Samapt Soni
Samapt Soni Aug 18, 2017

Sampat. Soni. 94138. 23707

Sampat. Soni. 94138. 23707

*#हनुमान जी का अद्भुत पराक्रम #भक्ति कथा*

जब रावण ने देखा कि हमारी पराजय निश्चित है तो उसने १००० अमर राक्षसों को बुलाकर

रणभूमि में भेजने का आदेश दिया ! ये ऐसे थे जिनको काल भी नहीं खा सका था!

विभीषण के गुप्तचरों से समाचार मिलने पर श्रीराम को चिंता हुई कि हम लोग इनसे कब तक

लड़ेंगे ? सीता का उद्धार और विभीषण का राज तिलक कैसे होगा?क्योंकि युद्ध कि समाप्ति असंभव है !

श्रीराम कि इस स्थिति से वानरवाहिनी के साथ कपिराज सुग्रीव भी विचलित हो गए कि अब क्या होगा ? हम अनंत कल तक युद्ध तो कर सकते हैं पर विजयश्री का वरण नहीं !पूर्वोक्त दोनों कार्य असंभव हैं !

अंजनानंदन हनुमान जी आकर वानर वाहिनी के साथ श्रीराम को चिंतित देखकर बोले –प्रभो !

क्या बात है ? श्रीराम के संकेत से विभीषण जी ने सारी बात बतलाई !अब विजय असंभव है !
पवन पुत्र ने कहा –असम्भव को संभव और संभव को असम्भव कर देने का नाम ही तो हनुमान है !प्रभो! आप केवल मुझे आज्ञा दीजिए मैं अकेले ही जाकर रावण की अमर सेना को नष्ट कर दूँगा !कैसे हनुमान ? वे तो अमर हैं !

प्रभो ! इसकी चिंता आप न करें सेवक पर विश्वास करें !उधर रावण ने चलते समय राक्षसों से कहा था कि वहां हनुमान नाम का एक वानर है उससे जरा सावधान रहना !

एकाकी हनुमानजी को रणभूमि में देखकर राक्षसों ने पूछा तुम कौन हो क्या हम लोगों को देखकर भय नहीं लगता जो अकेले रणभूमि में चले आये !

मारुति –क्यों आते समय राक्षस राज रावण ने तुम लोगों को कुछ संकेत नहीं किया था जो मेरे समक्ष निर्भय खड़े हो !निशाचरों को समझते देर न लगी कि ये महाबली हनुमान हैं ! तो भी क्या ? हम अमर हैं हमारा ये क्या बिगाड़ लेंगे !

भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ पवनपुत्र कि मार से राक्षस रणभूमि में ढेर होने लगे चौथाई सेना बची थी कि पीछे से आवाज आई हनुमान हम लोग अमर हैं हमें जीतना असंभव है ! अतः अपने स्वामी के साथ लंका से लौट जावो इसी में तुम सबका कल्याण है !

आंजनेय ने कहा लौटूंगा अवश्य पर तुम्हारे कहने से नहीं !अपितु अपनी इच्छा से !हाँ तुम सब मिलकर आक्रमण करो फिर मेरा बल देखो और रावण को जाकर बताना !

राक्षसों ने जैसे ही एक साथ मिलकर हनुमानजी पर आक्रमण करना चाहां वैसे ही पवनपुत्र ने उन सबको अपनी पूंछ में लपेटकर ऊपर आकाश में फेंक दिया !

वे सब पृथ्वी कि गुरुत्वाकर्षण शक्ति जहाँ तक है वहां से भी ऊपर चले गए ! चले ही जा रहे हैं

*चले मग जात सूखि गए गात*
गोस्वामी तुलसीदास !

उनका शरीर सूख गया अमर होने के कारण मर सकते नहीं !

अतः रावण को गाली देते हुए और कष्ट के कारण अपनी अमरता को कोसते हुए अभी भी जा रहे हैं !

इधर हनुमान जी ने आकर प्रभु के चरणों में शीश झुकाया !श्रीराम बोले –क्या हुआ हनुमान ! प्रभो ! उन्हें ऊपर भेजकर आ रहा हूँ !

राघव –पर वे अमर थे हनुमान!हाँ स्वामी इसलिए उन्हें जीवित ही ऊपर भेज आया हूँ अब वे कभी भी नीचे नहीं आ सकते ? रावण को अब आप शीघ्रातिशीघ्र ऊपर भेजने की कृपा करें जिससे माता जानकी का आपसे मिलन और महाराज विभीषण का राजसिंहासन हो सके !
पवनपुत्र को प्रभु ने उठाकर गले लगा लिया ! वे धन्य हो गए अविरल भक्ति का वर पाकर ! श्रीराम उनके ऋणी बन गए !और बोले –

हनुमानजी—आपने जो उपकार किया है वह मेरे अंग अंग में ही जीर्ण शीर्ण हो जाय मैं उसका बदला न चुका सकूँ ,क्योकि उपकार का बदला विपत्तिकाल में ही चुकाया जाता है !

पुत्र ! तुम पर कभी कोई विपत्ति न आये !निहाल हो गए आंजनेय !

हनुमानजी की वीरता के समान साक्षात काल देवराज इन्द्र महाराज कुबेर तथा भगवान विष्णु की भी वीरता नहीं सुनी गयी –ऐसा कथन श्रीराम का है –

*न कालस्य न शक्रस्य न विष्णर्वित्तपस्य च !*

*कर्माणि तानि श्रूयन्ते यानि युद्धे हनूमतः !*

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कामेंट्स

Sunil Ag Aug 18, 2017
jai jai siya ram jai jai Hanuman

S.B. Yadav Aug 18, 2017
जय बजरंग बली जय हनुमान जय पवन पुत्र

Chandrashekhar Karwa Jan 26, 2020

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Chandrashekhar Karwa Jan 25, 2020

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Chandrashekhar Karwa Jan 24, 2020

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Chandrashekhar Karwa Jan 26, 2020

श्रीरामचरित मानस  Serial No 253 (बालकाण्ड)   1/347/दोहा  चौपाई / छंद / दोहा - होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ । बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ ॥ व्यक्त भाव एवं प्रेरणा - विवाह के बाद जब प्रभु श्री रामजी और भगवती सीता माता श्री अयोध्याजी में बारात के साथ प्रवेश कर रहे थे तो नाना शकुन होने लगे । देवतागण आकाश से दुन्दुभी बजाकर फूल बरसाने लगे । देवताओं की पत्नियां सुंदर मंगलगीत गाने लगी । नगर के भाट प्रभु का यशगान करने लगे । सभी ओर से प्रभु के लिए जयध्वनि सुनाई देने लगी । श्रीवेदध्वनि दसों दिशाओं से सुनाई देने लगी । आकाश में देवतागण और श्री अयोध्याजी के वासी प्रेम मग्न होकर अत्यंत आनंदित हो गये । गोस्वामी श्री तुलसीदासजी कहते हैं कि उस प्रेम और महान आनंद का वर्णन कोई नहीं कर सकता । www.devotionalthoughts.in

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Chandrashekhar Karwa Jan 26, 2020

BHAKTI Vichar  Chapter - 09,  Serial No  386 – 400 386. जिनके मन में प्रभु को प्राप्त करने का दीप जल गया है उन्हें उस दीप के रूई को कथारूपी घी में डुबोकर रखना चाहिए जिससे आग निरंतर जलती रहे । 387. प्रभु के विरह का अनुभव जीवन में करना चाहिए । 388. संतजन कहते हैं श्री वृंदावनजी में राधे-राधे कहा जाता है क्योंकि कृष्ण-कृष्ण कहने से श्रीगोपिजन विरह में टूट जायेगी और बेहोश हो जायेगी । राधे-राधे कहने से मथुरा में प्रभु तक आवाज पहुँचती है कि श्रीगोपिजन प्रभु को याद कर रही हैं । इसलिए श्री नंदबाबा के भाई श्री उपनंदजी ने श्री वृंदावनजी के द्वारपालों को यह नियम बताया था कि आने वालों को राधे-राधे कहने को कहो । तब से यह नियम है कि श्रीबृज में सब राधे-राधे कहते हैं । 389. या तो हम दुनिया के काम आ सकते हैं और या श्रीगोविंद के काम आ सकते हैं । दोनों में से एक ही हो सकता है । अब यह चुनाव हमारे ऊपर है । 390. प्रभु की कथा हमें संसार से वैराग्य करा देती है । 391. प्रभु कथा हमारे जीवन में अध्यात्म को स्थिर कर देती है । 392. प्रभु कथा से प्रभु के वियोग की ज्वाला जल उठती है । 393. प्रभु की कथा सबके लिए अति रसदायी है । 394. मन की गंदगी को प्रभु की कथा दूर कर देती है । 395. जैसे एक मटकी जिसमें गंदगी भरी हुई है उसमें हम स्वच्छ जल डालते रहेंगे तो गंदगी धीरे-धीरे ऊपर आती जायेगी और एक समय ऐसा आयेगा कि पूरे मटके की गंदगी पूरी तरह निकल जायेगी और मटका स्वच्छ पानी से भर जायेगा । इसी तरह निरंतर प्रभु की कथा सुनते रहने से मन की गंदगी एक दिन पूरी तरह से निकल जायेगी और मन प्रभु को पाने के लिए पूरा स्वच्छ हो जायेगा । 396. जहाँ प्रभु श्री रामजी और प्रभु श्री कृष्णजी की कथा हो वहाँ प्रभु श्री हनुमानजी नहीं हो ऐसा हो ही नहीं सकता । प्रभु श्री हनुमानजी सदा वहाँ आकर कथा श्रवण करते हैं । 397. जैसे भगवान की कथा भक्तों को आनंद देती है वैसे ही भक्तों की कथा प्रभु को आनंद देती है । 398. श्रीमद् भागवतजी महापुराण में भक्तों का चरित्र है, इसलिए प्रभु को श्रीमद् भागवतजी महापुराण अति प्रिय है । 399. प्रभु श्री हनुमानजी की कृपा से श्रीराम प्रेम का रोग हमें लग जाता है । 400. श्री ठाकुरजी को सबसे प्रिय कथा है । www.bhaktivichar.in GOD, GOD & Only GOD   Request you to please SHARE THIS POST to spread the message related to ALMIGHTY GOD.

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Chandrashekhar Karwa Jan 26, 2020

श्रीरामचरित मानस  Serial No 254 (बालकाण्ड)   1/349/4  चौपाई / छंद / दोहा - सारद उपमा सकल ढँढोरीं ॥ व्यक्त भाव एवं प्रेरणा - प्रभु श्री रामजी और भगवती सीता माता की छवि को बार-बार देखकर श्री अयोध्याजी की स्त्रियां जगत में अपने जीवन को सफल मान आनंदित हो रही थी । राजमहल में मातायें और सखियां भगवती सीता माता की अलौकित सुंदरता को देखकर अपने पूण्यों की सराहना करने लगी जिस कारण उन्हें यह सौभाग्य मिला । देवतागण क्षण क्षण फुल बरसाकर, नाचकर, गाकर अपनी सेवा प्रभु और माता को समर्पित कर रहे थे । भगवती सरस्वती माता ने वर-वधू को देने के लिए सारी उपमाओं को खोज लिया पर उन्हें कोई उपमा देते नहीं बनी । कोई भी उपमा जो वे सोचती थी वह उन्हें प्रभु और माता को देने के लिए तुच्छ जान पड़ती । www.devotionalthoughts.in

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Chandrashekhar Karwa Jan 25, 2020

BHAKTI Vichar  Chapter - 09,  Serial No  371 – 385 371. प्रभु के श्री कमलचरणों में हमारा मस्तक सदैव के लिए झुक जाये, जीवन में इससे सुंदर बात कुछ नहीं हो सकती । 372. प्रभु श्री शुकदेवजी भगवती सरस्वती माता से प्रार्थना करते हैं कि उनकी वाणी को प्रभु गुनानुवाद और लीला गान के लिए अलंकृत कर देवें । 373. ऋषि, संत और भक्त जो कह देते हैं प्रभु को उसे सार्थक करके निभाना पड़ता है । 374. प्रभु कथा सुनकर कभी ऐसी भावना नहीं आनी चाहिए कि हम तृप्त हो गये । ऐसा मानना चाहिए कि मानो हमारी प्यास और बढ़ गई प्रभु के गुणानुवाद को सुनने के लिए । 375. प्रभु का प्रेमी ऐसा होता है कि उसके लिए प्रभु को परिश्रम करते देखना असहनीय हो जाता है । प्रभु जब श्रीगोपिजन के यहाँ माखन का भोग लगाने आते थे तो वे यह सोचती थी कि प्रभु को आने में कितना परिश्रम होता होगा । 376. रावण ने मृत्यु बेला पर श्री लक्ष्मणजी को कहा कि प्रभु इतने दयालु हैं कि मैंने अपनी जीते जी प्रभु को लंका में प्रवेश नहीं करने दिया पर प्रभु ने मेरे जीते जी मुझे वैकुंठ में प्रवेश करवा दिया । 377. जो गति शरणागति लेने पर प्रभु ने श्री विभिषणजी को दी वही गति प्रभु ने विरोध करने वाले रावण को भी दे दी । प्रभु इतने कृपालु की दोनों को प्रभु ने वैकुंठ भेजा और दोनों का उद्धार किया । 378. प्रभु के श्रीमद् भगवद गीताजी में कहे हर वाक्य हमारी रक्षा करते हैं । प्रभु के श्रीवचनों में चलने से हमारी रक्षा स्वत: ही हो जाती है । 379. भक्त वह है जो भक्ति में अमीर है । 380. श्रीमद् भागवतजी महापुराण, श्रीमद् भगवत गीताजी और श्री रामचरितमानसजी जैसा धन और कुछ भी नहीं हो सकता । ऐसा धन भारतवर्ष के अलावा कहीं नहीं मिलेगा । 381. संत कहते हैं कि प्रभु का नाम ही महाधन है । 382. संत कहते हैं कि हरि नाम ही हीरा है जिसमें ने तो कभी जंग लगता है और नहीं ही कभी कीड़े पड़ते हैं । 383. शास्त्र कहते हैं कि प्रभु के कथा अमृत को जी भर कर पीना चाहिए । 384. प्रभु की कथा का अमृत हमें इस संसार तापों से बचाकर रखता है  । 385. प्रभु की कथा  के रूप में प्रभु ही हमें साक्षात मिल जाते हैं । www.bhaktivichar.in GOD, GOD & Only GOD   Request you to please SHARE THIS POST to spread the message related to ALMIGHTY GOD.

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