आज का गीता ज्ञान !!

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SC Sharma Jan 14, 2019
ॐ नमो नारायण जय श्री राधे कृष्णा

jatan Jan 14, 2019
om nmo narayan bhagvate vasudeyay

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ramkumar verma Apr 17, 2019

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ बारहवाँ अध्याय : भक्तियोग सप्तम दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ।।13।। संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद् भक्तः स मे प्रियः ।।14।। जो किसी से द्वेष नहीं करता, लेकिन सभी जीवों का दयालु मित्र है, जो अपने को स्वामी नहीं मानता और मिथ्या अहंकार से मुक्त है, जो सुख-दुख में समभाव रहता है, सहिष्णु है, सदैव आत्मतुष्ट रहता है, आत्मसंयमी है तथा जो निश्चय के साथ मुझमें मन तथा बुद्धि को स्थिर करके भक्ति में लगा रहता है, ऐसा भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय है। सज्जनों, भगवान् श्रीकृष्ण शुद्ध भक्ति पर पुनः इन दोनों श्लोकों के माध्यम से शुद्ध भक्त के दिव्य गुणों का वर्णन कर रहे हैं, शुद्ध भक्त किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता, न ही वह किसी के प्रति ईर्ष्यालु होता है, न वह अपने शत्रु का शत्रु बनता है, भक्त तो यही सोचता है कि यह व्यक्ति मेरे विगत दुष्कर्मो के कारण मेरा शत्रु बना हुआ है, अतएव विरोध करने की अपेक्षा कष्ट सहना अच्छा है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है- "तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो भुञ्जान एवात्मकृतं विपाकम्" यानी जब भी कोई भक्त पर मुसीबत आये तो वह सोचता है कि यह भगवान् की मेरे ऊपर कृपा ही है, मुझे अपने विगत दुष्कर्मो के अनुसार इससे कहीं अधिक कष्ट भोगना चाहिये था, यह तो भगवान् की असीम कृपा है मुझ पर कि मुझे मिलने वाला दण्ड पूरा नहीं मिल रहा है, भगवत्कृपा से थोड़ा ही दण्ड मिल रहा है। इसलिये अनेक कष्टप्रद परिस्थतियों में भी भक्त सदैव शान्त तथा धीर बना रहता है, भक्त सदैव प्रत्येक प्राणी पर, यहाँ तक कि अपने शत्रु पर भी दयालु होता है, निर्मम का यही अर्थ है कि भक्त शारीरिक कष्टों को प्रधानता प्रदान नहीं करता, क्योंकि भक्त अच्छी तरह जानता है कि वह भौतिक शरीर नहीं है, भक्त अपने को शरीर नहीं मानता, इसलिये भक्त मिथ्या अहंकार के बोध से मुक्त रहता है, और सुख तथा दुख में समभाव रहता है, वह सहिष्णु होता है और भगवत्कृपा से जो कुछ प्राप्त होता है, उसी से सन्तुष्ट रहता है। भक्त ऐसी किसी वस्तु को प्राप्त करने का प्रयास नहीं करता जो कठिनाई से मिले, अतएव भक्त हमेशा प्रसन्नचित्त रहता है, भक्त पूर्णयोगी होता है, क्योंकि वह अपने गुरु के आदेशों पर अटल रहता है, चूँकि भक्त की इन्द्रियाँ वश में रहती है, अतः वह दृढ़निश्चयी होता है, वह झूठे तर्कों से विचलित नहीं होता, क्योंकि कोई उसे भक्ति के दृढ़ संकल्प से हटा नहीं सकता, भक्त को पूर्णतया विश्वास रहता है कि श्रीकृष्ण अनुकंपा उस पर है इसलिये कोई भी उसे विचलित नहीं कर सकता। इन समस्त गुणों के फलस्वरूप भक्त अपने मन तथा बुद्धि को पूर्णतया परमेश्वर पर स्थिर करने में समर्थ होता है, भक्ति का ऐसा आदर्श अत्यन्त दुर्लभ है, लेकिन भक्त भक्ति के विधि-विधानों का पालन करते हुये उसी अवस्था में स्थित रहता है, इसलिये इस श्लोक में भगवान् स्वयं कहते हैं कि ऐसा भक्त मुझे अति प्रिय है, क्योंकि भगवान् भक्त की भगवद्भक्ति युक्त कार्यकलापों सदैव प्रसन्न रहते हैं। यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ।।15।। जिससे किसी को कष्ट नहीं पहुँचता तथा जो अन्य किसी के द्वारा विचलित नहीं किया जाता, जो सुख-दुख में, भय तथा चिन्ता में समभाव रहता है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। सज्जनों! इस श्लोक में भक्त के कुछ अन्य गुणों का वर्णन हुआ है, ऐसे भक्त द्वारा कोई व्यक्ति कष्ट, चिन्ता, भय या असन्तोष को प्राप्त नहीं होता, चूँकि भक्त सबों पर दयालु होता है, इसलिये भक्त ऐसा कोई भी कार्य नहीं करता कि जिससे किसी को चिन्ता या तकलीफ हो, यदि अन्य लोग भक्त को चिन्ता में डालता भी है तो वह विचलित नहीं होता, यह भगवत्कृपा ही है कि भक्त किसी बाह्य उपद्रव से शुब्ध नहीं होता, वास्तव में देखा जाए तो भक्त सदैव भगवद्भक्ति में रत रहने के कारण ही ऐसे भौतिक उपद्रव भक्त को विचलित नहीं कर पाते। लेकिन सामान्य रूप से विषयी व्यक्ति अपने शरीर तथा इन्द्रियतृप्ति के लिये किसी वस्तु को पाकर अत्यन्त प्रसन्न होता है, जब साधारण व्यक्ति यह देखता है कि है कि अन्यों के पास इन्द्रियतृप्ति के लिये ऐसे साधन है जो उसके पास नहीं है, तो अभक्त या साधारण व्यक्ति दुख तथा ईष्र्या से पूर्ण हो जाता है, वह भयभीत रहता है और जब वह कुछ भी करने में सफल नहीं होता तो निराश हो जाता है, जबकि भक्त तो हर परिस्थिति में खुश तथा आनन्दित रहता है, इसलिये श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसा भक्त उन्हें अत्यन्त प्रिय है। शेष जारी • • • जय श्री कृष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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kiran tak Apr 16, 2019

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जय श्री कृष्णा हरे कृष्ण हरे कृष्ण हरे राम हरे राम आज का श्लोक: श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति श्लोक--16 *हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।* *हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ।।* 🙌🏼🙌🏼 आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 8.16 अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन | मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते || १६ || आ-ब्रह्म-भुवनात् – ब्रह्मलोक तक; लोकाः– सारे लोक; पुनः– फिर; आवर्तिनः– लौटने वाले; अर्जुन– हे अर्जुन; माम्– मुझको; उपेत्य– पाकर; तु– लेकिन; कौन्तेय– हे कुन्तीपुत्र; पुनःजन्म– पुनर्जन्म; न– कभी नहीं; विद्यते– होता है | इस जगत् में सर्वोच्च लोक से लेकर निम्नतम सारे लोक दुखों के घर हैं, जहाँ जन्म तथा मरण का चक्कर लगा रहता है | किन्तु हे कुन्तीपुत्र! जो मेरे धाम को प्राप्त कर लेता है, वह फिर कभी जन्म नहीं लेता | तात्पर्य : समस्त योगियों को चाहें वे कर्मयोगी हों, ज्ञानयोगी या हठयोगी – अन्ततः भक्तियोग या कृष्णभावनामृत में भक्ति की सिद्धि प्राप्त करनी होती है, तभी वे कृष्ण के दिव्य धाम को जा सकते हैं, जहाँ से वे फिर वापस नहीं आते | किन्तु जो सर्वोच्च भौतिक लोकों अर्थात् देवलोकों को प्राप्त होता है, उसका पुनर्जन्म होते रहता है | जिस प्रकार इस पृथ्वी के लोग उच्चलोकों को जाते हैं, उसी तरह ब्रह्मलोक, चन्द्रलोक तथा इन्द्रलोक जैसे उच्चतर लोकों से लोग पृथ्वी पर गिरते रहते हैं | छान्दोग्य उपनिषद् में जिस पंचाग्नि विद्या का विधान है, उससे मनुष्य ब्रह्मलोक को प्राप्त कर सकता है, किन्तु यदि ब्रह्मलोक में वह कृष्णभावनामृत का अनुशीलन नहीं करता, तो उसे पृथ्वी पर फिर से लौटना पड़ता है | जो उच्चतर लोकों में कृष्णभावनामृत में प्रगति करते हैं, वे क्रमशः और ऊपर जाते रहते हैं और प्रलय के समय वे नित्य परमधाम को भेज दिये जाते हैं | श्रीधर स्वामी ने अपने भगवद्गीता भाष्य में यह श्लोक उद्धृत किया है – ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसञ्चरे | परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् || “जब इस भौतिक ब्रह्माण्ड का प्रलय होता है, तो ब्रह्मा तथा कृष्णभावनामृत में निरन्तर प्रवृत्त उनके भक्त अपनी इच्छानुसार आध्यात्मिक ब्रह्माण्ड को तथा विशिष्ट वैकुण्ठ लोकों को भेज दिये जाते हैं |” ************************************ प्रतिदिन *भगवद्गीता का हिंदी में एक श्लोक* प्राप्त करने हेतु, इस ग्रुप को join करें 🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/Cyr9RUHQzU19vSDOHWWaRt ********************************** To receive daily *ONE shloka of Bhagavad Gita in English*, join below group:🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/Bjx2K7CHftX5gnCsEuxeOr

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जय श्री कृष्णा हरे कृष्ण हरे कृष्ण हरे राम हरे राम आज का श्लोक: श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति श्लोक--15 *हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।* *हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ।।* 🙌🏼🙌🏼 आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 8.15 अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयमशाश्र्वतम् | नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः || १५ || माम्– मुझको; उपेत्य– प्राप्त करके; पुनः– फिर; जन्म– जन्म; दुःख-आलयम्– दुखों के स्थान को; अशाश्र्वतम्– क्षणिक; न– कभी नहीं; आप्नुवन्ति– प्राप्त करते हैं; महा-आत्मानः – महान पुरुष; संसिद्धिम्– सिद्धि को; परमाम्– परम; गताः– प्राप्त हुए | मुझे प्राप्त करके महापुरुष, जो भक्तियोगी हैं, कभी भी दुखों से पूर्ण इस अनित्य जगत् में नहीं लौटते, क्योंकि उन्हें परम सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है | तात्पर्य : चूँकि यह नश्र्वर जगत् जन्म, जरा तथा मृत्यु के क्लेशों से पूर्ण है, अतः जो परम सिद्धि प्राप्त करता है और परमलोक कृष्णलोक या गोलोक वृन्दावन को प्राप्त होता है, वह वहाँ से कभी वापस नहीं आना चाहता | इस परमलोक को वेदों में अव्यक्त, अक्षर तथा परमा गति कहा गया है | दूसरे शब्दों में, यह लोक हमारी भौतिक दृष्टि से परे है और अवर्णनीय है, किन्तु यह चरमलक्ष्य है, जो महात्माओं का गन्तव्य है | महात्मा अनुभवसिद्ध भक्तों से दिव्य सन्देश प्राप्त करते हैं और इस प्रकार वे धीरे-धीरे कृष्णभावनामृत में भक्ति विकसित करते हैं और दिव्यसेवा में इतने लीन हो जाते हैं कि वे न तो किसी भौतिक लोक में जाना चाहते हैं, यहाँ तक कि न ही वे किसी आध्यात्मिक लोक में जाना चाहते हैं | वे केवल कृष्ण तथा कृष्ण का सामीप्य चाहते हैं, अन्य कुछ नहीं | यही जीवन की सबसे बड़ी सिद्धि है | इस श्लोक में भगवान् कृष्ण के सगुणवादी भक्तों का विशेष रूप से उल्लेख हुआ है | ये भक्त कृष्णभावनामृत में जीवन की परमसिद्धि प्राप्त करते हैं | दूसरे शब्दों में, वे सर्वोच्च आत्माएँ हैं | ************************************ प्रतिदिन *भगवद्गीता का हिंदी में एक श्लोक* प्राप्त करने हेतु, इस ग्रुप को join करें 🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/84sj4qkdU1NKvEzn8wcag2 ********************************** To receive daily *ONE shloka of Bhagavad Gita in English*, join below group:🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/Bjx2K7CHftX5gnCsEuxeOr

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जय श्री कृष्णा हरे कृष्ण हरे कृष्ण हरे राम हरे राम आज का श्लोक: श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति श्लोक--14 *हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।* *हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ।।* 🙌🏼🙌🏼 आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 8.14 अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः | तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः || १४ || अनन्य-चेताः– अविचलित मन से; सततम्– सदैव; यः– जो; माम्– मुझ (कृष्ण) को; स्मरति– स्मरण करता है; नित्यशः– नियमित रूप से; तस्य– उस; अहम्– मैं हूँ; सु-लभः– सुलभ, सरलता से प्राप्य; पार्थ– हे पृथापुत्र; नित्य– नियमित रूप से; युक्तस्य– लगे हुए; योगिनः– भक्त के लिए | हे अर्जुन! जो अनन्य भाव से निरन्तर मेरा स्मरण करता है उसके लिए मैं सुलभ हूँ, क्योंकि वह मेरी भक्ति में प्रवृत्त रहता है | तात्पर्य : इस श्लोक में उन निष्काम भक्तों द्वारा प्राप्तव्य अन्तिम गन्तव्य का वर्णन है जो भक्तियोग के द्वारा भगवान् की सेवा करते हैं | पिछले श्लोकों में चार प्रकार के भक्तों का वर्णन हुआ है – आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी | मुक्ति की विभिन्न विधियों का भी वर्णन हुआ है – कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा हठयोग | इस योग पद्धतियों के नियमों में कुछ न कुछ भक्ति मिली रहती है, लेकिन इस श्लोक में शुद्ध भक्तियोग का वर्णन है, जिसमें ज्ञान, कर्म या हठ का मिश्रण नहीं होता | जैसा की अनन्यचेताः शब्द से सूचित होता है, भक्तियोग में भक्त कृष्ण के अतिरिक्त और कोई इच्छा नहीं करता | शुद्धभक्त न तो स्वर्गलोक जाना चाहता है, न ब्रह्मज्योति से तादात्म्य या मोक्ष या भवबन्धन से मुक्ति ही चाहता है | शुद्धभक्त किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं करता | चैतन्यचरितामृत में शुद्धभक्त को निष्काम कहा गया है | उसे ही पूर्णशान्ति का लाभ होता है, उन्हें नहीं जो स्वार्थ में लगे रहते हैं | एक ओर जहाँ ज्ञानयोगी, कर्मयोगी या हठयोगी का अपना-अपना स्वार्थ रहता है, वहीं पूर्णभक्त में भगवान् को प्रसन्न करने के अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा नहीं होती | अतः भगवान् कहते हैं कि जो एकनिष्ट भाव से उनकी भक्ति में लगा रहता है, उसे वे सरलता से प्राप्त होते हैं | शुद्धभक्त सदैव कृष्ण के विभिन्न रूपों में से किसी एक की भक्ति में लगा रहता है | कृष्ण के अनेक स्वांश तथा अवतार हैं, यथा राम तथा नृसिंह जिनमें से भक्त किसी एक रूप को चुनकर उसकी प्रेमाभक्ति में मन को स्थिर कर सकता है | ऐसे भक्त को उन अनेक समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता, जो अन्य योग के अभ्यासकर्ताओं को झेलनी पड़ती हैं | भक्तियोग अत्यन्त सरल, शुद्ध तथा सुगम है इसका शुभारम्भ हरे कृष्ण जप से किया जा सकता है | भगवान् सबों पर कृपालु हैं, किन्तु जैसा कि पहले कहा जा चुका है जो अनन्य भाव से उनकी सेवा करते हैं वे उनके ऊपर विशेष कृपालु रहते हैं | भगवान् ऐसे भक्तों की सहायता अनेक प्रकार से करते हैं | जैसा की वेदों में (कठोपनिषद् १.२-२३) कहा गया है – यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् – जिसने पूरी तरह से भगवान् की शरण ले ली है और जो उनकी भक्ति में लगा हुआ है वही भगवान् को यथारूप में समझ सकता है | तथा गीता में भी (१०.१०) कहा गया है – ददामि बुद्धियोगं तम्– ऐसे भक्त को भगवान् पर्याप्त बुद्धि प्रदान करते हैं, जिससे वह उन्हें भगवद्धाम में प्राप्त कर सके | शुद्धभक्त का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह देश अथवा काल का विचार किये बिना अनन्य भाव से कृष्ण का ही चिन्तन करता रहता है | उसको किसी तरह का व्यवधान नहीं होना चाहिए | उसे कहीं भी और किसी भी समय अपना सेवा कार्य करते रहने में समर्थ होना चाहिए | कुछ लोगों का कहना है कि भक्तों को वृन्दावन जैसे पवित्र स्थानों में या किसी पवित्र नगर में, जहाँ भगवान् रह चुके हैं, रहना चाहिए, किन्तु शुद्धभक्त कहीं भी रहकर अपनी भक्ति से वृन्दावन जैसा वातावरण उत्पन्न कर सकता है | श्री अद्वैत ने चैतन्य महाप्रभु से कहा था, “आप जहाँ भी हैं, हे प्रभु! वहीं वृन्दावन है |” जैसा कि सततम् तथा नित्यशः शब्दों से सूचित होता है, शुद्धभक्त निरन्तर कृष्ण का ही स्मरण करता है और उन्हीं का ध्यान करता है | ये शुद्धभक्त के गुण हैं, जिनके लिए भगवान् सहज सुलभ हैं | गीता समस्त योग पद्धतियों में से भक्तियोग की ही संस्तुति करती है | सामान्यतया भक्तियोगी पाँच प्रकार से भक्ति में लगे रहते हैं – (१) शान्त भक्त, जो उदासीन रहकर भक्ति में युक्त होते हैं, (२) दास्य भक्त, जो दास के रूप में भक्ति में युक्त होते हैं, (३) सख्य भक्त, जो सखा रूप में भक्ति में युक्त होते हैं, (४) वात्सल्य भक्त, जो माता-पिता की भाँति भक्ति में युक्त होते हैं तथा (५) माधुर्य भक्त, जो परमेश्र्वर के साथ दाम्पत्य प्रेमी की भाँति भक्ति में युक्त होते हैं | शुद्धभक्त उनमें से किसी में भी परमेश्र्वर की प्रेमाभक्ति में युक्त होता है और उन्हें कभी नहीं भूल पाता,जिससे भगवान् उसे सरलता से प्राप्त हो जाते हैं | जिस प्रकार शुद्धभक्त क्षणभर के लिए भी भगवान् को नहीं भूलता, उसी प्रकार भगवान् भी अपने शुद्धभक्त को क्षणभर के लिए भी नहीं भूलते | हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे | हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे – इस महामन्त्र के कीर्तन की कृष्णभावनाभावित विधि का यही सबसे बड़ा आशीर्वाद है | ************************************ प्रतिदिन *भगवद्गीता का हिंदी में एक श्लोक* प्राप्त करने हेतु, इस ग्रुप को join करें 🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/9bsGCFKJWFB4ZJSlGmOmU7 ********************************** To receive daily *ONE shloka of Bhagavad Gita in English*, join below group:🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/Bjx2K7CHftX5gnCsEuxeOr

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