शनि महाराज की कथा एवं उपाय । संकलन✏✏✏पं देवशर्मा

शनि महाराज की कथा एवं उपाय । संकलन✏✏✏पं देवशर्मा

शनि महाराज की कथा एवं उपाय
〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰
हिन्दू धर्म ग्रन्थों और शास्त्रों में भगवान् शिवजी को शनिदेव का गुरु बताया गया है, तथा शनिदेव को न्याय करने और किसी को दण्डित करने की शक्ति भगवान् शिवजी के आशीर्वाद द्वारा ही प्राप्त हुई है, अर्थात शनिदेव किसी को भी उनके कर्मो के अनुसार उनके साथ न्याय कर सकते है और उन्हें दण्डित कर सकते है, चाहे वे देवता हो या असुर, मनुष्य हो या कोई अन्य प्राणी ।

शास्त्रों के अनुसार सूर्य देव एवं देवी छाया के पुत्र शनिदेव को क्रूर ग्रह की संज्ञा दी गयी है । शनिदेव बचपन में बहुत ही उद्ण्डत थे तथा पिता सूर्य देव ने उनकी इस उदंडता से परेशान होकर भगवान् शिवजी को अपने पुत्र शनि को सही मार्ग दिखाने को कहा, भगवान् शिवजी के लाख समझाने पर भी जब शनिदेव की उदंडता में कोई परिवर्तन नहीं आया।

एक दिन भगवान् शिवजी ने शनिदेव को सबक सिखाने के लिए उन पर प्रहार किया जिससे शनिदेव मूर्छित हो गये, पिता सूर्यदेव के कहने पर भगवान् शिवजी ने शनिदेव की मूर्छा तोड़ी तथा शनिदेव को अपना शिष्य बना लिया और उन्हें दण्डाधिकारी का आशीर्वाद दिया, इस प्रकार शनिदेव न्यायधीश के समान न्याय एवं दण्ड के कार्य में भगवान् शिवजी का सहयोग करने लगे।

शास्त्रों के अनुसार एक दिन शनिदेव कैलाश पर्वत पर अपने गुरु भगवान् भोलेनाथ से भेट करने के बाद कहा- प्रभु! कल में आपकी राशि में प्रवेश करने वाला हूंँ, अर्थात मेरी वक्रदृष्टि आप पर पड़ने वाली है, भगवान् शिवजी ने जब यह सूना तो वे आश्चर्य में पड गयें, तथा शनिदेव से बोले की तुम्हारी वक्रदृष्टि कितने समय के लिये मुझ पर रहेगी?

शनिदेव ने शिवजी से कहा की कल मेरी वक्रदृष्टि आप पर सवा प्रहर तक रहेगी, अगले दिन प्रातः शिवजी ने सोचा की आज मुझ पर शनि की दृष्टि पड़ने वाली है, अतः मुझे कुछ ऐसा करना होगा की आज के दिन शनि मुझे देख ही ना पाये? तब भगवान् शिवजी कुछ सोचते हुये मृत्यु लोक अर्थात धरती में प्रकट हुये तथा उन्होंने अपना भेष बदलकर हाथी का रूप धारण कर लिया।

सज्जनों! पुरे दिन भोलेनाथ हाथी का रूप धारण कर धरती पर इधर-उधर विचरण करते रहे, जब शाम हुई तो भगवान् शिवजी ने सोचा की अब शनि मेरे ग्रह से जाने वाला है, अतः मुझे मेरे वास्तविक स्वरूप में आ जाना चाहियें, भगवान् शिवजी अपना वास्तविक रूप धारण कर कैलाश पर्वत पर वापस आयें, भोलेनाथ प्रसन्न मुद्रा में कैलाश पर्वत पहुँचे तो वहाँ पर पहले से ही मौजूद शनिदेव शिवजी की प्रतीक्षा कर रहे थे।

शनिदेव को देखते है शिवजी बोले, हे शनिदेव! देखो तुम्हारी वक्रदृष्टि का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं हुआ, तथा आज में सारे दिन तुम से सुरक्षित रहा, भगवान् भोलेनाथ की बात को सुन शनिदेव मुस्कराते हुये बोले- प्रभु! मेरी दृष्टि से ना तो कोई देव बच पाये है और नहीं कोई दानव, यहाँ तक की आप पर भी आज पुरे दिन मेरे वक्र दृष्टि का प्रभाव रहा।

भगवान् शिवजी आश्चर्यचकित होते हुये शनिदेव से पूछा कि यह कैसे सम्भव है? मैं तुम्हें मिला ही नहीं, तो वक्रदृष्टि का सवाल ही नहीं? शनिदेव बड़ी शालीनता से मुस्कराते हुए शिवजी से बोले- प्रभु मेरे वक्र दृष्टि के कारण ही आपको आज सारे दिन देव-योनि से पशु योनि में जाना पड़ा इस प्रकार आप मेरी वक्रदृष्टि के पात्र बने।

यह सुनकर भगवान् भोलेनाथ ने शनिदेव से प्रसन्न होकर उन्हें गले से लगा लिया तथा पूरे कैलाश पर्वत में शनिदेव का जयकारा गूजने लगा, अतः शनिदेव के प्रकोप से भगवान् भी नहीं बच सकते तो हम कलयुगी मानव की बिसात ही क्या है? इसलिये सत्यता को जीवन में अपनाओं, पवित्रता को चरित्र में धारण करों, शुचिता को व्यवहार में लाओ।

अगर शनिदेव की वक्रदृष्टि हमारे ऊपर आ भी गयीं तो कुछ समय की ही होगी यह भी नियमित सत्संग भजन तथा उचित उपाय करने से कम अनुभव होती है , न्याय के देवता श्री शनि महाराज पूरा लेखा-जोखा रखते हैं, अतः पाप से बचो व अन्याय का साथ न दो, समस्त जीवों पर दया का भाव रखों, भगवान् भोलेनाथ के साथ शनि महाराज आपकी रक्षा करें।

शनि जनित सर्वारिष्ट शांति के उपाय
〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰
आपको किसी भी कारण शनि के शुभ फल प्राप्त नहीं हो रहे हैं। फिर वह चाहे जन्मकुंडली में शनि ग्रह के अशुभ होने, शनि साढ़ेसाती या शनि ढैय्या के कारण है तो प्रस्तुख लेख में दिये गये सरल उपाय आपके लिए लाभकारी सिद्ध होंगे।

भारतीय समाज में आमतौर ऐसा माना जाता है कि शनि अनिष्टकारक, अशुभ और दुःख प्रदाता है, पर वास्तव में ऐसा नहीं है। मानव जीवन में शनि के सकारात्मक प्रभाव भी बहुत है। शनि संतुलन एवं न्याय के ग्रह हैं। यह नीले रंग के ग्रह हैं, जिससे नीले रंग की किरणें पृथ्वी पर निरंतर पड़ती रहती हैं। यह सबसे धीमी गति से चलने वाला ग्रह है। यह बड़ा है, इसलिए यह एक राशि का भ्रमण करने में अढाई वर्ष तथा १२ राशियों का भ्रमण करने पर लगभग ३० वर्ष का समय लगाता है।

शनि अपने पिता सूर्य से अत्यधिक दूरी के कारण प्रकाशहीन है। इसलिए इसे अंधकारमयी, विद्याहीन, भावहीन, उत्साह हीन, नीच, निर्दयी, अभावग्रस्त माना जाता है। फिर भी विशेष परिस्थितियों में यह अर्थ, धर्म, कर्म और न्याय का प्रतीक है। इसके अलावा शनि ही सुख-संपत्ति, वैभव और मोक्ष भी देते हैं।

प्रायः शनि पापी व्यक्तियों के लिए दुख और कष्टकारक होता है। मगर ईमानदारों के लिए यह यश, धन, पद और सम्मान का ग्रह है। शनि की दशा आने पर जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते हैं। शनि प्रायः किसी को क्षति नहीं पहुंचाता, लेकिन अति की स्थिति में अनेक ऐसे सरल टोटके हैं, जिनका प्रयोग कर हम लाभ उठा सकते हैं। साथ ही इस आलेख में लाल किताब में शनि के १२ भावों का फलादेश व नियम, परहेज व उपाय भी दिये गये हैं, जिनका प्रयोग कर हम शनि शांति कर सकते हैं और जीवन में दुख दूर कर कामयाबी की ओर बढ़ सकते हैं।

शनि का प्रभाव व निवास मुख्य रूप से तेल व लौह में होता है, अतः जीवन में कभी भी तेल निशुल्क (फ्री) में ना लें और ना तेल की कीमत से कम पैसे देने चाहिए, भूलकर भी तेल के पैसे नहीं खाना चाहिए और ना ही मुल्य से कम पैसे देने चाहिए, अन्यथा शनि का प्रकोप झेलना पड़ता है। जीवन में कभी न कभी शनि का प्रभाव हर व्यक्ति पर पडता है, यही ग्रह है जो आप को राजा बना सकता है यही है जो आप को ऐश्वर्य धन तथा चक्रवति सम्राट तक बना सकता है और यही शनि आप को, निर्धन (राजा से फकीर) बना देता है।


शनि के प्रभाव को अपने अनुरूप करने के लिए कुछ उपाय
〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
शनि के सिर्फ तिल का तेल ही चढता है और तिल का तेल ही सभी देवताओं व महा देवी-देवताओं तथा सभी धार्मिक महत्व में उतम स्थान प्राप्त है लेकिन कुछ मंदबुदृि के लोग सरसों के तेल को भी शनि व अन्य धार्मिक कार्यों के लिए उपयोग में लेते हैं जो कि अनैतिक व अधर्म है। हमारे शास्त्रों में सरसों का कही भी उल्लेख नहीं है, अतः तिल ही श्रेष्ठ कहा गया है और कार्य सिद्ध करने के लिए तिल का तेल ही इस्तेमाल करना चाहिए।

शनि के लिए सरसों के तेल का प्रयोग वर्जित है। आगे आप की मर्जी.।?

शनिवार को काले रंग की चिड़िया खरीदकर उसे दोनों हाथों से आसमान में उड़ा दें। आपकी दुख-तकलीफें दूर हो जायेंगी

शनिवार के दिन लोहे का त्रिशूल महाकाल शिव, महाकाल भैरव या महाकाली मंदिर में अर्पित करें।

शनि दोष के कारण विवाह में विलंब हो रहा हो, तो शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार को २५० ग्राम काली राई, नये काले कपड़े में बांधकर पीपल के पेड़ की जड़ में रख आयें और शीघ्र विवाह की प्रार्थना करें।

पुराना जूता शनिचरी अमावस्या के दिन चैराहे पर रखें।

आर्थिक वृद्धि के लिए आप सदैव शनिवार के दिन गेंहू पिसवाएं और गेहूं में कुछ काले चने भी मिला दें।

किसी भी शुक्ल पक्ष के पहले शनि को १० बादाम लेकर हनुमान मंदिर में जायें। ०५ बादाम वहां रख दें और ०५ बादाम घर लाकर किसी लाल वस्त्र में बांधकर धन स्थान पर रख दें।

शनिवार के दिन बंदरों को काले चने, गुड़, केला खिलाएं।

तिल के तेल का छाया पत्र दान करें।

बहते पानी में सर से ११ बार नारियल उसारकर विसर्जित करें।

शनिवार को काले उड़द पीसकर उसके आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को खिलाएं।

प्रत्येक शनिवार को आक के पौधे पर ७ लोहे की कीलें चढ़ाएं।

काले घोड़े की नाल या नाव की कील से बनी लोहे की अंगूठी मध्यमा उंगली में शनिवार को सूर्यस्त के समय पहनें।

लगातार पांच शनिवार शमशान घाट में लकड़ी का दान करें।

काले कुत्ते को दूध पिलाएं।

शनिवार की रात को तिल का तेल से बने पुडी या गुलगुले (पुये) कुत्तो को व गरीब लोगों को खिलाऐ।

चीटिंयों को 7 शनिवार काले तिल, आटा, शक्कर मिलाकर खिलाएं।

शनिवार की शाम पीपल के पेड़ के नीचे तिल के तेल का दीपक जलाएं।

शनि की ढैया से ग्रस्ति व्यक्ति को हनुमान चालीसा का सुबह-शाम जप करना चाहिए।

शनि पीड़ा से ग्रस्त व्यक्ति को रात्रि के समय दूध का सेवन नहीं करना चाहिए।

काला हकीक सुनशान जगह में शनिवार के दिन दबाएं।

शनिवार के कारण कर्ज से मुक्ति ना हो रही हो, तो काले गुलाब जामुन अंधों को खिलाएं।

शनिवार की संध्या को काले कुत्ते को चुपड़ी हुई रोटी खिलाएं। यदि काला कुत्ते रोटी खा ले तो अवश्य शनि ग्रह द्वारा मिल रही पीड़ा शांति होती है।

काले कुत्ते को द्वार पर नहीं लाना चाहिए। अपितु पास जाकर सड़क पर ही रोटी खिलानी चाहिए।

शनि शांति के लिए ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः या ऊँ शनैश्चराय नमः का जप करें।

शनि शांति के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जप करें।

सात मुखी रुद्राक्ष भी शनि शांति के लिए धारण कर सकते हैं।

नीलम रत्न धारण करें अथवा नीली या लाजवर्त, पंच धातु में धारण करें।

विशेष रत्न धारण अथवा अन्य उपाय करने से पहले किसी योग्य ज्योतिषी से परामर्श अवश्य करें।

संकलन✏✏✏
पं देवशर्मा
९४१११८५५५२
〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

+201 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 153 शेयर

कामेंट्स

Ravi Pandey Nov 11, 2017
jai sani dev jai shree Radhe Krishna radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe

+324 प्रतिक्रिया 63 कॉमेंट्स • 166 शेयर

+65 प्रतिक्रिया 11 कॉमेंट्स • 60 शेयर
Anita Sharma Feb 28, 2021

ज्ञान वाणी। राजस्थान के हाड़ोती क्षेत्र के बूंदी नगर में रामदासजी नाम के एक बनिया थे । वे व्यापार करने के साथ-साथ भगवान की भक्ति-साधना भी करते थे और नित्य संतों की सेवा भी किया करते थे । भगवान ने अपने भक्तों (संतों) की पूजा को अपनी पूजा से श्रेष्ठ माना है क्योंकि संत लोग अपने पवित्र संग से असंतों को भी अपने जैसा संत बना लेते हैं ।भगवान की इसी बात को मानकर भक्तों ने संतों की सेवा को भगवान की सेवा से बढ़कर माना है-‘प्रथम भक्ति संतन कर संगा ।’ रामदासजी सारा दिन नमक-मिर्च, गुड़ आदि की गठरी अपनी पीठ पर बांध कर गांव में फेरी लगाकर सामान बेचते थे जिससे उन्हें कुछ पैसे और अनाज मिल जाता था । एक दिन फेरी में कुछ सामान बेचने के बाद गठरी सिर पर रखकर घर की ओर चले । गठरी का वजन अधिक था पर वह उसे जैसे-तैसे ढो रहे थे । भगवान श्रीराम एक किसान का रूप धारण कर आये और बोले—‘भगतजी ! आपका दु:ख मुझसे देखा नहीं जा रहा है । मुझे भार वहन करने का अभ्यास है, मुझे भी बूंदी जाना है, मैं आपकी गठरी घर पहुंचा दूंगा ।’ गीता (९।१४) में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है—‘संत लोग धैर्य धारण करके प्रयत्न से नित्य कीर्तन और नमन करते हैं, भक्तिभाव से नित्य उपासना करते हैं । ऐसे प्रेमी संत मेरे और मैं उनका हूँ; इस लोक में मैं उनके कार्यों में सदा सहयोग करता हूँ ।’ ऐसा कह कर भगवान ने अपने भक्त के सिर का भार अपने ऊपर ले लिया और तेजी से आगे बढ़कर आंखों से ओझल हो गये । रामदासजी सोचने लगे—‘मैं इसे पहचानता नहीं हूँ और यह भी शायद मेरा घर न जानता होगा । पर जाने दो, राम करे सो होय ।’ यह कहकर वह रामधुन गाते हुए घर की चल दिए । रास्ते में वे मन-ही-मन सोचने लगे—आज थका हुआ हूँ, यदि घर पहुंचने पर गर्म जल मिल जाए तो झट से स्नान कर सेवा-पूजा कर लूं और आज कढ़ी-चपाती का भोग लगे तो अच्छा है । उधर किसान बने भगवान श्रीराम ने रामदासजी के घर जाकर गठरी एक कोने में रख दी और जोर से पुकार कर कहा—‘भगतजी आ रहे हैं, उन्होंने कहा है कि नहाने के लिए पानी गर्म कर देना और भोग के लिए कढ़ी-चपाती बना देना ।’ कुछ देर बाद रामदासजी घर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि सामान की गठरी कोने में रखी है । उनकी पत्नी ने कहा—‘पानी गर्म कर दिया है, झट से स्नान कर लो । भोग के लिए गर्म-गर्म कढ़ी और फुलके भी तैयार हैं ।’ रामदासजी ने आश्चर्यचकित होकर पूछा—‘तुमने मेरे मन की बात कैसे जान ली ।’ पत्नी बोली—‘मुझे क्या पता तुम्हारे मन की बात ? उस गठरी लाने वाले ने कहा था ।’ रामदासजी समझ गए कि आज रामजी ने भक्त-वत्सलतावश बड़ा कष्ट सहा । उनकी आंखों से प्रेमाश्रु झरने लगे और वे अपने इष्ट के ध्यान में बैठ गये । ध्यान में प्रभु श्रीराम ने प्रकट होकर प्रसन्न होते हुए कहा—‘तुम नित्य सन्त-सेवा के लिए इतना परिश्रम करते हो, मैंने तुम्हारी थोड़ी-सी सहायता कर दी तो क्या हुआ ?’ रामदासजी ने अपनी पत्नी से पूछा—‘क्या तूने उस गठरी लाने वाले को देखा था?’ पत्नी बोली—‘मैं तो अंदर थी, पर उस व्यक्ति के शब्द बहुत ही मधुर थे।’ रामदासजी ने पत्नी को बताया कि वे साक्षात् श्रीराम ही थे । तभी उन्होंने मेरे मन की बात जान ली। दोनों पति-पत्नी भगवान की भक्तवत्सलता से भाव-विह्वल होकर रामधुन गाने में लीन हो गये। संदेश -गीता (८।१४) में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है— अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश: । तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन: ।। अर्थात्—‘मेरा ही ध्यान मन में रखकर प्रतिदिन जो मुझे भजता है, उस योगी संत को सहज में मेरा दर्शन हो जाता है ।’

+30 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 15 शेयर

+133 प्रतिक्रिया 25 कॉमेंट्स • 77 शेयर

🌠🌠🌠🌠🌠🌠🌠🌠🌠🌠🌠 प्राचीन समय से ही भारत में एक से बढ़कर एक धनुर्धर हुए हैं. लेकिन हमारे देश में धनुष-बाण की शुरुआत कब और कैसे हुई? यह एक रहस्य ही है. विश्व के प्राचीनतम साहित्य संहिता और अरण्य ग्रंथों में इंद्र के वज्र और धनुष-बाण का वर्णन मिलता है. वहीँ हिन्दू धर्म के 4 उपवेदों में से चौथा उपवेद धनुर्वेद का ही है. एक अन्य साहित्य में भी कुल 12 तरह के शस्त्रों का वर्णन किया गया है जिसमें धनुष-बाण का स्थान सबसे ऊपर माना गया है. आइए जानते हैं कुछ दिव्य धनुष और बाणों के बारे में. पिनाक धनुष: भगवान शंकर ने इसी धनुष के द्वारा ब्रह्मा से अमरत्व का वरदान पाने वाले त्रिपुरासुर राक्षस का संहार किया था. भगवान शंकर ने इसी धनुष के एक ही तीर से त्रिपुरासुर के तीनों नगरों को ध्वस्त कर दिया था. बाद में भगवान शंकर ने इस धनुष को देवराज इंद्र को सौंप दिया था. पिनाक नामक यह वही शिव धनुष था जिसे देवताओं ने राजा जनक के पूर्वजों को दिया था जो अंत में धरोहर के रूप में राजा जनक को प्राप्त हुआ था. इसी पिनाक नामक धनुष को भगवान राम ने प्रत्यंचा चढ़ाकर तोड़ दिया था. कोदंड धनुष: कोदंड अर्थात ‘बांस’ का बना हुआ यह धनुष भगवान राम के पास था. ऐसी मान्यता है कि इस धनुष से छोड़ा गया बाण अपना लक्ष्य भेदकर ही वापस आता था. शारंग धनुष: सींग का बना हुआ यह धनुष भगवान श्रीकृष्ण के पास था. ऐसा माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण इसी धनुष के द्वारा लक्ष्मणा स्वयंवर की प्रतियोगिता जीतकर लक्ष्मणा से विवाह किया था. गाण्डीव धनुष: यह धनुष अर्जुन के पास था. मान्यता है कि अर्जुन के गाण्डीव धनुष की टंकार से सारा युद्ध क्षेत्र गूंज जाता था. अर्जुन को यह धनुष अग्नि देवता से प्राप्त हुआ था और अग्नि देवता को यह धनुष वरुण देव से प्राप्त हुआ था. विजय धनुष: यह धनुष कर्ण के पास था. ऐसा माना जाता है कि कर्ण को यह धनुष उनके गुरु परशुराम ने प्रदान किया था. इस धनुष की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह किसी भी तरह के अस्त्र-शस्त्र से खंडित नहीं हो सकता था. जय श्री भोलेनाथ जय श्री राम जय श्री कृष्ण जय श्री हरी ॐ 🙏 ॐ नमोऽस्तुते 👏 नमस्कार शुभ रात्री वंदन 👣 💐 👏 🚩 🐚 🌹 नमस्कार 🙏 🚩 🌙✨💫💥🎪🌷🎉🕯🌹🙏🚩 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷 🌷

+19 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 3 शेयर
RAJ RATHOD Feb 26, 2021

+274 प्रतिक्रिया 52 कॉमेंट्स • 305 शेयर

गोत्र क्या है? सनातन धर्म के अंतर्गत वर्ण के साथ-साथ गोत्र को भी बेहद महत्वपूर्ण दर्जा दिया गया है। जहां एक ओर समान वर्ण में विवाह करने को मान्यता प्रदान की गई है वहीं इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी बताया है कि वर-वधु का गोत्र समान ना हो.... ऐसी मानयता है कि अगर समान गोत्र वाले स्त्री-पुरुष विवाह बंधन में बंध जाते हैं तो उनकी होने वाली संतान को रक्त संबंधित समस्याएं आ सकती हैं। कई बार गोत्र के विषय में पढ़ा और सुना है..... लेकिन गोत्र क्या है ?इसके विषय में हम जानते हैं? शायद नहीं.... बहुत ही कमलोग इस बात से अवगत होंगे कि आखिर गोत्र है और इसका निर्धारण कैसे होता है। आज हम इसी सवाल का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार गोत्र का शाब्दिक अर्थ बेहद व्यापक है... जिसकी समय-समय पर व्याखाया भी की जाती रही है। गोत्र शब्द की संधि विच्छेद पर ध्यान दें तो यह ‘गो’ यानि इन्द्रियां और ‘त्र’ यानि रक्षा करना से मिलकर बना है... अर्थात इन्द्रियों पर आघात से रक्षा करने वाला....जिसे “ऋषि” कहा जाता है। सनातन धर्म से संबंधित दस्तावेजों पर नजर डालें तो प्राचीनकाल में चार ऋषियों के नाम से गोत्र परंपरा की शुरुआत हुई, जिनके नाम ऋषि अंगिरा, ऋषि कश्यप, ऋषि वशिष्ठ और ऋषि भृगु हैं... कुछ समय पश्चात इनमें ऋषि जमदग्नि, ऋषि अत्रि, ऋषि विश्वामित्र और ऋषि अगस्त्य भी इसमें जुड़ गए। प्रैक्टिकल तौर पर देखा जाए तो गोत्र का आशय पहचान से है... यानि कौनसा व्यक्ति किस ऋषि का वंशज है। सामाजिक तौर पर देखा जाए तो 'गोत्र' की स्थापना का मुख्य उद्देश्य ‘एकत्रीकरण’ से संबंध रखता है। ॐ गं गणपतये नमः 👏 ॐ नम :शिवाय ॐ नमो नारायणाय ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जय श्री भोलेनाथ ॐ सूर्याय नमः 🌅 👏 🌹 🚩 फेब्रुवारी महिने का आखरी दिवस 28 शुभ 🌅 रविवार जय श्री सुर्य नारायण 🌅 👣 💐 👏 ॐ नमो नारायणाय नमस्कार 🙏 🚩

+22 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 10 शेयर
Anita Sharma Feb 27, 2021

*अदभुत गणितज्ञ "श्री.तुलसीदासजी"* ... से एक भक्त ने पूछा कि... महाराज आप श्रीराम के इतने गुणगान करते हैं , क्या कभी खुद श्रीराम ने आपको दर्शन दिए हैं ?.. तुलसीदास बोले :- " हां " भक्त :- महाराज क्या आप मुझे भी दर्शन करा देंगे ??? तुलसीदास :- " हां अवश्य " ....तुलसीदास जी ने ऐसा मार्ग दिखाया कि एक गणित का विद्वान भी चकित हो जाए !!! *तुलसीदास जी ने कहा , ""अरे भाई यह बहुत ही आसान है !!! तुम श्रीराम के दर्शन स्वयं अपने अंदर ही प्राप्त कर सकते हो.""* *हर नाम के अंत में राम का ही नाम है.* इसे समझने के लिए तुम्हे एक *"सूत्रश्लोक "* बताता हूं . यह सूत्र किसी के भी नाम में लागू होता है !!! भक्त :-" कौनसा सूत्र महाराज ?" *तुलसीदास* :- यह सूत्र है ... *||"नाम चतुर्गुण पंचतत्व मिलन तासां द्विगुण प्रमाण || || तुलसी अष्ट सोभाग्ये अंत मे शेष राम ही राम || "* इस सूत्र के अनुसार ★ *अब हम किसी का भी नाम ले और उसके अक्षरों की गिनती करें*... *१)उस गिनती को (चतुर्गुण) ४ से गुणाकार करें*. *२) उसमें (पंचतत्व मिलन) ५ मिला लें.* *३) फिर उसे (द्विगुण प्रमाण) दुगना करें.* *४)आई हुई संख्या को (अष्ट सो भागे) ८ से विभाजित करें .* *"" संख्या पूर्ण विभाजित नहीं होगी और हमेशा २ शेष रहेगा!!! ... *यह २ ही "राम" है। यह २ अंक ही " राम " अक्षर हैं*... ★विश्वास नहीं हों रहा है ना??? चलिए हम एक उदाहरण लेते हैं ... आप एक नाम लिखें , अक्षर कितने भी हों !!! ★ उदा. ..निरंजन... ४ अक्षर १) ४ से गुणा करिए ४x४=१६ २)५ जोड़िए १६+५=२१ ३) दुगने करिए २१×२=४२ ४)८ से विभाजन करने पर ४२÷८= ५ पूर्ण अंक , शेष २ !!! *शेष हमेशा दो ही बचेंगे,यह बचे २ अर्थात् - "राम" !!!* *विशेष यह है कि सूत्रश्लोक की संख्याओं को तुलसीदासजी ने विशेष महत्व दिया है*!!! ★1) *चतुर्गुण* अर्थात् *४ पुरुषार्थ* :- *धर्म, अर्थ, काम,मोक्ष* !!! ★2) *पंचतत्व* अर्थात् ५ *पंचमहाभौतिक* :- *पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु , आकाश*!!! ★3) *द्विगुण प्रमाण* अर्थात् २ *माया व ब्रह्म* !!! ★4) *अष्ट सो भागे* अर्थात् ८ * *आठ प्रकार की लक्ष्मी* (आग्घ, विद्या, सौभाग्य, अमृत, काम, सत्य, भोग आणि योग लक्ष्मी ) अथवा तो अष्ठधा प्रकृति. ★अब यदि हम सभी अपने नाम की जांच इस सूत्र के अनुसार करें तो आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि हमेशा शेष २ ही प्राप्त होगा ... इसी से हमें श्री तुलसीदास जी की बुद्धिमानी और अनंत रामभक्ति का ज्ञान होता है !!! 🙏🏻 *जय श्रीराम* 🙏🏻(साभार फेसबुक)

+20 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 53 शेयर
Garima Gahlot Rajput Feb 27, 2021

+6 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 11 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB