Jagdish Prasad ने केदारनाथ मंदिर में यह पोस्ट की।

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R C GARG Jun 1, 2020

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jainarayan singh Jun 1, 2020

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Smt Neelam Sharma Jun 1, 2020

🔱🌙🔱🌙🔱🌙🔱 ॐ🌙नमः🔱🌙🔱 शिवाय🌙🔱🌙🔱🌙🔱🌙🔱 हरि ओम🌙🔱🌙🔱🌙🔱🌙 आज सोमवार है। आज गंगा अवतरण दिवस। गंगा दशहरा। पतित पावनी माँ गंगे। हर हर गंगे। आज बहुत सुंदर संयोग है। भगवान भोलेनाथ जी का वार ओर शीश गंगा विराजित। माता गंगा जी का त्योहार ।जिसके नाम के स्मरण मात्र से हमारे पाप धुल जाते ऐसी पवित्र पावनी माँ गंगा। हम उस देश के वासी है जिस देश मे गंगा बहती है। हमे गर्व है कि हम माँ गंगा के लाल और लाली है।स्वर्ग से उतरी माँ गंगा की गोदी में हम है। हर हर गंगे। ॐ गंगेश्वराय नमः। ॐ पाप नाशिनी मोक्ष प्रदायिनी गंगे नमः। संसार मे क़ई नदिया है पर गंगा मैया के समान नही है। सब से बड़ी बात है कि सालों गंगा जल अपने घर मे रखने केपश्चात भी जल में कीड़े नही पड़ते। ओर माँ गंगा गंगोत्री के गोमुख से निकल कर अपना वृहत रूप लेकर ऋषिकेश हरिद्वार प्रयाग राज काशी विश्वनाथ । से होकर बंगाल की खाड़ी में जाकर समुद्र में समा जाती है। हम बहुत भाग्य शाली है जो माँ की शरण मे चरण में है। जय जय श्री महांकाल। आज के दिन गंगा स्नान का बहुत महत्व है। लेकिन आज हम सादे पानी मे गंगा जल मिलाकर हर हर गंगे का उच्चारण कर स्नान कर सकते है । हमे गंगा स्नान के समान ही फल प्राप्त होगा। जय माँ गंगे शाम को माँ गंगा की आरती करें । दीप जलाए।जय माँ गंगा।सभी पर भगवान भोलेनाथ की कृपा बनी रहे। सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणिपश्चन्तु माँ कश्चित दुःख भाग भवेत। इसी कामना के साथ जय जय श्री महांकाल। हर हर गंगे।सभीको गंगा दशहरे कीहार्दिक शुभ कामना। सभी का दिन मंगल मयी शुभ कारी हो सभी अपने परिवार के साथ स्वस्थ सुखी रहे। 🌹🙏जय जय भोले नाथ🙏🌹

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Ajit sinh Parmar Jun 1, 2020

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Ashok Sunita Jun 1, 2020

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गंगा दशहरा जून 1, 2020 विशेष गंगा पूजन एवं अवतरण की कथा 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ वराह पुराण के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, बुधवार के दिन, हस्त नक्षत्र में गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थी इसलिये इस दिन को हिन्दू धर्म मे माँ गंगा के पृथ्वी पर अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन स्नान, दान, रूपात्मक व्रत होता है। स्कन्द पुराण में लिखा हुआ है कि, ज्येष्ठ शुक्ला दशमी संवत्सरमुखी मानी गई है इसमें स्नान और दान तो विशेष रूप से करें। किसी भी नदी पर जाकर अर्ध्य (पू‍जादिक) एवम् तिलोदक (तीर्थ प्राप्ति निमित्तक तर्पण) अवश्य करें। ऐसा करने वाला महापातकों के बराबर के दस पापों से छूट जाता है। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष, दशमी को गंगावतरण का दिन मन्दिरों एवं सरोवरों में स्नान कर पवित्रता के साथ मनाया जाता है। गंगा स्नान का महत्त्व 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ भविष्य पुराण में लिखा हुआ है कि जो मनुष्य गंगा दशहरा के दिन गंगा के पानी में खड़ा होकर दस बार ओम नमो भगवती हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे माँ पावय पावय स्वाहा स्तोत्र को पढ़ता है, चाहे वो दरिद्र हो, असमर्थ हो वह भी गंगा की पूजा कर पूर्ण फल को पाता है। यदि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन मंगलवार हो तथा हस्त नक्षत्र तिथि हो तो यह सब पापों को हरने वाली होती है। वराह पुराण में लिखा है कि ज्येष्ठ शुक्ल दशमी बुधवार में हस्त नक्षत्र में श्रेष्ठ नदी स्वर्ग से अवतीर्ण हुई थी। वह दस पापों को नष्ट करती है। इस कारण उस तिथि को दशहरा कहते हैं। दशहरे के कुछ प्रमुख योग 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ 31 मई सायं 5:36 से 1 जून दिन 02:57 तक। यह दिन संवत्सर का मुख माना गया है। इसलिए गंगा स्नान करके दूध, बताशा, जल, रोली, नारियल, धूप, दीप से पूजन करके दान देना चाहिए। इस दिन गंगा, शिव, ब्रह्मा, सूर्य देवता, भागीरथी तथा हिमालय की प्रतिमा बनाकर पूजन करने से विशेष फल प्राप्त होता है। इस दिन गंगा आदि का स्नान, अन्न-वस्त्रादि का दान, जप-तप, उपासना और उपवास किया जाता है। जिस भी वस्तु का दान करे उनकी संख्या 10 ही होनी शुभ मानी गयी है। इससे दस प्रकार के पापों से छुटकारा मिलता है। इस दिन नीचे दिये गये दस योग हो तो यह अपूर्व योग है और महाफलदायक होता है। यदि ज्येष्ठ अधिकमास हो तो स्नान, दान, तप, व्रतादि मलमास में करने से ही अधिक फल प्राप्त होता है। इन दस योगों में मनुष्य स्नान करके सब पापों से छूट जाता है। दस योग 〰️〰️〰️ ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, बुधवार, हस्त नक्षत्र, गर करण, आनंद योग व्यतिपात, कन्या का चंद्र, वृषभ का सूर्य आदि। गंगा दशहरा पर दान का महत्त्व एवं पूजा विधि 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ इस दिन पवित्र नदी गंगा जी में स्नान किया जाता है। यदि कोई मनुष्य वहाँ तक जाने में असमर्थ है तब अपने घर के पास किसी नदी या तालाब में गंगा मैया का ध्यान करते हुए स्नान कर सकते है। गंगा जी का ध्यान करते हुए षोडशोपचार से पूजन करना चाहिए. गंगा जी का पूजन करते हुए निम्न मंत्र पढ़ना चाहिए :- “ऊँ नम: शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नम:” इस मंत्र के बाद “ऊँ नमो भगवते ऎं ह्रीं श्रीं हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा” मंत्र का पाँच पुष्प अर्पित करते हुए गंगा को धरती पर लाने भगीरथी का नाम मंत्र से पूजन करना चाहिए. इसके साथ ही गंगा के उत्पत्ति स्थल को भी स्मरण करना चाहिए. गंगा जी की पूजा में सभी वस्तुएँ दस प्रकार की होनी चाहिए. जैसे दस प्रकार के फूल, दस गंध, दस दीपक, दस प्रकार का नैवेद्य, दस पान के पत्ते, दस प्रकार के फल होने चाहिए. यदि कोई व्यक्ति पूजन के बाद दान करना चाहता है तब वह भी दस प्रकार की वस्तुओं का करता है तो अच्छा होता है लेकिन जौ और तिल का दान सोलह मुठ्ठी का होना चाहिए. दक्षिणा भी दस ब्राह्मणों को देनी चाहिए. जब गंगा नदी में स्नान करें तब दस बार डुबकी लगानी चाहिए। यह मौसम भरपूर गर्मी का होता है, अत: छतरी, वस्त्र, जूते-चप्पल आदि दान में दिए जाते हैं। पूजन के लिये यदि गंगाजी अथवा अन्य किसी पवित्र नदी पर सपरिवार स्नान हेतु जाया जा सके तब तो सर्वश्रेष्ठ है, यदि संभव न हो तब घर पर ही गंगाजली को सम्मुख रखकर गंगाजी की पूजा-अराधना कर ली जाती है। इस दिन जप-तप, दान, व्रत, उपवास और गंगाजी की पूजा करने पर सभी पाप जड़ से कट जाते हैं- ऐसी मान्यता है। अनेक परिवारों में दरवाज़े पर पाँच पत्थर रखकर पाँच पीर पूजे जाते हैं। इसी प्रकार परिवार के प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से सवा सेर चूरमा बनाकर साधुओं, फ़कीरों और ब्राह्मणों में बांटने का भी रिवाज है। ब्राह्मणों को बड़ी मात्रा में अनाज को दान के रूप में आज के दिन दिया जाता है। आज ही के दिन आम खाने और आम दान करने को भी विशिष्ट महत्त्व दिया जाता है। दशहरा के दिन दशाश्वमेध संभव ना हो तो किसी भी गंगा घाट में दस बार स्नान करके शिवलिंग का दस संख्या के गंध, पुष्प, दीप, नैवेद्य और फल आदि से पूजन करके रात्रि को जागरण करने से अनंत फल प्राप्त होता है। विधि-विधान से गंगाजी का पूजन करके दस सेर तिल, दस सेर जौ और दस सेर गेहूँ दस ब्राह्मणों को दान दें। परदारा और परद्रव्यादि से दूर रहें तथा ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ करके दशमी तक एकोत्तर-वृद्धि से दशहरा स्तोत्र का पाठ करें। इससे सब प्रकार के पापों का समूल नाश हो जाता है और दुर्लभ सम्पत्ति प्राप्त होती है। गंगा दशहरे का फल 〰️〰️🌸🌸〰️〰️ ज्येष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के दस प्रकार के पापों का नाश होता है। इन दस पापों में तीन पाप कायिक, चार पाप वाचिक और तीन पाप मानसिक होते हैं। जैसे कि 👉 बिना आज्ञा या जबरन किसी की वस्तु लेना 👉 हिंसा 👉 पराई स्त्री के साथ समागम 👉 कटुवचन का प्रयोग 👉 असत्य वचन बोलना 👉 किसी की शिकायत करना 👉 असंबद्ध प्रलाप 👉 दूसरें की संपत्ति हड़पना या हड़पने की इच्छा 👉 दूसरें को हानि पहुँचाना या ऐसे इच्छा रखना 👉 व्यर्थ बातो पर परिचर्चा कहने का तात्पर्य है जिस किसी ने भी उपरोक्त पापकर्म किये हैं और जिसे अपने किये का पश्चाताप है और इससे मुक्ति पाना चाहता है तो उसे सच्चे मन से मां गंगा में डूबकी अवश्य लगानी चाहिये। यदि आप मां गंगा तक नहीं जा सकते हैं तो स्वच्छ जल में थोड़ा गंगा जल मिलाकर मां गंगा का स्मरण कर उससे भी स्नान कर सकते हैं। इन सभी से व्यक्ति को मुक्ति मिलती है। माँ गंगा जी की आरती 〰️〰️🌸〰️🌸〰️〰️ ॐ जय गंगे माता, मैया जय गंगे माता। जो नर तुमको ध्याता, मनवांछित फल पाता॥ ॐ जय गंगे माता॥ चन्द्र-सी ज्योति तुम्हारी, जल निर्मल आता। शरण पड़े जो तेरी, सो नर तर जाता॥ ॐ जय गंगे माता॥ पुत्र सगर के तारे, सब जग को ज्ञाता। कृपा दृष्टि हो तुम्हारी, त्रिभुवन सुख दाता॥ ॐ जय गंगे माता॥ एक बार जो प्राणी, शरण तेरी आता। यम की त्रास मिटाकर, परमगति पाता॥ ॐ जय गंगे माता॥ आरती मातु तुम्हारी, जो नर नित गाता। सेवक वही सहज में, मुक्ति को पाता॥ ॐ जय गंगे माता॥ गंगा अवतरण की कथा 〰️〰️🌸〰️🌸〰️〰️ ब्रह्मा से अत्रि, अत्रि से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध, बुध से पुरुरवा, पुरुरवा से आयु, आयु से नहुष, नहुष से यति, ययाति, संयाति, आयति, वियाति और कृति नामक छः महाबली और विक्रमशाली पुत्र हुए। अत्रि से उत्पन्न चंद्रवंशियों में पुरुरवा-ऐल के बाद सबसे चर्चित कहानी ययाति और उसने पुत्रों की है, ययाति के 5 पुत्र थे-! पुरु, यदु, तुर्वस, अनु और द्रुह्मु, उनके इन पांचों पुत्रों और उनके कुल के लोगों ने मिलकर लगभग संपूर्ण एशिया पर राज किया था, ऋग्वेद में इसका उल्लेख मिलता है। ययाति बहुत ही भोग-विलासी राजा था, जब भी उसको यमराज लेने आते तो वह कह देता नहीं अभी तो बहुत काम बचे हैं, अभी तो कुछ देखा ही नहीं। गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र के मध्य प्रतिष्ठा की लड़ाई चलती रहती थी, इस लड़ाई के चलते ही 5 हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध के पूर्व एक और महासंग्राम हुआ था जिसे 'दशराज युद्ध' के नाम से जाना जाता हैं इस युद्ध की चर्चा ऋग्वेद में मिलती है, यह रामायण काल की बात है। महाभारत युद्ध के पहले भारत के आर्यावर्त क्षेत्र में आर्यों के बीच दशराज युद्ध हुआ था इस युद्ध का वर्णन दुनिया के हर देश और वहां की संस्कृति में आज भी विद्यमान है, ऋग्वेद के 7 वें मंडल में इस युद्ध का वर्णन मिलता है। इस युद्ध से यह पता चलता है कि आर्यों के कितने कुल या कबीले थे और उनकी सत्ता धरती पर कहां तक फैली थी, इतिहासकारों के अनुसार यह युद्ध आधुनिक पाकिस्तानी पंजाब में परुष्णि नदी (रावी नदी) के पास हुआ था। ब्रह्मा से भृगु, भृगु से वारिणी भृगु, वारिणी भृगु से बाधृश्य, शुनक, शुक्राचार्य (उशना या काव्या), बाधूल, सांनग और च्यवन का जन्म हुआ, शुनक से शौनक, शुक्राचार्य से त्वष्टा का जन्म हुआ, त्वष्टा से विश्वरूप और विश्‍वकर्मा, विश्वकर्मा से मनु, मय, त्वष्टा, शिल्लपी और देवज्ञ का जन्म हुआ, दशराज्ञ युद्ध के समय भृगु मौजूद थे। इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर भगीरथ और श्रीराम के पूर्वज हैं। राजा सगर की 2 रानियां थीं- केशिनी और सुमति, जब दीर्घकाल तक दोनों पत्नियों को कोई संतान नहीं हुई तो राजा अपनी दोनों रानियों के साथ हिमालय पर्वत पर जाकर पुत्र कामना से तपस्या करने लगे। तब ब्रह्मा के पुत्र महर्षि भृगु ने उन्हें वरदान दिया कि एक रानी को 60 हजार अभिमानी पुत्र प्राप्त तथाहोगेतथा दूसरी से एक वंशधर पुत्र होगा, वंशधर अर्थात जिससे आगे वंश चलेगा। बाद में रानी सुमति ने तूंबी के आकार के एक गर्भ-पिंड को जन्म दिया, वह सिर्फ एक बेजान पिंड था, राजा सगर निराश होकर उसे फेंकने लगे, तभी आकाशवाणी हुई- 'सावधान राजा! इस तूंबी में 60 हजार बीज हैं, घी से भरे एक-एक मटके में एक-एक बीज सुरक्षित रखने पर कालांतर में 60 हजार पुत्र प्राप्त होंगे।' राजा सगर ने इस आकाशवाणी को सुनकर इसे विधाता का विधान मानकर वैसा ही सुरक्षित रख लिया, जैसा कहा गया था, समय आने पर उन मटकों से 60 हजार पुत्र उत्पन्न हुए, जब राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया तो उन्होंने अपने 60 हजार पुत्रों को उस घोड़े की सुरक्षा में नियुक्त किया। देवराज इंद्र ने उस घोड़े को छलपूर्वक चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया, राजा सगर के 60 हजार पुत्र उस घोड़े को ढूंढते-ढूंढते जब कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे तो उन्हें लगा कि मुनि ने ही यज्ञ का घोड़ा चुराया है। यह सोचकर उन्होंने कपिल मुनि का अपमान कर दिया, ध्यानमग्न कपिल मुनि ने जैसे ही अपनी आंखें खोलीं, राजा सगर के 60 हजार पुत्र वहीं भस्म हो गए, भगीरथ के पूर्वज राजा सगर के 60 हजार पुत्र कपिल मुनि के तेज से भस्म हो जाने के कारण अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए थे। अपने पूर्वजों की शांति के लिए ही भगीरथ ने घोर तप किया और गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने में सफल हुए, पूर्वजों की भस्म के गंगा के पवित्र जल में डूबते ही वे सब शांति को प्राप्त हुए। राजा भगीरथ के कठिन प्रयासों और तपस्या से ही गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर आई थी, इसे ही 'गंगावतरण' की कथा कहते हैं। सगर और भगीरथ से जुड़ी अनेक और भी कथाएं है। 🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸

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jainarayan singh Jun 1, 2020

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annu priya Jaiswal Jun 1, 2020

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