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#हनुमानचालीसा #लताजी

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Hari singh Feb 25, 2021

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paramahansh Chauhan Feb 23, 2021

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[email protected] Feb 23, 2021

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Shivnarayan Sharma Feb 23, 2021

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Amit Kumar Feb 23, 2021

कथा राजा भरथरी (भर्तृहरि) की..... पत्नी के धोखे से आहत होकर बन गए तपस्वी... उज्जैन में भरथरी की गुफा स्थित है। इसके संबंध में यह माना जाता है कि यहां भरथरी ने तपस्या की थी। यह गुफा शहर से बाहर एक सुनसान इलाके में है। गुफा के पास ही शिप्रा नदी बह रही है। गुफा के अंदर जाने का रास्ता काफी छोटा है। जब हम इस गुफा के अंदर जाते हैं तो सांस लेने में भी कठिनाई महसूस होती है। गुफा की ऊंचाई भी काफी कम है, अत: अंदर जाते समय काफी सावधानी रखनी होती है। यहाँ पर एक गुफा और है जो कि पहली गुफा से छोटी है। यह गोपीचन्द कि गुफा है जो कि भरथरी का भतीजा था। यहां प्रकाश भी काफी कम है, अंदर रोशनी के लिए बल्ब लगे हुए हैं। इसके बावजूद गुफा में अंधेरा दिखाई देता है। यदि किसी व्यक्ति को डर लगता है तो उसे गुफा के अंदर अकेले जाने में भी डर लगेगा। यहां की छत बड़े-बड़े पत्थरों के सहारे टिकी हुई है। गुफा के अंत में राजा भर्तृहरि की प्रतिमा है और उस प्रतिमा के पास ही एक और गुफा का रास्ता है। इस दूसरी गुफा के विषय में ऐसा माना जाता है कि यहां से चारों धामों का रास्ता है। गुफा में भर्तृहरि की प्रतिमा के सामने एक धुनी भी है, जिसकी राख हमेशा गर्म ही रहती है। गौर से देखने पर आपको गुफा के अंत में एक गुप्त रास्ता दिखाई देगा जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ से चारो धामों को रास्ता जाता है पत्नी के धोखे से आहत राजा भरथरी के साधू बनने कि कहानी :- उज्जैन को उज्जयिनी के नाम से भी जाना जाता था। उज्जयिनी शहर के परम प्रतापी राजा हुए थे विक्रमादित्य। विक्रमादित्य के पिता महाराज गंधर्वसेन थे और उनकी दो पत्नियां थीं। एक पत्नी के पुत्र विक्रमादित्य और दूसरी पत्नी के पुत्र थे भर्तृहरि। गंधर्वसेन के बाद उज्जैन का राजपाठ भर्तृहरि को प्राप्त हुआ, क्योंकि भरथरी विक्रमादित्य से बड़े थे। राजा भर्तृहरि धर्म और नीतिशास्त्र के ज्ञाता थे। प्रचलित कथाओं के अनुसार भरथरी की दो पत्नियां थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने तीसरा विवाह किया पिंगला से। पिंगला बहुत सुंदर थीं और इसी वजह से भरथरी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित हो गए थे। कथाओं के अनुसार भरथरी अपनी तीसरी पत्नी पिंगला पर काफी मोहित थे और वे उस पर अंधा विश्वास करते थे। राजा पत्नी मोह में अपने कर्तव्यों को भी भूल गए थे। उस समय उज्जैन में एक तपस्वी गुरु गोरखनाथ का आगमन हुआ। गोरखनाथ राजा के दरबार में पहुंचे। भरथरी ने गोरखनाथ का उचित आदर-सत्कार किया। इससे तपस्वी गुरु अति प्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर गोरखनाथ ने राजा एक फल दिया और कहा कि यह खाने से वह सदैव जवान बने रहेंगे, कभी बुढ़ापा नहीं आएगा, सदैव सुंदरता बनी रहेगी। यह चमत्कारी फल देकर गोरखनाथ वहां से चले गए। राजा ने फल लेकर सोचा कि उन्हें जवानी और सुंदरता की क्या आवश्यकता है। चूंकि राजा अपनी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित थे, अत: उन्होंने सोचा कि यदि यह फल पिंगला खा लेगी तो वह सदैव सुंदर और जवान बनी रहेगी। यह सोचकर राजा ने पिंगला को वह फल दे दिया। रानी पिंगला भर्तृहरि पर नहीं बल्कि उसके राज्य के कोतवाल पर मोहित थी। यह बात राजा नहीं जानते थे। जब राजा ने वह चमत्कारी फल रानी को दिया तो रानी ने सोचा कि यह फल यदि कोतवाल खाएगा तो वह लंबे समय तक उसकी इच्छाओं की पूर्ति कर सकेगा। रानी ने यह सोचकर चमत्कारी फल कोतवाल को दे दिया। वह कोतवाल एक वैश्या से प्रेम करता था और उसने चमत्कारी फल उसे दे दिया। ताकि वैश्या सदैव जवान और सुंदर बनी रहे। वैश्या ने फल पाकर सोचा कि यदि वह जवान और सुंदर बनी रहेगी तो उसे यह गंदा काम हमेशा करना पड़ेगा। नर्क समान जीवन से मुक्ति नहीं मिलेगी। इस फल की सबसे ज्यादा जरूरत हमारे राजा को है। राजा हमेशा जवान रहेगा तो लंबे समय तक प्रजा को सभी सुख-सुविधाएं देता रहेगा। यह सोचकर उसने चमत्कारी फल राजा को दे दिया। राजा वह फल देखकर हतप्रभ रह गए। राजा ने वैश्या से पूछा कि यह फल उसे कहा से प्राप्त हुआ। वैश्या ने बताया कि यह फल उसे कोतवाल ने दिया है। भरथरी ने तुरंत कोतवाल को बुलवा लिया। सख्ती से पूछने पर कोतवाल ने बताया कि यह फल उसे रानी पिंगला ने दिया है। जब भरथरी को पूरी सच्चाई मालूम हुई तो वह समझ गया कि पिंगला उसे धोखा दे रही है। पत्नी के धोखे से भरथरी के मन में वैराग्य जाग गया और वे अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर उज्जैन की एक गुफा में आ गए। इसी गुफा में भरथरी ने 12 वर्षों तक तपस्या की थी। राजा भरथरी की कठोर तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए। इंद्र ने सोचा की भरथरी वरदान पाकर स्वर्ग पर आक्रमण करेंगे। यह सोचकर इंद्र ने भरथरी पर एक विशाल पत्थर गिरा दिया। तपस्या में बैठे भरथरी ने उस पत्थर को एक हाथ से रोक लिया और तपस्या में बैठे रहे। इसी प्रकार कई वर्षों तक तपस्या करने से उस पत्थर पर भरथरी के पंजे का निशान बन गया। यह निशान आज भी भरथरी की गुफा में राजा की प्रतिमा के ऊपर वाले पत्थर पर दिखाई देता है। यह पंजे का निशान काफी बड़ा है, जिसे देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजा भरथरी की कद-काठी कितनी विशालकाय रही होगी। भरथरी ने वैराग्य पर वैराग्य शतक की रचना की, जो कि काफी प्रसिद्ध है। इसके साथ ही भरथरी ने श्रृंगार शतक और नीति शतक की भी रचना की। यह तीनों ही शतक आज भी उपलब्ध हैं और पढ़ने योग्य है। उज्जैन के राजा भरथरी के पास 365 पाकशास्त्री यानि रसोइए थे, जो राजा और उसके परिवार और अतिथियों के लिए भोजन बनाने के लिए। एक रसोइए को वर्ष में केवल एक ही बार भोजन बनाने का मोका मिलता था। लेकिन इस दौरान भरथरी जब गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में चले गये तो भिक्षा मांगकर खाने लगे थे। एक बार गुरु गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहा, ‘देखो, राजा होकर भी इसने काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है। ‘ शिष्यों ने कहा, ‘गुरुजी ! ये तो राजाधिराज हैं, इनके यहां 365 तो बावर्ची रहते थे। ऐसे भोग विलास के वातावरण में से आए हुए राजा और कैसे काम, क्रोध, लोभ रहित हो गए?’ गुरु गोरखनाथ जी ने राजा भरथरी से कहा, ‘भरथरी! जाओ, भंडारे के लिए जंगल से लकड़ियां ले आओ।’ राजा भरथरी नंगे पैर गए, जंगल से लकड़ियां एकत्रित करके सिर पर बोझ उठाकर ला रहे थे। गोरखनाथ जी ने दूसरे शिष्यों से कहा, ‘जाओ, उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझ गिर जाए।‘ चेले गए और ऐसा धक्का मारा कि बोझ गिर गया और भरथरी गिर गए। भरथरी ने बोझ उठाया, लेकिन न चेहरे पर शिकन, न आंखों में आग के गोले, न होंठ फड़के। गुरु जी ने चेलों से क, ‘देखा! भरथरी ने क्रोध को जीत लिया है।’ शिष्य बोले, ‘गुरुजी! अभी तो और भी परीक्षा लेनी चाहिए।’ थोड़ा सा आगे जाते ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया। गोरखनाथ जी भरथरी को महल दिखा रहे थे। युवतियां नाना प्रकार के व्यंजन आदि से सेवक उनका आदर सत्कार करने लगे। भरथरी युवतियों को देखकर कामी भी नहीं हुए और उनके नखरों पर क्रोधित भी नहीं हुए, चलते ही गए। गोरखनाथजी ने शिष्यों को कहा, अब तो तुम लोगों को विश्वास हो ही गया है कि भरथरी े काम, क्रोध, लोभ आदि को जीत लिया है। शिष्यों ने कहा, गुरुदेव एक परीक्षा और लीजिए। गोरखनाथजी ने कहा, अच्छा भरथरी हमारा शिष्य बनने के लिए परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जाओ, तुमको एक महीना मरुभूमि में नंगे पैर पैदल यात्रा करनी होगी।’ भरथरी अपने निर्दिष्ट मार्ग पर चल पड़े। पहाड़ी इलाका लांघते-लांघते राजस्थान की मरुभूमि में पहुंचे। धधकती बालू, कड़ाके की धूप मरुभूमि में पैर रखो तो बस जल जाए। एक दिन, दो दिन यात्रा करते-करते छः दिन बीत गए। सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से अपने प्रिय चेलों को भी साथ लेकर वहां पहुंचे। गोरखनाथ जी बोले, ‘देखो, यह भरथरी जा रहा है। मैं अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूं। वृक्ष की छाया में भी नहीं बैठेगा।’ अचानक वृक्ष खड़ा कर दिया। चलते-चलते भरथरी का पैर वृक्ष की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़े, मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो। ‘मरुभूमि में वृक्ष कैसे आ गया? छायावाले वृक्ष के नीचे पैर कैसे आ गया? गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में यात्रा करने की।’ कूदकर दूर हट गए। गुरु जी प्रसन्न हो गए कि देखो! कैसे गुरु की आज्ञा मानता है। जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे नहीं रखा, वह मरुभूमि में चलते-चलते पेड़ की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास करता है। ’ गोरखनाथ जी दिल में चेले की दृढ़ता पर बड़े खुश हुए, लेकिन और शिष्यों के मन में ईर्ष्या थी। शिष्य बोले, ‘गुरुजी! यह तो ठीक है लेकिन अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई।’ गोरखनाथ जी (रूप बदल कर) भर्तृहरि से मिले और बोले, ‘जरा छाया का उपयोग कर लो।’ भरथरी बोले, ‘नहीं, मेरे गुरुजी की आज्ञा है कि नंगे पैर मरुभूमि में चलूं।’ गोरखनाथ जी ने सोचा, ‘अच्छा! कितना चलते हो देखते हैं।’ थोड़ा आगे गए तो गोरखनाथ जी ने योगबल से कांटे पैदा कर दिए। ऐसी कंटीली झाड़ी कि कंथा (फटे-पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्र) फट गया। पैरों में शूल चुभने लगे, फिर भी भरथरी ने ‘आह’ तक नहीं की। भरथरी तो और अंतर्मुख हो गए, ’यह सब सपना है, गुरु जी ने जो आदेश दिया है, वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है’। अंतिम परीक्षा के लिए गुरु गोरखनाथ जी ने अपने योगबल से प्रबल ताप पैदा किया। प्यास के मारे भरथरी के प्राण कंठ तक आ गये। तभी गोरखनाथ जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा-भरा वृक्ष खड़ा कर दिया, जिसके नीचे पानी से भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी। एक बार तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल आया कि कहीं गुरु आज्ञा भंग तो नहीं हो रही है। उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ आते दिखाई दिए। भरथरी ने दंडवत प्रणाम किया। गुरुजी बोले, ”शाबाश भरथरी, वर मांग लो। अष्टसिद्धि दे दूं, नवनिधि दे दूं। तुमने सुंदर-सुंदर व्यंजन ठुकरा दिए, युवतियां तुम्हारे चरण पखारने के लिए तैयार थीं, लेकिन तुम उनके चक्कर में नहीं आए। तुम्हें जो मांगना है, वो मांग लो। भर्तृहरि बोले, ‘गुरुजी! बस आप प्रसन्न हैं, मुझे सब कुछ मिल गया। शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है। आप मुझसे संतुष्ट हुए, मेरे करोड़ों पुण्यकर्म और यज्ञ, तप सब सफल हो गए।’ गोरखनाथ बोले, ‘नहीं भरथरी! अनादर मत करो। तुम्हें कुछ-न-कुछ तो लेना ही पड़ेगा, कुछ-न-कुछ मांगना ही पड़ेगा।’ इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सूई दिखाई दी। उसे उठाकर भरथरी बोले, ‘गुरुजी! कंठा फट गया है, सूई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं अपना कंठा सी लूं।’ गोरखनाथ जी और खुश हुए कि ’हद हो गई! कितना निरपेक्ष है, अष्टसिद्धि-नवनिधियां कुछ नहीं चाहिए। मैंने कहा कुछ मांगो, तो बोलता है कि सूई में जरा धागा डाल दो। गुरु का वचन रख लिया। कोई अपेक्षा नहीं? भर्तृहरि तुम धन्य हो गए! कहां उज्जयिनी का सम्राट नंगे पैर मरुभूमि में। एक महीना भी नहीं होने दिया, सात-आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गए।

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आकस्मिक संकट से बचाएंगे 6 सरल उपाय जब मनुष्य आकस्मिक संकट से घिर जाता है, तब उनसे बाहर निकलने का रास्ता खोजना बहुत ही मुश्किल भरा काम है। अत: ऐसे समय में आप नीचे दिए गए इन 6 उपायों को आजमाएंगे तो निश्चित ही आपके संकट तत्काल दूर होंगे। यह उपाय बहुत ही उपयोगी है, अवश्य आजमाएं प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ पढ़ें। सुबह, शाम और रात को कपूर जलाना न भूलें। दरवाजों के कब्जों में तेल डालते रहें अन्यथा दरवाजा खोलते या बंद करते समय आवाज करते हैं, जो कि वास्तु के अनुसार अत्यंत अशुभ और अनिष्टकारी होता है। बाहर जाने से पहले कुछ मीठा खाकर जाएं। घर से बाहर जाते वक्त कभी भी झगड़कर न जाएं। शाम के वक्त (धरधरी के समय) खेलना, सफर करना, संभोग करना, झगड़ा करना, अपशब्द बोलना, टीवी देखना, बुरे विचार मन-मस्तिष्क में लाना आदि सभी कार्य करने से व्यक्ति संकटों से घिर जाता है। 🌷🌺🌸🌻🚩🙏

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vinodkumar mahajan Feb 23, 2021

हनुमान भक्ति व तुलसीदास *श्रीहनुमान चालिसाचे प्रभावी पठण* संत तुलसीदासांच्या काळात काऴया कुविद्येच्या उपासकांनी गंगातीरावर एकमंदिर बांधले होते त्या मंदिराचा विध्वंस करण्याचे सामर्थ्य केवळ हनुमंतामध्येआहे हे जाणून तुलसीदासांनी श्री हनुमंताना प्रसन्न करण्यासाठी वटपौर्णिमेच्या दिवशी वटवृक्षाखाली बसून रोज तीन वेळा हनुमानचलिसा पठणास बसले . रोज तीन वेळा म्हणजे सकाळी १०८ वेळा, दुपारी १०८ वेळा व संध्याकाळी १०८ वेळा आणि तेही तीस दिवस. तीस दिवसांनी म्हणजे गुरुपौर्णिमेच्या दिवशी हनुमंत प्रकट झाले व त्यांनी ती अपवित्र, वाईटवस्तु नष्ट केली. त्यामुळे तुलसीदासांना अत्यंत आनंद झाला. त्यांना आनंदात बघून हनुमानजी तुलसीदासांना प्रश्न करतात की," तु एवढा आनंदित का? तुझे संरक्षण पहिल्यापासूनच होते". त्यावर तुलसीदासजी म्हणतात की "हनुमानजी मी आता सर्वांना सांगू शकतो की, आपल्या कडे भक्तीचा लवलेश ही नसताना दयाळु हनुमंतानी आपल्याला त्रास होऊ नये म्हणून ह्या अपवित्र वस्तुचा नाश केला आहे व आपले सर्वांचे रक्षण केले आहे. म्हणूनआपण सर्वजण हनुमंताचे स्मरण करूया. केवळ ह्या निमिताने तरी ते आपले *(हनुमंताचे) नामस्मरण करतील."* त्यावर तुलसीदासांची निष्ठा तपासण्यासाठी हनुमंतजी त्यांना उलट प्रश्न करतात "तुझ्यावर विश्वास कोण ठेवील?". त्यावर तुलसीदासजी वादावादी न करता हनुमानजींना सांगतात "देवा तु म्हणतोस ते बरोबर", येवढे बोलून पुन्हा पठण करण्यास बसतात. त्यानंतर हनुमानजी मानवी रुपात गावात जाऊन ४-5 जणांना सांगतात की,त्या वटवृक्षाखाली बसलेला म्हातारा पाखंडी आहे. तुम्ही जाऊन त्याला मारा. हनुमंताच्या मुखातील हे शब्द ऐकताच ते सर्वजण काठयांनी तुलसीदासजीवर वार करतात व त्यांना दगडानी मारतात परंतु त्यांना काहीचं होत नाही,उलट दगड मारण्याऱ्यांच्या उलटे येतात, ते सर्वजण घाबरतात व भीतीपोटी(प्रेमाने नाही) तुलसीदासांना शरण जातात. त्याचवेळी तुलसीदासजी त्यांना सांगतात "माझ्याकडे काही जादू नाही, *हे सामर्थ्य आहे त्या हनुमंतांचे, त्याच्या हनुमान चालीसा पठणाचे,* तुम्ही मारलेल्या दगडांची, काठयांची फुले होतील व हनुमंताच्या चरणाशी पडतील, आणि तसेच होते. ते सर्वजण तुलसीदासजीकडे हनुमान चालिसा शिकू लागतात. त्या रात्री पुन्हां हनुमानजी तुलसीदास बरोबर समोर प्रकट होऊन त्यांना विचारतात "तु एवढा खुष का? तुला काय मिळाले?", तुलसीदासजी उत्तर देतात *"तुझ्या नामाची गोडी सामान्य जनांना लागली, मला पाहिजे ते मिळालं"*, त्याला हनुमानजी तुलसीदासांना विचारतात "मग त्याने काय झाले?", त्यावर तुलसीदासानी दिलेले उत्तर त्यांच्या भक्तीची परमोच्च स्थिती दर्शविते, तुलसीदासजी म्हणतात "हे मी जाणत नाही, ते तू आणि लोक जाणो. मी एवढेच जाणतो की, *तू व तुझे नाम अतिशय सुंदर आहे, पवित्रआहे, तू काय करू शकतोस हे जाणून घेण्याची मला आवश्यकता नाही"*. कृपाळू हनुमंत प्रसन्न होतात व तुलसीदासांना सांगतात, "तू जे काहीमागायचं ते माग". तुलसीदासजी अत्यंत विनम्रपणे हनुमंताना प्रार्थना करतात "हे दयाळू हनुमान जो कोणी ह्या तीस दिवसात म्हणजे वटपौर्णिमा ते गुरुपौर्णिमा ह्याकालावधीत, घरात, मंदिरात, जंगलात, किंवा शक्य असेल तेथे कुठेही बसून ३0 दिवसातून १ दिवस केवळ एकदाच १०८ वेळा हनुमान चालिसाचेपठण करील त्याचे तू रक्षण कर, मात्र तू माझी परीक्षा घेतली तशी त्यांची परीक्षा तू घेऊ नकोस ". तुलसीदासांच्या मुखातील हे शब्द ऎकून हनुमानजी प्रसन्न होतात व"तस्थास्तु" म्हणून निघून जातात. *तेव्हांपासून एका दिवसात १ ० ८ वेळाहनुमान चालिसा म्हणण्याची प्रथा सुरु झाली.* *||श्री स्वामी समर्थ महाराज की जय, जय जय बाबाजी||*

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हनुमान चालीसा पाठ की सही विधि हम सभी जानते हैं कि हनुमान जी प्रत्यक्ष देवता है, तुरंत प्रसन्न होते हैं लेकिन उनकी निरंतर आराधना के बाद भी आपको लाभ नहीं मिल रहा है तो अवश्य ही आप कोई बड़ी गलती कर रहे हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि आखिर क्यों नहीं मिलता कुछ लोगों को हनुमान चालीसा का लाभ हम आपको बता रहे हैं कि आप हनुमान चालीसा का पाठ किस प्रकार करें और क्या उपाय अपनाएं जिससे भगवान खुश हो और आपकी मनोकामनाएं पूर्ण हो हनुमान चालीसा के पाठ की शुरुआत आप मंगलवार या शनिवार से कर सकते हैं। आप 40 दिनों का अनुसरण कीजिए। उसके बाद अगले 11 शनिवार और अगले 11 मंगलवार तक आपको एक दिन के अंदर 21 पाठ करने होंगे। स्मरण रहे कि पाठ केवल सुबह-सुबह 4 बजे शुरू करना होगा। जो तरीका आपको बताया गया है अगर इसी प्रकार से आप नियमानुसार हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे तो आपकी मनोकामना पूर्ण होगी और इच्छानुसार फल आपको प्राप्त होगा इस विधि के द्वारा पाठ करके प्रसाद को गाय और बंदर को देना चाहिए। उसके बाद बांट दीजिए। जब चालीसा पूर्ण हो जाए तो हवन भी कराएं। हर चौपाई के बाद एक आहुति दीजिए। जब हवन हो जाए तो गरीबों में बूंदी चूरमा बांट दीजिए। इस प्रकार आपने जो अनुष्ठान किया है वो पूरा हो जाएगा। अब हनुमान चालीसा सिद्ध हो गया है। जब भी कभी आप संकट में घिरें तो इसे पढ़ें यह तुरंत चमत्कारी असर दिखाएगा। 🌼🌺🍁❤️💐🙏🚩

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Pandurang Khot Feb 23, 2021

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