Arun Kumar Sharma
Arun Kumar Sharma Jan 20, 2021

✍एक साधु महाराज श्री रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। साधु महाराज का नियम था, रोज कथा शुरू करने से पहले "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे। एक वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई। उन्हें लगा कि महाराज रोज "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहते हैं, तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे ? अत: वकील साहब ने महात्मा जी से पूछ ही डाला! महाराज जी आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं, हमें बड़ा रस आता है, परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उस पर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं ? साधु महाराज ने कहा: हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है, कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं। वकील ने कहा: महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी, हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए। आपको साबित करके दिखाना चाहिए, कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं। महाराज जी ने बहुत समझाया, कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए, यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है, व्यक्तिगत श्रद्धा का विषय है। आप कहो तो मैं प्रवचन करना बंद कर दूँ, या आप कथा में आना छोड़ दो। लेकिन वकील नहीं माना। कहता ही रहा, कि आप कई दिनों से दावा करते आ रहे हैं। यह बात और स्थानों पर भी कहते होंगे, इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा, कि हनुमान जी कथा सुनने आते हैं। इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा। मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया। हार कर साधु महाराज ने कहा... हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा। कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा। जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना, कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा। कथा से पहले हनुमानजी को बुलाएंगे, फिर आप गद्दी ऊँची उठाना। यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं। वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया। महाराज ने कहा: हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ? यह तो सत्य की परीक्षा है। वकील ने कहा: मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा ले लूंगा। आप पराजित हो गए तो क्या करोगे ? साधु ने कहा: मैं कथा वाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा। अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग रोजाना कथा सुनने नहीं आते थे, वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए, काफी भीड़ हो गई, पंडाल भर गया। श्रद्धा और विश्वास का प्रश्न जो था। साधु महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में पधारे। गद्दी रखी गई। महात्मा जी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले: "आइए हनुमंत जी बिराजिए" ऐसा बोलते ही साधु महाराज के नेत्र सजल हो उठे। मन ही मन साधु बोले... प्रभु! आज मेरा प्रश्न नहीं, बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है। मैं तो एक साधारण जन हूँ। मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना। फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया गया, आइए गद्दी ऊँची कीजिए। लोगों की आँखे जम गईं। वकील साहब खड़े हुए। उन्होंने गद्दी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके! जो भी कारण रहा, उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया, किन्तु तीनों बार असफल रहे। महात्मा जी देख रहे थे, गद्दी को पकड़ना तो दूर वकील साहब गद्दी को छू भी न सके। तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए। वकील साहब साधु महाराज के चरणों में गिर पड़े और बोले, महाराज गद्दी उठाना तो दूर, मुझे नहीं मालूम कि क्यों मेरा हाथ भी गद्दी तक नहीं पहुंच पा रहा है। अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूं। कहते है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है। मानो तो देव नहीं तो पत्थर। प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है, *लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है, और हमारे प्राण तो हमारे भीतर होते है, वहीं पुजारी रूपी सदगुरू उसे प्रतिष्ठित करते हैं तब प्रभु सदैव के लिए घट भीतर ही बिराजते है।* 🌹🌹#जय_श्री_हनुमानजी🌹🌹 🌹🌹#जय_श्री_राम जी🌹🌹 -

✍एक साधु महाराज श्री रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। साधु महाराज का नियम था, रोज कथा शुरू करने से पहले "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे।
एक वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई। उन्हें लगा कि महाराज रोज "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहते हैं, तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे ?
अत: वकील साहब ने महात्मा जी से पूछ ही डाला! महाराज जी आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं, हमें बड़ा रस आता है, परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उस पर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं ?

साधु महाराज ने कहा: हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है, कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं।
वकील ने कहा: महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी, हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए। आपको साबित करके दिखाना चाहिए, कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं।
महाराज जी ने बहुत समझाया, कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए, यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है, व्यक्तिगत श्रद्धा का विषय है। आप कहो तो मैं प्रवचन करना बंद कर दूँ, या आप कथा में आना छोड़ दो।
लेकिन वकील नहीं माना। कहता ही रहा, कि आप कई दिनों से दावा करते आ रहे हैं। यह बात और स्थानों पर भी कहते होंगे, इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा, कि हनुमान जी कथा सुनने आते हैं।
इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा। मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया। हार कर साधु महाराज ने कहा... हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा। 
कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा।
जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना, कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा।
कथा से पहले हनुमानजी को बुलाएंगे, फिर आप गद्दी ऊँची उठाना। यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं। वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया।
महाराज ने कहा: हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ? यह तो सत्य की परीक्षा है।
वकील ने कहा: मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा ले लूंगा। आप पराजित हो गए तो क्या करोगे ?
साधु ने कहा: मैं कथा वाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा।
अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग रोजाना कथा सुनने नहीं आते थे, वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए, काफी भीड़ हो गई, पंडाल भर गया। श्रद्धा और विश्वास का प्रश्न जो था।
साधु महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में पधारे। गद्दी रखी गई।
महात्मा जी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले: "आइए हनुमंत जी बिराजिए" ऐसा बोलते ही साधु महाराज के नेत्र सजल हो उठे। मन ही मन साधु बोले... प्रभु! आज मेरा प्रश्न नहीं, बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है। मैं तो एक साधारण जन हूँ। मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना।
फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया गया, आइए गद्दी ऊँची कीजिए। लोगों की आँखे जम गईं। वकील साहब खड़े हुए।
उन्होंने गद्दी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके! जो भी कारण रहा, उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया, किन्तु तीनों बार असफल रहे।
महात्मा जी देख रहे थे, गद्दी को पकड़ना तो दूर वकील साहब गद्दी को छू भी न सके। तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए। वकील साहब साधु महाराज के चरणों में गिर पड़े और बोले, महाराज गद्दी उठाना तो दूर, मुझे नहीं मालूम कि क्यों मेरा हाथ भी गद्दी तक नहीं पहुंच पा रहा है।
अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूं।
कहते है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है। मानो तो देव नहीं तो पत्थर।
प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है, *लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है, और हमारे प्राण तो हमारे भीतर होते है, वहीं पुजारी रूपी सदगुरू उसे प्रतिष्ठित करते हैं तब प्रभु सदैव के लिए घट भीतर ही बिराजते है।*

🌹🌹#जय_श्री_हनुमानजी🌹🌹

🌹🌹#जय_श्री_राम जी🌹🌹
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✍एक साधु महाराज श्री रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। साधु महाराज का नियम था, रोज कथा शुरू करने से पहले "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे।
एक वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई। उन्हें लगा कि महाराज रोज "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहते हैं, तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे ?
अत: वकील साहब ने महात्मा जी से पूछ ही डाला! महाराज जी आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं, हमें बड़ा रस आता है, परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उस पर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं ?

साधु महाराज ने कहा: हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है, कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं।
वकील ने कहा: महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी, हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए। आपको साबित करके दिखाना चाहिए, कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं।
महाराज जी ने बहुत समझाया, कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए, यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है, व्यक्तिगत श्रद्धा का विषय है। आप कहो तो मैं प्रवचन करना बंद कर दूँ, या आप कथा में आना छोड़ दो।
लेकिन वकील नहीं माना। कहता ही रहा, कि आप कई दिनों से दावा करते आ रहे हैं। यह बात और स्थानों पर भी कहते होंगे, इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा, कि हनुमान जी कथा सुनने आते हैं।
इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा। मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया। हार कर साधु महाराज ने कहा... हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा। 
कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा।
जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना, कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा।
कथा से पहले हनुमानजी को बुलाएंगे, फिर आप गद्दी ऊँची उठाना। यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं। वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया।
महाराज ने कहा: हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ? यह तो सत्य की परीक्षा है।
वकील ने कहा: मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा ले लूंगा। आप पराजित हो गए तो क्या करोगे ?
साधु ने कहा: मैं कथा वाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा।
अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग रोजाना कथा सुनने नहीं आते थे, वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए, काफी भीड़ हो गई, पंडाल भर गया। श्रद्धा और विश्वास का प्रश्न जो था।
साधु महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में पधारे। गद्दी रखी गई।
महात्मा जी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले: "आइए हनुमंत जी बिराजिए" ऐसा बोलते ही साधु महाराज के नेत्र सजल हो उठे। मन ही मन साधु बोले... प्रभु! आज मेरा प्रश्न नहीं, बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है। मैं तो एक साधारण जन हूँ। मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना।
फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया गया, आइए गद्दी ऊँची कीजिए। लोगों की आँखे जम गईं। वकील साहब खड़े हुए।
उन्होंने गद्दी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके! जो भी कारण रहा, उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया, किन्तु तीनों बार असफल रहे।
महात्मा जी देख रहे थे, गद्दी को पकड़ना तो दूर वकील साहब गद्दी को छू भी न सके। तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए। वकील साहब साधु महाराज के चरणों में गिर पड़े और बोले, महाराज गद्दी उठाना तो दूर, मुझे नहीं मालूम कि क्यों मेरा हाथ भी गद्दी तक नहीं पहुंच पा रहा है।
अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूं।
कहते है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है। मानो तो देव नहीं तो पत्थर।
प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है, *लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है, और हमारे प्राण तो हमारे भीतर होते है, वहीं पुजारी रूपी सदगुरू उसे प्रतिष्ठित करते हैं तब प्रभु सदैव के लिए घट भीतर ही बिराजते है।*

🌹🌹#जय_श्री_हनुमानजी🌹🌹

🌹🌹#जय_श्री_राम जी🌹🌹
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श्रीमद्देवीभागवत (तीसरा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 16 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ राजकुमार सुदर्शन को मारने के लिये युधाजित् का भरद्वाजाश्रम पर जाना, मुनि से मनोरमा तथा सुदर्शन को बलपूर्वक छीन ले जाने की बात कहना तथा मुनि का रहस्यभरा उत्तर देना, ... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं-युद्ध समाप्त हो जाने पर महाबली युधाजित् लड़ाई के मैदान से लौटकर अयोध्या पहुँचा। जाते ही वध कर डालने की इच्छा से मनोरमा और सुदर्शन को खोजने लगा। 'वह कहाँ चली गयी'–यों बार-बार कहते हुए उसने बहुत-से सेवक इधर-उधर दौड़ाये। फिर एक अच्छा दिन देखकर अपने दौहित्र शत्रुजित् को राजगद्दी पर बैठाने की व्यवस्था की। अथर्ववेद के पावन मन्त्रों का उच्चारण करके जल से भरे हुए सम्पूर्ण कलशों से शत्रुजित् का अभिषेक हुआ। कुरुनन्दन! उस समय भेरी, शंख और तुरही आदि बाजों की ध्वनि से नगर में खूब उत्सव मनाया गया। ब्राह्मण वेद पढ़ते थे। वन्दीगण स्तुतिगान कर रहे थे और सर्वत्र जयध्वनि गूँज रही थी। ऐसा जान पड़ता था, मानो अयोध्यापुरी हँस रही है। उस नये नरेश की राजगद्दी होने पर हृष्ट पुष्ट मनुष्यों से भरी-पूरी तथा स्तुति और बाजों की ध्वनि से निनादित वह अयोध्या एक नवीन पुरी-सी जान पड़ती थी। कुछ सज्जन पुरुष ही अपने घरों में रहकर शोक मनाते थे। वे सोचते थे-'ओह! आज राजकुमार सुदर्शन कहाँ भटक रहा होगा। वह परम साध्वी रानी मनोरमा अपने पुत्र के साथ कहाँ चली गयी। उसके महात्मा पिता वीरसेन तो राज्यलोभी वैरी युधाजित् के हाथ युद्ध में मारे ही गये ।' इस प्रकार चिन्तित रहकर सबमें समान बुद्धि रखने वाले वे सज्जन पुरुष बड़े कष्ट से समय व्यतीत करते थे। शत्रुजित् का शासन मानना उनके लिये अनिवार्य था। यों युधाजित् ने दौहित्र शत्रुजित् को विधिपूर्वक राजगद्दी पर बैठाकर मन्त्रियों को कार्यभार सौंप दिया और स्वयं उज्जयिनी नगरी को चला गया। वहाँ पहुँचने पर उसे समाचार मिला कि सुदर्शन मुनियों के आश्रम पर ठहरा है। फिर तो उसे मारने के लिये वह दुष्ट चित्रकूट के लिये चल पड़ा। उस समय शृंगवेरपुर में दुर्दर्श नामक एक निषाद राज्य करता था। वह बड़ा बली और शूरवीर था। युधाजित् उसे अपना अगुआ बनाकर शीघ्र ही चल दिया। 'युधाजित् सेना सहित आ रहा है'-यह सुनकर मनोरमा के मन में महान् क्लेश हुआ। छोटे-से कुमार की सँभाल करने वाली स्नेहमयी माता भय से घबरा उठी। आँखों से आँसू गिराती हुई अत्यन्त चिन्तित होकर उसने मुनिवर भरद्वाज से कहा - 'मुनिजी! अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ ? युधाजित् यहाँ भी पहुँच गया। इसने मेरे पिता को मारने के पश्चात् अपने दौहित्र शत्रुजित् को राजा बना दिया और अब मेरे इस नन्हें से पुत्र का वध करने के लिये सेनासहित यहाँ आ रहा है। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ चतुर्थः स्कन्ध: अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः पुरञ्जनोपाख्यान का तात्पर्य...(भाग 2)〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ प्रवृत्तं च निवृत्तं च शास्त्रं पञ्ञचालसंज्ञितम् । पितृयानं देवयानं श्रोत्राच्छुतधराद्व्रजेत् ॥ १३ आसुरी मेढ़मर्वाग्द्वाळवायो ग्रामिणां रतिः। उपस्थो दुर्मदः प्रोक्तो निर्रतिर्गुद उच्यते ॥ १४ वैशसं नरकं पायुर्लुब्यको ऽन्धौ तु मे श्रृणु । हस्तपादौ पुमांस्ताभ्यां युक्तो याति करोति च ॥ १५ अन्तःपुरं च हृदयं विषूचिर्मन उच्यते । तत्र मोहं प्रसादं वा हर्ष प्राप्नोति तद्गुणैः ॥ १६ यथा यथा विक्रियते गुणाक्तो विकरोति वा। तथा तथोपद्रष्टाऽऽत्मा तद्वृत्तीरनुकार्यते ।॥ १७ देहो रथस्त्विन्द्रियाश्वः संवत्सररयोऽगतिः । द्विकर्मचक्रस्त्रिगुणध्वजः पञ्चासुबन्धुरः ॥ १८ मनोरश्मिर्बुद्धिसूतो हन्नीडो द्वन्द्रकूबरः पञ्चेन्द्रियार्थप्रक्षेपः सप्तधातुवरूथकः ॥ १९ आकूतिर्विक्रमो बाह्यो मृगतृष्णां प्रधावति। एकादंशेन्द्रियचमूः पञ्चसूनाविनोदकृत् ।। २० संवत्सरश्चण्डवेगः कालो येनोपलक्षितः । तस्याहानीह गन्धर्वा गन्धव्य्यो रात्रयः स्मृताः । हरन्त्यायुः परिक्रान्त्या षष्ट्युत्तरशतत्रयम्॥ २१ कालकन्या जरा साक्षाल्लोकस्तां नाभिनन्दति । स्वसारं जगृहे मृत्युः क्षयाय यवनेश्वरः ॥ २२ आधयो व्याधयस्तस्य सैनिका यवनाश्चराः। भूतोंपसर्गाशुरयः प्रज्वारो द्विविधो ज्वरः ॥ २३ एवं बहुविधैर्दुःखैर्दैवभूतात्मसम्भवैः । क्लिश्यमानः शतं वर्ष देहे देही तमोवृतः ॥ २४ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ कर्मकाण्डरूप प्रवृत्तिमार्ग का शास्त्र और उपासनाकाण्डरूप निवृत्तिमार्ग का शास्त्र ही क्रमशः दक्षिण और उत्तर पाञ्चाल देश हैं। इन्हें श्रवणेन्द्रियरूप श्रुतधर की सहायता से सुनकर जीव क्रमशः पितृयान और देवयान मार्गों में जाता है । १३ ॥ लिङ्ग ही आसुरी नाम का पश्चिमी द्वार है, स्त्रीप्रसङ्ग ग्रामक नाम का देश है और लिङ्ग में रहने वाला उपस्थेन्द्रिय दुर्मद नाम का मित्र है। गुदा नित्ति नाम का पश्चिमी द्वार है ।। १४ ॥ नरक वैशस नाम का देश है और गुदा में स्थित पायु-इन्द्रिय लुब्धक नाम का मित्र है। इनके सिवा दो पुरुष अंधे बताये गये थे, उनका रहस्य भी सुनो । वे हाथ और पाँव हैं; इन्हीं की सहायता से जीव क्रमशः सब काम करता और जहाँ-तहाँ जाता है।। १५ ।। हृदय अन्तःपुर है, उसमें रहने वाला मन ही विषूचि (विषूचीन) नाम का प्रधान सेवक है। जीव उस मन के सत्त्वादि गुणों के कारण ही प्रसन्नता, हर्षरूप विकार अथवा मोह को प्राप्त होता है।। १६ ।॥ बुद्धि (राजमहिषी पुरञ्जनी) जिस-जिस प्रकार स्वप्नावस्था में विकार को प्राप्त होती है और जाग्रत्-अवस्था में इन्द्रियादि को विकृत करती है, उसके गुणोंसे लिप्त होकर आत्मा (जीव) भी उसी-उसी रूप में उसकी वृत्तियों का अनुकरण करने को बाध्य होता है-यद्यपि वस्तुतः वह उनका निर्विकार साक्षीमात्र ही है।। १७ ॥ शरीर ही रथ है। उसमें ज्ञानेन्द्रियरूप पाँच घोड़े जुते हुए हैं। देखने में संवत्सररूप काल के समान ही उसका अप्रतिहत वेग है, वास्तव में वह गतिहीन है। पुण्य और पाप ये दो प्रकार के कर्म ही उसके पहिये हैं, तीन गुण ध्वजा हैं, पाँच प्राण डोरियाँ हैं १८ ॥ मन बागडोर है, बुद्धि सारथि है, हृदय बैठने का स्थान है, सुख-दुःखादि द्वन्द्र जुए हैं, इन्द्रियों के पाँच विषय उसमें रखे आयुध हैं और त्वचा हुए आदि सात धातुएँ उसके आवरण हैं। १९ ॥ पाँच कर्मेन्द्रियाँ उसकी पाँच प्रकार की गति हैं। इस रथपर चढ़कर रथीरूप यह जीव मृगतृष्णा के समान मिथ्या विषयों की ओर दौड़ता है। ग्यारह इन्द्रियाँ उसकी सेना हैं तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा उन-उन इन्द्रियों के विषयों को अन्यायपूर्वक ग्रहण करना ही उसका शिकार खेलना है।॥ २० ॥ जिसके द्वारा काल का ज्ञान होता है, वह संवत्सर ही चण्डवेग नामक गन्धर्वराज है। उसके अधीन जो तीन सौ साठ गन्धर्व बताये गये थे, वे दिन हैं और तीन सौ साठ गन्ध्वियाँ रात्रि हैं। ये बारी-बारी से चक्कर लगाते हुए मनुष्य को आयु को हरते रहते हैं |॥ २१ ॥ वृद्धावस्था ही साक्षात् कालकन्या है, उसे कोई भी पुरुष पसंद नहीं करता। तब मृत्युरूप यवनराज ने लोक का संहार करने के लिये उसे बहिन मानकर स्वीकार कर लिया ।। २२ ।। आधि (मानसिक क्लेश) और व्याधि (रोगादि शारीरिक कष्ट) ही उस यवनराज के पैदल चलनेवाले सैनिक हैं तथा प्राणियों को पीड़ा पहुँचाकर शीघ्र ही मृत्यु के मुख में ले जाने वाला शीत और उष्ण दो प्रकार का ज्वर ही प्रज्वार नाम का उसका भाई है।॥ २३ ।। इस प्रकार यह देहाभिमानी जीव अज्ञान से आच्छादित होकर अनेक प्रकार के आधिभौतिक, आध्यात्मिक और आधिदैविक कष्ट भोगता हुआ सौ वर्ष-तक मनुष्यशरीर में पड़ा रहता है ।। २४ ।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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alok Saxena Feb 28, 2021

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (पंद्रहवां दिन) व्रतोपवास की महिमा में शकटव्रत की कथा...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज ! मैंने जो भीषण नरकों का विस्तार से वर्णन किया है, उन्हें व्रत-उपवासरूपी नौका से मनुष्य पार कर सकता है। प्राणी को अति दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाकर ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे पश्चात्ताप न करना पड़े और यह जन्म भी व्यर्थ न जाय एवं फिर जन्म भी न लेना पड़े। जिस मनुष्य की कीर्ति, दान, व्रत, उपवास आदि की परम्परा बनी है, वह परलोक में उन्हीं कर्मों के द्वारा सुख भोगता है। व्रत तथा स्वाध्याय न करने वाले की कहीं भी गति नहीं है। इसके विपरीत व्रत-स्वाध्याय करने वाले पुरुष सदा सुखी होते हैं। इसलिये व्रत-स्वाध्याय अवश्य करने चाहिये राजन् ! यहाँ एक प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ-योग को सिद्ध किया हुआ एक सिद्ध अति भयंकर विकृत रूप धारण कर पृथ्वी पर विचरण करता था। उसके लम्बे ओंठ, टूटे दाँत, पिङ्गल नेत्र, चपटे कान, फटा मुख, लम्बा पेट, टेढ़े पैर और सम्पूर्ण अङ्ग कुरूप थे। उसे मूलजालिक नाम के एक ब्राह्मण ने देखा और उससे पूछा कि आप स्वर्ग से कब आये और किस प्रयोजन से यहाँ आपका आगमन हुआ? क्या आपने देवताओं के चित्त को मोहित करने वाली और स्वर्ग की अलंकार-स्वरूपिणी रम्भा को देखा है? अब आप स्वर्ग में जायँ तो रम्भा से कहें कि अवन्तिपुरी का निवासी ब्राह्मण तुम्हारा कुशल पूछता था। ब्राह्मण का वचन सुनकर सिद्ध ने चकित हो पूछा कि 'ब्राह्मण! तुमने मुझे कैसे पहचाना ?' तब ब्राह्मण ने कहा कि 'महाराज ! कुरूप पुरुषों के एक-दो अङ्ग विकृत होते हैं, पर आपके सभी अङ्ग टेढ़े और विकृत हैं।' इसी से मैंने अनुमान किया कि इतना रूप गुप्त किये कोई स्वर्ग के निवासी सिद्ध ही हैं। ब्राह्मण का वचन सुनते ही वह सिद्ध वहाँ से अन्तर्धान हो गया और कई दिनों के बाद पुनः ब्राह्मण के समीप आया और कहने लगा-'ब्राह्मण! हम स्वर्ग में गये और इन्द्र की सभा में जब नृत्य हो चुका, उसके बाद मैंने एकान्त में रम्भा से तुम्हारा संदेश कहा, परंतु रम्भा ने यह कहा कि मैं उस ब्राह्मण को नहीं जानती। यहाँ तो उसी का नाम जानते हैं जो निर्मल विद्या, पौरुष, दान, तप, यज्ञ अथवा व्रत आदि से युक्त होता है। उसका नाम स्वर्ग घर में चिरकाल तक स्थिर रहता है।' रम्भा का सिद्ध के मुख से यह वचन सुनकर ब्राह्मण ने कहा कि हम शकटव्रत को नियम से करते हैं, आप रम्भा से कह दीजिये। यह सुनते ही सिद्ध फिर अन्तर्धान हो गया और स्वर्ग में जाकर उसने रम्भा से ब्राह्मण का संदेश कहा और जब उसने उसके गुण वर्णन किये तब रम्भा प्रसन्न होकर कहने लगी-'सिद्ध महाकाल! मैं वनके निवासी उस शकट ब्रह्मचारी को जानती हूँ। दर्शन से, सम्भाषण से, एकत्र निवास से और उपकार करने से मनुष्यों का परस्पर स्नेह होता है, परंतु मुझे उस ब्राह्मण का दर्शन-सम्भाषण आदि कुछ भी नहीं हुआ। केवल नाम-श्रवण से इतना स्नेह हो गया है।' सिद्ध से इतना कहकर रम्भा इन्द्र के समीप गयी और ब्राह्मण के व्रत आदि करने तथा अपने ऊपर अनुरक्त होने का वर्णन किया। इन्द्रने भी प्रसन्न हो रम्भा से पूछकर उस उत्तम ब्राह्मण को वस्त्राभूषण आदि से अलंकृत कर दिव्य विमान में बैठाकर स्वर्ग में बुलाया वहाँ सत्कारपूर्वक स्वर्ग के दिव्य भोगों को उसे प्रदान किया। ब्राह्मण चिरकाल तक वहाँ दिव्य भोग भोगता रहा। यह शकट-व्रत का माहात्म्य हमने संक्षेप में वर्णन किया है। दृढ़व्रती पुरुष के लिये राजलक्ष्मी, वैकुण्ठलोक, मनोवाञ्छित फल आदि दुर्लभ पदार्थ भी जगत् में सुलभ हैं। इसलिये सदा सत्परायण पुरुष को व्रत में संलग्न रहना चाहिये। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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Neeta Trivedi Feb 27, 2021

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