MANOJKUMAR SRIVASTAVA
MANOJKUMAR SRIVASTAVA Apr 16, 2021

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Garima Gahlot Rajput May 15, 2021

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JAGDISH BIJARNIA May 17, 2021

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Amar jeet mishra May 17, 2021

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Radhe Krishna May 17, 2021

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Shanti pathak May 17, 2021

**जय श्री राधे कृष्णा जी** **शुभरात्रि वंदऩ** एक प्रेरक प्रसंग भीतर   के   ” मैं ”   का   मिटना   ज़रूरी   है  | यूनान के महान दार्शनिक सुकरात  समुन्द्र  तट  पर  टहल  रहे  थे |  उनकी  नजर  तट  पर  खड़े  एक  रोते  बच्चे  पर  पड़ी  | वो  उसके  पास  गए  और  प्यार  से  बच्चे  के  सिर  पर  हाथ  फेर  कर  पूछा  , -‘ ‘तुम  क्यों  रो  रहे  हो  ? लड़के  ने  कहा – ‘ ये  जो  मेरे  हाथ  में  प्याला  है  मैं  उसमें  इस  समुन्द्र  को  भरना  चाहता  हूँ  पर  यह  मेरे  प्याले  में  समाता  ही  नहीं  | बच्चे  की  बात  सुनकर  सुकरात  विस्माद  में  चले  गये  और  स्वयं  रोने  लगे  | अब  पूछने  की  बारी  बच्चे  की  थी  | बच्चा  कहने  लगा – आप  भी  मेरी  तरह  रोने  लगे  पर  आपका  प्याला  कहाँ  है ? सुकरात  ने  जवाब  दिया –  बालक ,  तुम  छोटे  से  प्याले  में  समुन्द्र  भरना  चाहते  हो , और  मैं  अपनी  छोटी  सी  बुद्धि  में  सारे  संसार की  जानकारी  भरना  चाहता  हूँ  | आज  तुमने  सिखा  दिया  कि  समुन्द्र  प्याले  में  नहीं  समा  सकता  है  ,  मैं  व्यर्थ  ही  बेचैन  रहा  |’ यह  सुनके  बच्चे  ने  प्याले  को  दूर  समुन्द्र  में  फेंक  दिया  और  बोला-  “सागर  अगर  तू  मेरे  प्याले  में  नहीं  समा  सकता  तो  मेरा  प्याला तो  तुम्हारे  में  समा  सकता  है  | इतना  सुनना  था  कि  सुकरात  बच्चे  के  पैरों  में  गिर  पड़े  और  बोले- बहुत  कीमती  सूत्र  हाथ  में  लगा  है  | हे  परमात्मा  !  आप  तो   सारा  का  सारा  मुझ  में  नहीं  समा  सकते  हैं  पर  मैं  तो  सारा  का  सारा  आपमें  लीन  हो  सकता  हूँ  | ईश्वर  की  खोज  में  भटकते  सुकरात  को  ज्ञान  देना  था  तो  भगवान  उस  बालक  में  समा  गए  | सुकरात  का  सारा  अभिमान  ध्वस्त  कराया  |  जिस  सुकरात  से  मिलने  के लिए सम्राट  समय  लेते  थे  वह  सुकरात  एक  बच्चे  के चरणों  में  लोट  गए  थे  | ईश्वर  जब  आपको  अपनी  शरण  में  लेते  हैं  तब  आपके  अंदर  का  ” मैं ”  सबसे  पहले  मिटता  है  | या  यूँ  कहें  जब  आपके  अंदर  का  ” मैं ”  मिटता  है  तभी  ईश्वर  की  कृपा  होती  है । एक प्रेरक प्रसंग टी  एन  शेषन  मुख्य  चुनाव  आयुक्त  थे  तब  एक  बार  वे  उत्तर  प्रदेश  की  यात्रा  पर  गए ।   उनके  साथ  उनकी  पत्नी  भी  थीं । रास्ते  में  एक  बाग  के  पास  वे  लोग  रुके ।  बाग  के  पेड़  पर  बया  पक्षियों  के  घोसले  थे ।  उनकी  पत्नी  ने  कहा  दो घोंसले मंगवा  दीजिए  मैं  इन्हें  घर  की  सज्जा  के  लिए  ले  चलूंगी ।  उन्होंने  साथ  चल  रहे  पुलिस  वालों  से  घोसला  लाने  के  लिए कहा ।  पुलिस  वाले  वहीं  पास  में  गाय  चरा  रहे  एक  बालक  से  पेड़  पर  चढ़कर  घोसला    लाने के बदले दस रुपए देने की बात  कही  ,  लेकिन  वह  लड़का  घोसला  तोड़  कर  लाने  के  लिए  तैयार  नहीं  हुआ ।  टी  एन  शेषन  उसे  दस  की  जगह  पचास  रुपए देने की बात कही फिर भी वह लड़का  तैयार नहीं हुआ।   उसने  शेषन  से  कहा  साहब  जी !  घोसले  में  चिड़िया  के  बच्चे  हैं  शाम  को  जब  वह  भोजन  लेकर  आएगी  तब  अपने  बच्चों  को  न  देख  कर  बहुत  दुखी  होगी ,  इसलिए  आप  चाहे  जितना  पैसा  दें  मैं  घोसला  नहीं  तोड़  सकता । इस  घटना  के  बाद  टी. एन . शेषन  को  आजीवन  यह  ग्लानि  रही  कि  जो  एक  चरवाहा  बालक  सोच  सका  और  उसके  अन्दर  जैसी  संवेदनशीलता  थी ,  इतने  पढ़े- लिखे  और  आई ए एस  होने  के  बाद  भी  वे  वह  बात  क्यों  नहीं  सोच  सके ,  उनके  अन्दर  वह  संवेदना  क्यों  नहीं  उत्पन्न  हुई  ? उन्होंने   कहा  उस  छोटे  बालक  के  सामने  मेरा  पद  और  मेरा  आई ए एस  होना  गायब  हो  गया ।  मैं  उसके  सामने  एक  सरसों के  बीज  के  समान  हो  गया ।  शिक्षा ,  पद  और  सामाजिक  स्थिति  मानवता  के  मापदण्ड  नहीं  हैं । प्रकृति  को  जानना  ही  ज्ञान  है ।  बहुत  सी  सूचनाओं  के  संग्रह  से  कुछ  नहीं  प्राप्त  होता ।  जीवन  तभी  आनंददायक  होता  है जब  ज्ञान , संवेदना  और  बुद्धिमत्ता  हो ।*

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