श्री भागवत महापुराण में आज प्रथम स्कन्ध का द्वितीय अध्याय प्रथम स्कन्ध-दूसरा अध्याय भगवत्कथा और भगवद्भक्तिका माहात्म्य श्रीव्यासजी कहते हैं—शौनकादि ब्रह्मवादी ऋषियोंके ये प्रश्र सुनकर रोमहर्षणके पुत्र उग्रश्रवाको बड़ा ही आनन्द हुआ। उन्होंने ऋषियोंके इस मङ्गलमय प्रश्रका अभिनन्दन करके कहना आरम्भ किया ॥ १ ॥ सूतजीने कहा—जिस समय श्रीशुकदेवजीका यज्ञोपवीत-संस्कार भी नहीं हुआ था, सुतरां लौकिक-वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था, उन्हें अकेले ही संन्यास लेनेके उद्देश्यसे जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरहसे कातर होकर पुकारने लगे—‘बेटा ! बेटा !’ उस समय तन्मय होनेके कारण श्रीशुकदेवजीकी ओरसे वृक्षोंने उत्तर दिया। ऐसे सबके हृदयमें विराजमान श्रीशुकदेव मुनिको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ यह श्रीमद्भागवत अत्यन्त गोपनीय— रहस्यात्मक पुराण है। यह भगवत्स्वरूपका अनुभव करानेवाला और समस्त वेदोंका सार है। संसारमें फँसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञानान्धकारसे पार जाना चाहते हैं, उनके लिये आध्यात्मिक तत्त्वोंको प्रकाशित करानेवाला यह एक अद्वितीय दीपक है। वास्तवमें उन्हींपर करुणा करके बड़े- बड़े मुनियोंके आचार्य श्रीशुकदेवजीने इसका वर्णन किया है। मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ ॥ ३ ॥ मनुष्योंमें सर्वश्रेष्ठ भगवान्‌के अवतार नर-नारायण ऋषियोंको, सरस्वती देवीको और श्रीव्यासदेवजीको नमस्कार करके तब संसार और अन्त:करणके समस्त विकारोंपर विजय प्राप्त करानेवाले इस श्रीमद्भागवत महापुराणका पाठ करना चाहिये ॥ ४ ॥ ऋषियो ! आपने सम्पूर्ण विश्वके कल्याणके लिये यह बहुत सुन्दर प्रश्र किया है; क्योंकि यह प्रश्र श्रीकृष्णके सम्बन्धमें है और इससे भलीभाँति आत्मशुद्धि हो जाती है ॥ ५ ॥ मनुष्योंके लिये सर्वश्रेष्ठ धर्म वही है, जिससे भगवान्‌ श्रीकृष्णमें भक्ति हो—भक्ति भी ऐसी, जिसमें किसी प्रकारकी कामना न हो और जो नित्य-निरन्तर बनी रहे; ऐसी भक्तिसे हृदय आनन्दस्वरूप परमात्माकी उपलब्धि करके कृतकृत्य हो जाता है ॥ ६ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णमें भक्ति होते ही, अनन्य प्रेमसे उनमें चित्त जोड़ते ही निष्काम ज्ञान और वैराग्यका आविर्भाव हो जाता है ॥ ७ ॥ धर्मका ठीक-ठीक अनुष्ठान करनेपर भी यदि मनुष्यके हृदयमें भगवान्‌की लीला-कथाओंके प्रति अनुरागका उदय न हो तो वह निरा श्रम-ही-श्रम है ॥ ८ ॥ धर्मका फल है मोक्ष। उसकी सार्थकता अर्थ-प्राप्तिमें नहीं है। अर्थ केवल धर्मके लिये है। भोगविलास उसका फल नहीं माना गया है ॥ ९ ॥ भोगविलासका फल इन्द्रियोंको तृप्त करना नहीं है, उसका प्रयोजन है केवल जीवन- निर्वाह। जीवनका फल भी तत्त्वजिज्ञासा है। बहुत कर्म करके स्वर्गादि प्राप्त करना उसका फल नहीं है ॥ १० ॥ तत्त्ववेत्तालोग ज्ञाता और ज्ञेयके भेदसे रहित अखण्ड अद्वितीय सच्चिदानन्दस्वरूप ज्ञानको ही तत्त्व कहते हैं। उसीको कोई ब्रह्म, कोई परमात्मा और कोई भगवान्‌के नामसे पुकारते हैं ॥ ११ ॥ श्रद्धालु मुनिजन भागवत-श्रवणसे प्राप्त ज्ञान-वैराग्ययुक्त भक्तिसे अपने हृदयमें उस परमतत्त्वरूप परमात्माका अनुभव करते हैं ॥ १२ ॥ शौनकादि ऋषियो ! यही कारण है कि अपने-अपने वर्ण तथा आश्रमके अनुसार मनुष्य जो धर्मका अनुष्ठान करते हैं, उसकी पूर्ण सिद्धि इसीमें है कि भगवान्‌ प्रसन्न हों ॥ १३ ॥ इसलिये एकाग्र मनसे भक्तवत्सल भगवान्‌का ही नित्य-निरन्तर श्रवण, कीर्तन, ध्यान और आराधन करना चाहिये ॥ १४ ॥ कर्मोंकी गाँठ बड़ी कड़ी है। विचारवान् पुरुष भगवान्‌के चिन्तनकी तलवारसे उस गाँठको काट डालते हैं। तब भला, ऐसा कौन मनुष्य होगा, जो भगवान्‌की लीलाकथामें प्रेम न करे ॥ १५ ॥ शौनकादि ऋषियो ! पवित्र तीर्थोंका सेवन करनेसे महत्सेवा, तदनन्तर श्रवणकी इच्छा, फिर श्रद्धा, तत्पश्चात् भगवत्-कथामें रुचि होती है ॥ १६ ॥ भगवान्‌ श्रीकृष्णके यशका श्रवण और कीर्तन दोनों पवित्र करनेवाले हैं। वे अपनी कथा सुननेवालोंके हृदयमें आकर स्थित हो जाते हैं और उनकी अशुभ वासनाओंको नष्ट कर देते हैं; क्योंकि वे संतोंके नित्यसुहृद् हैं ॥ १७ ॥ जब श्रीमद्भागवत अथवा भगवद्भक्तोंके निरन्तर सेवनसे अशुभ वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं, तब पवित्र- कीर्ति भगवान्‌ श्रीकृष्णके प्रति स्थायी प्रेमकी प्राप्ति होती है ॥ १८ ॥ तब रजोगुण और तमोगुणके भाव—काम और लोभादि शान्त हो जाते हैं और चित्त इनसे रहित होकर सत्त्वगुणमें स्थित एवं निर्मल हो जाता है ॥ १९ ॥ इस प्रकार भगवान्‌की प्रेममयी भक्तिसे जब संसारकी समस्त आसक्तियाँ मिट जाती हैं, हृदय आनन्दसे भर जाता है, तब भगवान्‌के तत्त्वका अनुभव अपने-आप हो जाता है ॥ २० ॥ हृदयमें आत्मस्वरूप भगवान्‌का साक्षात्कार होते ही हृदयकी ग्रन्थि टूट जाती है, सारे सन्देह मिट जाते हैं और कर्मबन्धन क्षीण हो जाता है ॥ २१ ॥ इसीसे बुद्धिमान् लोग नित्य- निरन्तर बड़े आनन्दसे भगवान्‌ श्रीकृष्णके प्रति प्रेम-भक्ति करते हैं, जिससे आत्मप्रसादकी प्राप्ति होती है ॥ २२ ॥ प्रकृतिके तीन गुण हैं—सत्त्व, रज और तम। इनको स्वीकार करके इस संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और प्रलयके लिये एक अद्वितीय परमात्मा ही विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र—ये तीन नाम ग्रहण करते हैं। फिर भी मनुष्योंका परम कल्याण तो सत्त्वगुण स्वीकार करनेवाले श्रीहरिसे ही होता है ॥ २३ ॥ जैसे पृथ्वीके विकार लकड़ीकी अपेक्षा धुआँ श्रेष्ठ है और उससे भी श्रेष्ठ है अग्रि— क्योंकि वेदोक्त यज्ञ-यागादिके द्वारा अग्रि सद्गति देनेवाला है—वैसे ही तमोगुणसे रजोगुण श्रेष्ठ है और रजोगुणसे भी सत्त्वगुण श्रेष्ठ है; क्योंकि वह भगवान्‌का दर्शन करानेवाला है ॥ २४ ॥ प्राचीन युगमें महात्मालोग अपने कल्याणके लिये विशुद्ध सत्त्वमय भगवान्‌ विष्णुकी ही आराधना किया करते थे। अब भी जो लोग उनका अनुसरण करते हैं, वे उन्हींके समान कल्याणभाजन होते हैं ॥ २५ ॥ जो लोग इस संसारसागरसे पार जाना चाहते हैं, वे यद्यपि किसीकी निन्दा तो नहीं करते, न किसीमें दोष ही देखते हैं, फिर भी घोररूपवाले—तमोगुणी-रजोगुणी भैरवादि भूतपतियोंकी उपासना न करके सत्त्वगुणी विष्णुभगवान्‌ और उनके अंश—कलास्वरूपोंका ही भजन करते हैं ॥ २६ ॥ परन्तु जिसका स्वभाव रजोगुणी अथवा तमोगुणी है, वे धन, ऐश्वर्य और संतानकी कामनासे भूत, पितर और प्रजापतियोंकी उपासना करते हैं; क्योंकि इन लोगोंका स्वभाव उन (भूतादि) से मिलता-जुलता होता है ॥ २७ ॥ वेदोंका तात्पर्य श्रीकृष्णमें ही है। यज्ञोंके उद्देश्य श्रीकृष्ण ही हैं। योग श्रीकृष्णके लिये ही किये जाते हैं और समस्त कर्मोंकी परिसमाप्ति भी श्रीकृष्णमें ही है ॥ २८ ॥ ज्ञानसे ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णकी ही प्राप्ति होती है। तपस्या श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये ही की जाती है। श्रीकृष्णके लिये ही धर्मोंका अनुष्ठान होता है और सब गतियाँ श्रीकृष्णमें ही समा जाती हैं ॥ २९ ॥ यद्यपि भगवान्‌ श्रीकृष्ण प्रकृति और उसके गुणोंसे अतीत हैं, फिर भी अपनी गुणमयी मायासे, जो प्रपञ्चकी दृष्टिसे है और तत्त्वकी दृष्टिसे नहीं है—उन्होंने ही सर्गके आदिमें इस संसारकी रचना की थी ॥ ३० ॥ ये सत्त्व, रज और तम—तीनों गुण उसी मायाके विलास हैं; इनके भीतर रहकर भगवान्‌ इनसे युक्त-सरीखे मालूम पड़ते हैं। वास्तवमें तो वे परिपूर्ण विज्ञानानन्दघन हैं ॥ ३१ ॥ अग्रि तो वस्तुत: एक ही है, परंतु जब वह अनेक प्रकारकी लकडिय़ोंमें प्रकट होती है तब अनेक-सी मालूम पड़ती है। वैसे ही सबके आत्मरूप भगवान्‌ तो एक ही हैं, परंतु प्राणियोंकी अनेकतासे अनेक-जैसे जान पड़ते हैं ॥ ३२ ॥ भगवान्‌ ही सूक्ष्म भूत—तन्मात्रा, इन्द्रिय तथा अन्त:करण आदि गुणोंके विकारभूत भावोंके द्वारा नाना प्रकारकी योनियोंका निर्माण करते हैं और उनमें भिन्न-भिन्न जीवोंके रूपमें प्रवेश करके उन-उन योनियोंके अनुरूप विषयोंका उपभोग करते-कराते हैं ॥ ३३ ॥ वे ही सम्पूर्ण लोकोंकी रचना करते हैं और देवता, पशु-पक्षी, मनुष्य आदि योनियोंमें लीलावतार ग्रहण करके सत्त्वगुणके द्वारा जीवोंका पालन-पोषण करते हैं ॥ ३४ ॥ जय श्री हरि जय श्री राधे जय श्री कृष्ण

+459 प्रतिक्रिया 90 कॉमेंट्स • 95 शेयर

कामेंट्स

Rajkumar Puri Jan 17, 2021
🚩🙏 Jai Shri Krishna radhe radhe shubh ratri vandan ji 🙏 dhanyavad ji 🙏

Shivbrat divedi rewa mp Kaaku Jan 17, 2021
चाँद से प्यारी चांदनी चाँदनी से प्यारी रात। रात से प्यारी जिन्दगी, जिन्दगी से प्यारी आप।। हर पल मुस्कुराती रहिये जी 🙏🏻🙏🏻 शुभ रात्री🙏🙏 🌹🌹जय श्री राधे राधे🌹🌹

शान्ति पाठक Jan 17, 2021
🌷🙏जय श्री राधे कृष्णा🙏शुभ रात्रि जी 🌷 कान्हा जी की असीम कृपा से आपके जीवन में सुख शांति, सम्पन्नता हमेशा बनी रहे 🌷 आपकी आनेवाली हर सुबह खुशियों से परिपूर्ण रहें जी🌷🙏🌷

Gouri Shankar Jan 17, 2021
Hare Krishna radhey radhey ji 🙏🌹 bahut sunder post ji Seema ji good night ji aapko 😊🙏🌹🌹 Ram Ram Sa 🙏🙏

दक्षा किर्ति कुमार वैश्य Jan 17, 2021
बहुत खुबसूरत सुंदर विचार व्यक्त किए पोस्टर पर लखाण सुविचार वीडीयो डाउनलोड किया अच्छा लगा श्रीकृष्ण का नगरी नदी सब दुर हे पर उसकि नगरी में तो दर्शन किया दुर दुर भी द्वारका धिस नहीं दिखाई पड़ा क्युकी श्रीकृष्ण सबकि आत्मा में उतरे ला बैठेला हे अपने भक्तों के पास तो चमत्कार दिखाया हे भजन के बोल संगीत अच्छा लगा रंग बेरंगी डेकोरेशन सुसोभीत सणगार मजेदार धमाकेदार सब पसंद आया गुड नाईट जेय रामदेवजी रणुजा वाला जेय द्वारका धिस लिलिधजा वाला

keerti Ballabh Jan 17, 2021
🌺🙏jai Radhe Krishna ji 🙏🌺 🥀🙏🥀🙏🥀🙏🥀🙏🥀🙏 shubh Ratri good night ji 🙏🥀 ➖➖➖aap ki har manokamna puri ho aap sada khush rahe bhana🙏🥀🌺🌺

Ashwinrchauhan Jan 17, 2021
राधे राधे बहना जी राधारानी की कृपा आप पर आप के पुरे परिवार पर सदेव बनी रहे मेरी आदरणीय बहना जी आप का हर पल मंगल एवं शुभ रहे भगवान श्री कृष्णा जी आप की हर मनोकामना पूरी करे आप का आने वाला दिन शुभ रहे गुड नाईट बहना जी

dinesh rajput Jan 17, 2021
जय श्री राधे श्याम शुभ संध्या जी

RAKESH SHARMA Jan 17, 2021
JAI SHREE KRISHNA BAHUT HI SUNDER KATHA SUNDER BHAJAN ATI SARAHANIYA RADHEY KRISHNA K DRISHYA APKO KOTI KOTI DHANYAWAD JI 👌👌👌👌👌🙏🙏🙏🌹🌹🌹

RAKESH SHARMA Jan 17, 2021
RADHEY RADHEY Very Good NIGHT JI 🌹🌹🌹🌹🌹🙏🙏🙏🌹🌹🌹

Brajesh Sharma Jan 17, 2021
जय श्री राधे कृष्णा जी... ॐ नमः शिवाय.. हर हर महादेव

Naresh Rawat Jan 17, 2021
शुभ रात्रि वंदन जी🙏🌙.*☆ जय श्रीकृष्ण जय राधे राधे जी🙏🌷ठाकुर जी आप सपरिवार पर आपनी कृपा दृष्टि सदैव बनाएँ रखे जी🙏 आप सपरिवार सदा स्वस्थ 💪और खुश🙂 रहो जी🙏 शुभ रात्रि सबा खैर 😴

saumya sharma Jan 17, 2021
Jai shri radhe krishna🙏🙏🙏 Good night my dear sis 🌛😊🌹🙏

mukesh Rana Jan 17, 2021
ॐ नमो नारायण जी🙏💕 श्री हरि शुभ रात्रि स्नेह वंदन जी🙏💕

Umesh Sharma Jan 18, 2021
Jai Jai Shri Radhe 🌷 good morning 🌹🌿🌅🍵😊

bipinrawal Jan 19, 2021
seemaji dhanyawad. aapki saari posts bahuthi marmik hai.

Anita Sharna Feb 27, 2021

+21 प्रतिक्रिया 10 कॉमेंट्स • 10 शेयर

+21 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 1 शेयर
🙏🌹Vanita Kale Feb 27, 2021

1🙏🚩!!जय शनि देव!! 🚩🚩🚩🚩!!जय हनुमान जी!! 🚩माघ पाेणिैमा की हार्दिक शुभकामनाएं.... !!हरहर महादेव! .•*""*•.¸ ¸.•*""*•.¸ ¸.•*""*•.¸ 🌴सुभप्रभात 🌴 👌“‪👌  बिना सम्पत्ती की कभी 👌Will नही होती, बिना संस्कारों की कभी🌿 Goodwill नही होती,🌻 हमे अपने प्रत्येक कर्म का🌴 फल मिलता जरूर है,🌺 वरना पाप और पुण्य की कोई Deal नहीं होती.. जिस प्रकार घिसने, काटने, आग में तापने-पीटने, इन चार उपायो से सोने की परख की जाती है, वैसे ही त्याग, शील, गुण और कर्म, इन चारों से मनुष्य की पहचान होती है। - ¸.•*""*•.¸ 🌹🎁🌹🎁🌹 ""सदा मुस्कुराते रहिये"" 😊🍀🙏शुभ प्रभात🙏🍀😊 🌹┣━┫α ρ ρ у 🌹 🌹 *ℳỖŘŇĮŇĞ*🌹 ┈┉┅━❀꧁ω❍ω꧂❀━┅┉┈ *आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो* शुभ शनिवार 🌞 Good Morning🌞

+178 प्रतिक्रिया 35 कॉमेंट्स • 143 शेयर
Kp Gupta Feb 27, 2021

+10 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Ravi Kumar Taneja Feb 27, 2021

ॐ श्री शनैश्वराय नमः 🙏🌸🙏 ॐ श्री हनुमंते नमः 🙏🌸🙏 🙏🌹🙏 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏🌹🙏 🌹🌹🌹सुप्रभात स्नेहवंदन जी 🌹🌹🌹 सभी को माघी पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं🌻🌲🌻🌲🌻🌲🌻🌲🌻 ✡प्रभु *बजरंग बली*और न्याय के देवता *शनिदेव* की कृपा आप सभी के ऊपर हमेशा बनी रहे 🙏🌸🙏🌸🙏 🕉सभी का सम्मान करना बहुत अच्छी बात है,🕉 🕉*पर*🕉 🕉आत्मसम्मान के साथ जीना, खुद की पहचान है...!!!🕉 ✡🦚🦢🙏🌹🙏🌹🙏🦢🦚✡ 🕉**तुलसी साथी विपत्ति के* *विद्या विनय विवेक |* *साहस सुकृति सुसत्यव्रत* *राम भरोसे एक ।।* 🕉 🌹अर्थ:- तुलसीदास जी कहते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में ये सात सद्गुण आपकी सहायता/रक्षा करते हैं :-- 🌹आपका ज्ञान 🕉 🌹आपकी विनम्रता🕉 🌹आपकी बुद्धि🕉 🌹आपका साहस🕉 🌹आपके अच्छे कर्म🕉 🌹सच बोलने की आदत🕉 🌹और...🌹 🌹ईश्वर में विश्वास..!!🕉 🔯🏹🦚🦢🙏🌼🙏🌼🙏🦢🦚🏹🔯

+64 प्रतिक्रिया 14 कॉमेंट्स • 27 शेयर

+76 प्रतिक्रिया 16 कॉमेंट्स • 56 शेयर
Ratna Nankani Feb 27, 2021

+142 प्रतिक्रिया 36 कॉमेंट्स • 170 शेयर

Ram Ram ji 🙋‍♀️🌹🌹🌹🌹🌹✍️✍️🙏 *पानि जोरी आगे भइ ठाढी,* *प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढी।* *केहि बिधी अस्तुति करौ तुम्हारी*, *अधम जाति मैं जड़मति भारी।।* एकटक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद बुजुर्ग भीलनी के मुंह से बोल फूटे: "कहो राम! सबरी की डीह ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ?" राम मुस्कुराए: "यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मूल्य...?" *"जानते हो राम! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ जब तुम जन्में भी नहीं थे।* यह भी नहीं जानती थी कि तुम कौन हो? कैसे दिखते हो? क्यों आओगे मेरे पास..? *बस इतना ज्ञात था कि कोई पुरुषोत्तम आएगा जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा..."* राम ने कहा: *"तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था कि राम को सबरी के आश्रम में जाना है।"* "एक बात बताऊँ प्रभु! *भक्ति के दो भाव होते हैं। पहला मर्कट भाव, और दूसरा मार्जार भाव। बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है ताकि गिरे न... उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है........* ".....पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया। *मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी, और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है... मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हे क्या पकड़ना...।"* *राम मुस्कुरा कर रह गए।* भीलनी ने पुनः कहा: *"सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न... कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं। तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी... यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते?"* राम गम्भीर हुए। कहा: *"भ्रम में न पड़ो मां! राम क्या रावण का वध करने आया है?* ......... *अरे रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से बाण चला कर कर सकता है।* ......... *राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि हजारों वर्षों बाद जब कोई पाखण्डी भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था।* ............ *जब कोई कपटी भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि नहीं! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ...... एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है।* .......... *राम वन में बस इसलिए आया है ताकि जब युगों का इतिहास लिखा जाय तो उसमें अंकित हो कि सत्ता जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी वह रामराज्य है।* ............ *राम वन में इसलिए आया है ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया मां...!"* सबरी एकटक राम को निहारती रहीं। राम ने फिर कहा: *"राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता! राम की यात्रा प्रारंभ हुई है भविष्य के लिए आदर्श की स्थापना के लिए।* ........... *राम निकला है ताकि विश्व को बता सके माँ ,की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'राम' होना है।* .............. *राम निकला है कि ताकि भारत को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है।* .............. *राम आया है ताकि भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है,* ............ *राम आया है ताकि युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय, और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाय।* ......और, .............. *राम आया है ताकि युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी सबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं।"* सबरी की आँखों में जल भर आया था। उसने बात बदलकर कहा: "बेर खाओगे राम? राम मुस्कुराए, "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां..." सबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया। राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा: "मीठे हैं न प्रभु?" *"यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है...।"* सबरी मुस्कुराईं, बोलीं: *"सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो, राम!"* *संकलित*

+69 प्रतिक्रिया 27 कॉमेंट्स • 76 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB