!! वसुबारस व्रत कथा !!

!! वसुबारस व्रत कथा !!

वसुबारसेची व्रत

एका छोट्या गावात एक कुणब्याची म्हातारी होती. तिला एक सून होती. गाईगुरं होती, ढोरं म्हशी होत्या, गव्हाळीं मुगाळीं वांसरं होतीं. एके दिवशीं काय झालं? आश्विनमास आला. पहिल्या द्वादशीच्या दिवशीं म्हतारी सकाळीं उठली. शेतावर जाऊं लागली. सुनेला हाक मारली, ‘मुली, इकडे ये” सून आली. ‘काय’ म्हणून म्हणाली. तशी म्हातारी म्हणाली. “मी शेतावर जातें. दुपारी येईन. तूं माडीवर जा, गव्हाचे मुगांचे दाणे काढ, गव्हाळे मुगाळे शिजवून ठेव.” असं सांगितलं. आपण निघून शेतावर गेली. सून माडीवर गेली. गहूं मूग काढून ठेवले. खालीं आली. गोठ्यांत गेली. गव्हाळीं मुगाळीं वासरं उड्या मारीत होती, त्यांना ठार मारलं, चिरलं व शिजवून ठेवून सासूची वाट पहात बसली. दुपार झाली. तशी सासू घरी आली. सुनेनं पान वाढलं. सासूनं देखिलं. तांबडं मांस दृष्टिस पडलं. तिनं हे कायं’ म्हणून सूनेला पुशिलं.

सुनेनं सर्व हकीकत सांगितली. ‘तुम्ही सांगितलं तसं केलं’ म्हणाली. सासू घाबरली. न समजता सूनेकडून चुकी घडली, म्हणून तशीच उठली. देवापाशी जाऊन बसली. प्रार्थना केली, “देवा, हा सुनेच्या हातून अपराध घडला. तिला ह्याची क्षमा कर. गाईंची वासरं जिवंत कर. असं न होईल तर संध्याकाळीं मी आपला प्राण देईन.” असा निश्चय केला. देवापाशीं बसून राहिली. देवानं तिचा एकनिश्चय पाहिला. निष्कपट अंतःकरण देखिलं. पुढं संध्याकाळीं गाई आल्या. हंबरडे फोडूं लागल्या. तशी देवाला चिंता पडली. ‘हिचा निश्चय ढळणार नाही’ असं देवाला वाटले. मग देवानं काय केलं? गाईंची वासरं जिवंत केली, तीं उड्या मारीत मारीत प्यायला गेलीं. गाईचे हंबरडे बंद झाले. म्हातारीला आनंद झाला. सुनेला आश्चर्य वाटलं. तसा सर्वांना आनंद झाला. नंतर म्हातारीनं गाईगोर्‍ह्यांची पूजा केली. स्वयंपाक जेवली, आनंदी झाली. असे तुम्ही आम्ही होऊं.

ही साठां उत्तरांची कहाणी, पांचां उत्तरी, देवाब्राह्मणाचे द्वारीं, पिंपळाच्या पारीं, गाईंच्या गोठी सुफळ संपूर्ण.

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कामेंट्स

s Oct 13, 2017
jai gay Mata ki

🌺🌺🙏🙏🌺🌺🙏🙏🌺🌺 *********|| जय श्री राधे ||********* 🌺🙏 *महर्षि पाराशर पंचांग* 🙏🌺 🙏🌺🙏 *अथ पंचांगम्* 🙏🌺🙏 *********ll जय श्री राधे ll********* 🌺🌺🙏🙏🌺🌺🙏🙏🌺🌺 *दिनाँक -: 28/03/2020,शनिवार* चतुर्थी, शुक्ल पक्ष चैत्र """""""""""""""""""""""""""""""""""""(समाप्ति काल) तिथि ----------चतुर्थी 24:17:07 तक पक्ष ---------------------------शुक्ल नक्षत्र ----------भरणी 12:50:51 योग ---------विश्कुम्भ 17:51:33 करण -------वाणिज 11:16:40 करण ------विष्टि भद्र 24:17:07 वार -------------------------शनिवार माह ------------------------------चैत्र चन्द्र राशि --------मेष 19:29:10 चन्द्र राशि ---------------------वृषभ सूर्य राशि ----------------------मीन रितु ----------------------------वसंत आयन --------------------उत्तरायण संवत्सर -----------------------शार्वरी संवत्सर (उत्तर) -------------प्रमादी विक्रम संवत ----------------2077 विक्रम संवत (कर्तक)------2076 शाका संवत ----------------1942 वृन्दावन सूर्योदय -----------------06:15:07 सूर्यास्त -----------------18:33:28 दिन काल --------------12:18:20 रात्री काल -------------11:40:31 चंद्रोदय -----------------08:34:01 चंद्रास्त -----------------22:03:10 लग्न ----मीन 13°40' , 343°40' सूर्य नक्षत्र ---------उत्तराभाद्रपदा चन्द्र नक्षत्र -------------------भरणी नक्षत्र पाया --------------------स्वर्ण *🚩💮🚩 पद, चरण 🚩💮🚩* लो ----भरणी 12:50:51 अ ----कृत्तिका 19:29:10 ई ----कृत्तिका 26:06:17 *💮🚩💮 ग्रह गोचर 💮🚩💮* ग्रह =राशी , अंश ,नक्षत्र, पद ======================= सूर्य=मीन 13°22 ' उ o भा o, 4 ञ चन्द्र =मेष 23°23 ' भरनी ' 4 लो बुध = कुम्भ 16°50 ' शतभिषा' 3 सी शुक्र= मेष 29°55, कृतिका ' 1 अ मंगल=मकर 03°30' उ o षा o ' 3 जा गुरु=धनु 29°50 ' उ oषाo , 1 भे शनि=मकर 05°43' उ oषा o ' 3 जा राहू=मिथुन 09°32 ' आर्द्रा , 1 कु केतु=धनु 09 ° 32 ' मूल , 3 भा *🚩💮🚩शुभा$शुभ मुहूर्त🚩💮🚩* राहू काल 09:20 - 10:52 अशुभ यम घंटा 13:57 - 15:29 अशुभ गुली काल 06:15 - 07:47 अशुभ अभिजित 11:59 -12:49 शुभ दूर मुहूर्त 07:54 - 08:43 अशुभ 💮चोघडिया, दिन काल 06:15 - 07:47 अशुभ शुभ 07:47 - 09:20 शुभ रोग 09:20 - 10:52 अशुभ उद्वेग 10:52 - 12:24 अशुभ चर 12:24 - 13:57 शुभ लाभ 13:57 - 15:29 शुभ अमृत 15:29 - 17:01 शुभ काल 17:01 - 18:33 अशुभ 🚩चोघडिया, रात लाभ 18:33 - 20:01 शुभ उद्वेग 20:01 - 21:29 अशुभ शुभ 21:29 - 22:56 शुभ अमृत 22:56 - 24:24* शुभ चर 24:24* - 25:51* शुभ रोग 25:51* - 27:19* अशुभ काल 27:19* - 28:46* अशुभ लाभ 28:46* - 30:14* शुभ 💮होरा, दिन शनि 06:15 - 07:17 बृहस्पति 07:17 - 08:18 मंगल 08:18 - 09:20 सूर्य 09:20 - 10:21 शुक्र 10:21 - 11:23 बुध 11:23 - 12:24 चन्द्र 12:24 - 13:26 शनि 13:26 - 14:27 बृहस्पति 14:27 - 15:29 मंगल 15:29 - 16:30 सूर्य 16:30 - 17:32 शुक्र 17:32 - 18:33 🚩होरा, रात बुध 18:33 - 19:32 चन्द्र 19:32 - 20:30 शनि 20:30 - 21:29 बृहस्पति 21:29 - 22:27 मंगल 22:27 - 23:25 सूर्य 23:25 - 24:24 शुक्र 24:24* - 25:22 बुध 25:22* - 26:21 चन्द्र 26:21* - 27:19 शनि 27:19* - 28:17 बृहस्पति 28:17* - 29:16 मंगल 29:16* - 30:14 *नोट*-- दिन और रात्रि के चौघड़िया का आरंभ क्रमशः सूर्योदय और सूर्यास्त से होता है। प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है। चर में चक्र चलाइये , उद्वेगे थलगार । शुभ में स्त्री श्रृंगार करे,लाभ में करो व्यापार ॥ रोग में रोगी स्नान करे ,काल करो भण्डार । अमृत में काम सभी करो , सहाय करो कर्तार ॥ अर्थात- चर में वाहन,मशीन आदि कार्य करें । उद्वेग में भूमि सम्बंधित एवं स्थायी कार्य करें । शुभ में स्त्री श्रृंगार ,सगाई व चूड़ा पहनना आदि कार्य करें । लाभ में व्यापार करें । रोग में जब रोगी रोग मुक्त हो जाय तो स्नान करें । काल में धन संग्रह करने पर धन वृद्धि होती है । अमृत में सभी शुभ कार्य करें । *💮दिशा शूल ज्ञान-------------पूर्व* परिहार-: आवश्यकतानुसार यदि यात्रा करनी हो तो लौंग अथवा कालीमिर्च खाके यात्रा कर सकते है l इस मंत्र का उच्चारण करें-: *शीघ्र गौतम गच्छत्वं ग्रामेषु नगरेषु च l* *भोजनं वसनं यानं मार्गं मे परिकल्पय: ll* *🚩 अग्नि वास ज्ञान -:* *यात्रा विवाह व्रत गोचरेषु,* *चोलोपनिताद्यखिलव्रतेषु ।* *दुर्गाविधानेषु सुत प्रसूतौ,* *नैवाग्नि चक्रं परिचिन्तनियं ।।* *महारुद्र व्रतेSमायां ग्रसतेन्द्वर्कास्त राहुणाम्* *नित्यनैमित्यके कार्ये अग्निचक्रं न दर्शायेत् ।।* 4 + 7 + 1 = 12 ÷ 4 = 0 शेष मृत्यु लोक पर अग्नि वास हवन के लिए शुभ कारक है l *💮 शिव वास एवं फल -:* 4 + 4 + 5 = 13 ÷ 7 = 6 शेष क्रीड़ायां = शोक ,दुःख कारक *🚩भद्रा वास एवं फल -:* *स्वर्गे भद्रा धनं धान्यं ,पाताले च धनागम:।* *मृत्युलोके यदा भद्रा सर्वकार्य विनाशिनी।।* प्रातः 11:14 से रात्रि 24:17 तक स्वर्ग लोक = शुभ कारक *💮🚩 विशेष जानकारी 🚩💮* * नवरात्रि चतुर्थ दिवस कूष्मांडा पूजन *💮🚩💮 शुभ विचार 💮🚩💮* राजा राष्ट्रकृतं पापं राज्ञः पापं पुरोहितः । भर्ता च स्त्रीकृतं पापं शिष्यपापं गुरुस्तथा ।। ।।चा o नी o।। राजा को उसके नागरिको के पाप लगते है. राजा के यहाँ काम करने वाले पुजारी को राजा के पाप लगते है. पति को पत्नी के पाप लगते है. गुरु को उसके शिष्यों के पाप लगते है. *🚩💮🚩 सुभाषितानि 🚩💮🚩* गीता -: मोक्षसन्यासयोग अo-18 ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति।, भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥, हे अर्जुन! शरीर रूप यंत्र में आरूढ़ हुए संपूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है॥,61॥, *💮🚩 दैनिक राशिफल 🚩💮* देशे ग्रामे गृहे युद्धे सेवायां व्यवहारके। नामराशेः प्रधानत्वं जन्मराशिं न चिन्तयेत्।। विवाहे सर्वमाङ्गल्ये यात्रायां ग्रहगोचरे। जन्मराशेः प्रधानत्वं नामराशिं न चिन्तयेत ।। 🐏मेष व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। अप्रत्याशित लाभ हो सकता है। जुए-सट्टे व लॉटरी से दूर रहें। व्यवसाय मनोनुकूल रहेगा। विरोधी सक्रिय रहेंगे। जीवनसाथी के स्वास्थ्य की चिंता रहेगी। किसी अपने का व्यवहार समझ नहीं आएगा। सुख के साधनों पर खर्च होगा। किसी बड़ी समस्या से निजात मिलेगी। 🐂वृष फिजूलखर्ची पर नियंत्रण रखें। कर्ज लेना पड़ सकता है। अपेक्षित कार्यों में विलंब होने से मन खिन्न रहेगा। विवाद को बढ़ावा न दें। शत्रुभय रहेगा। परिवार की चिंता रहेगी। व्यवसाय ठीक चलेगा। आय में निरंतरता रहेगी। अपरिचित व्यक्ति से सावधान रहें। 👫मिथुन संतान पक्ष की चिंता रहेगी। विरोधी सक्रिय रहेंगे। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। यात्रा मनोनुकूल रहेगी। बकाया वसूली के प्रयास सफल रहेंगे। आय व रोजगार में वृद्धि होगी। मित्र व संबंधी सहायता को आगे आएंगे। मेहमानों पर व्यय होगा। जल्दबाजी न करें। 🦀कर्क घर-बाहर तनाव रहेगा। लोगों से प्रतिकूलता रहेगी। नई योजना बनेगी। कार्यप्रणाली में सुधार होगा। सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। नौकरी में अधिकार वृद्धि हो सकती है। मनोनुकूल तबादला हो सकता है। आय में निरंतरता रहेगी। अपेक्षित कार्य पूरे होंगे। 🐅सिंह तंत्र-मंत्र में रुचि बढ़ेगी। किसी मार्गदर्शक का सहयोग मिलेगा। लोगों की बातों में न आएं। कोर्ट व कचहरी में दबदबा बना रहेगा। लाभ के अवसर हाथ आएंगे। व्यवसाय में वृद्धि होगी। जल्दबाजी न करें। थकान महसूस होगी। भाग्य का साथ मिलेगा। प्रसन्नता रहेगी। 🙎कन्या चोट व दुर्घटना से हानि संभव है। पुराना रोग परेशान कर सकता है। वाणी पर नियंत्रण रखें। जोखिम व जमानत के कार्य टालें। अज्ञात भय रहेगा। नया कार्य प्रारंभ करने की योजना टालें। यात्रा में जल्दबाजी न करें। घर-बाहर अशांति रहेगी। धैर्य रखें। आय बनी रहेगी। ⚖तुला भागदौड़ अधिक रहेगी। प्रेम-प्रसंग में अनुकूलता रहेगी। कोर्ट व कचहरी के कार्य अनुकूल रहेंगे। शत्रुओं का पराभव रहेगा। अधिकार प्राप्ति के योग हैं। परिवार के सदस्यों का सहयोग मिलेगा। व्यवसाय लाभदायक चलेगा। प्रसन्नता रहेगी। आंखों में पीड़ा हो सकती है। 🦂वृश्चिक कष्ट, भय या तनाव का वातावरण बन सकता है। लेन-देन में सावधानी रखें। मकान, दुकान व जमीन खरीदने की योजना बनेगी। रोजगार प्राप्ति के प्रयास सफल रहेंगे। धनहानि हो सकती है। आय में वृद्धि होगी। जोखिम लेने का साहस कर पाएंगे। रुके कार्य पूर्ण होंगे। 🏹धनु विद्यार्थी वर्ग सफलता हासिल करेगा। पार्टी व पिकनिक का आनंद प्राप्त होगा। स्वादिष्ट भोजन का आनंद प्राप्त होगा। नौकरी में अनुकूलता प्राप्त होगी। व्यवसाय ठीक चलेगा। रोजगार में वृद्धि होगी। घर-बाहर प्रसन्नता रहेगी। जोखिम व जमानत के कार्य टालें। शुभ समय। 🐊मकर परिवार के साथ मनोरंजक यात्रा हो सकती है। रचनात्मक कार्य सफल रहेंगे। स्वादिष्ट भोजन का आनंद मिलेगा। धन प्राप्ति सुगम होगी। किसी प्रभावशाली व्यक्ति का मार्गदर्शन प्राप्त होगा। क्रोध व आलस्य पर नियंत्रण रखें। घर-बाहर प्रसन्नता रहेगी। 🍯कुंभ मेहनत की अधिकता से स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। बुरी खबर मिल सकती है। कीमती वस्तुएं संभालकर रखें। अपेक्षित कार्यों में विलंब होने से तनाव रहेगा। विवेक व धैर्य का प्रयोग करें। लाभ होगा। जोखिम व जमानत के कार्य बिलकुल न करें। 🐟मीन घर-बाहर पूछ-परख रहेगी। मेहनत का फल मिलेगा। आय में वृद्धि होगी। पारिवारिक सदस्यों व मित्रों का सहयोग प्राप्त होगा। कोई बड़ी समस्या दूर हो सकती है। प्रसन्नता में वृद्धि होगी। जल्दबाजी न करें। महत्वाकांक्षाएं बढ़ेंगी। प्रयास अधिक करें। 🙏आपका दिन मंगलमय हो🙏 🌺🌺🌺🌺🙏🌺🌺🌺🌺

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नवरात्रि का तीसरा दिन: मां चंद्रघंटा की आज होती है पूजा, ये है विधि और कथा 🔱🚩🐅 नवरात्रि का तीसरा दिन मां चंद्रघंटा को समर्पित है. इस दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है. असुरों का संहार करने के लिए मां दुर्गा ने इस रूप को धारण किया था. आइए जानते हैं पूजन विधि और कथा. नवरात्रि का तीसरा दिन: मां चंद्रघंटा की आज होती है पूजा, ये है विधि और कथा 2020: नवरात्रि के तृतीय दिवस यानि तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है. मां चंद्रघंटा को परम शांतिदायक और कल्याणकारी माना गया है. इनके मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है. इसीलिए इन्हें मां चंद्रघंटा कहा जाता है. अन्य विशेषताओं की बात करें तो इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान है. मां चंद्रघंटा देवी के दस हाथ हैं. इनके हाथों में शस्त्र-अस्त्र विभूषित हैं. इनकी सवारी सिंह है. नवरात्रि में मां चंद्रघंटा की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि जो भी व्यक्ति नवरात्रि में मां चंद्रघंटा की पूजा विधि पूर्वक करता है उसे अलौकिक ज्ञान की प्राप्ति होती है. इस देवी की पूजा और उपासना से साहस और निडरता का बोध होता है. जो व्यक्ति मां चंद्रघंटा की पूजा करते हैं उन्में मां सौम्यता और विनम्रता का भी आर्शीवाद प्रदान करती हैं. मां चंद्रघंटा की पूजा करने से रोग से भी मुक्ति मिलती है. दुर्गा चालीसा का पाठ करने से भक्तों की हर मुराद होती है पूरी, मां दुर्गा होती हैं प्रसन्न पूजा विधि पूजा प्रारंभ करने से पहले मां चंद्रघंटा को केसर और केवड़ा जल से स्नान कराएं. इसके बाद उन्हें सुनहरे रंग के वस्त्र पहनाएं. इसके बाद मां को कमल और पीले गुलाब की माला चढ़ाएं. इसके उपरांत मिष्ठान, पंचामृत और मिश्री का भोग लगाएं. मां चंद्रघंटा को प्रसन्न करने का मंत्र या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नम:। माता चंद्रघंटा की कथा पौराणिक कथा के अनुसार जब दैत्यों का आतंक बढ़ने लगा तो मां दुर्गा ने मां चंद्रघंटा का अवतार लिया. उस समय असुरों का स्वामी महिषासुर था जिसका देवताओं से भंयकर युद्ध चल रहा था. महिषासुर देव राज इंद्र का सिंहासन प्राप्त करना चाहता था. उसकी प्रबल इच्छा स्वर्गलोक पर राज करने की थी. उसकी इस इच्छा को जानकार सभी देवता परेशान हो गए और इस समस्या से निकलने का उपाय जानने के लिए भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के सामने उपस्थित हुए. देवताओं की बात को गंभीरता से सुनने के बाद तीनों को ही क्रोध आया. क्रोध के कारण तीनों के मुख से जो ऊर्जा उत्पन्न हुई. उससे एक देवी अवतरित हुईं. जिन्हें भगवान शंकर ने अपना त्रिशूल और भगवान विष्णु ने चक्र प्रदान किया. इसी प्रकार अन्य देवी देवताओं ने भी माता के हाथों मेें अपने अस्त्र सौंप दिए. देवराज इंद्र ने देवी को एक घंटा दिया. सूर्य ने अपना तेज और तलवार दी, सवारी के लिए सिंह प्रदान किया. इसके बाद मां चंद्रघंटा महिषासुर के पास पहुंची. मां का ये रूप देखकर महिषासुर को ये आभास हो गया कि उसका काल आ गया है. महिषासुर ने मां पर हमला बोल दिया. इसके बाद देवताओं और असुरों में भंयकर युद्ध छिड़ गया. मां चंद्रघंटा ने महिषासुर का संहार किया. इस प्रकार मां ने देवताओं की रक्षा की.

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Nitin Kharbanda Mar 27, 2020

तुलसी कौन थी? तुलसी(पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था, राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी.बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी.जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था. वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी. एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा``` - स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठ कर``` आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प नही छोडूगी। जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी, उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये। सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता । फिर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है। भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए,जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है? उन्होंने पूँछा - आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये। सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्रार्थना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गयी। उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे। और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है। देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है !

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Laxman Singh solanki Mar 26, 2020

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