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MAHESH BHARGAVA
MAHESH BHARGAVA Jul 12, 2019

भगवान से प्रार्थना कैसे करे || श्री कृष्णा वचन | एक बार आप सभी जरूर सुनें✍️

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कामेंट्स

MAHESH BHARGAVA Jul 12, 2019
@nidhi2 जय श्री राधे कृष्णा जी 🌹आप का हर पल सुखद एवं मंगलमय हो 🍀🌿🌹शुभ रात्रि जी🌹

MAHESH BHARGAVA Jul 12, 2019
@ravindrakumar274 जय श्री राधे कृष्णा जी 🌹आप का हर पल सुखद 🌹शुभ रात्रि जी🌹

🚩Arjun Tiwari Ullasnagar🙏 Jul 12, 2019
@mahesh26 धन्यवाद जी 🙏🕊जय श्री राधे राधे जी 🕊 👉💕किसी को 💗दिल का दिवाना पसंद है💋;किसी को💗 दिल का नजराना ⚡पसंद है;👫औरों की पसंद तो हमें पता नहीं साबरे🙏हमें तो आपका😎 मुस्कुराना पसंद है☝जय की कृष्ण 😊नमस्कार शुभ रात्रि 🙇

Dheeraj Shukla Jul 12, 2019
जय श्री राधे कृष्णा जी शुभ रात्री भाई जी

Babita Sharma Jul 12, 2019
शुभ रात्रि वंदन भाई 🙏 जय श्री राधे कृष्णा 🌺

Payal sharma Jul 12, 2019
Jay Sri Radhe Krishna Shubh ratri Vandana ji nice 👌👌👌🙏🙏🥀🥀

Malkhan Singh UP Jul 12, 2019
*🌿🌞☘️🙏🕉️🙏☘️🌞🌿* *॥हरि ॐ॥*जय माँ भवानीII* *श्री कृष्ण गोविँद हरे मुरारे* *हे नाथ नारायण वासुदेव* *॥जय श्री राम॥*जय श्री कृष्णाII* *सपरिवार आपका हर पल शुभ हो* *🌹🙏राधे राधे जी🙏🌹* ***************************

Ritu Sen Jul 12, 2019
Jai Shri Radhe Krishna ji good night bhai ji aapka Har Pal mangalmay Ho god bless you and your family bhai ji🙏🙏🙏

मंगल ji Jul 13, 2019
🌺🚩🌺 जय श्री कृष्णा भाई जी 🌺☘ 🙏 आपका दिन शुभ मंगलमय हो

Shivsanker Shukala Jul 13, 2019
जय श्री राधे कृष्णा सुप्रभात भैया जी राधे राधे

( મેહુલ ) Jul 13, 2019
शुभ प्रभात वंदन भाई जी 🌹🙏🙏🙏🙏🙏🙏

U S Pandey Jul 13, 2019
🏵🙏🏵🚩🕉अति सुन्दर। 🏵🙏🏵🚩🕉कर्म ही प्रार्थना है। कर्म ही पूजा है। कर्म ही जीवन है। 🏵🙏🏵🚩🕉शुभकामना।

Dharma Saini Jul 13, 2019
जय श्री कृष्णा राधे राधे जी 🙏🙏🙏🙏🙏

MAHESH BHARGAVA Jul 17, 2019

सुंदर भजन जरूर सुने👌✍️✍️ संसार है एक नदिया सुख दुख दो किनारे है ✍️✍️✍️*✍️✍️✍️✍️✍️ रामायण कथा का एक अंश* जिससे हमें *सीख* मिलती है *"एहसास"* की... *श्री राम, लक्ष्मण एवम् सीता' मैया* चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे, राह बहुत *पथरीली और कंटीली* थी ! कि यकायक *श्री राम* के चरणों मे *कांटा* चुभ गया ! श्रीराम *रूष्ट या क्रोधित* नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से *अनुरोध* करने लगे ! बोले- "माँ, मेरी एक *विनम्र प्रार्थना* है आपसे, क्या आप *स्वीकार* करेंगी ?" *धरती* बोली- "प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दीजिए !" प्रभु बोले, "माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज मे इस पथ से गुज़रे, तो आप *नरम* हो जाना ! कुछ पल के लिए अपने आँचल के ये पत्थर और कांटे छुपा लेना ! मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पाँव मे *आघात* मत करना" श्री राम को यूँ व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई ! पूछा- "भगवन, धृष्टता क्षमा हो ! पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार हैं ? जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो क्या कुमार भरत सहन नही कर पाँएगें ? फिर उनको लेकर आपके चित में ऐसी *व्याकुलता* क्यों ?" *श्री राम* बोले- "नहीं...नहीं माते, आप मेरे कहने का अभिप्राय नही समझीं ! भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पाँव को नहीं, उसके *हृदय* को विदीर्ण कर देगा !" *"हृदय विदीर्ण* !! ऐसा क्यों प्रभु ?", *धरती माँ* जिज्ञासा भरे स्वर में बोलीं ! "अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि...इसी *कंटीली राह* से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये *शूल* उनके पगों मे भी चुभे होंगे ! मैया, मेरा भरत कल्पना मे भी मेरी *पीड़ा* सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति मे आप *कमल पंखुड़ियों सी कोमल* बन जाना..!!" अर्थात *रिश्ते* अंदरूनी एहसास, आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं । जहाँ *गहरी आत्मीयता* नही, वो रिश्ता शायद नही परंतु *दिखावा* हो सकता है । 🔰🔰 इसीलिए कहा गया है कि... *रिश्ते*खून से नहीं, *परिवार* से नही, *मित्रता* से नहीं, *व्यवहार* से नहीं, बल्कि... सिर्फ और सिर्फ *आत्मीय "एहसास"* से ही बनते और *निर्वहन* किए जाते हैं। जहाँ *एहसास* ही नहीं, *आत्मीयता* ही नहीं .. वहाँ *अपनापन* कहाँ से आएगा l 🍃🍂🍃🍂🍃

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MAHESH BHARGAVA Jul 16, 2019

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SUNIL KUMAR SHARMA Jul 16, 2019

गुरु भक्त आरुणि यह महर्षि आयोदधौम्य का आश्रम है। पूरे आश्रम में म‍हर्षि की मंत्र वाणी गूंजती रहती है। गुरुजी प्रात: 4 बजे उठकर गंगा स्नान करके लौटते, तब तक शिष्यगण भी नहा-धोकर बगीची से फूल तोड़कर गुरु को प्रणाम कर उपस्थित हो जाते। आश्रम, पवित्र यज्ञ धूम्र से सुगंधित रहता। आश्रम में एक तरफ बगीचा था। बगीचे के सामने झोपड़ियों में अनेक शिष्य रहते थे। एक दिन की बात है सायंकाल अचानक बादलों की गर्जना सुनाई देने लगी... घड़ड़ड़... घड़ड़ड़...।   कुछ दूर गुरुजी के खेत थे। गुरुजी ने सोचा कि कहीं अपने धान के खेत की मेड़ अधिक पानी भरने से टूट न जाए। खेतों में से सब पानी बह जाएगा। मिट्टी कट जाएगी। उन्होंने आवाज दी- आरुणि! बेटा आरुणिऽऽ! उपस्थित हुआ गुरुदेवऽऽ! बेटा आरुणि! वर्षा हो रही है। तुम खेत पर जाओ और देखो, कहीं मेड़ टूटकर खेत का पानी निकल न जाए। जो आज्ञा गुरुदेव! गुरु का आदेश पाकर आरुणि चल पड़ा खेत की ओर। झमाझम पानी बरस रहा था। बादल गरज रहे थे... घड़ड़ड़ऽऽऽ ... ऽऽऽ...।  मोर मस्ती में भर वर्षा के स्वागत में टुहुक रहे थे- पि... केऽऽ क। पिऽऽ कोऽऽ का। आरुणि भीगता हुआ भी दौड़ा जा रहा था। गुरुजी ने दूसरे शिष्यों की बजाए आरुणि को आदेश दिया इसलिए आरुणि खुशी से फूला नहीं समा रहा था। उसके कानों में वर्षा की रिमझिम के स्थान पर गुरुजी की बताई शिक्षा गूंजने लगी- गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:। आरुणि ने देखा कि खेत की मेड़ एक स्थान पर टूट गई है तथा वहां से बड़े जोर से पानी की धारा बहने लगी है। आरुणि ने टूटी मेड़ पर मिट्टी जमाकर पानी रोकना चाहा किंतु बहता पानी मिट्टी को बहा ले जाता। . हाय! यह तो सारी मेहनत ही बेकार हो गई। पानी तो ठहरता ही नहीं। क्या करूं? मैं खुद ही क्यों नहीं टूटी मेड़ के स्थान पर सो जाऊं? हां, यही ठीक रहेगा। और आरुणि सचमुच टूटी‍ मेड़ के स्थान पर सो गया। पानी का बहाव थम गया।  रात पड़ गई। चारों ओर अंधकार ही अंधकार। बादलों की गर्जना... घड़ड़ड़... घड़ड़ड़...।  गीदड़ों की... हुआऽऽ हुआऽऽ। झमाझम बरसता पानी। कल-कल बहती धाराएं। सर्द हवाएं। आरुणि का शरीर सर्दी से अकड़ने लगा किंतु उसे तो एक ही धुन... गुरु की आज्ञा का पालन। बहता हुआ पानी कल-कल करता मानो आरुणि को कहने लगा- मैं वर्षा का बहता पानी,  मेरी चाल बड़ी तूफानी। उठ आरुणि अपने घर जा, रास्ता दे दे, हट जा, हट जा।।  मगर गुरु भक्त बालक आरुणि का उत्तर था-  गुरुजी का आदेश मुझे है, मैं रोकूंगा बहती धारा। जय गुरु देवा, जय गुरु देवा, आज्ञा पालन काम हमारा।। रात बीतती रही। बादल गरजते रहे। गीदड़ चीखते रहे- हुआऽऽ हुआऽऽ।  मेंढक टर्राते रहे- टर्र... टर्र... टर्र...। एक घंटा... दो घंटे... तीन घंटे...। आरुणि रातभर खेत के सहारे सोता रहा। सर्दी में शरीर सुन्न पड़ गया। गुरुदेव के खेत से पानी बहने न पाए, इस विचार से वह न तो तनिक भी हिला और न ही उसने करवट बदली। शरीर भयंकर पीड़ा होते रहने पर भी सचमुच गुरु का स्मरण करते हुए पड़ रहा।  चिड़िया चहकने लगी। मुर्गे ने सुबह होने की सूचना दी... कुकड़ूं कूंऽऽ।  गुरुजी नहा-धोकर लौटे। सभी शिष्यगण सदैव की तरह गुरुजी को प्रणाम करने पहुंचा- गुरुदेव प्रणाम! प्रसन्न रहो उपमन्यु! गुरुदेव प्रणाम! प्रसन्न रहो बेटा वेद! गुरु ने देखा कि आज आरुणि प्रणाम करने नहीं आया। उन्होंने दूसरे शिष्यों से पूछा- आज आरुणि नहीं दिख रहा है?  एक शिष्य ने याद दिलाया- गुरुदेव! आरुणि कल संध्या समय खेत की मेड़ बांधने गया था, तब से अब तक नहीं लौटा। अरे हां, याद आ गया। किंतु वह लौटा क्यों नहीं? कहां रह गया? चलो पता लगाएं। महर्षि अपने शिष्यों की टोली के साथ आरुणि को ढूंढ़ने निकल पड़े। चलते-चलते वे खेत की मेड़ की तरफ जा पहूंचे।  बेटा आरुणिऽऽ! कहां हो? किंतु आरुणि का शरीर सर्दी से इतना अकड़ गया था कि न बोला जा रहा था, न हिल-डुल सकता था। वह रहा। वह तो मेड़ के सहारे पानी के बहाव में मूर्छित पड़ा है- एक ने बताया। सभी वहां पहुंचे। उन्होंने मरणासन्न आरुणि को उठाया। हाथ-पांवों की मालिश की। थोड़ी देर बाद उसे होश आ गया। गुरुजी ने सब बातें सुनकर उसे हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद दिया- बेटा आरुणि! तुम सच्चे गुरुभक्त हो। तुम्हें सब विद्याएं अपने आप ही आ जाएंगी। जगत में आरुणि की गुरुभक्ति सदा अमर रहेगी। सभी बालकों ने आरुणि को कंधों पर उठा लिया। घोष होने लगा। गुरु भक्त आरुणि,  धन्य हो। धन्य हो। गुरु भक्त आरुणि,  धन्य हो। धन्य हो।

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दो लिंग : नर और नारी । दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)। दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन। तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी। तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल। तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण। तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु। तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत। तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा। तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव। तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी। तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान। तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना। तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं। तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति। चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका। चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार। चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। चार निति : साम, दाम, दंड, भेद। चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद। चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री। चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग। चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात। चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा। चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु। चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर। चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज। चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्। चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास। चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य। चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन। पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु। पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा। पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि। पाँच उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा। पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य। पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर। पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस। पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा। पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान। पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन। पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)। पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक। पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी। छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर। छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष। छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान। छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच), मोह, आलस्य। सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती। सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि। सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद। सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार। सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि। सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब। सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप। सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक। सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज। सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य। सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल। सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल। सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची। सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा। आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा। आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी। आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास। आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व। आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा। नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री। नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु। नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया। नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि। दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला। दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे। दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत। दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि। दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती। उक्त जानकारी शास्त्रोक्त 📚 आधार पर... हैं । *हर हर महादेव...* 🏹 🙏 सब सनातनी हिन्दू के पास जानकारी होनी चाहिए

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जय श्री गुरुदेव जय श्री हरी विठ्ठल जय श्री कृष्ण जय श्री राम 👏 शुभ प्रभात 🙏 🌅 👣 वंदन 🚩 नमस्कार 🙏 मित्रांनो ॐ नमो नारायणाय ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमस्कार शुभ मंगलवार सबका मंगल हो 🙏 हिंदू धर्म में देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पूजन आदि के साथ-साथ मंत्र जाप का विधान है। शास्त्रों के अनुसार इन मंत्रों में इतनी शक्ति होती है कि व्यक्ति की हर कामना सिद्ध हो जाती है। तो वहीं ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक अगर इन मंत्रों का जाप पूरी श्रद्धा भावना से किया जाए तो जीवन में से हर तरह की बाधा का निवाराण हो जाता है। मगर बहुत से लोगों को ये नहीं पता रहता है कि किस कामना के लिए कौन से मंत्र का जाप करना चाहिए। जिस कारण उन्हें शुभ फल की प्राप्ति नहीं होती। तो चलिए हम आपको बताते हैं कि आपको बताते हैं कुछ ऐसे मंत्रों के बारे में जो आपको हर बड़ी से बड़ी बीमारी से कुछ ही देर में बाहर निकाल सकते हैं। आप में से लगभग लोगों को गायत्री मंत्र का तो पता हो होगा लेकिन क्या आपको ये पता है कि हिंदू धर्म के कितने देवी-देवताओं को विभिन्न गायत्री मंत्र समर्पित है, जिनका अगर कामना अनुसार जाप किया जाए तो शुभ होता है। बता दें इन मंत्रों को प्रतिदिन एक हज़ार या फिर 108 की संख्या में तुलसी की माला से जपें, सुख, सौभाग्य, समृद्धि और ऎश्वर्य की प्राप्ति होगी। गणेश गायत्री मंत्र- विघ्नों का निवारण करने के लिए ।। ॐ एक दृष्टाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो बुद्धिः प्रचोदयात्।। नृसिंह गायत्री मंत्र- पुरषार्थ एवं पराक्रम की वृद्धि के लिए ।। ॐ उग्रनृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि। तन्नो नृसिंह: प्रचोदयात्।। विष्णु गायत्री मंत्र- पारिवारिक कलह की समाप्ति के लिए ।। ॐ नारायण विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु: प्रचोदयात्।। शिव गायत्री मंत्र- सभी तरह के कल्याण के लिए ।। ॐ पंचवक्त्राय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।। कृष्ण गायत्री मंत्र- कर्म क्षेत्र की सफलता के लिए ।। ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो कृष्ण: प्रचोदयात्।। राधा गायत्री मंत्र- प्रेम के अभाव को दूर करने के लिए ।। ॐ वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमहि। तन्नो राधा प्रचोदयात्।। लक्ष्मी गायत्री मंत्र- पद प्रतिष्ठा,यश ऐश्वर्य और धन सम्पति के लिए ।। ॐ महालक्ष्म्यै विद्महे विष्णुप्रियायै धीमहि । तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।। अग्नि गायत्री मंत्र- इंद्रियों की तेजस्विता बढ़ाने के लिए ।। ॐ महाज्वालाय विद्महे अग्निदेवाय धीमहि। तन्नो अग्नि: प्रचोदयात्।। इन्द्र गायत्री:- दुश्मनों के हमले से बचाव के लिए ।। ॐ सहस्त्रनेत्राय विद्महे वज्रहस्ताय धीमहि। तन्नो इन्द्र: प्रचोदयात्।। दुर्गा गायत्री मंत्र- शत्रु नाश और विघ्नों पर विजय के लिए- ।। ॐ गिरिजायै विद्महे शिवप्रियायै धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्।। हनुमान गायत्री:- कर्म के प्रति निष्ठा की भावना जागृत करने के लिए- ।। ॐ अंजनी सुताय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि। तन्नो मारुति: प्रचोदयात्।। जय श्री कृष्ण जय श्री राधे राधे जय श्री राम 👏 जय श्री हरी विठ्ठल जय श्री हनुमान जी 🙏 जय श्री महाकाली माता की जय श्री गणेश जी जय श्री महाकाल जी नमस्कार 👏 🌅👣 नमस्कार 🌈🌹🍃⛅🌷🎪🙏 💖🍇🎈👪☔🙋शुभ प्रभात शुभ मंगलवार सबका मंगल हो 🙏गुरू पौर्णिमा च्या हार्दिक शुभेच्छा हार्दिक शुभकामना नमस्कार 🙏

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