sn.vyas
sn.vyas Mar 4, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *चित्त के दर्पण को भगवान की भक्ति के* *जल से स्वच्छ कीजिए और तब आपको बिना* *परिश्रम के ही चिन्मय तत्त्व दिखाई दे जाएगा।* °"" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" ""° रामचरितमानस में वेद भगवान की स्तुति करते हुए कहा गया है कि वृक्ष को ऊपर से अगर कोई देखे तो उसे वृक्ष का एक बड़ा भाग तो दिखाई देता है परन्तु वृक्ष का मूल नहीं दिखाई देता। पर जो वृक्ष के मूल को देखना चाहे तो उसे सबसे पहले यह जानना होगा कि इसका मूल तो पृथ्वी की आड़ में छिपा हुआ है। जब व्यक्ति की दृष्टि ऊपर की ओर नहीं बल्कि नीचे पैठती है तब वह मूल को पहचान पाता है। इसलिए वेद भगवान की स्तुति करते हुए कहते हैं— *'अव्यक्त मूल'* -- प्रभु ! सृष्टि तो दिखाई दे रही है व्यक्त, पर वस्तुतः इसके मूल में अव्यक्त आप ही हैं। जो अव्यक्त है वही अपने आपको सृष्टि के रूप में व्यक्त कर देता है। *अव्यक्त मूलमनादि तरु त्वचचारि निगमागम मने।* *षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने ॥* *फल जुगुल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।* *पल्लवत फूलत नवल नित संसार विटप नमामहे ॥* हे प्रभु ! संसार-वृक्ष तो आप ही हैं, हम आपको प्रणाम करते हैं। व्यक्ति की समस्या है कि वह व्यक्त को देख लेता है पर अव्यक्त को नहीं देख पाता। ब्रह्मा व्यक्त हैं और उनका जो मूल तत्त्व है वह है अव्यक्त, तो फिर वह दिखाई कैसे दे ? रामायण में इसका सूत्र देते हुए कहा गया कि अगर आप संसार में भी किसी की रचना का रहस्य जानना चाहें तो आपको उसके निर्माता से ही यह जानने को मिलता है कि उसने उस वस्तु का निर्माण कैसे किया। इसी प्रकार हम संसार के निर्माण का रहस्य जानना चाहें तो हमें भी उस पद्धति का आश्रय लेना होगा। किन्तु जानने की प्रक्रिया में वैज्ञानिकों तथा भक्तों की शैली में अन्तर है। वैज्ञानिक यन्त्र के माध्यम से शोध करके मूल की खोज कर रहा है। उस शोध में वह ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता जाता है, मूल में उसे जड़ ही दिखाई देता है। जड़ के पीछे जो चेतन तत्त्व है वह नहीं दिखाई देता। क्योंकि यन्त्र के द्वारा जड़ वस्तु तो दिखाई दे सकती है पर जो चेतन तत्त्व है वह भला कैसे दिखाई देगा ? भक्त जानते हैं कि यह रचना तो भगवान की है इसलिए उन्हीं से कहते हैं कि महाराज ! आप ही अपना भेद खोल दो कि इसे आपने कैसे बनाया ? इस सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध वाक्य कहा गया कि -- *जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे।* *बिधि हरि संभु नचावनिहारे ॥* *तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा।* *और तुम्हहि को जाननिहारा॥* -- ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी आपके रहस्य को नहीं जानते तो भला दूसरा कैसे जानेगा ? अब यहाँ पर यह प्रश्न किया जा सकता है कि जिसको कोई नहीं जानता उसके होने का प्रमाण क्या है ? परन्तु महर्षि वाल्मीकि ने कहा -- महाराज ! व्यक्ति अपनी बुद्धि और क्षमता से जानना चाहे तब तो नहीं जान सकता पर जानने का दूसरा उपाय अत्यन्त सरल है और वह उपाय यह है कि : *“सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।"* आप स्वयं अपना रहस्य जिसको जनाना चाहें वह जान लेता है। इसलिए भाई जड़ की खोज बड़ी लम्बी है। जड़ स्वयं तो बोलेगा नहीं, हाँ जड़ के द्वारा आप जो भी निष्कर्ष निकालना चाहें निकाल लीजिए। पर जड़ के मूल में जो चैतन्य तथा अव्यक्त तत्त्व है उस अव्यक्त तत्त्व को जब कोई उससे ही जान लेता है तो उसका परिणाम यह होता है कि वह भी चिन्मय चैतन्य हो जाता है। *“जानत तुम्हहि तुम्हहि होइ जाई।"* -- गोस्वामीजी ने उस चिन्मय तत्त्व की अनुभूति की जानकारी का उपाय बतलाते हुए कहा कि पहले अपने चित्त के दर्पण को भगवान की भक्ति के जल से स्वच्छ कीजिए और तब आपको बिना परिश्रम के ही दिखाई दे जाएगा। *रघुपति-भगति-बारि छालित चित बिनु प्रयास ही सूझै।* वस्तुतः बुद्धि के द्वारा कोई उनके रहस्य को जान नहीं पाता क्योंकि बुद्धि ससीम है और ब्रह्म असीम है। इसलिए हम अगर उसका ज्ञान प्राप्त करना चाहें तो उसके मूल में प्रेम और भक्ति ही हो सकती है। 👏 🌳💕 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!.........
         ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।।
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    *चित्त के दर्पण को भगवान की भक्ति के*
 *जल से स्वच्छ कीजिए और तब आपको बिना*
 *परिश्रम के ही चिन्मय तत्त्व दिखाई दे जाएगा।*
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      रामचरितमानस में वेद भगवान की स्तुति करते हुए कहा गया है कि वृक्ष को ऊपर से अगर कोई देखे तो उसे वृक्ष का एक बड़ा भाग तो दिखाई देता है परन्तु वृक्ष का मूल नहीं दिखाई देता। पर जो वृक्ष के मूल को देखना चाहे तो उसे सबसे पहले यह जानना होगा कि इसका मूल तो पृथ्वी की आड़ में छिपा हुआ है। जब व्यक्ति की दृष्टि ऊपर की ओर नहीं बल्कि नीचे पैठती है तब वह मूल को पहचान पाता है। इसलिए वेद भगवान की स्तुति करते हुए कहते हैं— *'अव्यक्त मूल'* -- प्रभु ! सृष्टि तो दिखाई दे रही है व्यक्त, पर वस्तुतः इसके मूल में अव्यक्त आप ही हैं। जो अव्यक्त है वही अपने आपको सृष्टि के रूप में व्यक्त कर देता है।
*अव्यक्त मूलमनादि तरु त्वचचारि निगमागम मने।*
*षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने ॥*
*फल जुगुल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।*
*पल्लवत फूलत नवल नित संसार विटप नमामहे ॥*
      हे प्रभु ! संसार-वृक्ष तो आप ही हैं, हम आपको प्रणाम करते हैं। व्यक्ति की समस्या है कि वह व्यक्त को देख लेता है पर अव्यक्त को नहीं देख पाता। ब्रह्मा व्यक्त हैं और उनका जो मूल तत्त्व है वह है अव्यक्त, तो फिर वह दिखाई कैसे दे ? रामायण में इसका सूत्र देते हुए कहा गया कि अगर आप संसार में भी किसी की रचना का रहस्य जानना चाहें तो आपको उसके निर्माता से ही यह जानने को मिलता है कि उसने उस वस्तु का निर्माण कैसे किया। इसी प्रकार हम संसार के निर्माण का रहस्य जानना चाहें तो हमें भी उस पद्धति का आश्रय लेना होगा। किन्तु जानने की प्रक्रिया में वैज्ञानिकों तथा भक्तों की शैली में अन्तर है। वैज्ञानिक यन्त्र के माध्यम से शोध करके मूल की खोज कर रहा है। उस शोध में वह ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता जाता है, मूल में उसे जड़ ही दिखाई देता है। जड़ के पीछे जो चेतन तत्त्व है वह नहीं दिखाई देता। क्योंकि यन्त्र के द्वारा जड़ वस्तु तो दिखाई दे सकती है पर जो चेतन तत्त्व है वह भला कैसे दिखाई देगा ?
      भक्त जानते हैं कि यह रचना तो भगवान की है इसलिए उन्हीं से कहते हैं कि महाराज ! आप ही अपना भेद खोल दो कि इसे आपने कैसे बनाया ? इस सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध वाक्य कहा गया कि --
   *जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे।*
   *बिधि हरि संभु नचावनिहारे ॥*
   *तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा।*
   *और तुम्हहि को जाननिहारा॥*
   -- ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी आपके रहस्य को नहीं जानते तो भला दूसरा कैसे जानेगा ? अब यहाँ पर यह प्रश्न किया जा सकता है कि जिसको कोई नहीं जानता उसके होने का प्रमाण क्या है ? परन्तु महर्षि वाल्मीकि ने कहा -- महाराज ! व्यक्ति अपनी बुद्धि और क्षमता से जानना चाहे तब तो नहीं जान सकता पर जानने का दूसरा उपाय अत्यन्त सरल है और वह उपाय यह है कि : 
      *“सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।"*
      आप स्वयं अपना रहस्य जिसको जनाना चाहें वह जान लेता है। इसलिए भाई जड़ की खोज बड़ी लम्बी है। जड़ स्वयं तो बोलेगा नहीं, हाँ जड़ के द्वारा आप जो भी निष्कर्ष निकालना चाहें निकाल लीजिए। पर जड़ के मूल में जो चैतन्य तथा अव्यक्त तत्त्व है उस अव्यक्त तत्त्व को जब कोई उससे ही जान लेता है तो उसका परिणाम यह होता है कि वह भी चिन्मय चैतन्य हो जाता है। *“जानत तुम्हहि तुम्हहि होइ जाई।"* -- गोस्वामीजी ने उस चिन्मय तत्त्व की अनुभूति की जानकारी का उपाय बतलाते हुए कहा कि पहले अपने चित्त के दर्पण को भगवान की भक्ति के जल से स्वच्छ कीजिए और तब आपको बिना परिश्रम के ही दिखाई दे जाएगा।
*रघुपति-भगति-बारि छालित चित बिनु प्रयास ही सूझै।*
    वस्तुतः बुद्धि के द्वारा कोई उनके रहस्य को जान नहीं पाता क्योंकि बुद्धि ससीम है और ब्रह्म असीम है। इसलिए हम अगर उसका ज्ञान प्राप्त करना चाहें तो उसके मूल में प्रेम और भक्ति ही हो सकती है। 👏
    🌳💕 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

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lndu Malhotra Mar 4, 2021
JAi Shri Krishna Damodram RAM Narayan Vishnu Balabham Laxmi Narayan Hari Om JAI JAIJAI JAI

sn.vyas Apr 19, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *स्वयं अपने लिए कर्तव्य तथा मार्ग* *का निर्णय हम करें तो* *किस आधार को केन्द्र बनाकर करें ?* °"" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" ""° इस सन्दर्भ में गोस्वामीजी तथा भगवान राम का बड़ा अनोखा सम्वाद विनय-पत्रिका में हुआ। गोस्वामीजी भगवान से कहने लगे कि आप से मैं सम्बन्ध जोड़ना चाहता हूँ। प्रभु ने जानना चाहा कौन-सा सम्बन्ध जोड़ना चाहते हो ? तो लगे गिनाने -- *ब्रह्म तू हौं जीव* -- आप ब्रह्म हैं मैं जीव हूँ -- *तू ठाकुर हौं चेरो* -- आप स्वामी हैं मैं सेवक हूँ। *तात मातु गुरु सखा तू सब विधि हितू मेरो।* आप पिता हैं, मैं पुत्र हूँ, आप माँ हैं मैं बेटा हूँ, आप मेरे मित्र हैं मैं आपका मित्र हूँ। और यहाँ तक कह दिया कि -- *नाथ तू अनाथ को अनाथ कौन मो सों* *मो समान आरत नहिं आरत हर तो सों।।* -- जब इतना गिना गए तो गोस्वामी जी से भगवान ने मुस्कुराकर पूछा -- यह तो तुमने बड़ी लम्बी सूची प्रस्तुत कर दी। किन्तु यह बताओ तुम हमारे और अपने बीच में इनमें से किस नाते को मानना चाहते हो ? तब गोस्वामी जी ने बड़ी चतुराई से अपनी बात भगवान से कह दी, उन्होंने कहा कि -- *मोहि तोहि नाते अनेक* -- महाराज ! आपके और हमारे बीच में तो इतने तरह के नाते हैं कि उन सबको गिनाना भी सम्भव नहीं है। जितने मैंने गिनाए हैं, वे तो अपनी असमर्थता के कारण ही हैं । वस्तुत: तो हमारे-आपके बीच न जाने कितने अधिक नाते हैं। भगवान ने कहा, अच्छा तो तुम इन नातों में किस नाते को मुख्यता देते हो ? तुरत गोस्वामी जी ने उलटकर प्रभु से कहा -- महाराज ! *मोहि तोहि नाते अनेक मानिये जो भावै।* -- प्रभु ! आपको जो अच्छा लगे उसे आप मान लीजिए । भगवान ने कहा -- बड़ी अनोखी बात है, अरे ! नाता जोड़ने के लिए तो तुम आए हो और कह रहे हो कि आपको जो अच्छा लगे वह मान लीजिए। गोस्वामीजी ने कहा -- महाराज! मेरे सामने दो समस्याएं हैं। पहली तो यह कि आपके और मेरे बीच जब इतने नाते हैं तो मैं यह निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ कि आपसे सबसे अधिक लाभ किस नाते से लिया जा सकता है । और दूसरे प्रभु ! मैं चाहता हूँ कि नाते तो मैंने गिना दिए लेकिन *'मानिये जो भावै'* -- चुनाव आप ही करें । प्रभु ने कहा -- क्यों ? गोस्वामीजी ने कहा -- प्रभु! यदि मैं आपसे कहूँ कि मैं आपका पुत्र हूँ तो आप मुझसे यही कह देंगे कि तुम पुत्र के कर्तव्य का पालन करो। यदि कहूँगा कि मित्र हूँ तो आप कहेंगे कि मित्र के धर्म का पालन करो। और अगर मैं कहूँ कि आप गुरु हैं, तो आप कहेंगे कि शिष्य के धर्म का पालन करो। तो महाराज ! मुझे बड़ी चिन्ता यह हो गई है कि मैं इन धर्मों का पालन कर पाऊँगा कि नहीं ? इसलिए मैं यह चाहता हूँ कि यदि नाते मैं मानूंगा तो मुझे कर्तव्य का पालन करना पड़ेगा, पर अगर आप ही नाते मान लें तो आपको ही पालन करना पड़ेगा, भले ही मैं पालन कर पाऊँ या नहीं। आप यदि कह देंगे कि मैं तुम्हारा पिता हूँ तो मेरे ऊपर कुछ भार नहीं हैं। आप पिता हैं तो आप पिता के धर्म का पालन कीजिए। ऐसी स्थिति में चुनाव का भार मैं आप पर ही छोड़ देता हूँ कि इन नातों में से आप ही बता दीजिए कि आपको कौन-सा नाता प्रिय लग रहा हैं। सांकेतिक दृष्टि से यदि कहें तो इसका अभिप्राय है कि साधना के सन्दर्भ में व्यक्ति के लिए कभी-कभी यह निर्णय करना कठिन हो जाता है कि ईश्वर को हम किस रूप में देखें, ईश्वर से किस सम्बन्ध का निर्वाह करें ? 🌺 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

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sn.vyas Apr 18, 2021

...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *आप जिस नगर में रहते हैं,* *वहीं से यात्रा प्रारम्भ करेंगे।* *आपका मार्ग निश्चित रूप से* *एक कभी नहीं हो सकता।* °" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "° श्रीरामचरितमानस में कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग तथा समर्पण योग के समन्वय सूत्र का प्रतिपादन करते हुए एक ओर कहा गया कि सत्य के विषय में दावा नहीं किया जा सकता। यह भी एक पक्ष है, और -- *मैं बिल्कुल ठीक कह रहा हूँ* -- कागभुशुण्डि जी के इस दावे का दूसरा पक्ष है। गोस्वामीजी से पूछा गया कि शंकर जी तो कहते हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता और कागभुशुण्डि जी कहते हैं कि मैं दावे से कह रहा हूँ, परन्तु आपका विचार क्या है ? तो गोस्वामीजी ने कहा -- भई ! *जो वक्ता जहाँ पर बैठा हैं, वहीं से बोलता है।* कागभुशुण्डि जी सुमेरु शिखर पर बैठे हैं, वे वहाँ से दावा करते हैं। परन्तु गोस्वामीजी स्वयं ऐसा दावा नहीं करते। कवितावली रामायण में उनसे जब यह जिज्ञासा की गई कि -- आपकी दृष्टि में जीवन का फल क्या है ? तो वे तुरत गिनाने लगे -- *सिय-राम-सरूपु अगाध अनूप* *बिलोचन-मीनन को को जलु है।* *श्रुति राम कथा, मुख राम को नाम,* *हिएँ पुनि रामहि को थलु है।।* *मति रामहि सों, गति रामहि सों,* *रति राम सों, रामहि को बलु है।* कवितावली, उत्तरकाण्ड, ३७ -- पूछा गया महाराज ! यह सब लोगों का मत है ? तो तुलसीदासजी बड़ी नम्रता से बोले कि -- *सबकी न कहै,* भई ! कागभुशुण्डि जी भक्ति के आचार्य हैं, वे तो दावा कर सकते हैं, लेकिन मैं वैसा दावा कैसे करूँ ? मैं तो बस इतना कह सकता हूँ कि -- *सबकी न कहै, तुलसी के मतें* *इतनो जग जीवन को फलु है।।* -- कवितावली, उत्तरकाण्ड, ३७ इसका तात्पर्य है कि *आचार्य, आचार्य की भाषा में बोलेगा । सन्त, सन्त की भाषा में बोलेगा। भक्त, भक्त की भाषा में बोलेगा और कर्मयोगी, कर्मयोगी की भाषा में बोलेगा। आप जिस नगर में रहते हैं, वहीं से यात्रा प्रारम्भ करेंगे।* इसलिए *आपका मार्ग निश्चित रूप से एक कभी नहीं हो सकता। जितने सही मार्ग पर चलने वाले साधक हैं उनके मार्ग में भी भिन्नता है।* रामायण के अलग-अलग पात्रों के सन्दर्भ में यदि देखें तो आपको यही सूत्र मिलेगा। 📿 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

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sn.vyas Apr 17, 2021

: ...........!! *श्रीराम: शरणं मम* !!......... ।।श्रीरामकिंकर वचनामृत।। °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° *ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने वाले* *भी उसके स्वरूप को लेकर उलझ जाते हैं* *कि ईश्वर निर्गुण है या सगुण !* °"" "" "" "" "" "" "" "" "" "" "" ""° महात्मा तुलसीदास दोनों ही मान्यताओं को स्वीकार करते हैं। *'हिय निर्गुण नैननि सगुण' !* ऐसा कहकर मानस में ईश्वर को बाहर और भीतर सर्वत्र स्वीकार करते हुए इस संघर्ष अथवा विवाद को समाप्त करने की चेष्टा की गई। ईश्वर अन्तर्यामी के रूप में प्रत्येक प्राणी के हृदय में हो, यह तो ठीक है ही, पर भक्त की भावना पूर्ण करने के लिए वह सगुण-साकार रूप भी ग्रहण करता है। प्रातः स्मरणीय गोस्वामीजी का दृष्टिकोण बड़ा उदार और व्यापक है। उनका दृढ़ मत है कि -- *कर्म, उपासन, ज्ञान, वेद-मत सो सब भाँति खरो।* लेकिन भक्ति की महिमा एवं उपादेयता का उद्घोष करते हुए गोस्वामीजी कहते हैं -- *बिनु बिसवास भगति नहिं,* *तेहि बिनु द्रवहिं न राम।* *रामकृपा बिनु सपनेहुँ,* *जीव न लह बिश्राम।।* सत्, चित् और आनन्द की वास्तविक उपलब्धि के लिए सच्ची आस्था, निश्छल भावना और भक्ति की आवश्यकता है। भक्ति से ही जीवन रससिक्त हो सकता है। भक्ति के बिना तो जीवन शुष्क है। ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास के साथ भक्ति के बिना जीवन में आनन्द रस की सुखानुभूति नहीं हो सकती । भक्ति के मार्ग पर मनुष्य अपनी भावना और ध्यान को सहज अभ्यास से ही केन्द्रित कर सकता है जो अन्यथा दुष्कर है। *'राम ते अधिक राम कर दासा'* -- कितनी उदात्त भावना है कि राम के दास, राम के भक्त, राम के किंकर, राम से भी श्रेष्ठ हैं। ऐसी स्थिति अथवा उपलब्धि तो भक्ति से ही संभव हो सकती है। 👏 🌸 जय गुरुदेव जय सियाराम 🙏

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Pandurang Khot Apr 18, 2021

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Deepa methwani Apr 18, 2021

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deewan saini Apr 18, 2021

*गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी॥ यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा॥3॥ भावार्थ:-वे (वानर) पर्वतों और जंगलों में जहाँ-तहाँ अपनी-अपनी सुंदर सेना बनाकर भरपूर छा गए। यह सब सुंदर चरित्र मैंने कहा। अब वह चरित्र सुनो जिसे बीच ही में छोड़ दिया था॥3॥ *अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ॥ धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी। हृदयँ भगति भति सारँगपानी॥4॥ भावार्थ:-अवधपुरी में रघुकुल शिरोमणि दशरथ नाम के राजा हुए, जिनका नाम वेदों में विख्यात है। वे धर्मधुरंधर, गुणों के भंडार और ज्ञानी थे। उनके हृदय में शांर्गधनुष धारण करने वाले भगवान की भक्ति थी और उनकी बुद्धि भी उन्हीं में लगी रहती थी॥4॥ दोहा: *कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत। पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत॥188॥ भावार्थ:-उनकी कौसल्या आदि प्रिय रानियाँ सभी पवित्र आचरण वाली थीं। वे (बड़ी) विनीत और पति के अनुकूल (चलने वाली) थीं और श्री हरि के चरणकमलों में उनका दृढ़ प्रेम था॥188॥ चौपाई: *एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं॥ गुर गृह गयउ तुरत महिपाला। चरन लागि करि बिनय बिसाला॥1॥ भावार्थ:-एक बार राजा के मन में बड़ी ग्लानि हुई कि मेरे पुत्र नहीं है। राजा तुरंत ही गुरु के घर गए और चरणों में प्रणाम कर बहुत विनय की॥1॥ *निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ॥ धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी॥2॥ भावार्थ:-राजा ने अपना सारा सुख-दुःख गुरु को सुनाया। गुरु वशिष्ठजी ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया (और कहा-) धीरज धरो, तुम्हारे चार पुत्र होंगे, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध और भक्तों के भय को हरने वाले होंगे॥2॥ *सृंगी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा॥ भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें॥3॥ भावार्थ:-वशिष्ठजी ने श्रृंगी ऋषि को बुलवाया और उनसे शुभ पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया। मुनि के भक्ति सहित आहुतियाँ देने पर अग्निदेव हाथ में चरु (हविष्यान्न खीर) लिए प्रकट हुए॥3॥ दोहा: *जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा॥ यह हबि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई॥4॥ भावार्थ:-(और दशरथ से बोले-) वशिष्ठ ने हृदय में जो कुछ विचारा था, तुम्हारा वह सब काम सिद्ध हो गया। हे राजन्‌! (अब) तुम जाकर इस हविष्यान्न (पायस) को, जिसको जैसा उचित हो, वैसा भाग बनाकर बाँट दो॥4॥ दोहा: *तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ। परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ॥189॥ भावार्थ:-तदनन्तर अग्निदेव सारी सभा को समझाकर अन्तर्धान हो गए। राजा परमानंद में मग्न हो गए, उनके हृदय में हर्ष समाता न था॥189॥ चौपाई: *तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आईं॥ अर्ध भाग कौसल्यहि दीन्हा। उभय भाग आधे कर कीन्हा॥1॥ भावार्थ:-उसी समय राजा ने अपनी प्यारी पत्नियों को बुलाया। कौसल्या आदि सब (रानियाँ) वहाँ चली आईं। राजा ने (पायस का) आधा भाग कौसल्या को दिया, (और शेष) आधे के दो भाग किए॥1॥ *कैकेई कहँ नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ॥ कौसल्या कैकेई हाथ धरि। दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि॥2॥ भावार्थ:-वह (उनमें से एक भाग) राजा ने कैकेयी को दिया। शेष जो बच रहा उसके फिर दो भाग हुए और राजा ने उनको कौसल्या और कैकेयी के हाथ पर रखकर (अर्थात्‌ उनकी अनुमति लेकर) और इस प्रकार उनका मन प्रसन्न करके सुमित्रा को दिया॥2॥ *एहि बिधि गर्भसहित सब नारी। भईं हृदयँ हरषित सुख भारी॥ जा दिन तें हरि गर्भहिं आए। सकल लोक सुख संपति छाए॥3॥ भावार्थ:-इस प्रकार सब स्त्रियाँ गर्भवती हुईं। वे हृदय में बहुत हर्षित हुईं। उन्हें बड़ा सुख मिला। जिस दिन से श्री हरि (लीला से ही) गर्भ में आए, सब लोकों में सुख और सम्पत्ति छा गई॥3॥ *मंदिर महँ सब राजहिं रानीं। सोभा सील तेज की खानीं॥ सुख जुत कछुक काल चलि गयऊ। जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ॥4॥ भावार्थ:-शोभा, शील और तेज की खान (बनी हुई) सब रानियाँ महल में सुशोभित हुईं। इस प्रकार कुछ समय सुखपूर्वक बीता और वह अवसर आ गया, जिसमें प्रभु को प्रकट होना था॥4॥

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