शनि महाराज की कथा एवं उपाय । संकलन✏✏✏पं देवशर्मा

शनि महाराज की कथा एवं उपाय । संकलन✏✏✏पं देवशर्मा

शनि महाराज की कथा एवं उपाय
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हिन्दू धर्म ग्रन्थों और शास्त्रों में भगवान् शिवजी को शनिदेव का गुरु बताया गया है, तथा शनिदेव को न्याय करने और किसी को दण्डित करने की शक्ति भगवान् शिवजी के आशीर्वाद द्वारा ही प्राप्त हुई है, अर्थात शनिदेव किसी को भी उनके कर्मो के अनुसार उनके साथ न्याय कर सकते है और उन्हें दण्डित कर सकते है, चाहे वे देवता हो या असुर, मनुष्य हो या कोई अन्य प्राणी ।

शास्त्रों के अनुसार सूर्य देव एवं देवी छाया के पुत्र शनिदेव को क्रूर ग्रह की संज्ञा दी गयी है । शनिदेव बचपन में बहुत ही उद्ण्डत थे तथा पिता सूर्य देव ने उनकी इस उदंडता से परेशान होकर भगवान् शिवजी को अपने पुत्र शनि को सही मार्ग दिखाने को कहा, भगवान् शिवजी के लाख समझाने पर भी जब शनिदेव की उदंडता में कोई परिवर्तन नहीं आया।

एक दिन भगवान् शिवजी ने शनिदेव को सबक सिखाने के लिए उन पर प्रहार किया जिससे शनिदेव मूर्छित हो गये, पिता सूर्यदेव के कहने पर भगवान् शिवजी ने शनिदेव की मूर्छा तोड़ी तथा शनिदेव को अपना शिष्य बना लिया और उन्हें दण्डाधिकारी का आशीर्वाद दिया, इस प्रकार शनिदेव न्यायधीश के समान न्याय एवं दण्ड के कार्य में भगवान् शिवजी का सहयोग करने लगे।

शास्त्रों के अनुसार एक दिन शनिदेव कैलाश पर्वत पर अपने गुरु भगवान् भोलेनाथ से भेट करने के बाद कहा- प्रभु! कल में आपकी राशि में प्रवेश करने वाला हूंँ, अर्थात मेरी वक्रदृष्टि आप पर पड़ने वाली है, भगवान् शिवजी ने जब यह सूना तो वे आश्चर्य में पड गयें, तथा शनिदेव से बोले की तुम्हारी वक्रदृष्टि कितने समय के लिये मुझ पर रहेगी?

शनिदेव ने शिवजी से कहा की कल मेरी वक्रदृष्टि आप पर सवा प्रहर तक रहेगी, अगले दिन प्रातः शिवजी ने सोचा की आज मुझ पर शनि की दृष्टि पड़ने वाली है, अतः मुझे कुछ ऐसा करना होगा की आज के दिन शनि मुझे देख ही ना पाये? तब भगवान् शिवजी कुछ सोचते हुये मृत्यु लोक अर्थात धरती में प्रकट हुये तथा उन्होंने अपना भेष बदलकर हाथी का रूप धारण कर लिया।

सज्जनों! पुरे दिन भोलेनाथ हाथी का रूप धारण कर धरती पर इधर-उधर विचरण करते रहे, जब शाम हुई तो भगवान् शिवजी ने सोचा की अब शनि मेरे ग्रह से जाने वाला है, अतः मुझे मेरे वास्तविक स्वरूप में आ जाना चाहियें, भगवान् शिवजी अपना वास्तविक रूप धारण कर कैलाश पर्वत पर वापस आयें, भोलेनाथ प्रसन्न मुद्रा में कैलाश पर्वत पहुँचे तो वहाँ पर पहले से ही मौजूद शनिदेव शिवजी की प्रतीक्षा कर रहे थे।

शनिदेव को देखते है शिवजी बोले, हे शनिदेव! देखो तुम्हारी वक्रदृष्टि का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं हुआ, तथा आज में सारे दिन तुम से सुरक्षित रहा, भगवान् भोलेनाथ की बात को सुन शनिदेव मुस्कराते हुये बोले- प्रभु! मेरी दृष्टि से ना तो कोई देव बच पाये है और नहीं कोई दानव, यहाँ तक की आप पर भी आज पुरे दिन मेरे वक्र दृष्टि का प्रभाव रहा।

भगवान् शिवजी आश्चर्यचकित होते हुये शनिदेव से पूछा कि यह कैसे सम्भव है? मैं तुम्हें मिला ही नहीं, तो वक्रदृष्टि का सवाल ही नहीं? शनिदेव बड़ी शालीनता से मुस्कराते हुए शिवजी से बोले- प्रभु मेरे वक्र दृष्टि के कारण ही आपको आज सारे दिन देव-योनि से पशु योनि में जाना पड़ा इस प्रकार आप मेरी वक्रदृष्टि के पात्र बने।

यह सुनकर भगवान् भोलेनाथ ने शनिदेव से प्रसन्न होकर उन्हें गले से लगा लिया तथा पूरे कैलाश पर्वत में शनिदेव का जयकारा गूजने लगा, अतः शनिदेव के प्रकोप से भगवान् भी नहीं बच सकते तो हम कलयुगी मानव की बिसात ही क्या है? इसलिये सत्यता को जीवन में अपनाओं, पवित्रता को चरित्र में धारण करों, शुचिता को व्यवहार में लाओ।

अगर शनिदेव की वक्रदृष्टि हमारे ऊपर आ भी गयीं तो कुछ समय की ही होगी यह भी नियमित सत्संग भजन तथा उचित उपाय करने से कम अनुभव होती है , न्याय के देवता श्री शनि महाराज पूरा लेखा-जोखा रखते हैं, अतः पाप से बचो व अन्याय का साथ न दो, समस्त जीवों पर दया का भाव रखों, भगवान् भोलेनाथ के साथ शनि महाराज आपकी रक्षा करें।

शनि जनित सर्वारिष्ट शांति के उपाय
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आपको किसी भी कारण शनि के शुभ फल प्राप्त नहीं हो रहे हैं। फिर वह चाहे जन्मकुंडली में शनि ग्रह के अशुभ होने, शनि साढ़ेसाती या शनि ढैय्या के कारण है तो प्रस्तुख लेख में दिये गये सरल उपाय आपके लिए लाभकारी सिद्ध होंगे।

भारतीय समाज में आमतौर ऐसा माना जाता है कि शनि अनिष्टकारक, अशुभ और दुःख प्रदाता है, पर वास्तव में ऐसा नहीं है। मानव जीवन में शनि के सकारात्मक प्रभाव भी बहुत है। शनि संतुलन एवं न्याय के ग्रह हैं। यह नीले रंग के ग्रह हैं, जिससे नीले रंग की किरणें पृथ्वी पर निरंतर पड़ती रहती हैं। यह सबसे धीमी गति से चलने वाला ग्रह है। यह बड़ा है, इसलिए यह एक राशि का भ्रमण करने में अढाई वर्ष तथा १२ राशियों का भ्रमण करने पर लगभग ३० वर्ष का समय लगाता है।

शनि अपने पिता सूर्य से अत्यधिक दूरी के कारण प्रकाशहीन है। इसलिए इसे अंधकारमयी, विद्याहीन, भावहीन, उत्साह हीन, नीच, निर्दयी, अभावग्रस्त माना जाता है। फिर भी विशेष परिस्थितियों में यह अर्थ, धर्म, कर्म और न्याय का प्रतीक है। इसके अलावा शनि ही सुख-संपत्ति, वैभव और मोक्ष भी देते हैं।

प्रायः शनि पापी व्यक्तियों के लिए दुख और कष्टकारक होता है। मगर ईमानदारों के लिए यह यश, धन, पद और सम्मान का ग्रह है। शनि की दशा आने पर जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते हैं। शनि प्रायः किसी को क्षति नहीं पहुंचाता, लेकिन अति की स्थिति में अनेक ऐसे सरल टोटके हैं, जिनका प्रयोग कर हम लाभ उठा सकते हैं। साथ ही इस आलेख में लाल किताब में शनि के १२ भावों का फलादेश व नियम, परहेज व उपाय भी दिये गये हैं, जिनका प्रयोग कर हम शनि शांति कर सकते हैं और जीवन में दुख दूर कर कामयाबी की ओर बढ़ सकते हैं।

शनि का प्रभाव व निवास मुख्य रूप से तेल व लौह में होता है, अतः जीवन में कभी भी तेल निशुल्क (फ्री) में ना लें और ना तेल की कीमत से कम पैसे देने चाहिए, भूलकर भी तेल के पैसे नहीं खाना चाहिए और ना ही मुल्य से कम पैसे देने चाहिए, अन्यथा शनि का प्रकोप झेलना पड़ता है। जीवन में कभी न कभी शनि का प्रभाव हर व्यक्ति पर पडता है, यही ग्रह है जो आप को राजा बना सकता है यही है जो आप को ऐश्वर्य धन तथा चक्रवति सम्राट तक बना सकता है और यही शनि आप को, निर्धन (राजा से फकीर) बना देता है।


शनि के प्रभाव को अपने अनुरूप करने के लिए कुछ उपाय
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शनि के सिर्फ तिल का तेल ही चढता है और तिल का तेल ही सभी देवताओं व महा देवी-देवताओं तथा सभी धार्मिक महत्व में उतम स्थान प्राप्त है लेकिन कुछ मंदबुदृि के लोग सरसों के तेल को भी शनि व अन्य धार्मिक कार्यों के लिए उपयोग में लेते हैं जो कि अनैतिक व अधर्म है। हमारे शास्त्रों में सरसों का कही भी उल्लेख नहीं है, अतः तिल ही श्रेष्ठ कहा गया है और कार्य सिद्ध करने के लिए तिल का तेल ही इस्तेमाल करना चाहिए।

शनि के लिए सरसों के तेल का प्रयोग वर्जित है। आगे आप की मर्जी.।?

शनिवार को काले रंग की चिड़िया खरीदकर उसे दोनों हाथों से आसमान में उड़ा दें। आपकी दुख-तकलीफें दूर हो जायेंगी

शनिवार के दिन लोहे का त्रिशूल महाकाल शिव, महाकाल भैरव या महाकाली मंदिर में अर्पित करें।

शनि दोष के कारण विवाह में विलंब हो रहा हो, तो शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार को २५० ग्राम काली राई, नये काले कपड़े में बांधकर पीपल के पेड़ की जड़ में रख आयें और शीघ्र विवाह की प्रार्थना करें।

पुराना जूता शनिचरी अमावस्या के दिन चैराहे पर रखें।

आर्थिक वृद्धि के लिए आप सदैव शनिवार के दिन गेंहू पिसवाएं और गेहूं में कुछ काले चने भी मिला दें।

किसी भी शुक्ल पक्ष के पहले शनि को १० बादाम लेकर हनुमान मंदिर में जायें। ०५ बादाम वहां रख दें और ०५ बादाम घर लाकर किसी लाल वस्त्र में बांधकर धन स्थान पर रख दें।

शनिवार के दिन बंदरों को काले चने, गुड़, केला खिलाएं।

तिल के तेल का छाया पत्र दान करें।

बहते पानी में सर से ११ बार नारियल उसारकर विसर्जित करें।

शनिवार को काले उड़द पीसकर उसके आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को खिलाएं।

प्रत्येक शनिवार को आक के पौधे पर ७ लोहे की कीलें चढ़ाएं।

काले घोड़े की नाल या नाव की कील से बनी लोहे की अंगूठी मध्यमा उंगली में शनिवार को सूर्यस्त के समय पहनें।

लगातार पांच शनिवार शमशान घाट में लकड़ी का दान करें।

काले कुत्ते को दूध पिलाएं।

शनिवार की रात को तिल का तेल से बने पुडी या गुलगुले (पुये) कुत्तो को व गरीब लोगों को खिलाऐ।

चीटिंयों को 7 शनिवार काले तिल, आटा, शक्कर मिलाकर खिलाएं।

शनिवार की शाम पीपल के पेड़ के नीचे तिल के तेल का दीपक जलाएं।

शनि की ढैया से ग्रस्ति व्यक्ति को हनुमान चालीसा का सुबह-शाम जप करना चाहिए।

शनि पीड़ा से ग्रस्त व्यक्ति को रात्रि के समय दूध का सेवन नहीं करना चाहिए।

काला हकीक सुनशान जगह में शनिवार के दिन दबाएं।

शनिवार के कारण कर्ज से मुक्ति ना हो रही हो, तो काले गुलाब जामुन अंधों को खिलाएं।

शनिवार की संध्या को काले कुत्ते को चुपड़ी हुई रोटी खिलाएं। यदि काला कुत्ते रोटी खा ले तो अवश्य शनि ग्रह द्वारा मिल रही पीड़ा शांति होती है।

काले कुत्ते को द्वार पर नहीं लाना चाहिए। अपितु पास जाकर सड़क पर ही रोटी खिलानी चाहिए।

शनि शांति के लिए ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः या ऊँ शनैश्चराय नमः का जप करें।

शनि शांति के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जप करें।

सात मुखी रुद्राक्ष भी शनि शांति के लिए धारण कर सकते हैं।

नीलम रत्न धारण करें अथवा नीली या लाजवर्त, पंच धातु में धारण करें।

विशेष रत्न धारण अथवा अन्य उपाय करने से पहले किसी योग्य ज्योतिषी से परामर्श अवश्य करें।

संकलन✏✏✏
पं देवशर्मा
९४१११८५५५२
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कामेंट्स

Ravi Pandey Nov 11, 2017
jai sani dev jai shree Radhe Krishna radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe

Gopal Jalan Jan 20, 2021

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Shakti Jan 20, 2021

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🏵️ श्री"सिद्धिविनायक" मंदिर 🏵️ "सिद्धिविनायक "मन्दिर मुम्बई स्थित एक प्रसिद्ध गणेश मन्दिर है। सिद्घिविनायक, गणेश जी का सबसे लोकप्रिय रूप है। ➡️श्री गणेश जी की जिन प्रतिमाओं की सूड़ दाईं तरह मुड़ी होती है, वे सिद्घपीठ से जुड़ी होती हैं और उनके मंदिर सिद्घिविनायक मंदिर कहलाते हैं। ➡️ सिद्धि विनायक की महिमा अपरंपार है, वे भक्तों की मनोकामना को तुरन्त पूरा करते हैं। मान्यता है कि ऐसे गणपति बहुत ही जल्दी प्रसन्न होते हैं और उतनी ही जल्दी कुपित भी होते हैं। ➡️चतुर्भुजी विग्रह सिद्धि विनायक की दूसरी विशेषता यह है कि वह चतुर्भुजी विग्रह है। उनके ऊपरी दाएं हाथ में कमल और बाएं हाथ में अंकुश है और नीचे के दाहिने हाथ में मोतियों की माला और बाएं हाथ में मोदक (लड्डुओं) भरा कटोरा है। गणपति के दोनों ओर उनकी दोनो पत्नियां ऋद्धि और सिद्धि मौजूद हैं जो धन, ऐश्वर्य, सफलता और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने का प्रतीक है। मस्तक पर अपने पिता शिव के समान एक तीसरा नेत्र और गले में एक सर्प हार के स्थान पर लिपटा है। सिद्धि विनायक का विग्रह ढाई फीट ऊंचा होता है और यह दो फीट चौड़े एक ही काले शिलाखंड से बना होता है। ➡️मुंबई का सिद्घिविनायक ➡️ दाहिनी ओर मुड़ी गणेश प्रतिमाएं सिद्ध पीठ की होती हैं और मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर में गणेश जी की जो प्रतिमा है, वह दाईं ओर मुड़े सूड़ वाली है। यानी यह मंदिर भी सिद्ध पीठ है। ➡️ वर्तमान में सिद्धि विनायक मंदिर की इमारत पांच मंजिला है और यहां प्रवचन ग्रह, गणेश संग्रहालय व गणेश विद्यापीठ के अलावा दूसरी मंजिल पर अस्पताल भी है, जहां रोगियों की मुफ्त चिकित्सा की जाती है। इसी मंजिल पर रसोईघर है, जहां से एक लिफ्ट सीधे गर्भग्रह में आती है। पुजारी गणपति के लिए निर्मित प्रसाद व लड्डू इसी रास्ते से लाते हैं। ➡️गर्भगृह ➡️नवनिर्मित मंदिर के 'गभारा ’ यानी गर्भगृह को इस तरह बनाया गया है ताकि अधिक से अधिक भक्त गणपति का सभामंडप से सीधे दर्शन कर सकें। पहले मंजिल की गैलरियां भी इस तरह बनाई गई हैं कि भक्त वहां से भी सीधे दर्शन कर सकते हैं। अष्टभुजी गर्भग्रह तकरीबन 10 फीट चौड़ा और 13 फीट ऊंचा है। गर्भग्रह के चबूतरे पर स्वर्ण शिखर वाला चांदी का सुंदर मंडप है, जिसमें सिद्धि विनायक विराजते हैं। गर्भग्रह में भक्तों के जाने के लिए तीन दरवाजे हैं, जिन पर अष्टविनायक, अष्टलक्ष्मी और दशावतार की आकृतियां चित्रित हैं। ➡️ सिद्धिविनायक मंदिर में हर मंगलवार को भारी संख्या में भक्तगण गणपति बप्पा के दर्शन कर अपनी अभिलाषा पूरी करते हैं। ➡️हर साल गणपति पूजा महोत्सव यहां भाद्रपद की चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक विशेष समारोह पूर्वक मनाया जाता है। 🏵️ऊं श्री गणेशाय नमः 🏵️

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मनुष्य देह के घटक कौन से हैं ? 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ इस लेख में हमने मनुष्य देह की रचना और उसके विविध सूक्ष्म देहों का विवरण दिया है। आधुनिक विज्ञान ने मनुष्य के स्थूल शरीर का कुछ गहराई तक अध्ययन किया है; किंतु मनुष्य के अस्तित्व के अन्य अंगों के संदर्भ में आधुनिक विज्ञान की समझ आज भी अत्यंत सीमित है। मनुष्य के मन एवं बुद्धि के संदर्भ में ज्ञान अब भी उनके स्थूल अंगों तक सीमित है। इसकी तुलना में अध्यात्मशास्त्र ने मनुष्य के संपूर्ण अस्तित्व का विस्तृतरूप से अध्ययन किया है। अध्यात्मशास्त्र के अनुसार मनुष्य किन घटकों से बना है ? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 👉 जीवित मनुष्य आगे दिए अनुसार विविध देहों से बना है। 👉 स्थूल शरीर अथवा स्थूलदेह 👉 चेतना (ऊर्जा) अथवा प्राणदेह 👉 मन अथवा मनोदेह 👉 बुद्धि अथवा कारणदेह 👉 सूक्ष्म अहं अथवा महाकारण देह 👉 आत्मा अथवा हम सभी में विद्यमान ईश्‍वरीय तत्त्व स्थूलदेह 〰️〰️〰️ आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से यह देह सर्वाधिक परिचित है। यह देह अस्थि-ढांचा, स्नायु, ऊतक, अवयव, रक्त, पंच ज्ञानेंद्रिय आदि से बनी है। चेतनामय अथवा प्राणदेह 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ यह देह प्राणदेह के नाम से परिचित है । इस देह द्वारा स्थूल तथा मनोदेह के सभी कार्यों के लिए आवश्यक चेतनाशक्ति की (ऊर्जा की) आपूर्ति की जाती है । यह चेतनाशक्ति अथवा प्राण पांच प्रकार के होते हैं : प्राण :👉 श्‍वास के लिए आवश्यक ऊर्जा उदान :👉 उच्छवास तथा बोलने के लिए आवश्यक ऊर्जा समान :👉 जठर एवं आंतों के कार्य के लिए आवश्यक ऊर्जा व्यान :👉 शरीर की ऐच्छिक तथा अनैच्छिक गतिविधियों के लिए आवश्यक ऊर्जा अपान :👉 मल-मूत्र विसर्जन, वीर्यपतन, प्रसव आदि के लिए आवश्यक ऊर्जा मृत्यु के समय यह ऊर्जा पुनश्‍च ब्रह्मांड में विलीन होती है और साथ ही सूक्ष्मदेह की यात्रा में गति प्रदान करने में सहायक होती है। मनोदेह अथवा मन 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ मनोदेह अथवा मन हमारी संवेदनाएं, भावनाएं और इच्छाआें का स्थान है । इस पर हमारे वर्तमान तथा पूर्वजन्म के अनंत संस्कार होते हैं। इसके तीन भाग हैं : बाह्य (चेतन) मन👉 मन के इस भाग में हमारी वे संवेदनाएं तथा विचार होते हैं, जिनका हमें भान रहता है। अंतर्मन (अवचेतन मन)👉 इसमें वे संस्कार होते हैं, जिन्हें हमें इस जन्म में प्रारब्ध के रूप में भोगकर पूरा करना आवश्यक है । अंतर्मन के विचार किसी बाह्य संवेदना के कारण, तो कभी-कभी बिना किसी कारण भी बाह्यमन में समय-समय पर उभरते हैं । उदाहरण👉 कभी-कभी किसी के मन में अचानक ही बचपन की किसी संदिग्ध घटना के विषय में निरर्थक एवं असम्बंधित विचार उभर आते हैं । सुप्त (अचेतन) मन👉 मन के इस भाग के संदर्भ में हम पूर्णतः अनभिज्ञ होते हैं । इसमें हमारे संचित से संबंधित सर्व संस्कार होते हैं । अंतर्मन तथा सुप्त मन, दोनों मिलकर चित्त बनता है। कभी-कभी मनोदेह के एक भाग को हम वासनादेह भी कहते हैं। मन के इस भाग में हमारी सर्व वासनाएं संस्कारूप में होती हैं। मनोदेह से सम्बंधित स्थूल अवयव मस्तिष्क है । बुद्धि 〰️〰️ कारणदेह अथवा बुद्धि का कार्य है निर्णय प्रक्रिया एवं तर्कक्षमता। बुद्धि से सम्बंधित स्थूल अवयव मस्तिष्क है। सूक्ष्म अहं 〰️〰️〰️ सूक्ष्म अहं अथवा महाकारण देह मनुष्य की अज्ञानता का अंतिम शेष भाग (अवशेष) है। मैं ईश्‍वर से अलग हूं, यह भावना ही अज्ञानता है। आत्मा 〰️〰️〰️ आत्मा हमारे भीतर का ईश्‍वरीय तत्त्व है और हमारा वास्तविक स्वरूप है । सूक्ष्मदेह का यह मुख्य घटक है, जो कि परमेश्‍वरीय तत्त्व का अंश है । इस अंश के गुण हैं – सत, चित्त और आनंद (शाश्‍वत सुख) । आत्मा पर जीवन के किसी सुख-दुःख का प्रभाव नहीं पडता और वह निरंतर आनंदावस्था में रहती है । वह जीवन के सुख-दुःखों की ओर साक्षीभाव से (तटस्थता से) देखती है। आत्मा तीन मूल सूक्ष्म-घटकों के परे है; तथापि हमारा शेष अस्तित्व स्थूलदेह एवं मनोदेह से बना होता है। सूक्ष्मदेह 〰️〰️〰️ हमारे अस्तित्व का जो भाग मृत्यु के समय हमारे स्थूल शरीर को छोड जाता है, उसे सूक्ष्मदेह कहते हैं । इसके घटक हैं – मनोदेह, कारणदेह अथवा बुद्धि, महाकारण देह अथवा सूक्ष्म अहं और आत्मा । मृत्यु के समय केवल स्थूलदेह पीछे रह जाती है । प्राणशक्ति पुनश्‍च ब्रह्मांड में विलीन हो जाती है । सूक्ष्मदेह के कुछ अंग निम्नानुसार हैं । 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय👉 सूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय अर्थात हमारे पंचज्ञानेंद्रियों का वह सूक्ष्म भाग जिसके द्वारा हमें सूक्ष्म विश्‍व का बोध होता है। उदाहरण👉 कोई उत्तेजक न होते हुए भी हम चमेली के फूल जैसी सूक्ष्म सुगंध अनुभव कर सकते हैं । यह भी संभव है कि एक ही कक्ष में किसी एक को इस सूक्ष्म सुगंध की अनुभूति हो और अन्य किसी को न हो । इसका विस्तृत विवरण दिया है । सूक्ष्म कर्मेंद्रिय👉 सूक्ष्म कर्मेंद्रिय अर्थात, हमारे हाथ, जिह्वा (जीभ) स्थूल कर्मेंद्रियों का सूक्ष्म भाग। सर्व क्रियाओ का प्रारंभ सूक्ष्म कर्मेंद्रियों में होता है और तदुपरांत ये क्रियाएं स्थूल स्तर पर व्यक्ति की स्थूल कर्मेंद्रियों द्वारा की जाती हैं। अज्ञान (अविद्या) 〰️〰️〰️〰️〰️ आत्मा के अतिरिक्त हमारे अस्तित्व के सभी अंग माया का ही भाग हैं । इसे अज्ञान अथवा अविद्या कहते हैं, जिसका शब्दशः अर्थ है (सत्य) ज्ञान का अभाव । अविद्या अथवा अज्ञान शब्द का उगम इस तथ्य से है कि हम अपने अस्तित्व को केवल स्थूल शरीर, मन एवं बुद्धि तक ही सीमित समझते हैं । हमारा तादात्म्य हमारे सत्य स्वरूप (आत्मा अथवा स्वयंमें विद्यमान ईश्‍वरीय तत्त्व) के साथ नहीं होता । अज्ञान (अविद्या) ही दुःख का मूल कारण है । मनुष्य धनसंपत्ति, अपना घर, परिवार, नगर, देश आदि के प्रति आसक्त होता है । किसी व्यक्ति से अथवा वस्तु से आसक्ति जितनी अधिक होती है, उतनी ही इस आसक्ति से दुःख निर्मिति की संभावना अधिक होती है । एक आदर्श समाज सेवक अथवा संतके भी क्रमशः समाज तथा भक्तों के प्रति आसक्त होने की संभावना रहती है । मनुष्य की सबसे अधिक आसक्ति स्वयं के प्रति अर्थात अपने ही शरीर एवं मन के प्रति होती है । अल्पसा कष्ट अथवा रोग मनुष्य को दुःखी कर सकता है । इसलिए मनुष्य को स्वयं से धीर-धीरे अनासक्त होकर अपने जीवन में आनेवाले दुःख तथा व्याधियों को स्वीकार करना चाहिए, इस आंतरिक बोध के साथ कि जीवन में सुख-दुःख प्रमुखतः हमारे प्रारब्ध के कारण ही हैं (हमारे ही पिछले कर्मों का फल हैं ।) आत्मा से तादात्म्य होने पर ही हम शाश्‍वत (चिरस्थायी) आनंद प्राप्त कर सकते हैं । आत्मा और अविद्या मिलकर जीवात्मा बनती है । जीवित मनुष्य में अविद्या के कुल बीस घटक होते हैं – स्थूल शरीर, पंचसूक्ष्म ज्ञानेंद्रिय, पंचसूक्ष्म कर्मेंद्रिय, पंचप्राण, बाह्यमन, अंतर्मन, बुद्धि और अहं । सूक्ष्म देह के घटकों का कार्य निरंतर होता है, जीवात्मा का ध्यान आत्मा की अपेक्षा इन घटकों की ओर आकर्षित होता है; अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान की अपेक्षा अविद्या की ओर जाता है । 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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आशुतोष Jan 19, 2021

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Shakti Jan 19, 2021

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Anita Sharma Jan 19, 2021

🍃🌼"नंदा नाई"🌼🍃 🌼🍃एक नाई जिसका नाम नंदा था वह एक कृष्ण भक्त था। सुबह उठकर कृष्ण की सेवा करता, उन्हें भोग लगाता, कीर्तन करता फिर अपने काम पर निकलता था। 🌼🍃 सबसे पहले राजा की हजामत करता था क्योंकि राजा को दरबार जाना होता था। राजा की हजामत के बाद नगर के लिए निकलता था। एक दिन कृष्ण सेवा के बाद कीर्तन करते-करते कृष्ण के ध्यान में खो गया। पत्नी ने देर होते देख और राजा के क्रोध की बात सोचकर नंदा को झंझोड़ते हुये कहा - अजी सुनते हो! राजा के दरबार जाने का समय हो गया है। राजा की हजामत करनी है, राजा क्रोधित हो जायेंगे। नंदा ने जल्दी अपना सामान लिया और महल की ओर चल दिया। महल पहुंचा तो देखा कि वहां से राजा दरबार के लिए निकल रहे थे। राजा ने नंदा को देखकर कहा - अभी तो हजामत करके गये हो! क्या तुम्हे कोई परेशानी है या किसी चीज आवश्यकता है? नंदा ने कहा - जी नहीं! मुझे लगा मैं शायद कुछ भूल रहा था। नंदा मन में सोचने लगा; मैं तो अभी आ रहा हूं, मैं तो कीर्तन में मुग्ध था तो राजा की हजामत किसने की? नंदा को मन मे विचार आया, मेरी लाज रखने और राजा के क्रोध से बचाने मेरे कृष्ण ही मेरे रूप में आये होंगे। ईश्वर कहते हैं - डर मत! मैं तेरे साथ हूं और कही नहीं तेरे आस-पास हूं। आँखे बंद करके मुझे याद कर और कोई नही मैं तेरा विश्वास हूँ।।

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Garima Gahlot Rajput Jan 19, 2021

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