sn vyas
sn vyas Apr 21, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *भगवान राम की महानता यह है कि* *उन्होंने निडर और डरपोक* *दोनों को ही स्वीकार किया।* °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "° बालि से सन्त्रस्त होकर ऋष्यमूक पर्वत में छिपकर रह रहे सुग्रीव ने जब भगवान् राम और लक्ष्मण को आते देखा तो सुग्रीव बड़े ही भयभीत होकर हनुमान जी से कहने लगे कि उन दोनों राजकुमारों को देखो। मुझे तो लग रहा है कि बालि ने इन दोनों को मुझे मारने के लिए भेजा है। परन्तु आप वेष बदलकर यह पता लगाइए कि ये कौन हैं ? हनुमानजी से सुग्रीव जी ने कह दिया कि -- *धरि बट रूप देखु तँ जाई।* -- आप जरा ब्राह्मण का रूप बनाकर जाइए और देखकर मुझे वहीं से संकेत कर दीजिएगा कि यह कौन हैं ? हनुमान जी ने पूछा कि अगर बालि के भेजे हुए हैं तो आप क्या करेंगे ? सुग्रीव ने कहा -- बस अपने पास तो एक ही कला है। क्या ? बोले -- *पठए बालि होहिं मन मैला।* *भागौं तुरत तजौं यह सैला।।* -- मैं यहाँ से भाग जाऊँगा । इस प्रसंग में बड़ी अनोखी सी बात यह है कि हनुमानजी कभी न भागने वाले, और सुग्रीव जी बड़े भगोड़े हैं, तो अब दोनों में किसका मार्ग ठीक है ? इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि *भागने का भी सदुपयोग होना चाहिए और न भागने का भी।* इसलिए सुग्रीव यद्यपि बड़े डरपोक हैं और हनुमानजी में डर का लेश भी नहीं है। पर *भगवान राम की महानता यह है कि उन्होंने निडर और डरपोक दोनों को ही स्वीकार किया।* निर्भीक हनुमानजी तो उनके महान सेवक हैं ही, पर भगवान ने सुग्रीव के भय का भी सदुपयोग कर लिया। आगे चलकर वर्णन आता है कि जब चार महीने तक सुग्रीव भगवान् राम से मिलने नहीं आए तब प्रभु ने कहा -- लक्ष्मण! मैंने निश्चय किया है कि सुग्रीव का वध भी मैं कल उसी बाण से कर दूंगा जिससे मैंने बालि का वध किया था। लक्ष्मणजी ने कहा -- महाराज! मुझे आज्ञा दीजिए मैं अभी जाकर यह कार्य पूरा कर देता हूँ। प्रभु ने कहा -- लक्ष्मण ! उसे मारने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि वह तो बड़े डरपोक स्वभाव का था, मैंने डर छुड़ा दिया तो मुझे भी भूल गया। इसलिए तुम जाकर फिर से थोड़ा सा डर पैदा कर दो तो फिर से मेरे पास आ जाएगा -- *तब अनुर्जाह समुझावा रघुपति करुनासींव।* *भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।।* ४/१८ -- बस यही है डर का सदुपयोग। भगवान राम ने कितनी मनोवैज्ञानिक बात कही ? लक्ष्मणजी ने कहा -- मैं अभी जाकर डराता हूँ। तो तुरंत हाथ पकड़ लिया भगवान ने। प्रभु का तात्पर्य था कि सावधानी से डराना। क्योंकि वह जितना डरने वाला है उतना ही भागने वाला भी है, तो कहीं ऐसा न डराना कि मुझसे दूर भाग जाय। इसलिए -- *भय देखाइ ले आवहु* -- ऐसा डराना कि भाग कर इधर ही आए कहीं उधर न भाग जाए। इसका अभिप्राय है कि अगर कोई पलायन करके भगवान की ओर भागे तो यह पलायन (भागने) का सदुपयोग है। हनुमानजी जब ब्राह्मण बनकर गये तो जाते ही उन्होंने प्रभु को प्रणाम किया। और जब भगवान् श्री राघवेन्द्र का राज्याभिषेक हो गया तो प्रभु ने एक दिन एकान्त में हनुमान जी से पूछा -- हनुमान ! नाटक में तो जो बने उसका पूरी तरह से निर्वाह करना चाहिए। किन्तु तुम जब पहली बार ब्राह्मण बनकर आए और मैं क्षत्रिय के रूप में था तो तुम्हें यह चाहिए था कि तुम यह आशा करते कि क्षत्रिय मुझे प्रणाम करे परन्तु तुमने मुझे प्रणाम क्यों कर दिया ? वस्तुतः प्रभु तो हनुमानजी के भाव की उज्ज्वलता को प्रकट करने के लिए ही ऐसा प्रश्न कर रहे थे। वैसे तो प्रभु सब जानते ही हैं । प्रभु का प्रश्न सुनकर हनुमान जी ने भगवान के चरणों को कसकर पकड़ लिया और कहा -- प्रभु ! यह बताइए कि ब्राह्मण की क्या यही परिभाषा है कि जो किसी को प्रणाम न करे, वह ब्राह्मण है ? जो कभी सिर न झुकावे वह ब्राह्मण है! नहीं - नहीं महाराज ? शास्त्र ब्राह्मण की यह परिभाषा नहीं करता है। अपितु शास्त्र ने तो ब्राह्मणत्व की परिभाषा करते हुए यह कहा कि -- *ब्रह्म जानाति सब्राह्मण* -- जो ब्रह्म को जान ले वही ब्राह्मण है। तो महाराज ! जब मैंने आपको प्रणाम किया तो ब्रह्म समझकर प्रणाम किया था, क्षत्रिय समझकर नहीं। तो वस्तुतः सच्चा ब्राह्मण तो वही है जो ब्रह्म को पहचान ले न कि जो अकड़कर खड़ा हो जाय कि मैं तो ब्राह्मण हूँ। हनुमान जी ने कहा प्रभु ! उस दिन ब्राह्मणत्व का जितना सदुपयोग हुआ उतना तो कभी भी नहीं हुआ। इस प्रकार हनुमान जी अपने ब्राह्मणत्व का भी सदुपयोग करते हैं । अपने ब्राह्मणत्व का सदुपयोग करने के बाद हनुमान जी ने प्रभु से पूछ दिया -- महाराज! आप कौन हैं ? प्रभु ने पूछा-आप बताइए कि आपको क्या लगता है ? हनुमानजी ने कहा कि -- *जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।* *की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।।* ४/१ हनुमान जी का वाक्य सुनकर प्रभु हँसे और तब प्रभु ने हनुमान जी को अपना चरित्र सुनाया। 📖 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏 आप सभी देशवासियों को भगवान श्री राम जन्मोत्सव पर हार्दिक शुभकामनाएं जय श्री राम स्वस्थ रहें मस्त रहें व्यस्त रहें

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!.........
         ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।।
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     *भगवान राम की महानता यह है कि*
            *उन्होंने निडर और डरपोक* 
           *दोनों को ही स्वीकार किया।*
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      बालि से सन्त्रस्त होकर  ऋष्यमूक पर्वत में छिपकर रह रहे सुग्रीव ने जब भगवान् राम और लक्ष्मण को आते देखा तो सुग्रीव बड़े ही भयभीत होकर हनुमान जी से कहने लगे कि उन दोनों राजकुमारों को देखो। मुझे तो लग रहा है कि बालि ने इन दोनों को मुझे मारने के लिए भेजा है। परन्तु आप वेष बदलकर यह पता लगाइए कि ये कौन हैं ?
     हनुमानजी से सुग्रीव जी ने कह दिया कि --
     *धरि बट रूप देखु तँ जाई।*
-- आप जरा ब्राह्मण का रूप बनाकर जाइए और देखकर मुझे वहीं से संकेत कर दीजिएगा कि यह कौन हैं ? हनुमान जी ने पूछा कि अगर बालि के भेजे हुए हैं तो आप क्या करेंगे ? सुग्रीव ने कहा -- बस अपने पास तो एक ही कला है। क्या ? बोले --
    *पठए बालि होहिं मन मैला।*
    *भागौं तुरत तजौं यह सैला।।*
-- मैं यहाँ से भाग जाऊँगा । इस प्रसंग में बड़ी अनोखी सी बात यह है कि हनुमानजी कभी न भागने वाले, और सुग्रीव जी बड़े भगोड़े हैं, तो अब दोनों में किसका मार्ग ठीक है ? इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि *भागने का भी सदुपयोग होना चाहिए और न भागने का भी।* इसलिए सुग्रीव यद्यपि बड़े डरपोक हैं और हनुमानजी में डर का लेश भी नहीं है। पर *भगवान राम की महानता यह है कि उन्होंने निडर और डरपोक दोनों को ही स्वीकार किया।* निर्भीक हनुमानजी तो उनके महान सेवक हैं ही, पर भगवान ने सुग्रीव के भय का भी सदुपयोग कर लिया।
      आगे चलकर वर्णन आता है कि जब चार महीने तक सुग्रीव भगवान् राम से मिलने नहीं आए तब प्रभु ने कहा -- लक्ष्मण! मैंने निश्चय किया है कि सुग्रीव का वध भी मैं कल उसी बाण से कर दूंगा जिससे मैंने बालि का वध किया था। लक्ष्मणजी ने कहा -- महाराज! मुझे आज्ञा दीजिए मैं अभी जाकर यह कार्य पूरा कर देता हूँ। प्रभु ने कहा -- लक्ष्मण ! उसे मारने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि वह तो बड़े डरपोक स्वभाव का था, मैंने डर छुड़ा दिया तो मुझे भी भूल गया। इसलिए तुम जाकर फिर से थोड़ा सा डर पैदा कर दो तो फिर से मेरे पास आ जाएगा --
*तब अनुर्जाह समुझावा रघुपति करुनासींव।*
*भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।।*
४/१८
-- बस यही है डर का सदुपयोग। भगवान राम ने कितनी मनोवैज्ञानिक बात कही ? लक्ष्मणजी ने कहा -- मैं अभी जाकर डराता हूँ। तो तुरंत हाथ पकड़ लिया भगवान ने। प्रभु का तात्पर्य था कि सावधानी से डराना। क्योंकि वह जितना डरने वाला है उतना ही भागने वाला भी है, तो कहीं ऐसा न डराना कि मुझसे दूर भाग जाय। इसलिए -- *भय देखाइ ले आवहु* -- ऐसा डराना कि भाग कर इधर ही आए कहीं उधर न भाग जाए। इसका अभिप्राय है कि अगर कोई पलायन करके भगवान की ओर भागे तो यह पलायन (भागने) का सदुपयोग है। हनुमानजी जब ब्राह्मण बनकर गये तो जाते ही उन्होंने प्रभु को प्रणाम किया। और जब भगवान् श्री राघवेन्द्र का राज्याभिषेक हो गया तो प्रभु ने एक दिन एकान्त में हनुमान जी से पूछा -- हनुमान ! नाटक में तो जो बने उसका पूरी तरह से निर्वाह करना चाहिए। किन्तु तुम जब पहली बार ब्राह्मण बनकर आए और मैं क्षत्रिय के रूप में था तो तुम्हें यह चाहिए था कि तुम यह आशा करते कि क्षत्रिय मुझे प्रणाम करे परन्तु तुमने मुझे प्रणाम क्यों कर दिया ? वस्तुतः प्रभु तो हनुमानजी के भाव की उज्ज्वलता को प्रकट करने के लिए ही ऐसा प्रश्न कर रहे थे। वैसे तो प्रभु सब जानते ही हैं । प्रभु का प्रश्न सुनकर हनुमान जी ने भगवान के चरणों को कसकर पकड़ लिया और कहा -- प्रभु ! यह बताइए कि ब्राह्मण की क्या यही परिभाषा है कि जो किसी को प्रणाम न करे, वह ब्राह्मण है ? जो कभी सिर न झुकावे वह ब्राह्मण है! नहीं - नहीं महाराज ? शास्त्र ब्राह्मण की यह परिभाषा नहीं करता है। अपितु शास्त्र ने तो ब्राह्मणत्व की परिभाषा करते हुए यह कहा कि -- *ब्रह्म जानाति सब्राह्मण* -- जो ब्रह्म को जान ले वही ब्राह्मण है। तो महाराज ! जब मैंने आपको प्रणाम किया तो ब्रह्म समझकर प्रणाम किया था, क्षत्रिय समझकर नहीं। तो वस्तुतः सच्चा ब्राह्मण तो वही है जो ब्रह्म को पहचान ले न कि जो अकड़कर खड़ा हो जाय कि मैं तो ब्राह्मण हूँ। हनुमान जी ने कहा प्रभु ! उस दिन ब्राह्मणत्व का जितना सदुपयोग हुआ उतना तो कभी भी नहीं हुआ। इस प्रकार हनुमान जी अपने ब्राह्मणत्व का भी सदुपयोग करते हैं । अपने ब्राह्मणत्व का सदुपयोग करने के बाद हनुमान जी ने प्रभु से पूछ दिया -- महाराज! आप कौन हैं ? प्रभु ने पूछा-आप बताइए कि आपको क्या लगता है ? हनुमानजी ने कहा कि --
*जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।*
*की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।।* ४/१
हनुमान जी का वाक्य सुनकर प्रभु हँसे और तब प्रभु ने हनुमान जी को अपना चरित्र सुनाया।
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आप सभी देशवासियों को भगवान श्री राम जन्मोत्सव पर हार्दिक शुभकामनाएं
जय श्री राम
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rajawat sanjay singh May 16, 2021

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Suresh Pandey May 16, 2021

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