Bhawna Gupta
Bhawna Gupta Nov 27, 2021

Jai Shree Radhe Radhe Krishna ji. 🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Jai Shree Radhe Radhe Krishna ji. 🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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कामेंट्स

Gajendrasingh kaviya Nov 27, 2021
Radhe Radhe good evening my sweet sis 🌹🌷🌹🌹🌹 happy weekend 🌹🌹🌹🌹🌹

CG Sahu Nov 27, 2021
ati sunder thought radheKrishna nice sweet good evening hanumanji ki kripa bani rahe sabhi per 🙏🏻🙋‍♀️💐🥀🍁💮🌹🥀🍁🍀💮

Brajesh Sharma Nov 28, 2021
🇮🇳🚩🎋💥❤🙏🌞🚩🎋💥🙏🇮🇳 सूर्य भगवान आपको स्वस्थ एवं प्रसन्न चित्त रखे ॐ नमः शिवाय.. हर हर महादेव खुश रहें मस्त रहें स्वस्थ रहें व्यस्त रहें जय जय श्री राधे जी., राम राम जी 💥🎋🚩🇮🇳🙏❤🌞🙏🚩💥🙏🇮🇳

Ramesh mathwas🙏🙏🤦 Nov 28, 2021
meri Pyari Bdi Bahana ji Radhe Radhe Jai Shri Krishna ji Jai Shri Krishna ji Radhe Radhe Jai Shri Krishna ji

Mohan Patidar Nov 30, 2021
Jai Shri Radhe ji suhbh sandhya vandan ji ⚘☘🌿🌲🌲🌲🌲

Deepak Jan 15, 2022

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devilakshmi Jan 13, 2022

🚩इस हँसी का क्या रहस्य है🚩 एक बार राजा भोज की पत्नी भोज को स्नान करा रही थी दोनों आनन्द का अनुभव कर रहे थे . भोज बार बार अपनी पत्नी से आग्रह करते कि पानी और डालो इस पर उनकी पत्नी जोर जोर से हंसने लगी . राजा ने पूछा कि तुम क्यों हंस रही हो इस पर उसने कहा कि ये बताने की बात नहीं है . लेकिन राजा अङ गया कि तुम्हें बताना होगा . तब उसने कहा कि ये बात तुम्हें मैं नहीं मेरी बहन बतायेगी उल्लेखनीय है कि भोज की पत्नी उस ग्यान को जानती थी जिसमें पूर्वजन्म का ग्यान होता है .उसकी बहन भी इस ग्यान को जानती थी पर क्योंकि इस ग्यान का संसार के नातों से कोई सम्बन्ध नहीं होता इसलिये कितना भी सगा हो उसे ये ग्यान नहीं बताते . बताने पर ये ग्यान नियम विरुद्ध हो जाने से चला जाता है . राजा भोज अपनी भारी जिग्यासा के चलते अपनी साली के घर पहुँचा वहाँ उस वक्त कोई कार्यक्रम चल रहा था अतः राजा बात न पूछ सका फ़िर फ़ुरसत मिलते ही राजा ने वह प्रश्न अपनी साली से कर दिया तब उसने कहा कि तुम्हारी बहन ने कहा है कि बार बार पानी डालने की बात पर हंसने का रहस्य मेरी बहन बतायेगी..तब राजा की साली ने कहा कि आज आधी रात को बच्चे को जन्म देते ही मेरी मृत्यु हो जायेगी इसके अठारह साल बाद मेरे पुत्र जिसका आज जन्म होगा उसकी पत्नी तुम्हें ये राज बतायेगी . राजा ने बहुत हठ किया पर इससे ज्यादा बताने से उसने इंकार कर दिया .ठीक वैसा ही हुआ पुत्र को जन्म देकर भोज की साली मर गयी..राजा ने अठारह साल तक बेसब्री से इंतजार किया और फ़िर वो दिन आ ही गया जब उस पुत्र का विवाह हुआ राजा उसी बात का इंतजार कर रहा था सो जैसे ही उसे वधू से मिलने का मौका मिला . उसने कहा मैं अठारह साल से इस समय का इंतजार कर रहा हूँ....और भोज ने पूरी बात बता दी . वधू ने कहा कि पहले तो आप ये बात न ही पूछो तो बेहतर है और अगर पूछते ही हो तो मेरे पति से कभी इसका जिक्र न करना..अन्यथा वो पति धर्म से विमुख हो जायेगा और इससे विधान में खलल पङेगा..राजा मान गया . तब उस वधू ने कहा कि आज जो मेरा पति है अठारह साल पहले इसे मैंने ही जन्म दिया था ...तुम्हारी पत्नी इस लिये हंस रही थी कि इससे पहले के जन्म में जब तुम उसके पुत्र थे वह तुम्हें बाल अवस्था में नहलाने के लिये पकङती थी तब तुम नहाने से बचने के लिये बार बार भागते थे..और आज स्वयं तुम पानी डालने को कह रहे थे..इसलिये उस जन्म की बात याद कर वो हस रही थी ..उसने या मैंने उसी समय तुम्हें ये बात इसलिये नहीं बतायी कि वैसी अवस्था में तुम उसे पत्नी मानने के धर्म से विमुख हो सकते थे...यह बात सुनते ही राजा में गहरा वैराग्य जाग्रत हो गया . यही प्रभु की अजीव लीला है ! . 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌷

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Soni Mishra Jan 13, 2022

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Deepak Jan 14, 2022

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*━━━━━━━ꕥ❈ꕥ❈ꕥ━━━━━━━* ┌──────────────────┐ █▓░ *༺श्रीगणेशाय नम:༻*░▓█ └──────────────────┘ *━━━━━━━ꕥ❈ꕥ❈ꕥ━━━━━━* *༺⚜❝दैनिक-पंचांग ❞⚜༻* *━━━━━━━ꕥ❈ꕥ❈ꕥ━━━━━━* _*🌷ꕥ❈दिनांक:-16-01-2022❈ꕥ🌷*_ *ꕥ श्रीमाधोपुर-पंचांग ꕥ* 🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐 🥎 तिथि चतुर्दशी 27:20:37 🥎 नक्षत्र आर्द्रा 26:09:22 🥎 करण : गर 14:12:26 वणिज 27:20:37 🥎 पक्ष शुक्ल 🥎 योग एन्द्र 15:18:14 🥎 वार रविवार *🏀 सूर्य व चन्द्र से संबंधित गणनाएँ* 🥎 सूर्योदय 07:19:14 🥎 चन्द्रोदय 16:26:00 🥎 चन्द्र राशि मिथुन 🥎 सूर्यास्त 17:55:35 🥎 चन्द्रास्त 30:52:59 🥎 ऋतु शिशिर *🏀 हिन्दू मास एवं वर्ष* 🥎 शक सम्वत 1943 प्लव 🥎 कलि सम्वत 5123 🥎 दिन काल 10:36:21 🥎 विक्रम सम्वत 2078 🥎 मास अमांत पौष 🥎 मास पूर्णिमांत पौष *🏀 शुभ समय* 🥎 अभिजित 12:16:12 - 12:58:37 *🏀 अशुभ समय* 🥎 दुष्टमुहूर्त 16:30:45 - 17:13:10 🥎 कंटक 10:51:21 - 11:33:46 🥎 यमघण्ट 13:41:03 - 14:23:28 🥎 राहु काल 16:36:03 - 17:55:35 🥎 कुलिक 16:30:45 - 17:13:10 🥎 कालवेला या अर्द्धयाम 12:16:12 - 12:58:37 🥎 यमगण्ड 12:37:24 - 13:56:57 🥎 गुलिक काल 15:16:30 - 16:36:03 *🏀 दिशा शूल पश्चिम* *🏀चौघड़िया मुहूर्त* 🥎उद्वेग 07:19:14 - 08:38:46 🥎चल 08:38:46 - 09:58:19 🥎लाभ 09:58:19 - 11:17:52 🥎अमृत 11:17:52 - 12:37:24 🥎काल 12:37:24 - 13:56:57 🥎शुभ 13:56:57 - 15:16:30 🥎रोग 15:16:30 - 16:36:03 🥎उद्वेग 16:36:03 - 17:55:35 🥎शुभ 17:55:35 - 19:36:02 🥎अमृत 19:36:02 - 21:16:28 🥎चल 21:16:28 - 22:56:55 🥎रोग 22:56:55 - 24:37:21 🥎काल 24:37:21 - 26:17:47 🥎लाभ 26:17:47 - 27:58:14 🥎उद्वेग 27:58:14 - 29:38:40 🥎शुभ 29:38:40 - 31:19:07 🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐 *पंचांग को फॉरवर्ड नहीं, शेयर करें।* 🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴🪴 li.▬▭▬▭▬--▭▬▭▬▭▬.li 1️⃣6️⃣🕋0️⃣1️⃣🕋2️⃣2️⃣ li.▬▭▬▭▬--▭▬▭▬▭▬.li 🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐 ━━━━━━━ꕥ❈ꕥ❈ꕥ━━━━━━━ _*🪴🎀 📿जयश्री कृष्णा📿🎀🪴*_ ━━━━━━━ꕥ❈ꕥ❈ꕥ━━━━━━━ *ज्योतिषशास्त्री-सुरेन्द्र कुमार चेजारा व्याख्याता राउमावि होल्याकाबास निवास-श्रीमाधोपुर* 🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐🫐 *━━━━━━━ꕥ❈ꕥ❈ꕥ━━━━━━━*

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Jasbir Singh nain Jan 14, 2022

प्रदोष व्रत (शुक्ल) 15 जनवरी, 2022 (शनिवार) शुभ प्रभात जी 🪔🪴🙏🪔🙏🙏🪔🪔🪴🙏🙏🙏🙏 प्रदोष व्रत को त्रयोदशी व्रत के नाम से भी जाना जाता हैं। यह व्रत माता पार्वती और भगवान शिव को समर्पित है। पुराणों के अनुसार इस व्रत को करने से बेहतर स्वास्थ्य और लम्बी आयु की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत एक साल में कई बार आता है । प्रायः यह व्रत महीने में दो बार आता है। जानें क्या है प्रदोष व्रत प्रत्येक महीने की कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष को त्रयोदशी मनाते है। प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के व्रत को प्रदोष व्रत कहा जाता है। सूर्यास्त के बाद और रात्रि के आने से पहले का समय प्रदोष काल कहलाता है। इस व्रत में भगवान शिव कि पूजा की जाती है। हिन्दू धर्म में व्रत, पूजा-पाठ, उपवास आदि को काफी महत्व दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि सच्चे मन से व्रत रखने पर व्यक्ति को मनचाहे वस्तु की प्राप्ति होती है। वैसे तो हिन्दू धर्म में हर महीने की प्रत्येक तिथि को कोई न कोई व्रत या उपवास होते हैं लेकिन लेकिन इन सब में प्रदोष व्रत की बहुत मान्यता है । प्रदोष व्रत का महत्व प्रदोष व्रत को हिन्दू धर्म में बहुत शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन पूरी निष्ठा से भगवान शिव की अराधना करने से जातक के सारे कष्ट दूर होते हैं और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। पुराणों के अनुसार एक प्रदोष व्रत करने का फल दो गायों के दान जितना होता है। इस व्रत के महत्व को वेदों के महाज्ञानी सूतजी ने गंगा नदी के तट पर शौनकादि ऋषियों को बताया था। उन्होंने कहा था कि कलयुग में जब अधर्म का बोलबाला रहेगा, लोग धर्म के रास्ते को छोड़ अन्याय की राह पर जा रहे होंगे उस समय प्रदोष व्रत एक माध्यम बनेगा जिसके द्वारा वो शिव की अराधना कर अपने पापों का प्रायश्चित कर सकेगा और अपने सारे कष्टों को दूर कर सकेगा। सबसे पहले इस व्रत के महत्व के बारे में भगवान शिव ने माता सती को बताया था, उसके बाद सूत जी को इस व्रत के बारे में महर्षि वेदव्यास जी ने सुनाया, जिसके बाद सूत जी ने इस व्रत की महिमा के बारे में शौनकादि ऋषियों को बताया था। प्रदोष व्रत की विधि शाम का समय प्रदोष व्रत पूजन समय के लिए अच्छा माना जाता है क्यूंकि हिन्दू पंचांग के अनुसार सभी शिव मन्दिरों में शाम के समय प्रदोष मंत्र का जाप करतेहैं। ● प्रदोष व्रत करने के लिए सबसे पहले आप त्रयोदशी के दिन सूर्योदय से पहले उठ जाएं। ● स्नान आदि करने के बाद साफ़ वस्त्र पहन लें। ● उसके बाद आप बेलपत्र, अक्षत, दीप, धूप, गंगाजल आदि से भगवान शिव की पूजा करें। ● इस व्रत में भोजन ग्रहण नहीं किया जाता है। ● पूरे दिन का उपवास रखने के बाद सूर्यास्त से कुछ देर पहले दोबारा स्नान कर लें और सफ़ेद रंग का वस्त्र धारण करें। ● आप स्वच्छ जल या गंगा जल से पूजा स्थल को शुद्ध कर लें। ● अब आप गाय का गोबर लें और उसकी मदद से मंडप तैयार कर लें। ● पांच अलग-अलग रंगों की मदद से आप मंडप में रंगोली बना लें। ● पूजा की सारी तैयारी करने के बाद आप उतर-पूर्व दिशा में मुंह करके कुशा के आसन पर बैठ जाएं। ● भगवान शिव के मंत्र ऊँ नम: शिवाय का जाप करें और शिव को जल चढ़ाएं। धार्मिक दृष्टिकोण से आप जिस दिन भी प्रदोष व्रत रखना चाहते हों, उस वार के अंतर्गत आने वाली त्रयोदशी को चुनें और उस वार के लिए निर्धारित कथा पढ़ें और सुनें । प्रदोष व्रत कथा किसी भी व्रत को करने के पीछे कोई न कोई पौराणिक महत्व और कथा अवश्य होती है। तो चलिए पढ़ते हैं इस व्रत की पौराणिक कथा के बारे में- एक विधवा ब्राह्मणी अपने बेटे के साथ रोज़ाना भिक्षा मांगने जाती और संध्या के समय तक लौट आती। हमेशा की तरह एक दिन जब वह भिक्षा लेकर वापस लौट रही थी तो उसने नदी किनारे एक बहुत ही सुन्दर बालक को देखा लेकिन ब्राह्मणी नहीं जानती थी कि वह बालक कौन है और किसका है ? दरअसल उस बालक का नाम धर्मगुप्त था और वह विदर्भ देश का राजकुमार था। उस बालक के पिता को जो कि विदर्भ देश के राजा थे, दुश्मनों ने उन्हें युद्ध में मौत के घाट उतार दिया और राज्य को अपने अधीन कर लिया। पिता के शोक में धर्मगुप्त की माता भी चल बसी और शत्रुओं ने धर्मगुप्त को राज्य से बाहर कर दिया। बालक की हालत देख ब्राह्मणी ने उसे अपना लिया और अपने पुत्र के समान ही उसका भी पालन-पोषण किया कुछ दिनों बाद ब्राह्मणी अपने दोनों बालकों को लेकर देवयोग से देव मंदिर गई, जहाँ उसकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई।ऋषि शाण्डिल्य एक विख्यात ऋषि थे, जिनकी बुद्धि और विवेक की हर जगह चर्चा थी। ऋषि ने ब्राह्मणी को उस बालक के अतीत यानि कि उसके माता-पिता के मौत के बारे में बताया, जिसे सुन ब्राह्मणी बहुत उदास हुई। ऋषि ने ब्राह्मणी और उसके दोनों बेटों को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी और उससे जुड़े पूरे वधि-विधान के बारे में बताया। ऋषि के बताये गए नियमों के अनुसार ब्राह्मणी और बालकों ने व्रत सम्पन्न किया लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि इस व्रत का फल क्या मिल सकता है। कुछ दिनों बाद दोनों बालक वन विहार कर रहे थे तभी उन्हें वहां कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आईं जो कि बेहद सुन्दर थी। राजकुमार धर्मगुप्त अंशुमती नाम की एक गंधर्व कन्या की ओर आकर्षित हो गए। कुछ समय पश्चात् राजकुमार और अंशुमती दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे और कन्या ने राजकुमार को विवाह हेतु अपने पिता गंधर्वराज से मिलने के लिए बुलाया। कन्या के पिता को जब यह पता चला कि वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार है तो उसने भगवान शिव की आज्ञा से दोनों का विवाह कराया। राजकुमार धर्मगुप्त की ज़िन्दगी वापस बदलने लगी। उसने बहुत संघर्ष किया और दोबारा अपनी गंधर्व सेना को तैयार किया। राजकुमार ने विदर्भ देश पर वापस आधिपत्य प्राप्त कर लिया। कुछ समय बाद उसे यह मालूम हुआ कि बीते समय में जो कुछ भी उसे हासिल हुआ है वह ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के द्वारा किये गए प्रदोष व्रत का फल था। उसकी सच्ची आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे जीवन की हर परेशानी से लड़ने की शक्ति दी। उसी समय से हिदू धर्म में यह मान्यता हो गई कि जो भी व्यक्ति प्रदोष व्रत के दिन शिवपूजा करेगा और एकाग्र होकर प्रदोष व्रत की कथा सुनेगा और पढ़ेगा उसे सौ जन्मों तक कभी किसी परेशानी या फिर दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ेगा। प्रदोष व्रत का उद्यापन जो उपासक इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशी तक रखते हैं, उन्हें इस व्रत का उद्यापन विधिवत तरीके से करना चाहिए। ● व्रत का उद्यापन आप त्रयोदशी तिथि पर ही करें। ● उद्यापन करने से एक दिन पहले श्री गणेश की पूजा की जाती है। और उद्यापन से पहले वाली रात को कीर्तन करते हुए जागरण करते हैं। ● अगलर दिन सुबह जल्दी उठकर मंडप बनाना होता है और उसे वस्त्रों और रंगोली से सजाया जाता है। ● ऊँ उमा सहित शिवाय नम: मंत्र का 108 बार जाप करते हुए हवन करते हैं। ● खीर का प्रयोग हवन में आहूति के लिए किया जाता है। ● हवन समाप्त होने के बाद भगवान शिव की आरती और शान्ति पाठ करते हैं। ● और अंत में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है और अपने इच्छा और सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देते हुए उनसे आशीर्वाद लेते हैं। प्रदोष व्रत से मिलने वाले लाभ अलग-अलग वार के प्रदोष व्रत के अलग-अलग लाभ होते है । ● जो उपासक रविवार को प्रदोष व्रत रखते हैं, उनकी आयु में वृद्धि होती है अच्छा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है। ● सोमवार के दिन के प्रदोष व्रत को सोम प्रदोषम या चन्द्र प्रदोषम भी कहा जाता है और इसे मनोकामनायों की पूर्ती करने के लिए किया जाता है। ● जो प्रदोष व्रत मंगलवार को रखे जाते हैं उनको भौम प्रदोषम कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने से हर तरह के रोगों से मुक्ति मिलती है और स्वास्थ सम्बन्धी समस्याएं नहीं होती। बुधवार के दिन इस व्रत को करने से हर तरह की कामना सिद्ध होती है। ● बृहस्पतिवार के दिन प्रदोष व्रत करने से शत्रुओं का नाश होता है। ● वो लोग जो शुक्रवार के दिन प्रदोष व्रत रखते हैं, उनके जीवन में सौभाग्य की वृद्धि होती है और दांपत्य जीवन में सुख-शांति आती है। ● शनिवार के दिन आने वाले प्रदोष व्रत को शनि प्रदोषम कहा जाता है और लोग इस दिन संतान प्राप्ति की चाह में यह व्रत करते हैं। अपनी इच्छाओं को ध्यान में रख कर प्रदोष व्रत करने से फल की प्राप्ति निश्चित हीं होती है।

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सारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार जाने क्यों गंगा सागर को तीर्थों का पिता कहा जाता है, कहने का तात्पर्य है कि गंगा सागर का अन्य तीर्थों की अपेक्षा अत्यधिक महत्व है। शायद यही कारण है कि जन साधारण में यह कहावत बहुत प्रचलित है कि- ''सब तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार।' ' गंगा जिस स्थान पर समुद्र में मिलती है, उसे गंगा सागर कहा गया है। गंगा सागर एक बहुत सुंदर वन द्वीप समूह है जो बंगाल की दक्षिण सीमा में बंगाल की खाड़ी पर स्थित है। प्राचीन समय में इसे पाताल लोक के नाम से भी जाना जाता था। कलकत्ते से यात्री प्रायः जहाज में गंगा सागर जाते हैं। यहां मेले के दिनों में काफी भीड़-भाड़ व रौनक रहती है। लेकिन बाकी दिनों में शांति एवं एकांकीपन छाया रहता है। तीर्थ स्थान-सागर द्वीप में केवल थोड़े से साधु ही रहते हैं। यह अब वन से ढका और प्रायः जनहीन है। इस सागर द्वीप में जहां गंगा सागर मेला होता है, वहां से एक मील उत्तर में वामनखल स्थान पर एक प्राचीन मंदिर है। इस समय जहां गंगा सागर पर मेला लगता है, पहले यहीं गंगाजी समुद्र में मिलती थी, किंतु अब गंगा का मुहाना पीछे हट गया है। अब गंगा सागर के पास गंगाजी की एक छोटी धारा समुद्र से मिलती है। आज यहां सपाट मैदान है और जहां तक नजर जाती है वहां केवल घना जंगल। मेले के दिनों में गंगा के किनारे पर मेले के स्थान बनाने के लिए इन जंगलों को कई मीलों तक काट दिया जाता है। गंगा सागर का मेला मकर संक्रांति को लगता है। खाने-पीने के लिए होटल, पूजा-पाठ की सामग्री व अन्य सामानों की भी बहुत-सी दुकानें खुल जाती हैं। सारे तीर्थों का फल अकेले गंगा सागर में मिल जाता है। संक्रांति के दिन गंगा सागर में स्नान का महात्म्य सबसे बड़ा माना गया है। प्रातः और दोपहर स्नान और मुण्डन-कर्म होता है। यहां पर लोग श्राद्ध व पिण्डदान भी करते हैं। कपिल मुनि के मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं, इसके बाद लोग लौटते हैं ओर पांचवें दिन मेला समाप्त हो जाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसके बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है। इसके अलावा यहां सांखय योग के आचार्य कपिलानंद जी का आश्रम, महादेव मंदिर, योगेंद्र मठ, शिव शक्ति-महानिर्वाण आश्रम और भारत सेवाश्रम संघ का विशाल मंदिर भी हैं। रामायण में एक कथा मिलती है जिसके अनुसार कपिल मुनि किसी अन्य स्थान पर तपस्या कर रहे थे। ऐसे ही समय में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सगर एक अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करने लगे। उनके अश्वमेध यज्ञ से डरकर इंद्र ने राक्षस रूप धारण कर यज्ञ के अश्व को चुरा लिया और पाताल लोक में ले जाकर कपिल के आश्रम में बांध दिया। राजा सगर की दो पत्नियां थीं- केशिनी और सुमति। केशिनी के गर्भ से असमंजस पैदा हुआ और सुमति के गर्भ से साठ हजार पुत्र। असमंजस बड़ा ही उद्धत प्रकृति का था। वह प्रजा को बहुत पीड़ा देता था। अतः सगर ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया था। अश्वमेध का घोड़ा चुरा लिये जाने के कारण सगर बड़ी चिंता में पड़ गये। उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को अश्व ढूंढने के लिए कहा। साठों हजार पुत्र अश्व ढूंढते ढूंढते-ढूंढते पाताल लोक में पहुंच गये। वहां उन लोगों ने कपिल मुनि के आश्रम में यज्ञीय अश्व को बंधा देखा। उन लोगों ने मुनि कपिल को ही चोर समझकर उनका काफी अपमान कर दिया। अपमानित होकर ऋषि कपिल ने सभी को शाप दिया- 'तुम लोग भस्म हो जाओ। ' शाप मिलते ही सभी भस्म हो गये। पुत्रों के आने में विलंब देखकर राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान, जो असमंजस का पुत्र था, को पता लगाने के लिए भेजा। अंशुमान खोजते-खोजते पाताल लोक पहुंचा। वहां अपने सभी चाचाओं को भस्म रूप में परिणत देखा तो सारी स्थिति समझ गया। उन्होंने कपिल मुनि की स्तुति कर प्रसन्न किया। कपिल मुनि ने उसे घोड़ा ले जाने की अनुमति दे दी और यह भी कहा कि यदि राजा सगर का कोई वंशज गंगा को वहां तक ले आये तो सभी का उद्धार हो जाएगा। अंशुमान घोड़ा लेकर अयोध्या लौट आया। यज्ञ समाप्त करने के बाद राजा सगर ने 30 हजार वर्षों तक राज्य किया और अंत में अंशुमान को राजगद्दी देकर स्वर्ग सिधार गये। अंशुमान ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का काफी प्रयत्न किया, लेकिन सफल नहीं हो पाया। अंशुमान के पुत्र दिलीप ने दीर्घकाल तक तपस्या की। लेकिन वह भी सफल नहीं हो पाया। दिलीप के पुत्र भगीरथ ने घोर तपस्या की। गंगा ने आश्वासन दिया कि मैं जरूर पृथ्वी पर आऊंगी, लेकिन जिस समय मैं स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आऊंगी, उस समय मेरे प्रवाह को रोकने के लिए कोई उपस्थित होना चाहिए। भगीरथ ने इसके लिए भगवान शिव को प्रसन्न किया। भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटा में धारण कर लिया। भगीरथ ने उन्हें पुनः प्रसन्न किया तो शिवजी ने गंगा को छोड़ दिया। गंगा शिवजी के मस्तक से सात स्रोतों में भूमि पर उतरी। ह्रानिदी, पावनी और नलिनी नामक तीन प्रवाह पूर्व की ओर चल गये, वड.क्ष, सीता तथा सिंधु नामक तीन प्रवाह पश्चिम की ओर चले गये और अंतिम एक प्रवाह भगीरथ के बताए हुए मार्ग से चलने लगा। भगीरथ पैदल गंगा के साथ नहीं चल सकते थे, अतः उन्हें एक रथ दिया गया। भगीरथ गंगा को लेकर उसी जगह आये जहां उनके प्रपितामह आदि भस्म हुए थे। गंगा सबका उद्धार करती हुई सागर में मिल गयी। भगीरथ द्वारा लाये जाने के कारण गंगा का एक नाम भागीरथी भी पड़ा। जहां भगीरथ के पितरों का उद्धार हुआ, वही स्थान सागर द्वीप या गंगासागर कहलाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसके बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है। जय मांँ गंगे🙏🙏

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radha Jan 16, 2022

®💐 💐🌞 💐💐 *​🌹शुभ प्रभात 🌹​* ​☕आपका दिन शुभ हो☕​ ​💐🦜😊सदा मुस्कुराते रहो 😊🦜💐​ ®​​​​​​🙏 *꧁!! Զเधॆ Զเधॆ !!꧂*🙏​​​​​​® *_┈┉═══❀(("ॐ"))❀═══┉┈_* *अपने घर के बुजुर्गों की आँख* *कभी भीगने मत देना क्योकि,,* *जिस घर की छतसे पानी* *टपकता है उस घर कि दीवारें भी* *कमजोर हो जाती है,,,* *यदि हर कोई आप से खुश है* *तो ये निश्चित है कि,,,* *आपने जीवन में बहुत से* *समझौते किये हैं... और* *यदि आप सबसे खुश हैं तो* *निश्चित है कि आपने लोगों की* *बहुत सी ग़लतियों को* *नज़रअंदाज़ किया है।* *जिंदगी आसान नहीं होती,* *इसे आसान बनाना पड़ता है.....* *कुछ 'अंदाज' से,,,कुछ,,,,* *नजर अंदाज से!!* ▬▬▬▬▬๑⁂❋⁂๑▬▬▬▬▬ *◆●स्वयं विचार करें​●◆* ® *🙏꧁ ll जय श्री श्याम जी ll꧂*🙏 🌹हारे का सहारा बाबा हमारा🌹 🙏मेरी पहचान मेरा खाटू वाला श्याम​🙏 🙏जय श्री बालाजी🙏 ®

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