Rajendra Prajapati
Rajendra Prajapati Apr 17, 2019

https://youtu.be/IVkzi2ND8LA

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poonam aggarwal Apr 17, 2019
Jay Shri radhe krishna ji Shub ratri vandan bhai ji be happy tc 🌹🌹🙏

Madhu sharma Apr 17, 2019
Shree Ganeshay Namah jai sairam ji very beautiful bhajan ji mangalmurti Shree Ganesh ji maharaj ji ka Aashirwad sadev hi Aap avam aap ki family par Har pal bana rhe Riddhi Siddhi ke Data aap ko Apaar Yash Kirti Vaibhav Accha Swasth Sabhi Sukh Shanti Dirghayu avam Samradhi pradhan karein ji Inke Aashirwad se aap Sabhi ka Jeevan Sda khushiyo se bhararhe aap ke Har pal Ati Shubh avam mangalmay ho good night ji 🙏🙏🌹🌹

Mamta Chauhan Apr 17, 2019
Radhe Radhe Ji Subh Ratri vandan bhai ji 🙏🙏🙏

Alka Devgan Apr 17, 2019
Om Ganeshay Namah 🙏 God bless you and your family aapka har pal mangalmay n shubh ho bhai ji 🙏 very beautiful post bhai ji 🙏 Ganpati Bappa aap sabhi par kirpa karein bhai ji 🙏 Ganpati Bappa moriyaa 🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹

sushila devi Apr 17, 2019
jay Shree Ganesh good morning Bhai ji aap Ka Deen bhut bhut shubh ho

Sanjna Apr 18, 2019
om namah shivay ji shubh Prabhat

Himani Sharma Apr 18, 2019
Jay shree radhe Krishna bhai Ji good morning apka din shubh or mnglmy ho

sumitra Apr 18, 2019
Om Sai Ram bhaiji Sai Baba aapki HR mnokamna Puri kre bhaiji Aapka din shubh v mnglmay ho bhaiji🙏🌹

sheela Sharma Apr 18, 2019
Jai Shri radhe krishna ji good morning bhai ji shree Ganesh जी ki kirpa aap aur aapki family par bani rahe bhai ji aap hamesha khush raho bhai ji

Savita Apr 18, 2019
om namo Narayana 🌹🌹 Shree Vishnu Hari g ki kirpa drishti Ap par sada bani rehe 🌹🌲 Laxmi Narayan g apki har manokamna Puri Kare 💠💠 AP hamesha Khush v sawasth rahe 🌼🌼 apki har Subah shubh v mangalmai ho 🌹🌺

Vanita Kale Apr 18, 2019
🙏🌷Om namah Shivay jai mahakal ji ki Kripa app per are aapke pariwar per Sada hi bani rahe Shubh ratri aap ka din shubh h mere Bhai ji 🌷🙏

Seema Valluvar Apr 18, 2019
राधे राधे जी, हर हर महादेव 🙏🌺🌺🌺🌺🍌🍌🍌🍌🍌🌿🌿🌿🌿🌿

astro puja Apr 18, 2019
कलियुग केवल नाम अधारा ।🌻 सुमिर- सुमिर नर उतरहिं पारा ।।🌻 राम सिया राम सिया राम जय जय राम ।।।🌻 🍃🌹🍃🚩🔔🚩🍃🌹🍃

Sandhya Nagar Apr 18, 2019
*श्री राधे....*🙌🏼🌸💐 *श्री राधा अमृत कथा... 🌸 📖 🌸* *श्री बरसाने* का गहवर वन की महिमा पवनदेव स्वयं को बड़भागी समझते हैं क्योंकि दो [एक ही] दिव्य-देहधारियों की सुवास को वह माध्यम रुप से बरसाने और नन्दगाँव के मध्य वितरित कर पाते हैं। राजकुँवरी श्रीवृषभानु-नन्दिनी संध्या समय अपनी दोनों अनन्य सखियों श्रीललिताजू और विशाखाजू के साथ अपने प्रिय गहवर-वन में विहार हेतु महल से निकल रही हैं। *श्रीजू* की शोभा का वर्णन तो दिव्य नेत्रों द्वारा निहारकर भी नहीं किया जा सकता। अनुपम दिव्य श्रृंगार है। बड़े घेर का लहँगा है जिसमें सोने के तारों से हीरे-मोती और पन्ने जड़े हुए हैं। संध्या समय के सूर्य की लालिमा की किरणें पड़ने से उसमें से ऐसी दिव्य आभा निकल रही है कि उस आभा के कारण भी *श्रीजू* के मुख की ओर देखना संभव नहीं हो पाता। संभव है नन्दनन्दन स्वयं भी न चाहते हों ! गहवर-वन को श्रीप्रियाजू ने स्वयं अपने हाथों से लगाया है, सींचा है; वहाँ के प्रत्येक लता-गुल्मों को उनके श्रीकर-पल्लव का स्पर्श मिला है सो वे हर ऋतु में फ़ल-फ़ूल और सुवास से भरे रहते हैं। खग-मृगों और शुक-सारिकाओं को भी श्रीगहवर वन में वास का सौभाग्य मिला है। मंद-मंद समीर बहता रहता है और शुक-सारिकाओं का कलरव एक अदभुत संगीत की सृष्टि करता रहता है। महल से एक सुन्दर पगडंडी गहवर वन को जाती है जिस पर समीप के लता-गुल्म पुष्पों की वर्षा करते रहते हैं। न जाने स्वामिनी कब पधारें और उनके श्रीचरणों में पर्वत- श्रृंखला की कठोर भूमि पर पग रखने से व्यथा न हो जाये ! सो वह पगडंडी सब समय पुष्पों से आच्छादित रहती है। पुष्पों की दिव्य सुगंध, वन की हरीतिमा और पक्षियों का कलरव एक दिव्य-लोक की सृष्टि करते हैं। हाँ, दिव्य ही तो ! जागतिक हो भी कैसे सकता है? परम तत्व कृपा कर प्रकट हुआ है। उस पगडंडी पर दिव्य-लता के पीछे एक "चोर" प्रतीक्षारत है। दर्शन की अभिलाषा लिये ! महल से प्रतिक्षण समीप आती सुवास संकेत दे रही है कि आराध्या निरन्तर समीप आ रही हैं। नेत्रों की व्याकुलता बढ़ती ही जा रही है; बार-बार वे उझककर देखते हैं कि कहीं दिख जायें और फ़िर छिप जाते हैं कि कहीं वे देख न लें ! *श्रीजू* महल की बारादरी से निकल अब पगडंडी पर अपना प्रथम पग रखने वाली हैं कि चोर का धैर्य छूट गया और वे दोनों घुटनों के बल पगडंडी पर बैठ गये और अपने दोनों कर-पल्लवों को आगे बढ़ा दिया है ताकि *श्रीजू* अपने श्रीचरणों का भूमि पर स्पर्श करने से पहले उनके कर-कमल को सेवा का अवसर दें। हे देव ! यह क्या? अचकचा गयीं श्रीप्रियाजू ! एक पग बारादरी में है और एक पग भूमि से ऊपर ! न रखते बनता है और न पीछे हटते ! "ललिते ! देख इन्हें ! यह न मानेंगे !" श्रीप्रियाजू ने ललिताजू के काँधे का आश्रय ले लिया है और लजाकर आँचल की ओट कर ली है। अपने प्राण-प्रियतम की इस लीला पर लजा भी रही हैं और गर्वित भी ! ऐसा कौन? परम तत्व ही ऐसा कर सकता है और कौन? श्रीललिताजू और श्रीविशाखाजू मुस्करा रही हैं; दिव्य लीलाओं के दर्शन का सौभाग्य जो मिला है ! नन्दनन्दन अधीर हो उठे हैं और अब वे साष्टांग प्रणाम कर रहे हैं अपनी आराध्या को। विनय कर रहे हैं कि *श्रीजू* के श्रीचरणों के स्पर्श का सौभाग्य उनके कर-पल्लव और मस्तक को मिले ! *श्रीजू* अभी भी एक पग पर ही ललिताजू के काँधे का अवलम्बन लिये खड़ी हैं और सम्पूर्ण गहवर-वन गूँज रहा है - *"स्मर गरल खण्डनम मम शिरसि मण्ड्नम।* *देहि पदपल्लवमुदारम।"* *जय जय श्री राधे....*🙌🏼🌸💐 ।

Sudesh Goyal Apr 18, 2019
Jai Shree radhe krishna ji happy guruvar have a nice day☀☀

Anita Mittal Apr 18, 2019
जय श्री कृष्णा जी कान्हा जी का आशीर्वाद व स्नेहानुराग आपके साथ बना रहे जी आपका हर पल मंगलमय व सर्वसुखप्रदायी हो जी

Anand Bhardwaj May 18, 2019

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Swamini May 17, 2019

🌹🍃🌹🍃🌹🍃🌹🍃🌹🍃 *|| महागणपति रूप वैभवम् ||* *श्री महागणपति, ब्रह्मपुराति के रूप में जाना जाता है, जो प्रमुदित है, चार प्रकार के ब्रह्मांडों का निर्माण किया और चौदह गणपति महाविद्या के साथ महादेव, महाविष्णु और ब्रह्मा की शुरुआत की। इनमें से मुख्य रूप से महागणपति का मंत्र निम्नलिखित पाँच कारणों से महाविद्या माना जाता है:* *महागणपति मंत्र हर दूसरे विद्या से पहले पूर्ण होता है क्योंकि यह मूलाधार विद्या है जो कि किसी की आध्यात्मिक यात्रा का प्रारंभिक बिंदु है [अग्रुपज्यत्व]।* *हर दूसरे देवता के उत्थान के लिए बाधाओं से छुटकारा पाने के लिए महाअगपति की पूजा करनी चाहिए। महागणपति की कृपा के बिना, उपासना बाधाओं से भर जाती है [विघ्ननाधिपत्यव]।* *महाअगपति का मंत्र स्वानंद लोका से उत्पन्न होता है, महाअगपति का निवास होता है, जो कि मंत्र को पढ़ने के फल का संकेत है - स्वअटचनानंद - स्वयं का आनंद [स्वानंदलोकतत्त्व]।* *महाअगपति मंत्र चार महाविद्याओं का सार है - महामंत्र के चार भागों में से प्रत्येक एक महावाक्य [महावाक्यस्वरुपत्व] का प्रतिनिधित्व करता है।* *महागणपति दो शक्तियों के देवता हैं - सिद्धि और बुद्धी, जो भोग और मोक्ष या भक्ति और ज्ञान का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रकार, महाअगपति मंत्र का एक उभार दोनों [सिद्धिबुद्धिपतित्व] के साथ प्राप्त होता है।* *श्री महागणपति ने गणक का रूप धारण किया और श्री शिव को गणपति के शाही मार्ग में दीक्षा दी। सत्य युग में, महादेव द्वारा विष्णु और शिव को 1000 गणपति तंत्र प्रकट किए गए थे। ये शिव के द्वारा काली के युग में ग्यारह गणपत तंत्रों में गाए गए थे: गणेश यमाला, सिद्धि यमाला, बुद्धी यमाला, सिद्धीश्वरा तंत्र, सिद्घिद्रा तंत्र, मित्र, गणेश, गणेश, गणेश, गणेश, गणेश, गणेश, गणेश।* *'गा' अक्षर सगुण ब्रह्म और `ना 'का प्रतिनिधित्व करता है - निर्गुण ब्रह्म। इन दोनों रूपों में प्रकट होने वाले आदिम भगवान को 'गणपति' कहा जाता है। जैसा कि वह पंच ब्रह्मा [ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, महेश्वरा और दु: खी शिव] के भगवान हैं, उन्हें ब्रह्मसंपत्ति कहा जाता है। आदिकालीन भगवान महागणपति अपने ब्रह्मांड में मौजूद हैं, जो अन्य ब्रह्मांडों से परे स्थित है, जिसे स्वानंद लोका कहा जाता है। प्रभु की अपरिमेय मैया शक्तियां, सिद्धि और बुद्ध के रूप में मौजूद हैं। चित्त शुद्धि [मन की पवित्रता] प्राप्त होने पर व्यक्ति की शक्ति के बल पर, सिद्धि और बुद्ध भगवान में विलीन हो जाते हैं और महाअगपति का देदीप्यमान रूप स्वयं के स्वयं के रूप में शानदार ढंग से चमकता है। नाम और रूपों के बिना दुनिया, जो ब्रह्मनास्पति का निवास है, स्वानंडलोक [ब्रह्मांड] कहलाता है स्वयं के आनंद की]।* *अथर्वशीर्षोपनिषद में बताए गए एकल अक्षर मंत्र का उच्चारण करते हुए ब्रह्मास्पति की पूजा की जाती है। गणक इस महामंत्र के लिए रुपी है और चंडास जीयात्रि है। चौदह गणेश मुद्राएँ प्रदर्शित करने के बाद मंत्र का उच्चारण किया जाना चाहिए: दांता, पाठ, अक्ष, विघ्न, परशु, मोदक, वर, अभय, चक्र, गदा, पद्म, छपा, लादुका और द्विअजप।* *ईकर्ण गणेश ने संस्कृत के वर्णमाला [मत्रका-]: विनयका, शिवोत्तम, विघ्नकर्त, विघ्नहर्ता, गणपा, एकदंत, द्वादंता, गजवक्त्र, निर्मंजना, क्रेमर्दि, दार्गिनी, दिग्वरी, द्वादशी, भगवान के 51 रूपों का वर्णन किया। , शूर्पकर्ण, त्रिनेत्र, लंबोदर, महानंदा, चतुरमूर्ति, सदाशिव, अमोदा, दुरमुखा, सुमुख, प्रमोदा, एकपापा, द्विजत्व, शूरा, विरा, शनमुख, वरदा, वामादेव, वक्रतुण्ड, दुर्धं डंडुण्डा। , मुंडी, खड्गे, वरेण्य, वृषकेतु, भक्तप्रिया, गनेश, मेघनाद, वायपी और गणेश्वर।* *एक अक्षर वाले मंत्र से प्रचलित महान भगवान ब्राह्मणस्पति को स्वानंदेश भी कहा जाता है और उनकी उत्पत्ति चार मूरति-एस: गणेश्वरा, गणक्रीड़ा, गणानाथ और गणपति से हुई है। इसके अलावा, स्वानंदेश के आठ अवतारा हैं, वक्रतुंड, एकदंत, महोदरा, गजानन, लंबोदर, विकता, विघ्नेश और धूम्रवर्णक। इन मूरति-से, गणेश के 100 रूप उत्पन्न होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप 108 स्वानंद होते हैं।* *गणेश्वरा को हमेशा योगनिद्रा में डूबा हुआ कहा जाता है। गणक्रीड़ा स्वानंद की जीवन शक्ति और गणेश के आनंद पहलू का प्रतिनिधित्व करता है। गणानाथ स्वानंदेश और गणाधिप के निराकार [निर्गुण] पहलू का प्रतिनिधित्व करते हैं, उनका सगुण [गुणों के साथ] रूप है।* *गणेश्वरा के सोलह अवतारा-एस हैं: सिद्धि-बुद्धिपति, धुंधी, पराशरसुता, कश्यपसुता, मयूरेश, ज्ञानेश, पंचकनीशा, पंचदेवरापराध, ओमकारेश, योगेश, कपीला, वेदनांक, वेदनाका, शंका। हिरण्यगर्भ, पश्वाश, वरदा गनेश, विराट-पति, पुष्यथ्रवा, मन्त्रपति, ज्ञानेश, दैत्यनाशका, स्कंदग्रजा, विघ्नहर्ता, तत्सवित्वा, शक्तिन्यका, मुशिकसुधा, श्रुतिसुधा, श्रवणश्रवण, श्रवणश्रवण, श्रवणश्राद्ध। चातुर्भुजा, लक्ष्मिश्वा, विष्णुरूपि, विष्णवेषा, धरणीधर, धुम्रवर्ण, शंभूरुपी, महेश्वराड़ा, काल, पार्वत्यनिगनायका - ये बत्तीस अवतारा-गणकृष्ण के *गनानाथ के सोलह अवतारा-एस हैं: श्वेतार्क गनेश, शमी गनेश, गव्य गनेश, मंदरा गनेश, सुमंगला गनेश, गजादंता, शोनभद्र,* *मल्लाह गनेश, कतंकटा गनेश, अविमुक्ती गौणभक्त गौतम,* *गौतम गणेश, श्वेतार्क गणेश। और लभेश्वर।* *सहस्रवदना गनेश, बीजा गनेश, त्रिमुख गन्नेश, शंकुमुख गनेश, पंचश्या गनेश, सुमुख,* *दुर्गा गनेश, कल्पक गनेश,* *दुर्मुखा, कुक्षी गनेश, बाला* *गन्नेश, गिद्धा, गंगाशाह, गंगाशाह*, *गंगा, गंगा, गंगा,* *गंगा। लक्ष्मी गणेश, भूमिपति गंगा, आशा पुरखा गनेश, पाषाणी गनेश, धूमाकेतु, वाहिनी गनेश,* *वायु गणेश, स्वरोद् गनेश, अज्ना गन्नेश, ज्येष्ठराज, क्षिप्राप्रसाद, क्षिप्रा, गदाधर, क्षिप्रा, श्रवण,* *श्रुतिप्रतिष्ठा गणेश - ये छत्तीस अवतार हैं* *गान्धिपा का।* *गणपति के 32 रूप भी हैं जिन्हें स्वानंद के अंग मुर्तियों के रूप में जाना जाता है: बाला गनेश, तरुण गनेश, भक्त गण, विरा गनेश, शक्ती गनेश, द्विज गणेश, सिद्धि गनेश, युचिश्त गणेश, विघ्न गिन्घना। गन्नेश, महा गनेश, विजाया गन्नेश, नृ्त्य गनेश, उर्ध्वा गनेश, एकक्षार गणेश, वर गणेश, त्र्यक्षरा गणेश, हरिद्रा गणेश, एकदंत, सृष्टी गणेश, उदमहेश, रुधमहानम, कर्मफलम, समाहार, रुधमाहन, रामधाम गणेश और संकटाधारा गणेश।* *गणेश के इन रूपों में से प्रत्येक में अलग-अलग मूला मंत्र, वेद मंत्र, गायत्री-, यन्त्र, और अवराण कर्म हैं। इन रूपों में से प्रत्येक की पूजा के साथ एक विशेष फल जुड़ा हुआ है। महागणेश की इन 112 मुर्तियों को श्रीकृष्ण के पंचम अवतार [या गणेश पंचअवाराणि यन्त्र में] गणेश शूरुमन्जला के साथ, चार गणेश युगमूर्ति, और पाँच गणेश अम्नासा के साथ पूजा की जाती है। ब्रह्मनास्पति की ११६ मुर्तियों की इस पूजा को विनायक तंत्र में महा यज्ञ कहा जाता है। भगवान महायोग के इन मंत्रों को याद करते हुए पृथ्वी पर हर तीर्थ और क्षत्र के दर्शन करने का गुण प्राप्त होता है [ज्ञानशाला]* *कंदर्पणोपंतकं प्रथुत्रजथाराम पीतवस्तत्रोत्रियम्* *वीणाचक्रसंयमै त्रिशिखाशुधनुहुस्तपतेशाहं दधनाम् |* *शतभिर्भूपदाम्हि शशधरमकु तम कीरवहम त्रिनेत्रम्* *ध्येय वेत्तापात्तुन्नसम् मराकताम् निभम् भिमचन्निद्गग्नाशनम् ||* *|| उद्देश्य ||* *हम आम जनमानस को धर्म, आध्यात्म के विषय में सैद्धान्तिक जानकारियां उपलब्ध करा सकें, तथा धर्म, आध्यात्म के नाम पर समाज में फैली भ्रांतियों का निराकरण कर आम जनमानस को सही दिशा प्रदान कर सकें ||* *। ऊ गतिस्त्वं गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी।* *|| जय माँ ...!!* 🚩🔔🔱🙏🙇🏻🙏🔱🔔🚩

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mahesh prasad lohani May 17, 2019

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Ramesh Agarwal May 18, 2019

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shiv shankar May 17, 2019

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राकेश May 18, 2019

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Devendra Angira May 16, 2019

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