aayush rampal
aayush rampal Mar 26, 2019

Jai GURUDEV MAHARAJ JI KI

Jai GURUDEV MAHARAJ JI KI

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aayush rampal Apr 25, 2019

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Shiva Gaur Apr 24, 2019

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🌷जयश्री राम 🌷काकभुसुंडी की कथा 🌷 👃🌺👃🌺👃🌺👃🌺👃🌺👃🌺 दो0,ज्ञानी भक्त शिरोमणि, त्रिभुवनपतिकर यान ।। ताहि मोह माया प्रबल, पामर करहिं गुमान ।। 🌷 शांराश 🌷 *एक समय काकभुसुंडी दशरथके घरमें राम चंद्रजी की बाललीला देख रहेथे इतनेमें मोह हुवा सो रामचंद्रजीके हाथसे पूरी छीनके, ले भगे, तब उन्होंने गुरुडजी की सुध की तो गुरुडजी आ पहुंचे, फिर गुरुड और काकभुसुंडी का बडा युद्ध हुवा, युद्ध होते 2 काकभुसुंडी जी तो भगे और गुरुडजी उनके पीछे लगे, तीनों लोकोंमे गये परंतु किसी ने रक्षण न किया जब काकभुसुंडी रामजी की शरणमें आये; तब रामजी ने उनका रक्षण किया और ज्ञान बताया, गुरुडजी के वही अंहकार रहा, सो भगवान् (रामजी )ने काकभुसुंडी का श्रोता (शिष्य )बनाकर ढूर किया, 🌺धर्म भक्ति 🌺धार्मिक भावना 🌺ज्ञानवशाॅ 🌺 🌺 🌺 🌺 🌺 रामायण 🌺🌺🌺🌺 👃 👃👃

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sushma Apr 24, 2019

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Shiva Gaur Apr 23, 2019

*मेरे पापा* किसी ने मुझे बोला किया करो देवों का आह्वान, पापा के पैर छूकर मैंने बोला यहीं है मेरे भगवान।। लोग कहते हैं मैं मेरे पापा की छाया हूं, मै ही उनकी धन और दौलत,मै ही उनकी माया हूं।। है उन्हें मुझ पर इतना विश्वास, जान कर होता है एक अनोखा अहसास।। मेरे पापा ने अब तक मेरी सारी बातें मानी है, मेरे पापा से ही मैंने अपनी कीमत जानी है।। जिसकी इच्छा कि है मैंने वो सब पाया है, मेरे पापा ने मुझ पर कभी हाथ नहीं उठाया है।। मेरी खुशी देखकर लोगों ने पूछा इसके पीछे है कौन, मैंने बोला मेरे पापा है मेरी बैक बोन।। कुछ लोगों में है मुझे हराने की होड, पर मेरे पापा है मेरी स्पाइनल कॉर्ड।। मेरे पापा ने दी है मुझे इतनी छूट, नहीं बोलना चाहता मैं उनसे कोई झूठ।। मेरे भाई ने मेरे पापा को मेरी स्पोर्ट करने से रोका है, उसको शाय़द अंदाजा नहीं कि यह प्यार बहुत अनोखा है।। मेरे पापा का प्यार मैं व्यर्थ नहीं बहाऊंगा, वादा है मेरे पापा से कुछ बनकर ज़रूर दिखाऊंगा।।

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anju mishra Apr 22, 2019

हर हर महादेव व्यक्ति जब जन्म लेता है तो अपने साथ तीन चीजें लाता है, 1.संचित कर्म, 2.स्मृति और 3.जागृति। हां एक चौथी चीज भी है और वह है सूक्ष्म शरीर।  1.क्या है संचित कर्म? हिंदू दर्शन के अनुसार, मृत्यु के बाद मात्र यह भौतिक शरीर या देह ही नष्ट होती है, जबकि सूक्ष्म शरीर जन्म-जन्मांतरों तक आत्मा के साथ संयुक्त रहता है। यह सूक्ष्म शरीर ही जन्म-जन्मांतरों के शुभ-अशुभ संस्कारों का वाहक होता है। संस्कार अर्थात हमने जो भी अच्छे और बुरे कर्म किए हैं वे सभी और हमारी आदतें।   ये संस्कार मनुष्य के पूर्वजन्मों से ही नहीं आते, अपितु माता-पिता के संस्कार भी रज और वीर्य के माध्यम से उसमें (सूक्ष्म शरीर में) प्रविष्ट होते हैं, जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व इन दोनों से ही प्रभावित होता है। बालक के गर्भधारण की परिस्थितियां भी इन पर प्रभाव डालती हैं। ये कर्म 'संस्कार' ही प्रत्येक जन्म में संगृहीत (एकत्र) होते चले जाते हैं, जिससे कर्मों (अच्छे-बुरे दोनों) का एक विशाल भंडार बनता जाता है। इसे 'संचित कर्म' कहते हैं।   अब जब व्यक्ति मरता है तो इन्हीं संचित कर्मों में इस जन्म के कर्म भी एकत्रित करके ले जाता है। दरअसल, इन संचित कर्मों में से एक छोटा हिस्सा हमें नए जन्म में भोगने के लिए मिल जाता है। इसे प्रारब्ध कहते हैं। ये प्रारब्ध कर्म ही नए होने वाले जन्म की योनि व उसमें मिलने वाले भोग को निर्धारित करते हैं। फिर इस जन्म में किए गए कर्म, जिनको क्रियमाण कहा जाता है, वह भी संचित संस्कारों में जाकर जमा होते रहते हैं। 2.क्या है स्मृति? एक प्रतिशत भी लोग नहीं होंगे जो अपने पिछले जन्म की स्मृति को खोलकर यह जान लेते होंगे कि मैं पिछले जन्म में क्या था। प्रत्येक व्यक्ति के पास अपने पिछले और इस जन्म की कुछ खास स्मृतियां संग्रहित रहती हैं। यह मेमोरी कभी भी समाप्त नहीं होती हैं। भगवान श्रीकृष्ण गीता में अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन तुझे अपने अगले और पिछले जन्मों की याद नहीं है। लेकिन मुझे अपने लाखों जन्मों की स्मृति हैं। लाखों वर्ष पूर्व भी तू था और मैं भी था। किस जन्म में तू क्या था यह मैं जानता हूं और अगले जन्म में तू क्या होगा यह भी मैं जानता हूं क्योंकि मैं तेरे संचित कर्मों की गति भी देख रहा हूं।   अत: यह कहना होगा कि जब व्यक्ति जन्म लेता है तो वह अपने पिछले जन्म की स्मृतियां साथ लाता है लेकिन वह धीरे धीरे उन्हें भूलता जाता है। भूलने का अर्थ यह नहीं कि वे स्मृतियां सता के लिए मिट गए। वे अभी भी आपकी हार्ड डिस्क में है लेकिन वह रेम से हट गई है। डी में कहीं सुरक्षित रखी है। इसी तरह जब व्यक्ति मरता है तो वह इस जन्म की भी स्मृतियां बटोरकर साथ ले जाता है।   3.जागृति क्या है? यह विषय थोड़ा कठिन है। प्रत्येक मनुष्य और प्रा‍णी के भीतर जाग्रति का स्तर अलग अलग होता है। यह उसकी जीवन शैली, संवेदना और सोच पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए हम समझ सकते हैं कि एक कुत्ता मनुष्य कम जागृत है। जैसे एक शराबी व्यक्ति होता है। आपमें बेहोशी का स्तर ज्यादा है तो आप भावना और विचारों के वश में रहकर ही जीवन यापन करेंगे। अर्थात आपके जीवन में भोग, संभोग और भावना ही महत्वपूर्ण होगी।    जाग्रति की प्रथम स्टेज बुद्धि और द्वितिय स्टेज विवेक और तृ‍तीय स्टेज आत्मावान होने में है। प्रार्थना और ध्यान से जागृति बढ़ती है।     उक्त सभी को मिलाकर कहा जाता है कि व्यक्ति अपने साथ धर्म लाता है और धर्म ही ले जाता है।   शास्त्र लिखते हैं कि - मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्टलोष्टसमं जना:। मुहूर्तमिव रोदित्वा ततोयान्ति पराङ्मुखा:।। तैस्तच्छरीमुत्सृष्टं धर्म एकोनुगच्छति। तस्माद्धर्म: सहायश्च सेवितव्य: सदा नृभि:।।   इसका सरल और व्यावहारिक अर्थ यही है कि मृत्यु होने पर व्यक्ति के सगे-संबंधी भी उसकी मृत देह से कुछ समय में ही मोह या भावना छोड़ देते हैं और अंतिम संस्कार कर चले जाते हैं। किंतु इस समय भी मात्र धर्म ही ऐसा साथी होता है, जो उसके साथ जाता है। जय श्री राम

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yogesh malav Apr 23, 2019

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