailashtibrewalla Jun 1, 2020

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Ram niwas Agroya Jun 1, 2020

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D.Y.Bhoite Jun 1, 2020

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Vandana Singh Jun 1, 2020

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Sunil Vohra Jun 1, 2020

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Vandana Singh Jun 1, 2020

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🙏शुभ मंगलवार🙏 🌺🌺🌺सुप्रभात वंदन जी🌺🌺🌺 🌹ॐ हनुमते नमः🌹 जय श्री राम🌹 गायत्री जयंती और निर्जला एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं!! 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 ॐ भूर् भुवः स्वः तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्… 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 महाभारत, स्कंद और पद्म पुराण के अनुसार निर्जला एकादशी व्रत करने वाले की उम्र बढ़ती है निर्जला एकादशी व्रत 2 जून को किया जाएगा। महाभारत, स्कंद और पद्म पुराण के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ महीने के शुक्लपक्ष की ग्यारहवीं तिथि को किया जाता है। इस व्रत के दौरान सूर्योदय से लेकर अगले दिन यानी द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल नहीं पीने का विधान है। इस कारण इसे निर्जला एकादशी कहते हैं। इस व्रत को विधि-विधान से करने वालों की उम्र बढ़ती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। काशी के ज्योतिषाचार्य और धर्मशास्त्रों के जानकार पं. गणेश मिश्र का कहना है कि निर्जला एकादशी व्रत में जल के महत्व के बारे में विस्तार से बताया गया है। ज्येष्ठ के महीने में जल की पूजा और दान का महत्व काफी बढ़ जाता है। एक दिन के अंतर में गंगा दशहरा और निर्जला एकादशी का व्रत रखा जाता है। निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं। महर्षि वेदव्यास के अनुसार भीमसेन ने इसे धारण किया था। निर्जला एकादशी पर दान का महत्व पं. गणेश मिश्र ने बताया कि निर्जला एकादशी पर जल का महत्व बताया गया है। इस दिन जल पिलाने और जल दान करने की परंपरा है। इस एकादशी पर अन्न, जल, कपड़े, आसन, जूता, छतरी, पंखा और फलों का दान करना चाहिए। इस दिन जल से भरे घड़े या कलश का दान करने वाले के हर पाप खत्म हो जाते हैं। इस दान से व्रत करने वाले के पितर भी तृप्त हो जाते हैं। इस व्रत से अन्य एकादशियों पर अन्न खाने का दोष भी खत्म हो जाता है और हर एकादशियों के पुण्य का फायदा भी मिलता है। श्रद्धा से जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह हर तरह के पापों से मुक्त होता है। निर्जला एकादशी व्रत की पूजा विधि पं. मिश्र के अनुसार इस व्रत में एकादशी तिथि के सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल नहीं पिया जाता और भोजन भी नहीं किया जाता है। एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर तीर्थ स्नान करना चाहिए। संभव न हो तो घर पर ही पानी में गंगाजल डालकर नहाना चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु की पूजा, दान और दिनभर व्रत रखने का संकल्प लेना चाहिए। भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। पीले कपड़े पहनकर पूजा करनी चाहिए। पूजा में पीले फूल और पीली मिठाई जरूरी शामिल करनी चाहिए। इसके बाद ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करें। फिर श्रद्धा और भक्ति से कथा सुननी चाहिए। जल से कलश भरे और उसे सफेद वस्त्र से ढककर रखें। उस पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें। देवव्रत भी कहा जाता है निर्जला एकादशी को एकादशी स्वयं विष्णु प्रिया हैं। भगवान विष्णु को ये तिथि प्रिय होने से इस दिन जप-तप, पूजा और दाना करने वाले भगवान विष्णु को प्राप्त करते हैं। जीवन-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं। इस व्रत को देवव्रत भी कहा जाता है क्योंकि सभी देवता, दानव, नाग, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, नवग्रह आदि अपनी रक्षा और श्रीविष्णु की कृपा पाने के लिए एकादशी का व्रत करते हैं। 🌹🌹🌹🙏🙏🙏🌹🌹🌹

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